6 मई 2025 का ज्ञानप्रसाद- सोर्स:अखंड ज्योति दिसंबर 1958
आज के दिव्य आध्यात्मिक ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ हमारी सबकी आदरणीय बहिन सुमनलता जी को धन्यवाद् देकर कर रहे हैं कि उन्होंने आज हमारे लिए 29वां टाइटल (ज्ञान शिक्षक) प्रयोग किया है। जहाँ बहिन जी का हम जैसे साधारण से व्यक्ति के लिए इतने सम्मानीय टाइटल प्रयोग करने के लिए धन्यवाद् करते हैं वहीँ अंदेशा भी है कि कहीं हम बहिन जी के स्नेह/आदर से ऋणमुक्त हुए बिना ही इस संसार से विदा न हो जाएँ। अपने साथिओं द्वारा लुटाया जा रहा प्यार हमें दिन-रात, सोते-जागते, खाते-पीते एक ही सन्देश दिए जा रहा है, “इस ऋण की गठरी का भार उतारने के लिए 24 घंटे कम लग रहे हैं।”
महान विभूतिओं द्वारा महायज्ञ का दिव्य विवरण एक Live commentary की भांति, एक दिव्य आँखों देखा हाल की भांति दर्शाया जा रहा है, सभी साथी इस विवरण को एक धारावाहिक टीवी सीरियल की भांति न केवल देख रहे हैं बल्कि सीरियल की भांति ही अगले एपिसोड की प्रतीक्षा भी कर रहे हैं।
आज के प्रस्तुतकर्ता आदरणीय श्री मार्कंडेय “ऋषि” की लेखनी ने वर्तमान लेख को पहले लेखों की तुलना में और भी अधिक आँखों देखा बना दिया है। यह लेख लिखते समय हमें उत्तरकाशी स्थित मार्कंडेय तीर्थ का स्मरण हो आया। ऋषि मार्कंडेय के करकमलों द्वारा लिखा मार्कंडेय पुराण अनेकों लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है।
परम पूज्य गुरुदेव द्वारा चयनित निम्नलिखित 12 विभूतियों में से आदरणीय मार्कंडेय जी सातवें स्थान को सुशोभित कर रहे हैं। यदि हमें लिखते हुए इतना दिव्य अनुभव हो रहा है, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि यज्ञ में शामिल होने वालों की क्या अनुभूति होगी।
1.श्री सत्यनारायण सिंह, 2.श्री शंभूसिंह जी, 3.श्री सत्य प्रकाश शर्मा, 4.डॉ. चमनलाल, 5.श्री सीतारामजी राठी,बोरीवली,मुंबई, 6.श्री रामनारायण अग्रवाल, 7.श्री मार्कंडेय ‘ऋषि,’काशी, 8.श्री बालकृष्ण जी, 9.श्री अवधूत, गुप्त मंत्र विद्या विशारद,गोरेगाँव,मुंबई,10.श्री गिरिजा सिंह जी,11.श्री घनश्याम दासजी,इकौना,12. ब्रह्मचारी योगेन्द्रनाथ।
ज्ञानप्रसाद लेखों/यूट्यूब वीडियोस।शार्ट वीडियोस/दिव्य संदेशों/साथिओं के कमैंट्स के माध्यम से, यदि हम अपने साथिओं को गुरुवर की उपस्थिति का अनुभव करा कर पाएं तो इसे बहुत बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है।
इस उपस्थिति को अनुभव करने के लिए आज एक बार फिर हम महायज्ञ की विशाल यज्ञभूमि की ओर लगभग सात दशक पीछे चलते हैं जहाँ परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के चरणस्पर्श का आकर्षण अनेकों प्रतिबंधों के बावजूद रोक पाने में असमर्थ है।
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महायज्ञ की दिव्य झाँकियाँ प्रस्तुतकर्ता श्री मार्कंडेय ‘ऋषि,’ काशी
महायज्ञ के विषय में लेखनी उठाते ही सब से पहले उस दिन की याद आती है जब-लगभग 10 महीने पहले, आचार्य जी ने एक दिन हम सब तपोभूमि वासियों से पूछा था:
“हमारा विचार यहाँ 1024 कुण्डों का यज्ञ करने का हो रहा है, तुम सब इस विषय में अपनी सम्मति दो। पिछली बार जो 108 कुण्डों का यज्ञ किया गया उसकी गर्मी (प्रेरणा) अब तक रही और इसके फलस्वरूप सैंकड़ों स्थानों पर यज्ञ किये गये। अब यदि 1024 कुण्डों का कर सकें तो उसके प्रभाव से यह यज्ञ-परम्परा बहुत अग्रसर हो सकेगी और हम सन् 1962 के भयंकर समय का थोड़ा बहुत निराकरण करने में समर्थ हो सकेंगे।”
गुरुदेव शायद 1962 भारत-चीन युद्ध की बात कर रहे हैं जो मात्र एक ही महीने में समाप्त हो गया था।
हमने कहा, “गुरुजी, इधर आपका स्वास्थ्य कमजोर हो गया है और इतने बड़े महायज्ञ में असीम परिश्रम की आवश्यकता पड़ेगी। साथ ही बहुसंख्यक सुयोग्य, श्रद्धालु, ईमानदार कार्यकर्त्ताओं का सहयोग मिलना भी आवश्यक है। इसलिये इन बातों का ध्यान रखकर ही इस विषय में निश्चय करना चाहिये।”
आचार्य जी ने हँसकर उत्तर दिया:
“मार्कंडेय जी, आप हमारे स्वास्थ्य की चिन्ता मत कीजिये! जब महायज्ञ करना होगा तो हम भोजन में पौष्टिक पदार्थ खायेंगे और मोटर गाड़ी से आएंगे/ जायेंगे! रह गई सहयोगियों की बात, सो अच्छे कामों में भगवान सहायता करते हैं। तुम सब लोग तैयार हो जाओ तो यह यज्ञ अवश्य हो जायगा और मैं इसी समय इसको पूरा करने का संकल्प करता हूँ।”
आँखों देखा हाल:
अब महायज्ञ के आरम्भ होने में केवल दो दिन का समय रह गया है। तपोभूमि के सामने से सैंकड़ों शाखाओं के उपासक और उपासिकाएँ गायत्री परिवार के झण्डे लेकर निकल रहे हैं। मथुरा जंक्शन स्टेशन से लेकर बिरला मंदिर तक इन लोगों की चींटियों जैसी कतारें चल रही हैं। लोगों के दल के दल तपोभूमि में गायत्री माता के दर्शन करने चले आ रहे हैं और उनके जयकारों से आकाश गूँज रहा है। तपोभूमि से आगे चलते ही ऐसा जान पड़ता है मानो मीलों लम्बा चौड़ा “कोई नया नगर जादू के जोर” से बसा दिया गया हो। सब दिशाओं में ताँगे, रिक्शे, दुकानें, तम्बू, भोजनशालायें, साधु, संन्यासी, धर्मोपदेशक आदि देखते-देखते दर्शक के मन में एक अकथनीय भाव का उदय होता है कि “अहा, आचार्य जी के एक क्षण के संकल्प ने किस प्रकार जंगल में मंगल करके दिखा दिया।”
हमको तो कई बार हर्ष से रोमाँच हो आया और हृदय आनन्द से परिपूर्ण हो गया।
यह 1024 कुण्डों की अभूतपूर्व यज्ञशाला है। फाटक के भीतर प्रवेश करते ही नर नारियों की अपार भीड़ के कारण चल सकना कठिन हो जाता है। होता और यजमान अपने-अपने स्थानों पर बैठे हुए हैं। गायत्री मंत्रों की एक दिव्य ध्वनि सर्वत्र गूँज रही है। एक तरफ ब्रह्मचारी योगेन्द्र ( इस श्रृंखला के अंतिम निर्देशक) अपनी गम्भीर गर्जना से यज्ञ का संचालन कर रहे हैं। पास में कितने ही विद्वान सहयोगार्थ बैठे हैं। पूज्य आचार्य जी और माता भगवती देवी भी वहीं विराजमान हैं। अहा, इन दोनों तपस्वियों के दर्शन के लिये असंख्य भीड़ उमड़ी चली आ रही है। सब चरण स्पर्श करना चाहते हैं लेकिन इसके लिये पहले ही निषेध कर दिया गया है। तो भी स्वयं सेवक लोग समस्त भीड़ को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं और इक्के दुक्के व्यक्ति आचार्य जी के चरणों तक पहुँच ही जाते हैं।
नवरात्रि से ही जौ के सत्तू पर रहने वाले दुर्बल से आचार्य जी और माता भगवती देवी अपने संकल्प को पूर्ण होते देख हर्षित हो रहे हैं। यज्ञशाला के मध्य में बने प्रधान यज्ञकुण्ड के पास खड़े एक लम्बे से संन्यासी वहाँ की देखभाल कर रहे हैं और चारों तरफ पीले वस्त्र पहिने असंख्यों नर नारी पवित्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए आहुतियाँ दे रहे हैं। यज्ञशाला के प्रत्येक प्रवेशद्वार पर यज्ञ-रक्षक खड़े हुए होताओं के अतिरिक्त अन्य लोगों को भीतर जाने से रोक रहे हैं।
अब यज्ञशाला के परिक्रमा मार्ग पर आगे बढ़िये, असंख्य श्रद्धालु व्यक्ति 24 और 108 परिक्रमाएँ लगाने में संलग्न हैं। कोई-कोई तो लेट-लेट कर ‘दण्डौती’ परिक्रमा दे रहे हैं। अरे, यह देखो भयंकर भीड़ के कारण अनेक लोगों के पैर उन दण्डौती करने वालों की पीठ पर पड़ गये। मैंने इस प्रकार परिक्रमा देने वाली एक स्त्री से कहा:
“माताजी,इस समय अपार भीड़ है, आप संध्या के समय शेष परिक्रमा पूरी कर लेना।” लेकिन इस बात को कौन सुनता है। उसे तो परिक्रमा पूरी करनी है, प्राणों की परवाह नहीं!
परिक्रमा-मार्ग में कीर्तन करते, झण्डे लिये, जयघोष करते गायत्री उपासक तथा नजदीक और दूर के स्थानों के दर्शक स्वयं को परम सौभाग्यवान समझ रहे हैं। अब आगे कुआं है, जहाँ लोगों को पानी पिलाने की व्यवस्था है। 10 व्यक्ति पूरी शक्ति से कार्य कर रहे हैं लेकिन प्यासे लोगों की भीड़ इससे भी कहीं अधिक है और बड़ी धक्कमधक्का हो रही है। पास में ही यज्ञ-सामग्री का विशाल भंडार है जिसमें तपोभूमि के “वैद्य श्री रामलाल जी” अपने सहयोगियों के साथ डटे हुए सामग्री और घी समस्त 1024 कुण्डों पर पहुँचाने की व्यवस्था कर रहे हैं। यह कार्य इतना विशाल था कि यज्ञशाला व्यवस्थापक रामलाल जी कई दिन तक भंडार से बाहर ही नहीं निकले और उनका खाना-पीना, सोना, नित्यकर्म आदि सब बन्द हो गया। 1024 कुण्डों पर होताओं के नये-नये दलों को सामग्री आदि पहुँचाने में कई सौ स्वयंसेवकों को लगातार दौड़धूप करनी पड़ती थी और अगले दिन के लिये पहले दिन रात से ही सब तैयारी करके रखनी पड़ती थी। स्वेच्छा सहयोग के लिये आने वाली सामग्री,घी,रुपये पैसों को जमा करने का काम भी बहुत बड़ा था। इन्हीं कामों की देखभाल में व्यवस्थापक जी को लगातार 24 घण्टे व्यस्त रहना पड़ता था।
महायज्ञ की सब बातें इस छोटे से लेख में वर्णन नहीं की जा सकतीं। जिन्होंने उसमें भाग लिया, सहयोग किया, दर्शन किये, वे ही उसकी महानता का अनुमान कर सकते हैं। यज्ञनगर, प्रवचन-पंडाल यज्ञशाला भोजनशाला की अपार भीड़ स्वयं सेवकों का परम उत्साह, होता और याज्ञिकों की हार्दिक भक्ति,ब्रह्म के मंडप और मुख्य यज्ञकुँड की दिव्य छटा आदि बातें जीवन भर सदैव याद रहेंगी। अहा,क्या सम्भव है कि हम पुनः इस जीवन में ऐसे महायज्ञ में भूख,नींद त्याग कर तन-मन से सेवा कर सकेंगे अथवा फिर कभी इन नेत्रों से ऐसे दिव्य दृश्य देख सकेंगे।
महायज्ञ का विरोध एवं सेठ जी का स्वप्न :
लोग कहते हैं कि मथुरा के कितने ही लोगों ने महायज्ञ का विरोध किया, उसमें विघ्न डालने की चेष्टा की लेकिन हमको तो चारों तरफ सहयोग ही सहयोग और आश्चर्यजनक सेवा भावना के दर्शन हो रहे थे। सैंकड़ों नर-नारी इस बात के लिये तड़प रहे थे कि हमको भी इस पुण्य आयोजन में कुछ परिश्रम करने का, सेवा का अवसर मिल जाय तो जीवन धन्य हो जाय। अभी पता लगा है कि मथुरा के ही एक सेठ जी अपनी मिल के सब कर्मचारियों के साथ अपनी ही इच्छा से 4 दिन तक सेवाकार्य में लगे रहे। इस कार्य के लिये उन्होंने न तो आचार्य जी से पूछा और न किसी को कुछ बताया। वे हर एक कार्य में,जहाँ भी आवश्यकता हुई अपने कर्मचारियों सहित सहयोग देते रहे और आयोजन समाप्त होने पर चुपचाप चले गये। सेठ जी की इस निःस्वार्थ सेवा का रहस्य कुछ लोग ही जान पाये। उन सेठ जी का कहना है कि यज्ञ से एक दिन पूर्व सुषुप्ति (Deep sleep) की सी अवस्था में उनके निकट एक कन्या आई और यज्ञ में सहयोग की प्रेरणा देकर अदृश्य हो गई। फिर क्या था, सवेरे ही उन्होंने अपनी मिल का काम स्थगित कर दिया और अपने पचास कर्मचारियों को लेकर सेवाकार्य में लग गये। इसी प्रकार अन्य सैंकड़ों व्यक्तियों ने,जिनमें अधिकाँश गायत्री परिवार के ही थे , रात दिन परिश्रम करके,अपने स्थानों पर डटे रह कर इस पुण्यकार्य में सहयोग दिया और इस प्रकार पूज्य आचार्य जी के 10 माह पूर्व कहे वाक्यों को चरितार्थ कर दिखाया।
मार्कंडेय जी द्वारा वर्णन किया गया आँखों देखा हाल यहीं पर समाप्त होता है।
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कल वाले लेख को 473 कमेंट मिले,10 साथिओं ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है। सभी का धन्यवाद् एवं बधाई।