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सेवियर दम्पति और स्वामीजी पर अद्भुत लेख-लेख श्रृंखला का 12वां लेख

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2026 का प्रथम ज्ञानप्रसाद लेख  

आज के लेख में इंटरनेट पर अनेकों स्रोतों को टटोलने के बाद कैप्टन सेवियर और उनकी पत्नी से सम्बंधित जानकारी प्रस्तुत की गयी है। भारत से गए हुए  वक्ता विपिनचन्द्र पाल ने स्वयं स्वामीजी का प्रभाव इंग्लैंड में देखा। 

तो साथिओ, आज इन्हीं बातों पर चर्चा हो रही है। 

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स्वामीजी के इंग्लैंड़ छोड़ने के चौदह महीने बाद जब प्रसिद्ध वक्ता विपिनचन्द्र पाल उस देश में गये, तब भी उन्हें वहाँ विवेकानन्द का प्रभाव इतने स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हुआ कि उन्होंने Indian mirror नामक समाचारपत्र में लिखा था,

“भारत में बहुत-से लोगों की ऐसी धारणा है कि इंग्लैंड में विवेकानन्द के व्याख्यानों का कोई विशेष फल नहीं हुआ है और उनके मित्रों एवं समर्थकों ने उनके थोड़े-से कार्य को ही बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया है लेकिन  यहाँ आकर मैं सर्वत्र ही उनका असाधारण प्रभाव देख रहा हूँ। इंग्लैंड में मैंने ऐसे बहुत से लोगों के साथ बातचीत की है जो सचमुच ही विवेकानन्द के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु है। उनके प्रचार के फलस्वरूप ही आजकल बहुत-से लोगों का विश्वास है कि प्राचीन हिन्दू धर्मग्रन्थों में बहुत से सत्य विद्यमान हैं। उन्होंने जनता के मन में इन भावों का रोपण तो किया ही है, साथ ही वे भारत और इंग्लैंड को एक स्वर्णसूत्र  से जोड़ने में भी सफल हुए हैं।” 

अन्तिम बार लन्दन में स्वामीजी ने जो व्याख्यान दिये, उनसे वहाँ के बहुत से विद्वानों की विचारधारा में हलचल सी मच गयी और उन्हें चिन्तन की बहुत सी सामग्री प्राप्त हुई। पश्चिम को स्वामीजी की अमोघ, सार्थक और प्रभावी देन का सिस्टर निवेदिता ने बड़ा सुन्दर चित्रण किया है: 

“इस देश में स्वामी विवेकानन्द के उपदेश हम जैसे अनेकों को प्यासे को शीतल जल के समान तृप्तिदायक लगे हैं। धर्म के क्षेत्र में, पिछले 50 वर्ष से एक लगातार, बढ़ती हुई अनिश्चितता और निराशा का भाव यूरोप के मानसिक जीवन को त्रस्त कर रहा है। पिछले कुछ समय से हम जैसे बहुत से लोग इस विषय में जागरूक हुए हैं। ईसाई धर्म के कट्टरतापूर्ण सिद्धान्तों में विश्वास करना अब हमारे लिए असम्भव सा हो गया है लेकिन  हमारे पास ऐसा कोई उपकरण नहीं था जिसके द्वारा मतवाद के छिलकों से उसके भीतर निहित धर्म के गूदे को अलग करना सम्भव हो। अब हमें वह उपकरण प्राप्त हो गया है। वेदान्त ने हमारे धर्म के विश्वासों और आवेगों को एक दार्शनिक आधार प्रदान किया है।”

भारतवर्ष की पुकार में निहित करुणा के स्वर ने स्वामीजी को अभिभूत कर दिया था। भारत की चिन्ता उनके हृदय में घर कर गयी थी । सारा भारत उन्हें देखने को व्याकुल था। इसी समय एक अंग्रेज मित्र ने उनसे पूछा:

“स्वामीजी ! पाश्चात्य देशों में इतने साल गुजारने के बाद अब भारतवर्ष आपको कैसा लगेगा?” भावभीने स्वर में स्वामीजी ने उत्तर दिया, “पाश्चात्य देशों में आने के पूर्व मैं भारत से प्यार करता लेकिन  अब तो भारत की हवा और मिट्टी तक मेरे लिए पवित्र है। भारतवर्ष अब मेरे लिए परम पावन तीर्थ है!”

ब्रिटिश आर्मी में कैप्टन James Henry Sevier और उनकी पत्नी Charlotte Elizabeth Sevier भी स्वामीजी के साथ भारत में आने की तैयारी कर रहे थे। स्वामी जी के स्टैनोग्राफर गुडविन और उनकी पत्नी, मिस मूलर और मिस मार्गरेट नोबल (मदर निवेदिता) ने भी निर्णय लिया कि भारत में नारी-शिक्षा के प्रसार के लिए स्वामीजी का अनुसरण करेंगी। 

ऐसे न जाने कितने ही व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में इंटरनेट भरा पड़ा है। हमारा सौभाग्य है कि हम ऐसे युग में रह रहे हैं जब इंटरनेट में हर प्रकार की जानकारी उपलब्ध है, धन्यवाद् करते हैं उन सभी Contributors का जो नई और वर्षों पुरानी जानकरियाँ शेयर करके पुनीत कार्य कर रहे हैं। ऐसे ही उदाहरणों  से प्रोत्साहित हम भी गिलहरी जैसा प्रयास करते हुए ज्ञान के महासागर में कुछ बूँदें उड़ेलने का कार्य कर रहे हैं। साहित्य चाहे परम पूज्य गुरुदेव का हो,स्वामी विवेकानंद का हो यां फिर लीलापत शर्मा जी का हो,जब तक उसे पूरी तरह विश्लेषण करके चैन की सांस न ले लें, तब तक साथिओं के समक्ष  प्रस्तुत नहीं करने को मन ही नहीं मानता । कहने का अर्थ है कि ज्ञानप्रसाद लेख, साधारण कॉपी पेस्ट लेख नहीं होते हैं। पुस्तकें तो अनेकों के पास होंगीं लेकिन ज्ञानप्रसाद लेखों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना एक बहुत बड़ा प्रयास है जिसमें हमें अपने साथिओं से सहयोग मिल रहा है।

उचित रहेगा कि सेवियर दम्पति को जानने को दिशा में कदम बढ़ाये जाएँ। 

Sevier couple एक ऐसा अंग्रेज़ जोड़ा था  जिन्होंने “स्वामीजी को अपना सब कुछ दे दिया और उनके काम के लिए अपना जीवन ही समर्पित कर दिया।” स्वामी विवेकानंद  ने पहली ही मुलाक़ात में उन्हें “पिताजी” और “माँ” कह का सम्बोधन किया। कैप्टन सेवियर, जो लगभग 49 साल के एक रिटायर्ड आर्मी ऑफ़िसर थे, ने भारत में 5 साल की सर्विस की थी और स्वामीजी के शब्दों में, “भारत को अच्छी तरह जानते हैं।” वे लंदन के एक Suburb Hampstead  में रहते थे, और 1896 में 63,सेंट जॉर्ज रोड पर स्वामीजी के लेक्चर में शामिल होने आये थे। दोनों ही स्वामीजी की ओर इतने आकर्षित हो गए कि  थोड़े ही समय में  उनके शिष्य बन गए। उन्होंने मिस मूलर  के साथ यूरोप में स्वामीजी छुट्टियों की मेज़बानी की। यह जोड़ा स्वामीजी के साथ जर्मनी और हॉलैंड की 2 माह की यात्रा में उनके साथ रहा। इंग्लैंड लौटने पर स्वामीजी कुछ समय के लिए Hampstead में उनके मेहमान रहे। 1897 में जब स्वामीजी भारत आ रहे थे तो उन्होंने अपना सारा सामान बेच दिया और स्वामीजी के साथ आ गए। कलकत्ता और दार्जिलिंग में कुछ समय बिताने के बाद, वे दोनों अल्मोड़ा में रहने चले गए। 

इंग्लैंड में किसी वार्ता के दौरान स्वामीजी ने उन्हें बताया था वह स्विट्ज़रलैंड के Alps वातावरण की तरह भारत के हिमालय क्षेत्र में एक आश्रम बनाना चाहते हैं।“हिमालय में एक मठ” वाले ड्रीम प्रोजेक्ट का सपना साकार करने के लिए सेवियर्स ने एक सही जगह ढूंढनी शुरू की और बहुत ढूंढने के बाद,चंपावत ज़िले  में मायावती अद्वैत आश्रम के लिए जगह खरीद ली। “अद्वैत, और सिर्फ़ अद्वैत” के सिद्धांत को समर्पित यह आश्रम 19 मार्च 1899 को शुरू हुआ था। मद्रास में “प्रबुद्ध भारत” पत्रिका  के टैलेंटेड युवा एडिटर बी.आर. राजम अय्यर की अचानक मौत के बाद पत्रिका का पब्लिकेशन बंद हो गया था। स्वामीजी, जो इस मैगज़ीन के बहुत शौकीन थे, ने कैप्टन सेवियर से एडिटर स्वामी स्वरूपानंद की सहायता से फिर से शुरू करने का अनुरोध किया। कुछ समय के लिए कैप्टन सेवियर इसके मैनेजर और पब्लिशर रहे। कलकत्ता से अल्मोड़ा तक का आना जाना हैंडप्रेस, टाइप, पेपर वगैरह खरीदने और ट्रांसपोर्ट का खर्च वही देखते थे। बाद में मिसेज सेवियर कई सालों तक असिस्टेंट एडिटर रहीं। कैप्टन सेवियर ने स्वामीजी की माताजी  को 8,000 रुपये गिफ्ट किए थे। 28 अक्टूबर 1900 को स्वामीजी की माताजी निधन हो गया और उनकी आखिरी इच्छा का सम्मान करते हुए हिंदू रीति-रिवाजों से उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया गया। कहा जाता है कि दोनों ने  हिंदू धर्म अपना लिया था। स्वामीजी कैप्टन सेवियर की मृत्यु पर जनवरी 1901 में मायावती आश्रम गए और मिसेज सेवियर से मिले और सेवियर को Martyr of cause  बताया।  मिसेज सेवियर  लगभग 15 साल तक वहीं रहीं और वहां के सभी कामों में अहम भूमिका निभाती रहीं । आश्रम से थोड़ी दूरी पर स्थित उनका बंगला “Mothers bunglow” और वहाँ जाने वाला मार्ग “Mothers walk ” के नाम से जाना जाता था। वह आश्रम की ट्रस्टी थीं। स्वामीजी की संपूर्ण कृतियों के प्रकाशन में उन्होंने अमूल्य सेवा दी। मिसेज सेवियर के वित्तीय एवं सक्रीय सहयोग से ही  श्यामला ताल आश्रम की, स्वामी विरजानंद द्वारा स्थापना हो पायी। 1909-1911,दो वर्ष के लिए वह इंग्लैंड गयीं और आकर 1915 में  मायावती छोड़ कर श्यामला ताल में रहने लगीं। वहां 10 महीने रहने के बाद बेलूर मठ गईं और बाद में  इंग्लैंड लौट आईं, जहाँ 83 वर्ष की आयु में 20 अक्टूबर 1930 को उनका निधन हो गया। 

जब स्वामीजी 1896 में लंदन की दूसरी यात्रा पर थे तो सेवियर दम्पति ने उनका एक धार्मिक प्रवचन सुना। उन्हें अंदर से लगा कि आखिरकार उन्हें वह मिल गया है जिसकी उन्हें तलाश थी। स्वामीजी द्वारा बताई गई अद्वैत फिलॉसफी ने उनकी ज़िंदगी भर की खोज का एक संतोषजनक जवाब दिया। स्वामीजी के भाषण  को सुनने आये लोगों में से किसी ने पूछा, “क्या आप इस नौजवान को जानते हैं? क्या वह सच में वैसा ही है जैसा दिखता है?” उसे “हाँ” में उत्तर देकर  कैप्टन सेवियर ने अपनी पत्नी से कहा, “क्या आप मुझे स्वामीजी  का शिष्य बनने देंगी?” उसने जवाब दिया, “हाँ” और पत्नी ने भी पूछा, “क्या आप मुझे स्वामीजी  का शिष्य बनने देंगें?’ उसने प्यार से मज़ाक में जवाब दिया,“मुझे नहीं पता।”

कुछ दिनों बाद वे स्वामीजी से उनके घर पर मिले। स्वामीजी ने  मिसेज सेविएर को “माँ” कहा और पूछा, “क्या तुम्हारा भारत आने का मन नहीं है? अगर तुम आती हो, तो मैं तुम्हें वह सब कुछ दूँगा जो मैंने अनुभव किया है।” 

स्वामीजी की सेवा के लिए उनका समर्पण उतना ही अचानक और सच्चा था जितना स्वामीजी की एक और स्टूडेंट, मार्गरेट नोबल (निवेदिता) का था, जो उनसे इंग्लैंड में मिली थी। उन तीनों को जल्द ही स्वामीजी से औपचारिक दीक्षा मिल गई।

गरीब पहाड़ी लोगों पर की गई अच्छी देखभाल की वजह से, मदर सेवियर को “देवी” के नाम से जाना जाने लगा। 29 जुलाई, 1897 को सिस्टर निवेदिता को लिखे एक लेटर में स्वामीजी ने लिखा: “मिसेज़ सेवियर एक बहुत ही अच्छी और दयालु महिला हैं। सेवियर ही ऐसे अंग्रेज़ हैं जो मूल निवासियों से नफ़रत नहीं करते।” 

स्वामीजी की इंग्लिश बायोग्राफी में लिखा है कि मायावती में, “एक दिन अपने भाषण  के दौरान वह अचानक अपनी सीट से उठे और ऊँची आवाज़ और भावनाओं से भरी आँखों से इधर-उधर टहलने लगे, जैसे वह एक बड़ी ऑडियंस को लेक्चर दे रहे हों। वह अपने पश्चिमी शिष्यों  के बारे में बात कर रहे थे।उनकी मिसाल देने वाली भक्ति और वफ़ादारी के बारे में उन्होंने कहा कि एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों मेरे कहने पर मौत के मुँह में जाने को तैयार हैं। कैप्टन  सेवियर को देखो, “कैसे वह मायावती  के लिए शहीद हो गए।”

नवंबर 1899 में मिस्टर स्टर्डी को लिखे अपने लेटर में, स्वामीजी कहते हैं, “मुझे याद है इंग्लैंड में कैप्टन और मिसेज़ सेवियर, जिन्होंने मुझे ठंड लगने पर कपड़े पहनाए थे, मेरी अपनी माँ से भी बेहतर मेरी देखभाल की थी। मेरी कमज़ोरियों, मेरी मुश्किलों में मेरा साथ देते और उनके पास मेरे लिए सिर्फ़ दुआएँ हैं। मिसेज़ सेवियर ने सराहना  की परवाह नहीं की, आज हज़ारों लोग उनकी पूजा करते हैं। मिसेज सेवियर की मृत्यु के बाद  लाखों लोग उन्हें गरीब भारतीयों की सबसे बड़ी मददगार के तौर पर याद करेंगे।”

आज यहीं पर मध्यांतर होता है 

जय गुरुदेव,धन्यवाद् 


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