3 फ़रवरी 2025, सोमवार को लिखी जा रही यह पंक्तियाँ ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के किसी भी साथी को ऊर्जावान किये बिना नहीं रह सकतीं क्योंकि पिछले कल (वसंत पंचमी) वाला दिन हम सभी के जीवन में एक विशेष स्थान बनाये बैठा है। वर्ष 1926 की वसंत पंचमी का दिन परम पूज्य गुरुदेव के जीवन का एक अति विशेष दिन था। यही वोह दिन था जब परम पूज्य गुरुदेव के हिमालयवासी गुरु (जिन्हें हम सब दादा गुरु के नाम से सम्बोधन करते हैं) के साथ,आंवलखेड़ा गाँव,(आगरा) स्थित हवेली की कोठरी में, दिव्य साक्षात्कार हुआ था, उनके तीन जन्मों की कथा एक फ़िल्म की भांति दिखाई गयी थी। उसी दिन से,आज लगभग 100 वर्ष (2026 में 100 वर्ष) बाद भी पूज्यवर ने इस दिन को अपना आध्यात्मिक जन्म दिन घोषित करते हुए,अपने सभी क्रियाकलापों को वसंत पंचमी के दिन ही आरम्भ करने का संकल्प लिया और उसे पूर्ण भी किया।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के अनेकों संकल्पों में एक ही ध्वनि चरितार्थ होती है और वोह ध्वनि है, “क्या हम सही मायनों में अपनेआप को गुरुवर के चरणों को समर्पित कर पाए हैं?” साथिओं द्वारा हमारे सभी प्रयासों को पर्याप्त सम्मान मिलना गुरुवर के समर्पण का मूल्यांकन है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ मूल्यांकन तो वसंत पर्व पर ही होता है जब हर कोई गुरुवर के चरणों में अपनी अनुभूतियाँ समर्पित करके उनके विशेष अनुदान प्राप्त करता है।
2021 की वसंत पंचमी से आरम्भ हुए “अनुभूति विशेषांक” का सिलसिला न केवल अनवरत चल रहा है बल्कि दिनोंदिन और भी दिव्य होता जा रहा है। 2021 में केवल दो साथिओं का ही योगदान था, 2022 में इस विशेषांक के अंतर्गत 13 साथिओं का योगदान रहा, 2023 में 19 और 2024 में 25 साथिओं ने इस दिव्य योगदान में अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये।
2025 में आज ही इस दिव्य कार्य का शुभारम्भ हुआ है और अभी तक 9 अनुभूतियाँ हम तक पँहुच चुकी हैं। हमें विश्वास है कि इस बार भी “हम किसी से कम नहीं रहेंगें” क्योंकि इस ज्ञानरथ को गुरुवर की शक्ति और मार्गदर्शन में ही हांका जा रहा है।
आद सरविन्द पाल भाई साहिब द्वारा रिसर्च किये गए लेख से आज इस विशेषांक का शुभारम्भ हो रहा है जिसके लिए हम उनका ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। आज की प्रस्तुति उनकी व्यक्तिगत अनुभूति न होकर अखंड ज्योति में प्रकाशित लेख है जिसे उन्होंने स्वध्याय करके, समझकर, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर शेयर करने का अति उत्तम निर्णय लिया, जिसके लिए पुनः आभार व्यक्त करते हैं।
आद. सरविन्द जी का यह कृत्य उन साथिओं का मार्गदर्शन कर सकता है जो इस असमंजस में हैं कि इस विशेष श्रृंखला के लिए क्या लिखा जाये, कोई अनुभूति तो है नहीं। इस दिशा में हम अपने व्यक्तिगत विचार पहले भी लिख चुके हैं, आज फिर बताना चाहेंगें कि इस नन्हें से समर्पित परिवार का कोई ही सदस्य होगा जिसे गुरुवर की लेखनी ने प्रभावित न किया होगा, आद चिन्मय जी की दिव्यता ने प्रभावित न किया होगा, अखंड दीप, अखंड ज्योति पत्रिका, युग निर्माण योजना, गायत्री उपासना, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार, कलश यात्रा, गुरुवर का सूक्ष्म सानिध्य, वंदनीय माता जी का ममत्व न प्राप्त हुआ हो, अनेकों टॉपिक्स हैं, चयन आपका है। इस दिशा में हमारे द्वारा किये जा रहे सारे प्रयास एवं प्रेरित करने के पीछे हमारा केवल एक ही स्वार्थ है “कोई भी साथी गुरु की अनुकम्पा से वंचित न रह जाये।”
आज के लेख की निम्नलिखित पंक्तियाँ किसी को भी रोमांचित किया बिना नहीं रह सकतीं :
“वसंत को कामदेव और देवी रति का पुत्र कहा गया है।” रूप और सौंदर्य के देवता कामदेव के घर संतान उत्पन्न होने से प्रकृति झूम उठती है, पेड़-पौधे उसके लिए नवपल्लव का पालना डालते हैं, फूल उसे वस्त्र धारण कराते हैं, हवा झूला झुलाती है और कोयल उसे संगीत सुनाकर बहलाती है।
तो इन्हीं शब्दों के साथ आइये गुरुचरणों में समर्पित होकर सरविन्द जी के इस योगदान का अमृतपान करें जो उन्होंने हमें सबसे पहले 9 जनवरी को भेज कर गुरुश्रद्धा और हमारे सुझाव का सम्मान किया था।
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वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगदृष्टा परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस (वसंत पंचमी) के उपलक्ष्य में यह दिव्य लेख प्रस्तुत कर रहे हैं जो गुरुवर की अद्वितीय रचना अखंड ज्योति पत्रिका के फरवरी 2022 अंक के पृष्ठ 17 पर प्रकाशित हुआ था। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इस दिव्य लेख से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रत्येक सहकर्मी को प्रेरणा व ऊर्जा मिलेगी।
गुरुदेव बता रहे हैं कि अपने देश में छह ((ग्रीष्म ऋतू,वर्षा ऋतू,शरद ऋतू,हेमंत ऋतू,शिशिर ऋतू और वसंत ऋतू) ऋतुएं होती हैं और ऐसा सुयोग इस विश्व ब्रह्मांड में और कहीं नहीं है। इन छह ऋतुओं में वसंत ऋतु को सर्वश्रेष्ठ ऋतु की संज्ञा देकर है “ऋतुराज” यानि ऋतुओं का राजा कहा जाता है। भारत में वसंत पंचमी का यह पर्व हर वर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। संस्कृत साहित्य वसंत के गुणगान से भरा पड़ा है। पक्षियों का कलरव, आम्रमंजरियां, मंद-मंद बहती हवा और वसंत ऋतु की सुवास अनायास सभी पर छा जाती है। जौ और गेहूँ की बालियाँ इस दिन भगवान के समक्ष समर्पित की जाती हैं। वृंदावन क्षेत्र में यह उत्सव विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है और सृष्टि की गहराई को समझ पाने की दृष्टि के लिए माँ शारदा से विशेष निवेदन किया जाता है।
वर्तमान समय की परिस्थितियाँ परिवर्तित हैं; अतः यह कह पाना कठिन है कि वसंत पंचमी का उत्सव उन्हीं भावों के साथ मनाया जाता है या नहीं, लेकिन फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि अपने देश व समाज में अन्य ऋतुओं की अपेक्षा इस पर्व का विशेष महत्व है। माँ सरस्वती पूजन की परंपरा शायद वैदिककाल से चली आ रही है,क्योंकि “संहिताओं के अध्ययन और पाठ के लिए यह दिन सबसे उपयुक्त माना गया है।”
माँ सरस्वती की दिव्य कथा :
माँ सरस्वती की दिव्य कथा अनेक ग्रंथों और पुराणों में वर्णित है। सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना का संकल्प लिया तो सात्विक चिंतन के पलों में उनके ललाट पर एक सफेद ज्योति प्रदीप्त हुई और कुछ समय के उपरांत उस स्थान से एक नवजात कन्या अवतरित हुई। तब ब्रह्मा जी ने पूछा कि “तुम कौन हो?” तो कन्या ने कहा कि “मेरा जन्म आपके चिंतन से हुआ है। कृपया मुझे यथोचित स्थान दें और मुझे सेवा-भार सौंपें। ” ब्रह्मा जी ने माता सरस्वती से कहा कि “तुम लोगों की जिव्हा में स्थान ग्रहण करो और वाक्शक्ति बनकर क्रियाशील रहो क्योंकि वाक् से ही लोग वश में होते हैं और वाक् से ही एक दूसरे के शत्रु हो जाते हैं।” जो लोग तुम्हारी अनेकानेक छवियों को पहचानेंगे,वे कवि-मनीषी आदि कहलायेंगे। यही नहीं, तुम्हें पृथ्वी पर दिव्य एवं पावन नदी के रूप में भी प्रतिष्ठा मिलेगी।
कालांतर में कुंभकर्ण की घोर तपस्या से ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर वरदान माँगने के लिए कहा, तब माता सरस्वती कुंभकर्ण की जिव्हा पर कुछ अधिक तीव्रता से क्रियाशील हो गईं। परिणाम यह हुआ कि माता सरस्वती के तीव्र प्रभाव से “कुंभकर्ण ने इंद्रासन की जगह निद्रासन माँगा।” इसी तरह समुद्र में निरंतर जल रही अग्नि (बड़वाग्नि) को समुद्र में पहुँचाने का काम भी माँ सरस्वती ने ही किया था। हुआ यह कि भार्गव और भौर्य ऋषि के बीच किसी विषय पर तीखी बहस हो गई और बहस का कारण भी माँ सरस्वती जी ही थीं। इस तर्क-वितर्क का परिणाम यह हुआ कि क्रोध अग्नि की एक लपट पैदा हुई जिसका जन्म ब्रह्मा जी की पलकों से उत्पन्न हुआ माना जाता है। माँ सरस्वती जी ने जब देखा कि जिव्हा से जन्मी तर्क-अग्नि से सब कुछ नष्ट हो जाएगा तो उन्होंने अग्नि की उस लपट को समुद्र तल में दबा दिया, इसी को बड़वाग्नि कहा जाता है।
गुरुदेव लिखते हैं कि सरस्वती नदी के तट पर ही वेदव्यास के पुत्र ने परीक्षित को ज्ञान दिया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार “वसंत को कामदेव और देवी रति का पुत्र कहा गया है।” रूप और सौंदर्य के देवता कामदेव के घर संतान उत्पन्न होने से प्रकृति झूम उठती है, पेड़-पौधे उसके लिए नवपल्लव का पालना डालते हैं, फूल उसे वस्त्र धारण कराते हैं, हवा झूला झुलाती है और कोयल उसे संगीत सुनाकर बहलाती है।
“इस तरह वसंत की महिमा अपार है। इसीलिए भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि ऋतुओं में मैं वसंत हूँ।”
वसंत ऋतु में माता सरस्वती की पूजा की जाती है और वसंत को हम सब ऋतुराज कहते हैं। हमारे देश के कवियों ने वसंत की महिमा में अनेक गीत गाए हैं और वेदों के पूजन का दिन भी माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी है। वसंत ऋतू, माँ प्रकृति के विकास की ऋतु है और इसकी दिव्य महिमा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह दिन पूरे देश में “सरस्वती पूजा” के रूप में मनाया जाता है। वैदिक साहित्य में वाणी (वाक्) की स्तुति अनेक ऋचाओं में विन्यस्त है। संस्कृत के अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप की पुरातन पालि भाषा में भी वसंत की महिमा का वर्णन किया गया है। पालि का शाब्दिक अर्थ पवित्र होता है। अनेकानेक कवियों ने इस विषय का अति सुंदर पंक्तियों से हम सबको परिचित कराया है।
वसंत ऋतु प्रकृति के उत्सव की ऋतु है और इस दिव्य ऋतु में सम्पूर्ण प्रकृति नर्तन, गायन और कीर्तन करती है। इस ऋतु में तन-मन झूम उठता है और अंतःकरण पुलकित हो उठता है। कामना करते हैं कि इस ऋतुराज से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी का जीवन उमंगित और पुलकित हो जिससे जीवन को एक नई प्रेरणा व ऊर्जा मिले।
यह दिव्य लेख परम पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में समर्पित है जिसे गुरुदेव स्वीकार करें और लिखने में जो त्रुटि हुई हो तो हमें अपना परम शिष्य समझकर माफ करें।
धन्यवाद। जय गुरुदेव
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शनिवार प्रकाशित हुए विशेषांक को केवल 591 कमेंट मिले, 15 संकल्पधारिओं ने 24 से अधिक आहुतियां प्रदान की हैं। इस प्रभावशाली रिजल्ट के लिए सभी साथिओं का ह्रदय से धन्यवाद करते हैं।
