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स्वामी विवेकानंद का “अभी मन्त्र” क्या है ?-लेख श्रृंखला का 13वां लेख  

पिछले कल से परम वंदनीय माता जी के अवतरण के,पूज्य गुरुदेव की साधना के एवं अखंड दीप  के प्राकट्य के 100 वर्ष को समर्पित शताब्दी वर्ष का शुभारम्भ हो चुका है लेकिन दिव्यसत्ता की पूर्वस्वीकृति से स्वामीजी की लेख श्रृंखला को पूर्ण करना (पूर्ण तो कभी भी न माना  जायेगा) कुछ समय के लिए उचित समझा जा रहा है।साथिओं से एवं गुरुसत्ता से क्षमाप्रार्थी हैं। आशा करते हैं कि पूज्यवर के आध्यात्मिक जन्म दिवस (वसन्त पर्व) से पहले इस लेख श्रृंखला का समापन हो  जायेगा 

आज का ज्ञानप्रसाद लेख स्वामीजी के विदेश से वापिस आने का संक्षिप्त सा विवरण दे रहा है क्योंकि भारत आने पर उन्हें जो अभूतपूर्व स्वागत मिला था उसे हमने 10 और 11 दिसंबर वाले दो लेखों में प्रकाशित किया था। इसलिए हमने उन दो लेखों के लिंक आज के लेख में अटैच किये हैं। 

सोमवार वाले लेख में स्वामीजी के जीवन के नए अध्याय (उठो,जागो और श्रेष्ठ लोगों से ज्ञान प्राप्त करो) का श्रीगणेश होने वाला है जिसका कुछ अंश आज भी वर्णित है।आने वाले लेखों में हम जान पायेंगें कि  स्वामीजी ने बहुत ही छोटे से जीवनकाल में क्या कुछ कर डाला। हमें स्व-मूल्यांकन करने का अवसर मिलेगा कि इतने परिश्रम से लिखे जा रहे ज्ञानप्रसाद लेख हमें कहाँ तक प्रेरित कर पाए। स्वामी जी ने “संघ के गठन” यानि “संगठन शक्ति” की बात अनेकों बार की है,उसी शक्ति की बात हम अपने छोटे से परिवार के संदर्भ में करते रहते हैं। इसको शक्तिशाली बनाना हम सबका कर्तव्य है। 

तो आइये शांतिपाठ का अर्थ समझें,शांति की कामना करें और आज के लेख का अमृतपान करें:

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए

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स्वामीजी से बिछुड़ने की कल्पना से उनके बहुत से शिष्यों और छात्रों का मन भारी हो रहा था। विदाई सभा में सैकड़ों नर-नारी उपस्थित थे। बहुतों की आँखों में आँसू थे। स्वामीजी ने लन्दनवासियों का हृदय जीत लिया था।

16  दिसम्बर 1896 को लन्दन से रवाना होकर स्वामीजी डोवर, केलाइस और मान्टसेनिस होते हुए इटली पहुँचे। इटली की राजधानी  रोम ने उन्हें मोहित कर लिया। रोम से स्वामीजी इटली के ही एक और नगर नेपल्स में पंहुचे और वहां से 30  दिसम्बर को उनका जहाज छूटा और 15 जनवरी 1897  को जहाज के कोलम्बो पँहुचा। 

स्वामीजी का सारा मन/प्राण भारत के चिन्तन में डूबा हुआ था। क्या स्वामीजी पश्चिम से खाली हाथ लौट रहे हैं? नहीं, वहाँ से स्वामीजी बहुत कुछ जोड़कर भारत ले जा रहे हैं जिससे देश में उन्नति आएगी। पश्चिम का विज्ञान, कर्मठता एवं  अदम्य उत्साह, भारत के राष्ट्रीय जीवन के लिए खूब उपयोगी सिद्ध होंगे।

अमेरिका के नगर Detroit  में एक बार उन्होंने अपने कुछ शिष्यों से कहा था:

स्वामीजी भारतवासियों को पहचानते थे लेकिन उन्होंने कभी  सोचा भी नहीं था कि सम्पूर्ण राष्ट्र उनके आगमन की प्रतीक्षा इतनी अधीरता से कर रहा है। सारे देश में अपने प्रिय और पूज्य विवेकानन्द के स्वागत की तैयारियाँ चल रही थीं। स्वागत का यह आयोजन जनता अपने हृदय की प्रेरणा से कर रही थी, राजशक्तियों का इसमें तनिक भी हाथ नहीं था। नगर-नगर को असंख्य स्वागत द्वार, तोरण से सजाया गया था। मकान और रास्ते पर हर जगह सजावट और उत्सव की धूम थी। जनता आनन्द में उन्मत्त थी। कोलम्बो से काश्मीर तक सारे भारत में विवेकानन्द का जो राष्ट्रीय अभिनन्दन हुआ, उसकी ठीक-ठीक कल्पना कर पाना असम्भव है।

15 जनवरी 1897 को गोधूलि के समय स्वामीजी कोलम्बो पहुँचे। शाम 5 से 7 बजे के समय को गोधूलि का समय कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार इस समय गायें वापिस घर आ रही होती हैं और उनके पाँव से उठ रही धूलि से सूर्य ढक जाता है एवं इसे बहुत ही शुभ समय माना  गया है।  

उन्हें देखते ही बन्दरगाह पर एकत्र जनसमुद्र आनन्दसूचक शब्दों और जयध्वनि के साथ इतने जोरों के साथ कोलाहल करने लगा कि उसके सामने सागर की गर्जना भी फीकी पड़ गयी।अगणित नर-नारियों ने स्वामीजी की संवर्धना की और उनका कण्ठ जयमालाओं से विभूषित कर दिया। बाद में एक महती जनसभा में उन्हें मानपत्र प्रदान दिया गया। उत्तर में स्वामीजी ने भारत की आध्यात्मिक परम्परा का उल्लेख करते हुए, भारत की सर्वांगीण उन्नति के लिए सभी को मातृभूमि  की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देने का आह्वान किया।

श्रीलंका के विभिन्न स्थानों में स्वामीजी ने दस दिन बिताये। सभी जगह उनका विशेष सम्मान हुआ। जनता के उत्साह को देखकर वे भावविह्वल हो उठे। सर्वत्र उन्होंने भारतभूमि की महिमा का बखान करते हुए विविध विषयों पर भाषण दिये, जिनमें प्रमुख हैं – ‘निरीह हिन्दुओं की धर्मप्राणता’, ‘धर्म ही भारत का एकमात्र आधार हैं’, ‘विश्व को आध्यात्मिक प्रकाश देना ही भारत की श्रेष्ठतम देन है’, ‘सनातन धर्म और युगधर्म’, ‘वेदान्त दर्शन’, सार्वजनिक धर्म और सर्वधर्मसमन्वय’ आदि। उनके तेजस्वितापूर्ण व्याख्यानों को सुनकर लोग अनुप्राणित और रोमांचित हो उठे थे। स्वामीजी की दैवी वाणी, सारे भारत में प्रचण्ड हलचल उत्पन्न करती हुई, मानव के भीतर सुप्त आत्मशक्ति के समीप एक सशक्त आह्वान के रूप में पहुँची। मृतप्राय लोगों में भी जीवन का संचार हो उठा। 

कोलम्बो से शुरू कर स्वामीजी ने सम्पूर्ण भारत को 

के नवजागरण की वाणी सुनायी और सभी के कानों में “अभी:” मन्त्र भर दिया। 

स्वामीजी “उत्तिष्ठत जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत” के  अर्थ पर ज़ोर देते हुए कहते थे कि “परिवर्तन कल नहीं,अभी से शुरू होना चाहिए।” इसलिए इसे लोग भावार्थ में उनका “अभी का मंत्र” कहते हैं।“अभी” का भाव है: आलस्य छोड़ो:अभी, स्वयं पर विश्वास करो:अभी,अपने लक्ष्य के लिए काम शुरू करो:अभी
पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपने “दि डिस्कवरी ऑफ इंडिया” (भारत की खोज) नामक सुप्रसिद्ध ग्रन्थ में स्वामीजी के बहुत से उद्धरण देते हुए “वर्तमान भारत को स्वामीजी की देन” विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। वे लिखते हैं: “ स्वामीजी के व्याख्यानों एवं रचनाओं में एक स्वर जो बार-बार झंकृत हो रहा है वह है “निर्भयता”। भय तथा दुर्बलता को त्याग कर वीर बनो। यही है उपनिषदों की महान् शिक्षा। स्वामीजी ने कहा था कि विशेष रूप से आज हमें ऐसे बलवान मनुष्यों की जरूरत हैं, जिनकी मांसपेशियाँ लौह के समान दृढ़ और फौलाद के समान सख्त हों,जिनकी इच्छाशक्ति में ब्रह्माण्ड के गूढ़तम रहस्यों का भेदन करने की क्षमता हो।”

यद्यपि स्वामीजी पृथ्वी के तीन महान् राष्ट्रों के सम्मान के अधिकारी थे, फिर भी अपने देशवासियों से प्राप्त सम्मान को उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक ग्रहण किया। एक मानपत्र के उत्तर में उन्होंने कहा था:

स्वामीजी की ओजस्वी वाणी ने भारतवासियों के जीवन में उथलपुथल मचा दी। निर्भीक जन-जागरण ने संगठित हो राष्ट्रवाद को नयी दिशा दी। उन्होंने भविष्य के भारत में अपना-अपना स्थान ग्रहण करने को आम जनता का आह्वान किया। जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल आयी। गाँधीजी को आज़ादी की लड़ाई में जो जनसमर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था । वस्तुत: विवेकानन्द भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के एक प्रमुख प्रेरणास्रोत थे। राष्ट्र की जीवनभूमि में उन्होंने मुक्तिचेतना का जो बीज बोया, वही कालान्तर में अनेकों के आत्मत्याग और रक्तसिंचन के फलस्वरूप एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलनरूपी विशाल वृक्ष में परिणत हुआ और उसी से “भारतवर्ष को स्वतन्त्रतारूपी फल” मिला। उन्होंने जो “उत्तिष्ठत जाग्रत …” .की गुहार लगायी थी, उसको सुनकर लाखों लोग उठ खड़े हुए थे। इस जागरण के फलस्वरूप 20वीं  शताब्दी में राष्ट्रीय आन्दोलन ने प्रार्थना-निवेदन का प्राणहीन मार्ग छोड़कर तीव्र निर्भीक राष्ट्रीयता के नये रास्ते को पकड़ा था।

कोलम्बो से मद्रास तक लगातार उत्साहित जनता के अभिनन्दनपत्रों के उत्तर और व्याख्यान देते-देते स्वामीजी बहुत थक गये। इसी बीच उनके पास देश के अन्य भागों से निमन्त्रण आने भी शुरू हो गये थे। पर सब कुछ भविष्य के लिए स्थगित रखकर, थोड़ा आराम पाने की आशा में उन्होंने जहाज द्वारा मद्रास से कलकत्ते की यात्रा की। 20 फरवरी 1897 को वे कलकत्ता पहुँचे। वहाँ उनके विराट् स्वागत की तैयारी हुई थी। स्वामीजी और उनके पाश्चात्य-शिष्यों को चार घोड़ों की एक बग्घी में बैठाया गया। सियालदह से उत्साही नवयुवकों ने घोड़े खोल दिये और स्वयं गाड़ी खींचकर ले चले। बंगाल के निवासियों और उनके गुरुभाइयों ने अत्यन्त प्रीति और आग्रह के साथ उन्हें ग्रहण किया। कलकत्ता के नागरिकों ने उनकी विराट् अभ्यर्थना की। उत्तर में उन्होंने कहा: 

बंगाल के नवयुवकों ने विवेकानन्द के इस आह्वान का उत्तर दिया। उनका वह आह्वान आज भी धरती एवं आकाश में गूँजते हुए उपयुक्त अधिकारियों को आकृष्ट कर रहा है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के एवं अन्य समर्पित साथिओं को  जो हमारे साथ इस दिव्य लेख श्रृंखला के आरम्भ से जुड़े हुए हैं,स्मरण हो आया होगा कि 11 और 12 दिसंबर 2025  के दो Full-length लेख स्वामीजी के भारत आने पर भव्य स्वागत से ही सम्बंधित थे। उस स्वागत की विस्तृत जानकारी दोहराने का कोई औचित्य नहीं है इसलिए उन दोनों  लेखों के लिंक दिए जा रहे हैं : 

मध्यांतर,जय गुरुदेव 


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