1 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
2 जून 1990, गायत्री जयंती वाले दिन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने स्थूल शरीर का स्वेच्छा से त्याग किया। वर्ष 1991 का वसंत, एक ऐसा वसंत था, ऐसा पहला वसंत था, जिसे परमपूज्य गुरुवर की अनुपस्थिति में मनाया गया था। परम वंदनीय माताजी के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुए, इस वसंत का अति संक्षिप्त विवरण, मार्च 1991 की अखंड ज्योति के एक ही पन्ने में समाहित था। इस विवरण का शीर्षक था “इस वसंत का पावन सन्देश”, आज के ज्ञानप्रसाद लेख का प्रथम भाग इस सन्देश को चरितार्थ कर रहा है ।
लेख के दूसरे भाग में वर्ष 1997 के वसंत का संक्षिप्त वर्णन है। इस वर्ष को “पुनर्गठन वर्ष” की संज्ञा दी गयी थी। इस भाग का समापन तो कल ही हो पायेगा लेकिन हम देख पायेंगें कि 20वीं शताब्दी के अंतिम चार वर्षों (1997 से 2000) में, न केवल गायत्री परिजनों को बल्कि सारे विश्व को हमसे क्या आशाएं हैं, सारा विश्व हमारी तरफ क्यों देख रहा है।
तो साथिओ, करबद्ध निवेदन करते हैं, प्रार्थना करते हैं कि परमपूज्य गुरु के चरणों में समर्पित होकर, विश्वशांति की कामना के साथ, हर बार की भांति आज भी, एक-एक शब्द को समझकर, उसकी भावना को अंतर्मन मन में उतार कर आज के लेख का अमृतपान करें, यही उस गुरु की सच्ची भक्ति होगी।
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आज के ज्ञानप्रसाद लेख का पहला भाग:
“पावन पर्व बसन्त कह रहा, हम उपास्य (जिसकी हम उपासना करते हैं) को भूल न जायें। नहीं बहाएँ आँसू ही हम, सृजन कार्य का शंख बजायें।”
इन पंक्तियों के सस्वर गायन के साथ पूज्य गुरुदेव की लाइफ हिस्ट्री पर बनी विराट प्रदर्शनी के उद्घाटन के पश्चात् 1991 के वसंत पर्व का शुभारंभ हुआ। वन्दनीय माताजी ने 5000 परिजनों को उद्बोधन देते हुए कहा,
“इस अवसर पर जुदाई का दर्द, एक पीड़ा, एक कसक हम सबके मन में है । किन्तु यह वसंत पर्व जो स्थूल शरीर से पूज्य गुरुदेव की अनुपस्थिति में पहला पर्व है, हमें सतत् अपनी जिम्मेदारियों की याद दिला रहा है। वे सूक्ष्म व कारण शरीर से संव्याप्त होकर सतत् हमें स्मरण दिला रहे हैं कि जो कार्य अधूरा छूटा पड़ा है उसे उन ब्रह्मबीजों (हम सब बच्चे) को पूरा करना है जो ब्रह्मकमल के रूप में विकसित होने के लिए वे छोड़ गए हैं।”
वंदनीय माताजी ने भावविव्हल होकर हृदय को छू लेने वाली अपनी वाणी में कहा:
“यह दीक्षा दिवस है, संकल्प दिवस है। गुरुदेव को याद करके सहज ही आँसू छलक उठते हैं फिर भी दृढ़तापूर्वक रोक लगानी होगी। पूज्य गुरुदेव अपने आध्यात्मिक जन्मदिवस पर कभी आँसू पसन्द नहीं करते थे। न खुशी के, न दुःख के । वे तो इस समय ऊपर से बैठे यह देख रहे हैं कि जिन दायित्वों को वे छोड़ कर आए हैं, उन्हें निभाया जा रहा है कई नहीं।”
माताजी एक वर्ष पूर्व प्रकाशित हुए, मात्र 8 पन्नों के “बसंतपर्व पर महाकाल का सन्देश” नामक परिपत्र को रेफर करते बता रही हैं कि युग परिवर्तन का बीजारोपण हो चुका। अब खाद पानी भर देना शेष है। यह कार्य परिजन कर सकें, उन्हें परिपूर्ण शक्ति मिल सके, विद्रोह कर रहे शरीर रूपी पिंजर से वे मुक्ति चाहते थे। उन्होंने इस मुक्ति की पूर्व घोषणा गायत्री जयंती से 5 माह पूर्व ही वसंत की पूर्ववला में कर दी थी।
वंदनीय माताजी ने यह बताते हुए आश्वासन भरे शब्दों में कहा:
“वे मुझे हर बच्चे को स्नेह-ममता बाँटते रहने का तथा उँगली पकड़ कर मार्ग दिखाते रहने का दायित्व सौंप गए हैं जिसे मैं सतत् निभाती रहूँगी। यह मिशन हजारों-लाखों वर्षों तक चलेगा क्योंकि दैवी शक्ति इसके साथ है। ऐसे योग्य हाथों में शक्तिशाली समर्थ परोक्षसत्ता के हाथों में मिशन का सूत्र संचालन है कि न तो किसी को शंका करनी चाहिए, नहीं भटकना चाहिए। यदि यह गुरुदेव पर टिका मिशन होता तो उनके साथ ही समाप्त भी हो जाता। यह शक्ति पर टिका अभियान दैवी अभियान है। विवेकानन्दों-निवेदिताओं ने अभी अपनी प्रसुप्त क्षमता को पहचाना नहीं है। यदि सभी जाग्रत आत्माओं को यह अनुमान हो सके कि वे क्या हैं और किन उद्देश्यों के लिए उनका अवतरण हुआ था तो देखते-देखते हज़ारों अड़चनों के बीच भी नवसृजन होता चला जाएगा । पूज्यवर की परोक्ष जगत से व मेरी प्रत्यक्ष जगत में तपश्चर्या इन्हीं उद्देश्यों के निमित्त है।”
अंत में वन्दनीय माताजी ने कहा कि गुरु और शिष्य परस्पर मजबूत धागों से जुड़े होते हैं। आज गुरुजी का बोध दिवस है, जन्मदिवस है। इस अवसर पर हम सब उन्हें श्रद्धांजलि दें कि आजीवन गुरुदेव के पद चिन्हों पर ही चलेंगे, वैसा ही उल्लास मन में बनाए रखेंगे तथा विद्याविस्तार के सभी महत्वपूर्ण दायित्वों को अंतिम स्थिति तक पहुँचा कर रहेंगे। लोकमंगल के लिए ही सबका जीवन समर्पित होगा। घर घर में गुरुजी के विचार पहुँचा कर ही रहेंगे ।
गुरुदेव की अनुपस्थिति का पहला वसंत,अखण्ड दीपक के दर्शन व नमन-वन्दन के पश्चात्, संध्याकाल में नये बने प्रज्ञारथों के 100 इंच के पर्दों पर, नयी बनी तीन वीडियो फिल्मों के साथ सम्पन्न हुआ |
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आज के ज्ञानप्रसाद लेख का दूसरा भाग:
वसन्त का आगमन हर वर्ष होता है एवं हर बार वह ठिठुरन भरी सर्दी से त्राण दिलाता हुआ एक गुनगुनी-सी गर्मी, जो उल्लास का प्रतीक है, के आगमन का निमित्त बन जाता है। वसन्त पर्व, वासन्ती रंग युगों-युगों से विवेक और बलिदान का प्रतीक बना प्रेरणा देता रहा है। शहीदों ने “वसन्ती चोला रंग डालो, मेरा रंग दे वसन्ती चोला” एवं संतों ने इसीलिए तो पहन लिया था यह केसरिया बाना। यह ड्रेस कोड अंतःकरण के बलिदान का प्रतीक है।
वसन्ती शब्द में एक विलक्षण-सी मस्ती समायी पड़ी है। यह लौकिक भी है व अलौकिक भी, जिसकी रसानुभूति उन्हीं को हो पाती है, जो इसे सही अर्थों में समझ पाते हैं।
वसन्त पर्व गायत्री परिवार, युग निर्माण मिशन के प्रणेता, अधिष्ठाता परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का आध्यात्मिक जन्मदिवस होने के साथ-साथ तत्वबोध (फिलॉसॉफी) का भी पर्व है। मिशन हर वर्ष अपना वार्षिकोत्सव इन्हीं दिनों मनाता है। इसी दिन महागुरु (दादागुरु) की प्रेरणा ने युवाशिष्य के अंतःकरण में प्रवेश कर, उनके अस्तित्व के हर कण को अलौकिक बोध प्राप्त करा दिया था । शिष्य के भावभरे समर्पण ने उसे अपने महागुरु के साथ एकाकार कर दिया। उनके व्यक्तित्व में एक विलक्षण आध्यात्मिक चेतना ज्योतिर्मान हो उठी थी। सहस्राब्दियों से अनीति-अज्ञान अभाव के अंधकार से घिरे मानव समुदाय को सम्प्रदाय-जाति की नीच मान्यताओं से ऊपर उठाकर “एक मानवधर्म व एक संस्कृति” की ओर ले जाकर एक विराट विश्व ही नहीं, युग के नवनिर्माण का संकल्प इसी पावन दिन लिया गया था।
इसी दिन आगे के वर्षों में वे सारे महत्त्वपूर्ण निर्धारण किए गए, जिन्होंने मिशन की आधारशिला रखी, मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग का स्वप्न साकार किये जाने का एक ब्ल्यू प्रिन्ट तैयार किया था ।
1997 का वसंत पर्व 11 फ़रवरी को ऐसे क्षणों में आया है जब हम संक्रान्ति काल की अंतिम भयावह घड़ियों से गुजर रहे थे । भारतवर्ष का भविष्य निश्चित ही हमारे सामने स्वर्णिम संभावना लिए खड़ा था किन्तु प्रसव काल की वेदना भरी घड़ियाँ भी इन्हीं कुछ वर्षों की अवधि में अनुभव की जा रही थीं।
ऐसे में यह विराट गायत्री परिवार जो करोड़ों व्यक्तियों की प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है, प्रगतिशील धर्मतंत्र का पर्यायवाची है एवं उन लोगों की आशा का भी केन्द्रबिन्दु बना हुआ है जो गायत्री परिवार से सम्बंधित नहीं हैं।
गुरुसत्ता के “तत्त्वबोध दिवस” पर हम उन्हें एक ही आश्वासन दे सकते हैं कि यह 5-6 वर्षों की घड़ियाँ चैन से बैठने की नहीं, सक्रियता का लेवल बढ़ा देने वाली हैं ।
जिस प्रकार वसंत में वृक्षों पर फूलों का यौवन साफ़ दिखता है, उसी प्रकार प्रत्येक वसंत को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा संचित वटवृक्ष पर देवमानवों रुपी संपदा अपने पूर्ण यौवन पर होता है। यह देवमानव फूलने फलने की तैयारी में लगे होते हैं एवं सारी वसुधा को अपने आम्र बौरों की सुवास से महका देना चाहते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ रहा शायद ही कोई पाठक होगा जो आम्र बौरों से परिचित न हो, भारत के कई भागों में इसे आम्र भूर भी कहा जाता है। इन्हीं फूलों से रसदार फल बनते हैं।
5-6 वर्ष की इस अवधि में अधिक से अधिक समयदानी सक्रियता बढ़ाते हुए अपना बलिदानी संकल्प को पूरा कर दिखाना चाहते हैं। यही अपेक्षित भी था। गुरुदेव के ऐसे अंशावतार जो इन दिनों इस धरती पर प्रकट हुए हैं, प्रज्ञावतार की सत्ता का हाथ बंटाना, एक बहुत ही सौभाग्यशाली अवसर है, जो केवल दुर्लभजनों को ही प्राप्त होता है। अपने समय का,श्रम का,अर्थ आदि का बलिदान करना ही सच्ची गुरुभक्ति है। हम तो यही कहेंगें कि कोई भी ऐसा मनुष्य न होगा जिसे ईश्वर ने किसी न किसी सम्पदा का वरदान न दिया हो, बस यहाँ पर उसी सम्पदा के बलिदान की बात हो रही है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से बार-बार इसी सन्देश का प्रचार किया जाता रहा है। अब समय कुछ करने का है, केवल नारे लगाने से,केसरी कपड़े पहनने से, तोते की भांति गायत्री मंत्र रटने से, बिना अर्थ समझे यज्ञकुंड में आहुतियां देने से कुछ नहीं होने वाला। ऐसे सन्देश से हमारे फेसबुक फ्रेंड्स इतने प्रभावित हुए हैं कि मात्र 2 दिन में ही 50000 व्यूज प्रदान करा दिए, सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
वसंत वेला, जिसकी उल्लास की चहक व ज्ञान की महक, वर्ष में एक बार ही आती है और गुरुदेव के मानसपुत्र (हम सब) उस उल्लास से अभिपूरित न हों, यह कैसे हो सकता है? ऐसी वेला में हर परिजन से आशा की जाती है कि वह अपने घर,अपनी शाखा, अपने प्रज्ञामण्डल, स्वाध्याय मण्डल, शक्तिपीठ आदि में सामूहिक अखण्ड जप में भागीदारी करे और युगऋषि की चेतनसत्ता का एक अंश स्वयं में समाहित करने का भावभरा संकल्प ले। वसंत का समय उल्लास और एनर्जी के कारण ही त्याग एवं बलिदान की ओर मोड़ पाने में सक्ष्म है। रियल लाइफ में भी अक्सर देखा गया है कि अधिकतर संकल्प (Resolutions) वर्ष के इसी समय में लिए जाते हैं
यही पर्व मिशन का वार्षिकोत्सव पर्व भी है। माँ सरस्वती का जन्मदिवस होने के कारण सद्ज्ञान-विस्तार का पर्व भी है यह। ऐसे में सामूहिक आयोजन जिसमें पर्वों की प्रेरणा की पुण्य प्रक्रिया द्वारा सभी तक युगऋषि का जीवन संदेश पहुँचाया जाता है, हर स्थान पर आयोजित होना चाहिए। यह लकीर पीटने की तरह न हो बल्कि इसमें पूर्व की प्रगति समीक्षा एवं आगे के महत्वपूर्ण निर्धारणों की चर्चा हो ।
अब इक्कीसवीं सदी में मात्र गिने- चुने चार वर्ष शेष रह गए हैं। कैसे हम आशावाद को जाग्रत-जीवन्त बनाए रख सकते हैं एवं अपने क्रिया-कलापों को आदर्शवादी बनाकर “कालनेमि” की माया से नितान्त अप्रभावित रह युगचेतना का संचार कर सकते हैं, यह अपेक्षा सभी हमसे रख रहे हैं।
आज के लेख का यहीं पर मध्यांतर होता है। कल इस भाग का दूसरा एवं अंतिम भाग प्रस्तुत किया जायेगा।
जय गुरुदेव, धन्यवाद्
