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स्वामीजी के ह्रदय में “जनसाधारण की चिंता” की धधकती ज्वाला-लेख श्रृंखला का 14वां लेख 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का सदैव प्रयास रहता है कि प्रत्येक लेख Self-contained हो,उसे समझने के लिए पाठकों को किसी भी तरह की रिसर्च न करनी पड़े। इसी उद्देश्य को ह्रदय में धारण करते हुए, लेखों को सरल और कम्पलीट करने के लिए, कहीं से भी Tested and verified जानकारी मिले उन्हें शामिल किया जाता है। आशा की जाती है कि साथिओं को हमारे प्रयास का लाभ मिल रहा होगा। 

आज के लेख का शुभारम्भ करने से पहले,शनिवार के स्पेशल सेगमेंट में साथिओं के सहयोग के लिए धन्यवाद करते हैं। साक्षात् परिवार की भावना,हृदयों की विशालता और यथासंभव सक्रियता ने एक बार फिर से हमारे अंदर शक्ति का संचार किया है। 

प्रत्येक लेख की भांति आज का लेख भी ऐसा ज्ञान प्रदान करा रहा है जिसे हर पाठक को अंतर्मन में उतारना ही उद्देश्य होना चाहिए,इससे कम में बात बनने वाली नहीं है।

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स्वामीजी के जीवन में एक नये अध्याय का श्रीगणेश: 

स्वामीजी ने भारत आते ही गुरुभाइयों के साथ रहते हुए, संगठन के कार्य में मनोनियोग करना आरम्भ कर दिया। अपनी  “जननी जन्मभूमि” की सेवा में अपने आपको समर्पित कर देने के लिए उन्होंने नवयुवकों का आह्वान किया। उनके आह्वान के संगीत ने सबका हृदय छू लिया। उन्होंने कहा:

आगे चल कर इन शब्दों को यूट्यूब वीडियो के माध्यम से सुनते हैं। 

मार्च 1897  के अन्तिम सप्ताह में स्वामी रामकृष्णानन्द वेदान्त के प्रचार के लिए मद्रास भेजे गये। स्वामीजी की सेवाभावना से प्रेरित होकर स्वामी अखण्डानन्द मुर्शीदाबाद में दुर्भिक्ष पीड़ितों की सेवा में जुट गये। उसी वर्ष स्वामी त्रिगुणातीतानन्द ने दिनाजपुर जिले में एक दुर्भिक्ष-सेवा केन्द्र खोला और चारों तरफ बहुत-से गाँवों में फैले अकाल पीड़ितों की सेवा करने लगे। उसी वर्ष स्वामी शिवानन्द प्रचार करने श्रीलंका भेजे गये। उधर अमेरिका में स्वामी सारदानन्द और स्वामी अभेदानन्द सफलता पूर्वक वेदान्त-प्रचार का कार्य चलाये जा रहे थे। जनसेवा का कार्य भी फैल रहा था।

आने वाले लेखों में स्वामीजी की कार्यस्थली का और अधिक व्यापक दृश्य दिखने वाला है।   

इन सब कार्यों को जारी रखने में स्वामीजी ने अपनी सारी शक्ति व्यय कर दी,परिणामवश  उनका स्वास्थ्य टूट गया। उनका गिरता स्वास्थ्य देख उनके गुरुभाई चिन्तित हुए। चिकित्सकों के परामर्श पर स्वास्थ्य सुधार के लिए उन्हें दार्जिलिंग जाना पड़ा लेकिन वे ज़्यादा दिन तक वहाँ ठहर नहीं सके। 

उन्होंने कहा था:

उस चिन्ता ने मानों उन्हें अशान्त कर डाला था। वापिस लौटकर वे फिर संघ गठन के कार्य में जुट गये।

1967 से प्रकाशित हो रहे “अखिल भारतीय विवेकानंद युवा महामण्डल” के ब्लॉग में प्रकाशित जानकारी के अनुसार 1897 में जब स्वामी जी अमेरिका से लौट कर आये थे तो वह  कोलकाता के बालराम मन्दिर’ में रह रहे थे। उन दिनों के कोलकाता का रहन सहन अलग तरह का था। मन्दिर शब्द का का अर्थ वास्तव में घर ही होता है, अर्थात घर को मंदिर ही समझा जाता था।

आज बालराम मंदिर एक महत्वपूर्ण मंदिर और रामकृष्ण मठ की शाखा है, जो 7, गिरीश एवेन्यू, बाघ बाजार, कोलकाता में स्थित है। यह मंदिर श्रीरामकृष्ण परमहंस के शिष्य, बालराम बोस का निवास स्थान था। 

स्वामीजी ने 1 मई 1897 को, रामकृष्ण मिशन की स्थापना के लिए पहली बैठक बालराम मंदिर में आयोजित की थी। उसी दिन से, यह मंदिर पूजा स्थल और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बन गया है, जो सभी को सांत्वना और मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह विभिन्न आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेता है, जनसमुदाय  को सशक्त बनाने और सार्वभौमिक भाईचारे (Universal brotherhood) का संदेश फैलाने का प्रयास करता है। मंदिर का माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है, जो आत्म-चिंतन और ध्यान के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।

इसी ब्लॉग के यूट्यूब चैनल का  लिंक साथिओं के साथ शेयर कर रहे हैं जिसमें “बहु रूपों में खड़े तुम्हारेआगे और कहाँ है ईश” को वर्णित किया गया है।

हमारे गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी जिस “व्यक्ति निर्माण सिद्धांत” की बात हमें समझाने में  प्रयासरत हैं, स्वामी विवेकानन्द ने उसी सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए, भविष्य के विकसित और श्रेष्ठ भारत का एक महान स्वप्न देखा था। उन्होंने उस परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए “एक मास्टर प्लान” भी तैयार किया था। उनके मास्टर प्लान का केन्द्रीय विचार सभी देशवासियों के लिए सच्ची शिक्षा के द्वारा अच्छे नागरिक और प्रबुद्ध नेताओं, Enlightened Leaders का निर्माण करना था  जिनके पास तीक्ष्ण बुद्धि-संपन्न मस्तिष्क (Head) और फौलादी मांस-पेशीयों वाले शरीर (Hand) के साथ ही एक ऐसा अनंत एवं विशाल ह्रदय (Heart) भी हो जो करोड़ों देशवासियों के लिए रोता हो, उनके दुःख-तकलीफों  को दूर करने की तीव्र व्याकुलता से भरा हुआ हो।  स्वामीजी का विश्वास युवा पीढ़ी, नई पीढ़ी में था। वे कहते थे,: 

स्वामीजी का स्वप्न था कि उन्हें 1000 तेजस्वी युवा मिल जाएं तो वह भारत को विश्व शिखर पर पहुंचा सकते हैं।

ऑनलाइन सोर्सेज में वर्णन आता है कि बलराम मन्दिर में कुछ युवा राजनैतिक  नेता स्वामी जी से मिलने आये हुए थे। उन्होंने स्वामीजी से पूछा कि देश में इतनी सारी समस्यायें हैं, आप बताएं  कि इन सबसे छुटकारा पाने का क्या उपाय है? 

पश्चिम की संगठन-शक्ति ने स्वामीजी को मोहित कर लिया था। संगठन के बिना किसी भी कार्य को स्थायी रूप नहीं दिया जा सकता। इसीलिए उन्होंने धर्म-प्रचार और जनसेवा के कार्य का विस्तार करने के लिए, संन्यासी और गृहस्थ भक्तों को साथ लेकर “रामकृष्ण मिशन” नाम से एक संघ का गठन किया। इस संघ का उद्देश्य और आदर्श “आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” था। ऋग्वेद का यह महावाक्य मानव जीवन का एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इस महावाक्य के अनुसार मानव जीवन के दो उद्देश्य हैं। 

1पहला: आत्म-साक्षात्कार(Self-realization) एवं मोक्ष (Salvation)

2 दूसरा: जगत हिताय, दूसरों के कल्याण के लिए,जगत की बेहतरी और उत्थान (Upliftment) 

इस मंत्र के अनुसार जीवन में इन दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करना आवश्यक है। वेद और उपनिषद हमें इन दो रास्तों में से किसी एक को चुनने के लिए नहीं कहते बल्कि इन दोनों पर एक साथ चलने के लिए प्रेरित करते हैं। आध्यात्मिक विकास का अर्थ संसार का त्याग (मुक्ति) नहीं बल्कि जागरुकता और करुणा के साथ जीवन जीना है। मुक्ति का अर्थ आंतरिक स्वतंत्रता है। अहंकार, स्वार्थ और भय के बंधन से मुक्ति है। जब तक मन पर अहंकार और स्वार्थ हावी रहते हैं,जब तक मनुष्य  केवल स्व-केंद्रित (Self-centered)  इच्छाओं से बंधा रहता है, जब तक मनुष्य भय की क़ैद में ग्रस्त हैं तब तक न तो वह सही मायने में स्वतंत्र है और न ही मुक्त। ऐसी स्थिति में वह दूसरों के लिए कोई सार्थक और भलाई का काम करने में कहाँ सक्षम है। इन आंतरिक अवरोधों को दूर करके ही हम “सच्ची शांति” का अनुभव कर सकते हैं। उस “आंतरिक शांति” से ही निस्वार्थ भाव से जगत की सेवा करने की शक्ति प्रवाहित होती है। वेद और उपनिषद हमें  मोक्ष प्राप्ति के साथ साथ दूसरों के लिए प्रकाश और सेवा का स्रोत बनने की भी प्रेरणा देते हैं।

इसी तरह की सेवा का उद्देश्य लेकर, स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित की हुई संस्था, बेलुड़ मठ के संन्यासियों द्वारा संचालित होकर, आज ‘रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन’ के रूप में अतीव विस्तार को प्राप्त हुई है।

रामकृष्ण मिशन स्थापित होने के कुछ दिनों बाद ही स्वामीजी उत्तरभारत की यात्रा पर निकले। कुछ दिन अल्मोड़ा में बिताने के बाद वे पंजाब आये। वहाँ सियालकोट और लाहौर में व्याख्यान देकर, वे देहरादून होते हुए राजस्थान  पहुँचे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने लाखों उत्साही एवं श्रद्धालु श्रोताओं की अनेक सभाओं में भाषण दिये, लाखों लोग उनके सम्पर्क में आये। उनकी वाणी ने जनमानस में प्रेरणा की ज्योति जगा दी  जिसके फलस्वरूप बहुत से गणमान्य लोगों ने देश-सेवा का व्रत लिया। जन-जागरण, नारी-शिक्षा, मानव-सेवा और राष्ट्र-उन्नयन को उनकी प्रेरणा के फलस्वरूप एक नयी दिशा मिली।

स्वामीजी का कार्यक्षेत्र सिर्फ राष्ट्र तक ही सीमित नहीं था। सम्पूर्ण मानवता उसकी परिधि में आती थी। मनुष्य के भीतर ईश्वर का निवास हैं लेकिन ईश्वर को उसने अपने अंदर बांध रखा है। स्वामीजी जीवनभर उन्हीं ईश्वर को मुक्त करने का प्रयास करते रहे। उन्होंने सभी स्वदेशवासियों को पुकारकर कहा:

उनके इस सन्देश ने युवकों के चित्त में हलचल मचा दी। उनकी वाणी को सम्मान और शक्ति दोनों मिली। 

लगभग पाँच महीनों तक स्वामीजी ने उत्तर भारत का अविराम दौरा किया। उनके सन्देश ने लोगों को उन्मत्त कर दिया लेकिन उनकी जीवनीशक्ति मानो धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही थी। गिरते स्वास्थ्य के साथ वे कोलकाता  लौट आये। उनकी योजनाएँ एक के बाद एक साकार हो रही थीं। रामकृष्ण संघ को सुदृढ़ नींव पर प्रतिष्ठित करने के लिए 3  फरवरी 1898  को गंगा के पश्चिमी तट पर बेलुड़ नामक ग्राम में, एक पुराने मकान सहित लगभग इक्कीस बीघा जमीन खरीदी गयी। नयी जमीन के दक्षिणी ओर अवस्थित, एक उद्यान एवं भवन किराये पर लेकर, मठ को आलमबाजार से स्थानान्तरित कर अस्थायी तौर पर उसमें लाया गया। नयी जमीन में मन्दिर तथा मठ-भवन के निर्माण का शुभारम्भ हुआ।

कल तक  मध्यांतर 

जय गुरुदेव 


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