12 नवंबर 2024 मंगलवार का ज्ञानप्रसाद- गायत्री की परम कल्याणकारी सर्वांगपूर्ण सुगम उपासना विधि”
आज का दिव्य ज्ञानप्रसाद परम पूज्य गुरुदेव की अद्भुत रचना “गायत्री की परम कल्याणकारी सर्वांगपूर्ण सुगम उपासना विधि” एवं ऑनलाइन रिसर्च पर आधारित है। लेख को सरल बनाने के लिए ओरिजिनल रचना में दिए गए दिव्य संस्कृत श्लोकों को डिलीट किया गया है लेकिन श्लोकों के नीचे दिए गए अर्थ समझकर,लेख में शामिल किया गए हैं।
दो भागों में प्रस्तुत किये जाने वाले लेख का यह प्रथम भाग है, कल इसका दूसरा भाग प्रस्तुत किया जायेगा। प्रयास किया गया है कि एक प्रारंभिक विद्यार्थी की भांति “गायत्री मंत्र जप साधना” और “गायत्री मंत्र लेखन साधना” के लाभों का Comparative analysis किया जाए।
हमारे अनेकों साथी बड़ी ही श्रद्धा से वर्षों से मंत्र लेखन कर रहे हैं एवं भलीभांति इस प्रक्रिया से परिचित भी होंगें लेकिन अनेकों ऐसे भी होंगें जो अपरिचित हैं। कुछ भी हो ज्ञान तो ज्ञान ही है इसे अर्जन करने में कोई हानि नहीं होती।
तो आइये गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर इस गुरुज्ञान का अमृतपान करें।
आदरणीय सरविन्द जी ने इस कक्षा को एक और नाम “आध्यात्मिक कक्षा” देकर अपने ज्ञान को प्रकट किया है
गुरुवर ने अपने प्रवचनों में अनेकों बार कहा है कि यह सब भगवान की शिक्षाएं हैं, इन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। गुरुकुल की आध्यात्मिक गुरुकक्षा का एक-एक शब्द जन्म घुंटी की अमृतधारा की भांति है।इस अमृतधारा को ग्रहण करते ही कायाकल्प होना निश्चित है, हम सब इस तथ्य के साक्षी हैं।
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गायत्री साधना मनुष्य मात्र के लिए सुलभ है और यह है भी अन्य सभी उपासनाओं में श्रेष्ठ और शीघ्र फलदायी। शब्द विज्ञान, स्वर शास्त्र की सूक्ष्म धारायें गायत्री महामंत्र में जिस विज्ञान सम्मत ढंग से मिली हुई हैं, वैसा संगम अन्य किसी मंत्र में नहीं हुआ है। साधनारत योगियों और तपस्वियों ने अपने प्रयोग परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर जो तुलनात्मक उत्कृष्टता देखी है उसी से प्रभावित होकर उन्होंने इस महाशक्ति की “सर्वोपरि स्थिति” बताई है। इन पुरातन एवं दिव्य योगियों द्वारा बताये गए, स्वयं टैस्ट करके, जाँच पड़ताल करके, निकाले गए निष्कर्ष आज भी वैसे ही बने पड़े हैं । मात्र जप पूजन से तो शायद संभव न हो पाए, लेकिन “अभीष्ट साधना प्रक्रिया” अपनाते हुए जो कोई भी साधक “गायत्री साधना” को कर सके तो उसका निजी अनुभव शास्त्रों में बताई गयी सर्वश्रेष्ठता का समर्थन ही करेगा। शास्त्रों में पग-पग पर गायत्री महामंत्र की महत्ता का गुणगान किया गया है।
देव्युपनिषद, स्कन्द पुराण, ब्रह्म सन्ध्या भाष्य, उशनः संहिता, विश्वामित्र कल्प के पन्ने गायत्री जप की महिमा से भरे पड़े हैं, देवी भागवत् में तो एकमेव भगवती गायत्री की माया का ही सुविस्तृत वर्णन है।
यह तो निश्चित है कि मनुष्य को “गायत्री जप” से सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती ही है लेकिन “गायत्री की सिद्धियाँ” मनुष्य को अनेक प्रकार की भौतिक और दैवी सम्पदाओं से विभूषित भी कर देती हैं।
गायत्री साधकों के लिए नियम बंधन:
जिस प्रकार प्रत्येक साधना के अपने नियम बंधन होते हैं, गायत्री साधना का इतना महत्त्व और पुण्य प्रभाव देखते हुए इसके भी कुछ नियम हैं, बन्धन एवं मर्यादायें हैं।
दो प्रहरों के सन्धिकाल ( जब दिन के दो पहर मिलते हैं: सुबह,सांय) में की गयी “गायत्री उपासना” के परिणाम सुनिश्चित करने के लिए नियमबद्ध जप, उपासना भी आवश्यक है।आधुनिक समय की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि यह आवश्यक नहीं कि हर किसी को प्रातः/सायं का समय जप के लिए मिल जाये । नाईट ड्यूटी करने वालों, महिलाओं आदि के लिए जिनको देर रात तक परिवार की देखभाल करनी पड़ती है,नियमबद्ध होना, मर्यादाओं का पालन करना सुनिश्चित कर पाना इतना सरल एवं आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में नियमित उपासना की सुविधा कैसे हो सकती है? इसका अर्थ तो यह हुआ कि ऐसे लोग माँ गायत्री के अनुग्रह से वंचित रह जायेंगें जो कि सरासर अन्याय ही लगता है।
व्यस्तता में “मंत्र लेखन साधना” एक सरल/सुलभ विकल्प :
मनीषियों ने इस कठिनाई के समाधान के लिये “मंत्र लेखन साधना” का मार्ग निकाला। यह एक ऐसा विकल्प है जहाँ बन्धनों के कारण या ऐसे ही किन्हीं अपरिहार्य कारणों से जप की व्यवस्था न हो सके, “गायत्री मंत्र लेखन” अपनाकर आत्म कल्याण का मार्ग ठीक उसी तरह प्रशस्त हो सकता है । इसके लिए अलग से कोई उपासनागृह,वेशभूषा, स्थान आदि की मर्यादाओं की भी छूट रखी गयी है। पवित्रता के साथ तो कोई Compromise नहीं किया जा सकता इसलिए स्वच्छतापूर्वक कहीं भी, किसी भी समय बैठकर, की गयी “गायत्री मंत्र लेखन साधना”, जप साधना जितनी ही शास्त्र सम्मत और फलदायक बताई गयी है। पुरातन ग्रंथों में लेखन साधना का जप साधना से अधिक महत्व बताया गया है। यज्ञ करते समय मंत्रों में प्राण आते हैं, जप से मंत्र जाग्रत होता है और लेखन से मंत्र की शक्ति आत्मा में प्रकाशित होती है। “साधना से सिद्धि” के अनेक मार्ग हैं इसमें भी मंत्र लेखन ही विशेष एवं श्रेष्ठ है।
पुरातन ग्रंथों में तो यहाँ तक भी लिख दिया है कि यदि श्रद्धापूर्वक शुद्ध मंत्र लिखे जायें तो जप से 10 गुना अधिक फल देते हैं। प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र के लिखने से वेदमाता गायत्री साधक पर अति प्रसन्न होती है।
गायत्री मंत्र लेखन एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधना विधि:
शास्त्र वचनों के आधार पर गायत्री मंत्र लेखन एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधना विधि है। इसमें स्त्री,पुरूष,बाल,वृद्ध सभी प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकते हैं। इसमें कोई विशेष प्रतिबन्ध नहीं है। सबसे बड़ी सुविधा यह है कि जब भी समय मिले, मंत्र लेखन किया जा सकता है। जप की अपेक्षा मंत्र लेखन का पुण्य 10 गुना अधिक माना गया है। इस प्रकार 24000 जप के अनुष्ठान की भाँति ही 2400 मंत्र लेखन का एक अनुष्ठान माना जाता है।
इसके पीछे भी एक वैज्ञानिक लॉजिक कार्य करता है।
मंत्र जप के समय हाथ की माला के मनके फेरने वाली उँगलियाँ और उच्चारण करने वाली जिह्वा ही प्रयोग में होती है जबकि मन्त्र लेखन में हाथ,आँख, मन,मस्तिष्क आदि अवयव व्यस्त रहने से चित्तवृत्तियाँ अधिक एकाग्र रहती हैं तथा मन भटकने की सम्भावनायें अपेक्षाकृत कम होती हैं। मन को वश में करके, चित्त को एकाग्र करके मंत्रलेखन किया जाय तो अनुपम लाभ मिलता है। इसी कारण मंत्र लेखन को बहुत महत्त्व मिला है।
गायत्री तपोभूमि मथुरा द्वारा मंत्र लेखन के लिए 1000 मंत्र लेखन की सुन्दर पुस्तिकाएँ विशेष रूप से तैयार कराई गयी हैं। सस्ते मूल्य की यह पुस्तिकायें वहाँ से मँगाई जा सकती हैं या फिर बाजार में मिलने वाली कापियों का प्रयोग भी किया जा सकता है। गायत्री तपोभूमि से एक या दो पुस्तिकायें मँगाने में डाक- खर्च अधिक लगता है इसलिए बेहतर रहता है कि कुछ लोग मिलकर इकट्ठे 50-50 के पैकेट ही मंगवाया करें। यज्ञायोजकों को भी अपेक्षित संख्या में मंत्र लेखन पुस्तिकायें स्वयं मँगाकर मंत्र साधना के इच्छुक भागीदारों को वितरित करनी चाहिए।
जिस पुस्तक को आधार बनाकर यह पंक्तियाँ लिखी जा रही है,जब वोह प्रकाशित हुई होगी और आज के समय में ज़मीन आसमान का अंतर् आ चुका है। आज मंत्र लेखन पुस्तिका प्राप्त करना इतना सरल हो चुका है कि हम विश्वास से कह सकते हैं कि यह शक्तिपीठों पर अवश्य उपलब्ध होगी, हमारे अनेकों सहकर्मी इस से परिचित होंगें,मंत्र लेखन कर भी रहे होंगें, कमैंट्स देकर साथिओं को ज्ञानप्रदान कर सकते हैं। हम व्यक्तिगत तौर से कह सकते हैं कि आदरणीय राधा त्रिखा जी जम्मू में शक्तिपीठ से ही पुस्तिका ले रही हैं और लिखने के बाद वहीँ जमा करा देती हैं। हमारे इधर कनाडा में भी गायत्री परिवार के आयोजनों में बुक स्टाल में यह पुस्तिका उपलब्ध रहती है लेकिन आयोजनों के बाद भी मंगाई जा सकती है।
मंत्र लिखी पुस्तिकायें प्राण प्रतिष्ठा हुई मूर्ति की तरह हैं जिन्हें किसी भी अपवित्र स्थान में नहीं फेंक देना चाहिए। यह न केवल श्रद्धा का अपमान है बल्कि एक प्रकार की उपेक्षा भी है। प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों को भी विधिवत् पवित्र तीर्थ स्थलों में प्रवाहित करने का विधान है। वही सम्मान इन पुस्तिकाओं को दिया जाता है। जिनके यहाँ इन्हें स्थापित करने के उपयुक्त पवित्र स्थान न हों यह पुस्तिकायें गायत्री तपोभूमि मथुरा भेज देना चाहिए। वहाँ इन मंत्र लेखनों का प्रतिदिन प्रातः सायं विधिवत् आरती पूजन सम्पन्न करने की व्यवस्था है।
मंत्र लेखन की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस स्थान पर यह कापियाँ स्थापित की जाती हैं वहाँ इनका नित्य पूजन होता है जिस कारण वह स्थान एक विशेष आध्यात्म-शक्ति से सम्पन्न बन जाता है। गायत्री तपोभूमि मथुरा में वंदनीय माता जी के मंदिर में, माता जी की प्रतिमा के ऊपर 2400 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्र रखे हुए हैं, यह हजारों वर्षों तक सुसज्जित रूप से सुरक्षित रखे रहेंगे। इनका नित्य पूजन होता रहेगा। इन मंत्रों को प्रति वर्ष लाखों तीर्थ यात्री देखते और प्रकाश एवं प्रेरणा प्राप्त करते रहेंगे। इन मन्त्र लेखन कापियों के पन्नों में साधकों की आंतरिक श्रद्धा एवं तपस्या लिपटी रहती है। इसलिए वे मात्र कागज की कापियां न होकर “सूक्ष्म सतोगुणी शक्ति सम्पन्न एवं प्रकाश पुंज” बनकर उस स्थान के वातावरण को बड़ा ही प्रभावशाली एवं शुद्ध बनाते हैं। जहाँ पर भी इन मंत्र लेखन कापियों की स्थापना होती है उस स्थान में प्रवेश करने वाला, निवास करने वाला व्यक्ति तुरन्त ही “एक असाधारण शक्ति” उसी प्रकार प्राप्त करता है जैसे गर्मी से सताया हुआ व्यक्ति बर्फखाने में घुसकर और सर्दी से काँपता हुआ व्यक्ति जलती हुई भट्ठी के पास बैठकर प्रसन्न होता है।
जो लोग गायत्री तपोभूमि में गये हैं और वहाँ ठहरे हैं, उन्हें वहाँ के सूक्ष्म वातावरण की पवित्रता एवं दिव्य प्रभाव शक्ति का अनुभव निश्चय ही हुआ होगा । इसका बहुत कुछ श्रेय 2400 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन की स्थापना को है।
शांतिकुंज हरिद्वार के स्वर्ण जयंती वर्ष 2021 में गायत्री परिवार की ओर से विश्व कीर्तिमान रचा गया था। अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से 5 अप्रैल से 27 अप्रैल तक अभियान चलाकर गायत्री साधकों से सुनहरे अक्षरों से गायत्री मंत्र लिखवाया गया था। इसमें ऑनलाइन पंजीकरण के बाद गायत्री साधक और सनातन धर्मियों ने महामंत्र का लेखन किया था। साधकों को रोजाना सुनहरी स्याही से गायत्री मंत्र लिखा था। लेखन साधना की पुस्तिका को कोरियर द्वारा शांतिकुंज अथवा जिलास्तरीय गायत्री कार्यालय में जमा कराया गया था ।
इस लेखन साधना में प्रत्येक साधक के लिए न्यूनतम 2400 गायत्री मंत्र लेखन करने का लक्ष्य रखा गया था।
यहाँ बताना उचित है कि गुजरात के मंगलदास ईश्वरदास कडिया ने 2019 में गायत्री मंत्र लेखन अभियान में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। मंगलदास जी ने 2013 से 2019 के बीच 322 पुस्तिकाओं का अनवरत लेखन किया जिसमें 772008 मंत्र लिखे गए थे।
कल दूसरा पार्ट प्रस्तुत किया जायेगा
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कल वाले लेख को 668 कमैंट्स मिले एवं 13 युगसैनिकों ने 24 से अधिक कमेंट करके ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की इस अनूठी एवं दिव्य यज्ञशाला की शोभा को कायम रखा गया है। सभी को हमारी बधाई एवं धन्यवाद।
