वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

आत्मबल सभी प्रकार के बल से सर्वोपरि है,भाग 2 

आत्मबल एवं इससे सम्बंधित विषय पर ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से अनेकों लेख पहले भी प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन बार-बार उसी विषय को फिर से प्रकाशित करने का उद्देश्य रिपीट करना तो होता ही है, आत्मनिरीक्षण एवं आत्ममूल्यांकन भी करना होता है। हमें यह भी जानना होता है क्या हम किसी विषय विशेष में एक्सपर्ट हो गए हैं, नहीं कदापि नहीं। ऐसा इसलिए कहना उचित लगता है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती, वोह असीमित होता है। जब दो वर्ष पहले इसी विषय को पढ़ा था तब मनःस्थिति कुछ और थी और आज बिल्कुल ही अलग है। इन पंक्तियों को लिखते समय हमारी स्थिति बिल्कुल ऐसी ही थी जिसके कारण आज के प्रज्ञागीत के स्थान पर एक अद्भुत वीडियो संलग्न की गयी है। 

कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स की प्रक्रिया को बल मिलते देखकर ह्रदय प्रसन्न हो उठा जब आद बहिन सुमनलता जी ने हमारे अपने अरुण जी की समस्या का समाधान कर दिया, धन्यवाद् बहिन जी 

अब सीधा अमृतपान की ओर  ही जाना पड़ेगा।   

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शान्तिकुंज परिवार द्वारा अब तक जो घटित हुआ है,उसके मूल में तप ही एकमात्र वास्तविकता है और यदि कोई इन दिव्य परिवारजनों की भांति ओजस्वी, तेजस्वी,वर्चस्वी,तपस्वी बनना चाहता है तो ऋद्धियों और सिद्धियों को प्राप्त करने के लिये इधर-उधर भटकने की ज़रा भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। यहाँ पर यह बात इतने दृढ विश्वास के साथ इसलिए कही जा रही है कि हमारे सभी पाठक कस्तूरी और मृग की कथा से भलीभांति परिचित हैं। कबीरदास जी के सुप्रसिद्ध दोहे, “कस्तूरी कुंडल में बसे मृग ढ़ूँढ़ै बन माहि, ऐसे घटी-घटी राम हैं दुनिया जानत नाँहि।” के अनुसार जिस प्रकार कस्तूरी {जो कि एक सुगंधित केमिकल( Perfume) होता है} मृग की  नाभि (कुंडल)  में व्याप्त रहता है लेकिन उसकी सुगंध से आकर्षित होकर वह मृग जंगल में इधर-उधर भागता फिरता है और ढूंढता रहता है कि वह सुगंध कहां से आ रही है।  ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी ईश्वर को जगह-जगह ढूंढता रहता है लेकिन ईश्वर तो संसार के कण-कण (घट-घट) में व्याप्त हैं, उसके ह्रदय में विरजमानमान हैं, इस महत्वपूर्ण तथ्य को मनुष्य समझ नहीं पाता। वाह रे कबीर जी, नमन है, नमन है, नमन है।

जो लोग मात्र पूजा के सहारे दैवी अनुकम्पा के रूप में मिलने वाले अनुदानों की आशा करते हैं,उनके हाथ मृगतृष्णा में भटकने पर खीज़, थकान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं लगता। “तप की शक्ति” को बल देता गुरुदेव द्वारा अनेकों बार दिया गया उदाहरण यहाँ बहुत ही सटीक एवं फिट बैठता दिखता है। बीज को विशाल, हरे भरे वृक्ष तक की यात्रा को सम्पन्न करने में जिस तप का सामना करना पड़ता है उससे हर कोई भलीभांति परिचित है। उसकी देख-रेख, खाद-पानी, गुड़ाई,गर्मी-सर्दी,मेघ आदि से रक्षा करने में किसान का जितना तप लगता है उसे नकारा नहीं जा सकता। ऐसा तो कभी भी नहीं होता कि किसान भूमि में बीज छिड़क कर, अपना दाइत्व पूरा हुआ समझकर,चद्दर ओढ़ कर सो जाये। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के लिए बीजारोपण एक बेसिक प्रक्रिया लेकिन देवमानव बनने के लिए अग्नि में तपना ही पड़ता है। 

यहाँ पर रामकृष्ण परमहंस जी का अखंड ज्योति के जुलाई 2001 के पृष्ठ 55 पर प्रकाशित एक वृतांत स्मरण हो आता है जो निम्नलिखित है :    

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के ज्ञान से प्रभावित श्री माथुर बाबू एक बार पूछ बैठे, “महाराज जी, आपके विचारों का स्पर्श पाकर जन-जीवन धन्य हो जाएगा। आप प्रचार के निमित्त निकलते क्यों नहीं ?” परमहंस बोले, “बेटे मैंने कुछ पौधे लगा रखे हैं, उनकी देखभाल करने के लिए यहाँ रहता हूँ ।” बाबू बोले, “प्रभु वह काम तो माली भी सकते हैं।” परमहंस बीच में ही हँस पड़े। पास बैठे नरेन्द्र, राखाल आदि की ओर इशारा करके बोले, “माली साधारण पौधे सँभाल सकता है, इन कल्पवृक्षों को तो मुझे ही सँभालना है। जो काम तू चाहता है, वह यही कर लेंगे ।” स्वामी रामकृष्ण के लगाए कल्पवृक्षों का लाभ सारे संसार ने खूब उठाया और उठाता रहेगा। 

परम पूज्य गुरुदेव का संरक्षण पाकर,खाद और पानी आदि प्राप्त करके अनेकों ब्रह्मबीज विश्वभर में उनके संदेशों को फैलाने का दिव्य कार्य संपन्न कर रहे हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के बैनर तले भी अपनी समर्था अनुसार ऐसा ही प्रयास हो रहा है।   

हम सब जानते हैं कि 1990 के वसन्त पर्व के लिए आशा से अधिक  परिजन शांतिकुंज में आ गए थे, यही वर्ष परम पूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण वर्ष  था। अनेकों परिजनों के मन में भांति-भांति की जिज्ञासा थी, अनेकों का समाधान भी हुआ। सभी ने यही अनुभव किया कि गुरुदेव के साथ  शंका समाधान निरर्थक नहीं गया। परिजनों की जिज्ञासा की न केवल संतुष्टि ही हुई, बल्कि सहस्रों परिजनों ने निश्चयपूर्वक संकल्प लिया कि वे अगले दिनों अध्यात्म के राजमार्ग पर चलेंगे। उन्होंने संकल्प लिया कि शेष जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनायेंगे। I ईश्वर का राजकुमार कहे जाने वाले अनेकों परिजनों ने संकल्प लिया कि उनकी आशा अपेक्षा पूरी करेंगे और बदले में एक सच्चे साथी सहचर की भूमिका निबाहते हुए निहाल कर देने के लिये प्रण लिया।

परम पूज्य गुरुदेव ने “अध्यात्म को साधना का प्राण” कहा है। अप्रैल 1990 की अखंड ज्योति में प्रकाशित 19 लेखों की विशेष लेखमाला में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक है “अध्यात्म अविश्वस्त सिद्ध हुआ तो ?” प्रश्न तो बहुत ही महत्वपूर्ण है कि यदि अध्यात्म पर लोगों ने विश्वास ही न किया तो बना बनाया  खेल बिगड़ जायेगा।  

ऋषियों को “आत्मबल” की साधना के लिए अभीष्ट तपश्चर्या के लिए साहस जुटाते रहना पड़ा है। योगी-तपस्वी अपने कार्यक्रम इसी आधार पर विनिर्मित करते हैं। बदले में उन्हें जो कुछ मिलता है,वह भी असाधारण,अद्भुत,अलौकिक ही कहा जाता है। “आत्मबल के धनी” होते ही इस स्तर के हैं कि वे अपने को महामानव, धरती के देवता कह सकें। उन्हीं को ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता स्तर की  उन्नति कर सकने की स्थिति में पाया जाता हैं एवं स्वयं को उन्नति के चरम शिखर तक योगी तपस्वी ही पहुँचाते हैं। यह अलौकिक स्तर की विभूतियों से सम्पन्न होते हैं। अपनी नाव पर बिठाकर अनेकों को भयंकर प्रवाह वाली नदी से उबारते-उतारते-पार कराते जाते  हैं। वातावरण की  दिशा  को बदल देना भी ऐसों से ही बन पड़ता है। दैवी अनुकम्पा एवं सहायता भी ऐसे ही लोग भारी  मात्रा में  प्राप्त  करते हैं। ऐसे ही योगियों में दूसरों को प्रभावित करने वाली शक्ति  (शाप/वरदान देने) की क्षमता होती हैं। स्वर्ग और मुक्ति की कामना भी “आत्मबल” के अधिष्ठाताओं से ही बन पड़ती है। इन सनातन मान्यताओं को कोई भी, कभी भी यथार्थता की कड़ी कसौटी पर कस सकता है, परख सकता है, टैस्ट कर सकता है एवं  आग पर तपाये गए, कसौटी पर कसे गए सोने की तरह खरा साबित कर  सकता हैं।

इस संदर्भ में इन दिनों एक भारी असमंजस भरा घटियापन देखने को मिलता है । “आत्मसाधना” का ड्रामा  करने का दावा तो असंख्यों लोगों को करते देखा जाता है लेकिन  उनमें वे विभूतियाँ नहीं देखी जातीं जो इस दिशा में सफल पुरुषार्थियों में देखी जानी चाहिए। मंदिर में जाना, घंटी बजाना, कर्मकांड करना, गायत्री उपासना करना, भारी  भरकम चढ़ावा चढ़ाना आदि सोसाइटी में, समाज में ऊँचा दिखने के उद्देश्य से करना ही यह घटियापन है। ऐसे लोग, यह प्रदर्शन केवल समाज में प्रतिष्ठा बनाने के लिए ही करते हैं। कहने का अर्थ है कि उनका सारे का सारा “ध्यान” समाज के लिए ही होता है। जो कुछ भी किया जाता है समाज को मुख रख कर ही  किया जाता है, लेकिन उन्हें  यह नहीं मालुम कि साधना के नाम पर हो रही इस ड्रामेबाज़ी से वोह अपने को मुर्ख तो बना सकते हैं , भगवान् को नहीं क्योंकि भगवान उनका बाप है, उनके अंदर बैठा सब कुछ देख रहा है। कुछ भी कृत्य करने से पहले भगवान को पहले पता चल जाता है। समाज और भगवान में से उसे किसी एक का चयन करना होगा। अगर वोह सब कुछ समाज के लिए ही कर रहा है तो भगवान से क्यों मांग रहा है। मंदिर में ईश्वर की प्रतिमा के समक्ष प्रसाद अर्पण करते भी अधखुली आँखों से इधर-उधर देख रहा होता है कि उसकी इस वाहवाही को कितने लोग देख रहे हैं, उससे भी बड़ी वाहवाही वोह सोशल मीडिया साइट्स पर शेयर करके लूट लेता है। सोशल मीडिया साइट्स पर मिलने वाले लाइक्स से वोह अपनी “आत्मसाधना” का मूल्यांकन करता है। सोशल मीडिया साइट्स पर भी सच्ची निष्ठा से किया गया कृत्य ही आत्मसाधना है।    

जिन बाज़ारू साधकों की बात यहाँ पर हो रही है उन्हें  सबसे बड़ी परेशानी तब होती है जब सफलता के लक्षण नहीं दिखते और वह भगवान को ही आरोपी ठहरा देते हैं, तरह-तरह के आरोपों से भगवान के साथ झगड़ा करने से भी कतराते नहीं हैं। भगवान् को डांटते हुए उन्हें अक्सर देखा जाता है कि वह धनाध्यक्ष कैसा, जो रोटी कपड़े जैसी सामान्य आवश्यकता भी जुटा सकने में असमर्थ है। वह पहलवान कैसा जो सौ कदम की दौड़ भी लगवाने में असमर्थ हो । वह विद्वान कैसा जो चिट्ठी पत्री तक पढ़ने लिखवाने में असमर्थता प्रकट करे। वह कलाकार कैसा जो एकाग्र रहने तक की क्षमता प्रदर्शित न करा सके। 

गुरुदेव ने परिजनों को  एक प्रकार से डाँटते हुए कहा कि ऐसे तथाकथित साधकों के बारे में क्या कहा जाये जो स्वयं को  “आत्मसाधना” में संलग्न हुआ बता कर अपना विज्ञापन करते हैं। ऐसे साधक न तो अपना निजी व्यक्तित्व परिष्कृत कर सकते हैं और न ही परिवार की समस्याओं के समाधान में कोई योगदान दे सकते हैं । 

सच्चे साधकों को विज्ञापन की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती, उनका व्यक्तित्व, आभा (Aura)  ही उनका विज्ञापन होता है, जिसे देखते ही प्रभावित होना स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। परम पूज्य गुरुदेव से क्षमा याचना करते हुए, उन्हीं  की प्रेरणा से इन बाज़ारू साधकों के बारे में लिख रहे हैं कि इनके पास दूसरों को प्रभावित करने,परिवर्तित करने का कोई सामर्थ्य नहीं होता, कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त कर सकने की क्षमता नहीं होती,समय की माँग,युग  परिवर्तन कर सकने की क्षमता नहीं होती। ऐसे साधकों का बाहुल्य होने के कारण “भोले भाले साधना के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे नर्सरी के विद्यार्थी” भटक सा जाते हैं और सारा जीवन एक गलत सी धारणा बना बैठते हैं। उनके लिए साधना एक Untouchable, अछूत सा उपकरण बन कर रह जाता है जिसे उनके ह्रदय पटल से हटा पाना लगभग असंभव ही प्रतीत होता है।

हमारे पाठक इस तथ्य से भलीभांति परिचित होंगें कि विद्यार्थी को जो कुछ  आरंभिक कक्षाओं में पढ़ाया जाता है, उसका प्रभाव सारी उम्र तक रहता है। इसलिए आवश्यक है कि साधना के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे परिजन को बड़ी ही समझदारी से गाइड किया जाये।

कल वाले लेख में आत्मसाधना को आडंबर कहने वाले वालों के बारे में कुछ और चर्चा की जाएगी। 

जय गुरुदेव 

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कल वाले लेख   को 556 कमेंटस मिले, आज भी 14  संकल्पधारी  साथिओं ने 24 से अधिक आहुतियां प्रदान की हैं। सभी का धन्यवाद् करते हैं । 


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