3 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
हम अपने समर्पित एवं प्रिय साथिओं से करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं कि वसंत पंचमी 2026 के लिए उनके द्वारा भेजे गए योगदान आगे ही आगे पोस्टपोन हुए जा रहे हैं। अभी तक केवल तीन ही साथिओं ने समयदान और विवेकदान करके कुछ लेख भेजे हैं, जल्दी ही आपके समक्ष इन्हें प्रस्तुत किया जायेगा।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख बहुत ही संक्षिप्त है और कल वाले भाग 2 का दूसरा एवं समापन लेख है। अखंड ज्योति फ़रवरी 1997 अंक में “वासंती उल्लास अंग-प्रत्यंग में उमगता दिख पड़े” शीर्षक के अंतर्गत पुनर्गठन वर्ष (1997) में नए संकल्पों के लिए मार्गदर्शन दिया गया है। कुछ ही वर्षों में 21वीं सदी का शुभारम्भ होने वाला था, वसंत के समय नवीन उल्लास था और नए कार्यक्रमों की योजना बन रही थी। पाठक स्वयं ही देख सकते हैं कि 21वीं सदी के प्रथम 26 वर्षों में सम्पूर्ण विश्व में क्या कुछ उथल पुथल हो रहा है, नकारात्मक शक्तियों का बस चले तो आज ही, एक ही चुटकी में सारे विश्व का खात्मा कर दें लेकिन ऐसा संभव नहीं है। विधाता ऐसा होने नहीं देगा, महाकाल की शक्ति नकारत्मकता का सिर कुचल कर दी दम लेगी। परमपूज्य गुरुदेव, परम वंदनीय माताजी को महाकाल की शक्ति पर एवं अपनी संतान पर अटूट विश्वास है। इसी अटूट विश्वास पर आज के लेख में नए संकल्प लिए गए हैं, नया मार्गदर्शन मिल रहा है। दृढ मातृशक्ति, अटूट शिष्यत्व को दर्शाती संलग्न शार्ट वीडियो पाठकों के ह्रदय में अवश्य ही एक चिंगारी को स्पार्क करेगी।
साथिओं को बताना उचित समझते हैं कि अखंड ज्योति के प्रत्येक अंक ने वसंत पर्व से सम्बंधित इतने उत्कृष्ट लेखों को संजों कर रखा हुआ है कि लेखक का दुविधा में पड़ना स्वाभाविक है कि किसे छोड़ा जाये और किसे प्रस्तुत किया जाए, लेकिन फिर सांत्वना मिलती है कि 2026 तो शताब्दी वर्ष (एक नहीं तीन-तीन) है, सारा वर्ष इन्हीं विषयों का संकल्प लिया हुआ है।
वसंत को ही आगे बढ़ाते हुए कल से, अप्रैल 1990 की अखंड ज्योति में प्रकाशित 19 छोटे-छोटे लेखों का शुभारम्भ करने की योजना है।लेख 19 जरूर हैं लेकिन पृष्ठ केवल 45ही हैं।
“21वीं सदी में हमें क्या करना होगा” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुई इस विशेष लेखमाला में गुरुदेव की आशाएं/निर्देश एवं सन्देश हमें ऊँगली पकड़ कर उज्जवल भविष्य की ओर ले जायेंगें, So fasten your seatbelts and get ready for a spiritual flight starting tomorrow.
आइए विश्वशांति की कामना करें, इसके अर्थ को समझें और आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करें:
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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नवसृजन के भागवत मुहूर्त की इस बेला में जब हम देव संस्कृति दिग्विजय के अनेकों सोपान पार कर आज एक समानान्तर धर्मतंत्र की विराट शक्ति का स्वरूप सबके समक्ष रख पाने में समर्थ हो पाए हैं, तो उसके मूल में युगऋषि का, मातृसत्ता का तप है, उनका पुण्य है एवं वह ब्राह्मणत्व है जिसकी सिद्धि आज चहुँ ओर देखी जा सकती है। प्रत्येक वसंत पर्व इन सभी को स्मरण दिलाता हुआ, हम सभी में नूतन शक्ति का प्राण संचार करता आता है एवं यही संकेत देता है कि हम ऋषियुग्म के बताए राजमार्ग पर चलकर निश्चित ही उस लक्ष्य को पा लेंगे, जिसके लिए वे हमें संकल्प दिला गए हैं।
“संस्कार महोत्सवों” की अभिनव श्रृंखला सारे भारत में चल पड़ी है। सारे भारत भर में उनकी माँग है। सभी जिला-स्तरीय नगर या कस्बे भी इनका आयोजन करने की क्षमता रखते हैं,कार्यकर्तों में उत्साह उभरना स्वाभाविक भी है, हमें योग्य साथिओं की पीठ थपथपानी चाहिए।
वर्ष 1997 को “पुनर्गठन वर्ष” नाम दिए जाने के बाद सभी से यह कह दिया गया था कि अपना संपूर्ण उत्साह गाँव में, गायत्री यज्ञ और घर-घर में गायत्री उपासना के शंखनाद के साथ संस्कार रूपी बीज के अंकुरित- पल्लवित होने योग्य पृष्ठभूमि बनाने के निमित्त नियोजित कर दें। बहुत कुछ स्थानों पर ऐसा हो भी रहा है लेकिन कहीं-कहीं,बिना किसी प्लानिंग के,बिना किसी पूर्व तैयारी के, बड़े आयोजनों का, विराट भव्य समारोहों का आग्रह उभरकर आ जाता है।
अभी तक जो संस्कार महोत्सव संपन्न हुए हैं, उनके माध्यम से,उन स्थानों पर बड़ा ही विलक्षण वातावरण बना है एवं गायत्री यज्ञ व एक प्रकार से देव संस्कृति के प्रति रुझान अत्यधिक अनुपात में बढ़ा है। ये संस्कार महोत्सव मूलतः उन स्थानों पर किये गये, जहाँ मिशन का आलोक इतनी तीव्र गति से नहीं पहुँच पाया था। उत्तर भारत, पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर एवं दक्षिणी भारत के कई भागों से उत्साह उभर कर आया है एवं वहाँ उन्हें संपन्न किए जाने की प्रक्रिया ज़ोर पकड़ रही है, तैयारियाँ चल रही हैं एवं इस वर्ष की शरद पूर्णिमा तक संभवत: बहुत बड़ा क्षेत्र इस प्रसार में लिया जा सकेगा।
अब जो महत्वपूर्ण कार्य है,उसे समझना है।
बड़े बड़े महानगरों में पंहुचने का कार्य, हाँ मुम्बई जैसे महानगर में एक “विराट ज्ञानयज्ञ” सम्पन्न कराने का कार्य करना है। इन आयोजनों में इलेक्ट्रॉनिक एक्जीबिशन, मल्टीमीडिया डिस्प्ले, देवात्मा हिमालय का दिग्दर्शन एवं विराट दीप यज्ञ को ही प्रधानता दी जाएगी। यह प्रयोग निश्चित ही पाश्चात्य सभ्यता के घातक प्रभाव से वहाँ की युवाशक्ति व अन्यों को उबारने में समर्थ हो सकेगा। इसके अलावा अन्य प्रान्तों में “ग्राउण्ड वर्क” करके सक्रियतापूर्वक संस्कार महोत्सवों की पृष्ठभूमि बनाने वाले अधिकाधिक समयदानियों की आवश्यकता पड़ेगी। यह पूर्ति अपने भावनाशील परिजन ही करेंगे व इसी वसंत पर्व पर “अभी नहीं तो कभी नहीं” का संकल्प लेंगे।
गायत्री परिवार में समयदानी भाई बहिनों की कभी भी कमी नहीं रही है। चाहे शांतिकुंज का मासिक श्रमदान हो, मुंबई अश्वमेध जैसा विशाल आयोजन हो समयदानिओं ने हमेशा ही बढ़ चढ़ कर गुरुकार्य में हाथ बंटाया हैं। इसका साक्षात उदाहरण वैरागी द्वीप में अभी कुछ दिन पूर्व संपन्न हुए भव्य शताब्दी समारोह में हम सबने देखा। इस तथ्य को सार्थक करते, इसी ज्ञानप्रसाद लेख के साथ कुछ चित्र अटैच किए हैं। कुछ ही दिनों में श्रद्धावान साथियों ने एक विशाल शताब्दी नगर का विकास कर डाला।
वंदनीय माताजी बता रही हैं कि यदि हम इस वर्ष ज्ञानयज्ञों, विज्ञान सम्मत प्रतिपादन वाली प्रदर्शनियों तथा संस्कार महोत्सवों को सुचारु रूप से संपादित कर सके तो विश्वास किया जाना चाहिए कि अगले वर्ष तक काफी कुछ वातावरण गायत्रीमय एवं यज्ञमय होता दिख पड़ने लगेगा। विराट भव्य आयोजनों में भारी शक्ति व्यय करने के स्थान पर प्रयोगों का यह क्रम चल पड़ा है जो अब सभी को हृदयंगम हो रहा है क्योंकि इससे ऊर्जा का एक जैसा वितरण होने में मदद मिलती है।
एक चूक जो हम सबसे होती आई है कि अति उत्साह में आकर हम समाज निर्माण के कार्यों में तत्पर हो जाते हैं और अपनी साधनात्मक दिनचर्या या जीवन को गौण मान लेते हैं । साधनात्मक पराक्रम अपने स्थान पर जरूरी है एवं वही एकमात्र संबल भी है जो साधक को पथभ्रष्ट, अहंकारी, उन्मादी नहीं बनने देता। लेकिन न्यूनतम ही सही किसी न किसी रूप में दैनिक जीवन में साधना का समावेश अत्यन्त जरूरी है।
माताजी कहती हैं कि यदि श्रमदान, समयदान का यह क्रम चलता रहे तो हमारे आस-पास परमपूज्य गुरुदेव के श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित कार्यकर्त्ताओं की एक टीम खड़ी होगी, न कि कुछ कच्ची बुद्धि के खुशामदीपसंद समर्थकगण, जो हमें अपना माध्यम बनाकर कुछ स्वार्थपूर्ति करते हैं। विराट से विराटतम होते जा रहे संगठन के लिए यह समझना अत्यन्त जरूरी है।
इस वसंत पर्व पर हम सबका, सामूहिक स्वरूप उभरकर आए एवं इस वसंत पर्व से वासंती लहर हमारी अंदर की ठण्डक को दूर कर उसमें कुछ गरमाई ला दे, यही हम सबकी प्रार्थना होनी चाहिए। हम कालनेमि के मायाजाल में न फँसने पाएँ, हमारा आत्मबल इतना बढ़ता जाए कि हम प्रभावित होने के स्थान पर औरों को प्रभावित कर इस सशक्त आंदोलन में घसीटते चलें, यही हमारा संकल्प इस पावन पर्व पर होना चाहिए।
वासंती बयार बेअसर न होने पाए, उसकी यह संचार क्षमता समाप्त न होने पाए, यही हम सब की इस ईशसत्ता से प्रार्थना होनी चाहिए। जिस वासंती स्पर्श ने भगतसिंह को मतवाला बनाकर फाँसी का फंदा चूमने की ओर प्रेरित किया था, क्या उसे पाकर हम भी एक कायर, नीच, कुत्सित मनुष्य की भांति अज्ञान की गुलामी भरी जिन्दगी से बाहर निकलना नहीं चाहेंगे? अवश्य चाहेंगे !!
हम सबका दृढ़मत से यह शिव-संकल्प इस पावन वेला में उभर कर आना चाहिए कि अब बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का एक-एक क्षण राष्ट्रभूमि की सेवा में नियोजित हो। मलीनता व प्रदूषणयुक्त वायु की तरह घोटालों-षड्यंत्रों, कानाफूसियों के झोंके, हमें स्पर्श भी न करने पाएँ एवं हम एक साथ एक स्वर से समूह गान करते हुए,गली-गली जाकर,नुक्क्ड़ सभाओं के माध्यम से सोये हुओं को जगाने का पुनीत करें। ऐसा करते हुए हम अपनी मातृसत्ता व गुरुसत्ता को आश्वासन दे सकें कि अभी भी इस धरती पर वासंती आत्माहुति देने वाले महामानवों की संख्या कम नहीं हुई है,यह संख्या तब तक निरन्तर बढ़ती ही चली जाएगी,जब तक कि सांस्कृतिक क्रान्ति के माध्यम से यह राष्ट्र, सारे विश्व का जगद्गुरु नहीं बन जाता है।
ऐसे ही विचारों से ओतप्रोत हमारी सबकी वंदनीय माताजी की शार्ट वीडियो इस लेख के साथ संलग्न की है जिसमें माताजी परमपूज्य गुरुदेव को हम बच्चों की तरफ से आश्वासन दे रही हैं।
किसी के Behalf पर कोई आश्वासन तो तभी दे सकता है जब उसे पूरा एवं अटूट विश्वास हो। गुरुदेव ने एक लाख यज्ञ और एक करोड़ व्यक्तिओं की बात की लेकिन माताजी ने तो दो लाख यज्ञ और दो करोड़ व्यक्तिओं का आश्वासन दे डाला, पता है क्यों ? क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के संकल्प पर और गुरुदेव का शक्ति पर पूरा विश्वास था। किया धरा तो सब गुरुदेव का ही है, हम बच्चे तो मात्र रगमंच की कठपुतलियां ही हैं।
धन्यवाद, जय गुरुदेव

