वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

आदरणीय पंडित लीलापत शर्मा जी की पुस्तक “युगऋषि का अध्यात्म-युगऋषि की वाणी” पर आधारित  दूसरा लेख-त्रिपदा गायत्री की विस्तृत जानकारी 

कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में गुरु-शिष्य संवाद के अंतर्गत माँ गायत्री के अंतरंग और बहिरंग रूपों की चर्चा की गयी थी। जब इन रूपों की जानकारी हो जाती है तो साधक में अद्भुत साहस का अनुभव होता है। साहस,श्रद्धा और समर्पण के तीन गुणों से ही पात्रता विकसित होती है। इन तीन गुणों का समाहित होना, उपासना के लिए अत्यंत आवश्यक है,इनके बिना उपासना संभव ही नहीं है। 

आज का ज्ञानप्रसाद लेख त्रिपदा के  शब्दिक अर्थ के साथ आरम्भ होता है और अनेकों उदाहरणों की सहायता से उपासना के लिए  ज़रूरतों (Prerequisite)  का वर्णन कर रहा है। 

तो आइए विश्वशांति की कामना करें और  आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें :

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए !  

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पिछले ज्ञानप्रसाद लेख में एक महत्वपूर्ण सन्देश समाहित था कि  गायत्री साधना की पहली पात्रता साहस है, जिसमें साहस नहीं, वह गायत्री साधना का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। 

वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार आदरणीय पंडित लीलापत शर्मा जी और परम पूज्य गुरुदेव के बीच हो रहे गुरु-शिष्य संवाद है। जब गुरु ने शिष्य को माँ गायत्री के दो रूप (बहिरंग और अंतरंग) के ज्ञान से अवगत कराया तो शिष्य का अगला प्रश्न “त्रिपदा गायत्री” के विषय में था।  

पंडित जी ने पूछा: गुरुदेव,क्या आपने त्रिपदा गायत्री की साधना की है? 

पूज्य गुरुदेव बोले: 

बेटा,तुमने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। हमने त्रिपदा गायत्री की ही साधना की है। “उपासना, साधना और आराधना” का अवलंबन लेना ही त्रिपदा गायत्री है। 

आगे चलने से पहले त्रिपदा का शब्दिक अर्थ समझना उचित रहेगा।

त्रिपदा” संस्कृत शब्द  है और इसका शाब्दिक अर्थ है  “तीन पदों वाली”, “तीन चरणों वाली”। “त्रि” = तीन, “पद” = चरण, पग, अवस्था या पंक्ति।  इसलिए “त्रिपदा” का अर्थ होता है, तीन पंक्तियों (या चरणों) से युक्त पद्य, या तीन चरणों वाला छंद, या तीन पैरों वाला (जीव या वस्तु), संदर्भ के अनुसार अर्थ बदल सकता है। वेदों में “त्रिपदा  गायत्री” का अर्थ होता है तीन पदों (प्रत्येक में आठ अक्षर) से युक्त गायत्री मंत्र।

उपासना यानि भगवान के पास बैठना, भगवान या गायत्री के गुणों को ग्रहण करना, भगवान पर विश्वास रखना है । लकड़ी जब अग्नि के गुणों को धारण कर लेती है तो स्वयं भी अग्नि बन जाती है। इसी प्रकार जब साधक भगवान के गुणों को धारण कर लेता है तो भगवान बन जाता है। हमें विश्वास करना चाहिए कि भगवान सदा हमारे साथ हैं और हमारे प्रत्येक क्रियाकलाप को देख रहे हैं। हम ग़लत कर्म करेंगे तो दंड मिलेगा और अच्छे कर्म करेंगे तो पुरस्कार मिलेगा। बेटा ! उपासना की सफलता के लिए साहस के इलावा कुछ और भी पात्रताएँ आवश्यक हैं, तभी उपासना फलीभूत होती है।

दूसरी पात्रता है, श्रद्धा।  बिना श्रद्धा के कोई उपासना, भजन, पूजा, यज्ञ सफल नहीं होता है। श्रद्धा का ही चमत्कार था कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस के हाथ से काली भोजन करती थी। मीरा को एक साधु ने पत्थर का टुकड़ा दिया और कहा कि ये भगवान कृष्ण हैं । मीरा ने उसी पत्थर में भगवान कृष्ण के दर्शन किए और वह श्रद्धा का ही चमत्कार था कि कृष्ण मीरा के साथ छाया पुरुष के रूप में रहने लगे, साथ-साथ नाचने-गाने लगे। राणा ने जब साँपों का पिटारा भेजा तो कृष्ण ने अपनी अँगुली आगे कर दी थी और जब जहर का प्याला भेजा तो स्वयं भगवान कृष्ण ने उसे पी लिया था । यह सारा चमत्कार मीरा की श्रद्धा का ही था। मीरा की श्रद्धा ने पत्थर के टुकड़े को चैतन्य कर दिया था। एकलव्य ने मिट्टी के गुरु से जैसा तीर चलाना सीखा वैसा असली गुरु द्रोणाचार्य भी पांडवों को नहीं सिखा पाए। एकलव्य की श्रद्धा ने मिट्टी के द्रोणाचार्य में वह शक्ति पैदा कर दी थी जो वास्तविक द्रोणाचार्य में भी नहीं थी। यह सब चमत्कार एकलव्य की श्रद्धा से हुआ था। 

एक गुरु के कई शिष्य थे । एक शिष्य अपने गुरु पर पूरी श्रद्धा और विश्वास रखता था । वह शिष्य रोगियों का इलाज करता था। जो भी रोगी आता उसे एक चम्मच जल देता और रोगी ठीक हो जाता था। उसकी ख्याति फैलने लगी । गुरुजी को भी मालूम हुआ तो गुरुजी ने शिष्य को एकांत में बुलाकर कहा कि बेटा ! तूने जो जादू सीख रखा है, उसे मुझे भी बता दे । देख मैं तेरा गुरु हूँ, मुझे  सच-सच बताना। शिष्य बोला, “गुरुजी ! मेरे पास कोई जादू-मंतर  नहीं है। मैं तो गुरुपूर्णिमा पर आपके चरणों को धोता हूँ,उस जल को घड़े में रख लेता हूँ। जो भी आता है, उसे उसी घड़े  में से एक चम्मच जल दे देता हूँ और वह ठीक हो जाता है। गुरु की आँखों में चमक आ गई, उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम था  कि मेरे चरणों में ऐसी शक्ति है। अगले दिन गुरुजी ने घोषणा करा दी कि जिसे भी बीमारी हो, हमारे पास आकर इलाज कराए। उन्होंने अपने पैर धोए और पानी रख लिया। बीमार आए, उनको एक-एक गिलास पानी भर कर पिला दिया लेकिन कोई ठीक नहीं हुआ। दूसरे दिन गुरुजी ने घुटनों तक शरीर धोया और एक-एक लोटा जल मरीजों को पिलाया लेकिन तब भी कोई ठीक नहीं हुआ। यह सब देखकर गुरुजी ने सोचा कि शिष्य ने मुझ से झूठ बोला है। उन्होंने पुनः शिष्य को बुलाकर पूछा,“बेटा! देख मैं तेरा गुरु हूँ, तू मुझे सच-सच बता कि तेरे पास क्या जादू है ?” शिष्य बोला, “गुरुदेव ! आपने केवल कर्मकांड किया, आपके जल में श्रद्धा का समावेश नहीं हुआ। मेरे जल में अटूट श्रद्धा और विश्वास घुला हुआ था। इस कारण मेरा जल चमत्कार दिखाता है। 

उपासना के लिए तीसरी पात्रता है -समर्पण । कोई व्यक्ति भजन पूजन तो करता है, लेकिन समर्पण नहीं करता तो उसका भजन कभी भी सफल नहीं होता है। जीभ से सारा समय गुनगुनाता रहता है, “अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे चरणों में” लोग भी समझते हैं कि बहुत बड़ा  श्रद्धावान है लेकिन यह सब दिखावा ही है। धन दौलत आदि के ऊपर सांप की तरह कब्ज़ा करके बैठा हुआ है,समय को अपने कब्ज़े में बाँधा हुआ है तो सौंपा क्या है ? यह सब विज्ञापनबाजी है,कोरा दिखावा है । 

भगवान के साथ धोखा/चापलूसी करना बंद करना ही सबसे बड़ी शर्त है। गुरुदेव बता रहे हैं, “हमने अपने भगवान को,अपने गुरु को  अपना समय, धन, श्रम,यहाँ तक कि शरीर भी सौंप दिया। तब हमारे गुरुदेव के पास जो कुछ था, हम सब के मालिक बन गए। तभी तो गुरुदेव और दादागुरु के बीच रोचक संवाद होते थे। दोनों एक दूसरे  से पूछते थे, “तुम्हें मुझसे क्या चाहिए ?” गुरुदेव कहते थे, “मेरा सब कुछ आपका है”  तो दादागुरु भी कहते थे, “मेरा सब कुछ तेरा है।”

गुरुदेव आगे बता रहे हैं, “बेटा ! समर्पण से ही मालिक बनते हैं। लड़की की जब शादी हो जाती है तो वह अपने पति को तन, मन, गोत्र सब कुछ सौंप देती है और पति की आज्ञा के अनुसार ही कार्य करती है, तब कहीं जाकर,इतने समर्पण के बाद ही  वह घर की मालकिन बन जाती है, ऐसी मालकिन बन जाती है  पति पर भी हुक्म भी चलाती है।” जब इस तरह का समर्पण, श्रद्धा, विश्वास होता है तो अपनेआप  साहस भी आ ही जाता है,भक्त भगवान का मालिक बन जाता है और उस पर हुक्म  भी चलाता है।   

अटूट समर्पण के होते यदि दुर्भाग्यवश विवाह  के तुरंत बाद पत्नी  विधवा हो जाए तो भी वह पति की सारी सम्पति  की “मालकिन” बन जाती है। ऐसा केवल समर्पण से ही संभव हो पाता है। 

समर्पित पत्नी के दूसरी ओर वेश्या होती है, जो धन के लालच में स्वयं को ग्राहक के लिए समर्पित करती है। ग्राहक को अधिक से अधिक लूटने में लगी रहती है। लेकिन इस “बाज़ारू समर्पण” में  वैश्या सम्पत्ति का कोई हिस्सा नहीं ले पाती। वह हमेशा साड़ी, बुँदे, हार जैसी कई वस्तुओं की ही मांग करती रहती है,वह मालकिन कभी नहीं बन सकती। 

गुरुदेव पंडित जी को बता रहे हैं कि “आजकल अधिकांश लोगों की उपासना वेश्यावृत्ति जैसी ही है।” हर कोई भगवान से हमेशा फरमाइश ही करता रहता है, मांगता ही रहता है। बेटा ! उपासना में समर्पण करना पड़ता है, तभी ऋद्धि-सिद्धि मिलती है और इसके लिए साहस की आवश्यकता पड़ती है। 

जो कोई भी श्रद्धा एवं समर्पण के साथ गायत्री उपासना करेगा उसका भजन सफल होगा। यह राजमार्ग सबके लिए खुला हुआ है।”

ऋद्धि-सिद्धि के बारे में विस्तार से जानने के लिए 11 जून 2021 का लेख जिसका लिंक नीचे दिया है, लाभदायक हो सकता है।

लीलापत जी कहते हैं, “ गुरुवर ,उपासना तो हमारी समझ में आ गई। अब साधना के विषय में बताइए। आपके अमृत वचनों से हमारे मन की सभी गुत्थियाँ सुलझती जा रही हैं। ऐसा जी चाहता है कि आप बोलते रहें और हम सुनते रहें।”

गुरुदेव बोले, “बेटा ! उपासना तो ईश्वर की करनी होती है लेकिन साधना अपनी की जाती है। साधना में स्वयं को ठीक करना पड़ता है,साधना होता है, स्वयं के दोष दुर्गुणों को छोड़ना पड़ता है। आलस्य, असंयम, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, गुटखा सब छोड़ना पड़ता है । कोई व्यक्ति दिन-रात भजन करता है, माला घुमाता है, भागवत कथा  सुनता है, तीर्थयात्रा करता है, उपवास करता है लेकिन अपने दोष, दुर्गुणों को छोड़ने को तैयार नहीं होता, तो उसको कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। रावण, कुंभकरण, मारीच, भस्मासुर आदि असुरों ने भागीरथ  जितनी ही तपस्या की होगी लेकिन उनमें  से किसी को कोई लाभ नहीं मिला। मारीच ने अपना ही सत्यानाश कराया, भगवान राम और सीता माता को परेशान किया। रावण ने तपस्या की लेकिन  साधना के अभाव में सारे वंश का सत्यानाश करा दिया। भस्मासुर ने तपस्या की लेकिन  साधना के अभाव में स्वयं जलकर भस्म हो गया। जिन भगवान शंकर ने वरदान दिया, उन्हीं को परेशान किया। सारे राक्षसों ने तपस्या करके शक्ति तो अर्जित की लेकिन साधना के रूप में अपने दोष दुर्गुणों को नहीं छोड़ा, स्वयं को ठीक नहीं किया, साधा नहीं तो उनकी तपस्या के  अच्छे परिणाम नहीं निकल सके। जो भी व्यक्ति उपासना, भजन, पूजन, कथा, भागवत, तीर्थयात्रा, उपवास तो करता है, लेकिन अपने दोष दुर्गुणों को नहीं छोड़ता, उसे उसकी उपासना का लाभ प्राप्त नहीं हो सकता ।

शेष अगले लेख में 


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