वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

“ध्यान” के विषय पर आरम्भ हो रही लेख श्रृंखला की पृष्ठभूमि 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथी इसकी कार्यप्रणाली से भलीभांति परिचित हैं। इस कार्यप्रणाली के अंतर्गत प्रयास तो सदैव यही रहता है कि लेख शृंखला का शुभारम्भ सप्ताह के प्रथम दिन सोमवार से ही किया जाए क्योंकि उस दिन रविवार के अवकाश के कारण हमारे भीतर एक नवीन ऊर्जा,उत्सुकता एवं जिज्ञासा का संचार हुआ होता है लेकिन कई बार इस निर्धारित  फॉर्मेट को अनदेखा करना पड़ता है, जैसे आज हो रहा है, आज मंगलवार है। हम तो इसमें भी परम पूज्य गुरुदेव का ही निर्देश मानते हैं  क्योंकि वही तो इस परिवार के संचालक एवं सूत्रधार है। 

हमारे साथिओं को कल वाले लेख में संकेत तो मिल ही गया था कि आज से “ध्यान” के  बहुचर्चित विषय पर लेख श्रृंखला का शुभारम्भ होने वाला है। बहुतों ने कमैंट्स द्वारा  इस लेख शृंखला के प्रति अपनी जिज्ञासा भी व्यक्त की है। 

2002 की अखंड ज्योति के  नवंबर, दिसंबर,जनवरी और फ़रवरी के  चार अंकों में प्रकाशित ध्यान-केंद्रित  लेखों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इस कंटेंट को फिर से स्टडी करने की आवश्यकता है। हम तो कहेंगें कि मात्र स्टडी करने की आवश्यकता न होकर, इस कंटेंट में दिखाए गए गुरुदेव के निर्देशों को  Practically apply किया जाए, apply करके देखा जाए कि गुरुदेव जिन परिणामों की बात कर रहे हैं, क्या हमारे लिए भी संभव हो सकते हैं ? गुरुदेव ने तो अनेकों बार अपने उद्बोधनों में इस तथ्य पर बल दिया है कि यदि साधना के यह सूत्र हम पर सार्थक  सिद्ध हो सकते हैं तो आपके ऊपर क्यों नहीं हो सकते। गुरुदेव के उद्बोधनों से ही हम यह भी जानते हैं कि गुरुदेव ने अपने शरीर को एक प्रयोगशाला के रूप में देखा, उन्होंने जो-जो प्रैक्टिकल किए, उनसे जो-जो परिणाम प्राप्त हुए, अपने बच्चों को  एक दिव्य प्रकाशन प्रदान करके उन्होंने हमारे ऊपर बहुत बड़ा उपकार किया है। 

2002 में प्रकाशित लेख श्रृंखला, गुरुदेव के उस उद्बोधन पर आधारित है जो उन्होंने शांतिकुंज प्रांगण में जून 1977 को दिया था । यह कोई साधारण उद्बोधन नहीं था , भाषा तो बहुत ही सरल थी  लेकिन ज्ञान इतना दिव्य था  कि इसे  समझने के लिए हमें आज से ही, पहले दिन से ही कमर कसनी पड़ेगी, अगर ऐसा नहीं करते हैं तो हम फिर वहीँ के वहीँ खड़े रहेंगे और हमें कबीर जी का वही राग अलापना पड़ेगा : 

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय । ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

हमनें  अनेकों पुस्तकों को पढ़ने व संग्रहित करने मे न जाने कितनी ही  रातें बिताई होंगी, कितनी ही चाय की प्यालियाँ खाली की होंगी और कितने ही पन्ने पलटे होंगे, लेकिन क्या इतनी पुस्तको को पढ़ने के बावजूद हम सब Expert बन पाए हैं? शायद नहीं।

इस दोहे में कबीर दास जी कहते है कि ज्ञान और विद्या की सच्ची पहचान प्यार के उस ढाई अक्षर में है, जिसे आज तक कोई पढ़ नही पाया है।  वे मानते हैं कि यदि कोई इस प्यार के मार्ग को समझता है, तो वह वास्तविक ज्ञान का  पात्र बन जाता है। प्यार का वास्तविक अर्थ समझने के पश्चात ही मनुष्य  विद्वान बन सकता है क्योकि प्रेम  न केवल एक भावना होती है, बल्कि एक गहरे रिश्ते का प्रतीक भी होता है।

इन लेखों में परम पूज्य गुरुदेव इसी भावना एवं रिश्ते की  बात समझा कर “ध्यान” से हमें परिचित करा रहे हैं। जब भी “भावना” की बात उठती है तो हमारा ध्यान एकदम “मन” की तरफ जाता है, क्योंकि भावनाओं का केंद्र मन ही तो है,मन ही तो है जो सारी परिस्थितिओं  की जड़ है। अच्छे बुरे विचार मन में ही तो पनपते हैं। 

कल वाले लेख में हमने  एक नवीन प्रयोग  का भी संकेत दिया था जिसके अंतर्गत  गुरुकक्षाएं  मात्र “थ्योरी की कक्षा” न होकर, “एक प्रैक्टिकल कक्षा” होगी, जिसमें प्रतक्ष्य परिणामों पर बल डाले  जाने की योजना है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर, पहली बार किये जाने वाले नवीन, अद्भुत, अनूठे  प्रयोग के लिए हम तो बहुत ही उत्साहित हैं, देखते हैं इस प्रयोग से  कितने साथी लाभ उठा पायेंगें। नए नए प्रयोग करना हमारी हॉबी एवं प्रवृति है, विज्ञान के विद्यार्थी जो ठहरे। इन प्रयोगों में जो भी method सफल हो जाता है, इसे Tried and Tested का Certificate देकर दूसरों से भी सफल कराने का प्रयास करते हैं। 

हमारे साथी हमसे पूछ सकते हैं कि हम इस तरह के नए नए प्रयास क्यों करते हैं एवं हमें दुविधा में क्यों डालते हैं? तो इसका एक ही सरल सा उत्तर है कि यदि ज्ञानप्रसाद लेख परिवारों में, साथिओं के रुधिर में सुख-शांति की इलेक्ट्रिक करंट का प्रवाह नहीं दौड़ा सकते तो सब प्रयास निष्फल हैं और ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार भी अन्य मंचों  की भांति एक विज्ञापन बन कर रह जाएगा, जो शायद हम सभी को सहन न हो। इसीलिए कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स के  माध्यम से ज्ञानप्रसार एवं गुरुभक्ति के लिए आग्रह किया जाता है। 

आगे चल कर नवीन प्रयोग की परिभाषा का भी वर्णन करना है।  

हममें से शायद हो कोई साथी होगा जिसने “ध्यान साधना” के विषय पर परिश्रम न किया हो, अनेकों को सफलता भी मिली होगी लेकिन अनेकों साथी ऐसे भी होंगें जिन्होंने यह शिकायत भी की होगी कि “ध्यान में मन नहीं लगता”, अनेकों ने ऐसा भी अनुभव किया होगा कि  पूजा स्थली में कर्मकांड, आरती, नाद इत्यादि तो सब कुछ करते हैं लेकिन मन भटकता ही रहता है, अक्सर लोगों को ऐसा भी कहते सुना गया है कि भांति-भांति के विचार उसी समय आते हैं जब हम पूजा स्थली में बैठते हैं, ऐसा लगता है जैसे कि समस्याओं का पुलंदा ही खुल गया हो। बेसिक स्तर का गणित बताता है कि अगर हमारा मन 5 मिंट भी स्थिर नहीं हो पाता, जो कि 24 घण्टों का एक बहुत ही छोटा सा भाग  है तो फिर कहीं न कहीं तो गड़बड़ है। अपनी रूचि के कामों में तो मनुष्य घंटों गुज़ार देता है, भूख-प्यास, नींद आदि भी भूल जाता है, भगवान के पास बैठने में (उपासना), अपनेआप को सीधा करने में(साधना) में इतनी बेरुखी क्यों ? अपने पिता से बेरुखी क्यों ?वोह आपसे कुछ मांग तो नहीं रहे हैं, अपने प्रिय पुत्र होने के कारण आपका जीवन सुखमय बनाना चाहते हैं। 

तो फिर हुई न सारी  की सारी समस्या रूचि की, मन की। इस मन को ही काबू करने की आवश्यकता है।  मन चंचल है, दिल तो बच्चा है, दिल तो पागल है, दिल का क्या कसूर आदि स्लोगनों से कब तक मनुष्य भटकता रहेगा, स्वयं को गुमराह करता रहेगा। चंचल तो छोटा शिशु भी बहुत होता है, उसकी चंचलता मन को भाति  भी है लेकिन कब तक ? हर किसी स्थिति की सीमा होती है। जिस पाकर शिशु की चंचलता को कण्ट्रोल करने के लिए कई बार भरे मन से हल्का सा थप्पड़ लगाना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य को अपने चंचल मन को स्थिर करने के लिए कान खींच  कर, थप्पड़ मारकर बैठाना पड़ता है।             

हमारे साथिओं को स्मरण होगा कि तीन वर्ष पूर्व 2021 में  “मनोनिग्रह विषय” पर हमने 30 लेखों की अद्भुत लेख श्रृंखला प्रस्तुत की थी। आदरणीय अनिल मिश्रा जी के सुझाव पर रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी की पुस्तक The Mind and its control पर आधारित इस  लेख श्रृंखला ने अनेकों साथिओं के मन को कण्ट्रोल करने, स्थिर करने में सहायता की होगी लेकिन अनेकों ऐसे भी होंगें जिनके मन  अभी भी अस्थिर होकर भटक रहे  होंगें। 

जिन साथिओं के मन अभी भी भटकन की समस्या से जूझ रहे हैं उनके लिए आने वाली प्रैक्टिकल कक्षाएं बहुत ही लाभदायक हो सकती हैं 

क्या है नवीन प्रयोग ?

बेसिक विज्ञान के विद्यार्थी जानते होंगें कि किसी भी प्रयोग के तीन स्टैप  होते हैं। सबसे पहला स्टैप  होता है Experiment यानि क्रिया। आपने एक गिलास दूध पीने की क्रिया की, दूसरा स्टैप  होता है Observation यानि दिखना।  दूध पीने से आपको क्या अनुभव हुआ और तीसरा स्टैप  होता है Inference यानि निष्कर्ष क्या निकला। इस प्रयोग के तीनों स्टैप्स  को एक वाक्य में कहा  जा सकता है कि हमने दूध पिया ,उससे एनर्जी प्राप्त हुई और निष्कर्ष निकला की दूध एनर्जी प्रदान करता है अर्थात दूध से एनर्जी मिलती है। लेकिन यह निष्कर्ष दूध पीने के बाद ही निकला। यही  स्टैप्स  हम सबने आने वाले दिनों में बिल्कुल निष्पक्ष होकर प्रयोग में लाने हैं। स्वयं के ऊपर Experiment करना है कि अगर ध्यान करते समय मन भटकता है तो उसका कारण क्या है ? एक बार कारण पता चल गया तो उसे कान पकड़कर बिठाना कोई कठिन नहीं है, अगर वोह बैठ गया तो समझ लेना चाहिए कि किला फतह हो गया। जिस प्रकार दूध और एनर्जी का सम्बन्ध है, ठीक उसी प्रकार ध्यान और स्थिरता का सम्बन्ध है। जिस प्रकार कहा जा सकता है कि दूध से एनर्जी मिलती है यां एनर्जी के लिए दूध पीना आवश्यक है उसी प्रकार ध्यान  से स्थिरता आती है  यां स्थिरता से ध्यान में मन लगता है।

अगर आज के बाद पूजा करते समय अगर हम मन की भटकन को दूर भगा पाए,तो ही हमारा परिश्रम सार्थक होगा नहीं तो 30 लेखों की भांति यह लेख भी मात्र पढ़े ही जाएंगे, प्रभाव दिखाने में असमर्थ रहेंगें।

आज के इस Introductory लेख का समापन मन की चंचलता का समाधान कराती निम्नलिखित कहानी से करने की आज्ञा चाहते हैं :

एक बार गुरुकुल में एक नया शिष्य आया ।आश्रम के नियमानुसार उसे भी प्रतिदिन संध्या- उपासना करनी थी। ध्यान, संध्या का अभिन्न अंग है । लेकिन नये शिष्य का ध्यान बिलकुल नहीं लगता था । कुछ दिन तो वह ज़बरदस्ती  आंखे बंद करके बैठा रहा लेकिन अंततः एक दिन उसके सब्र का बांध टूट गया । वह तुरंत उठकर अपने गुरुदेव के पास गया और बोला – “गुरुदेव ! संध्या में ध्यान की क्या आवश्यकता है ?” 

गुरुदेव बोले – “वत्स ! मन को साधने के लिए “ध्यान” अनिवार्य है।”

शिष्य बोला – ” किन्तु गुरुदेव, क्या मन को साधना जरुरी है ? मेरा मन तो ध्यान में बिलकुल नहीं लगता।”

गुरुदेव बोले – ” मन को साधना इसलिए जरुरी है क्योंकि मन चंचल है। चंचल मन से किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसलिए मन की चंचलता पर काबू पाना जरुरी है।”

शिष्य बोला – “मन चंचल क्यों है,गुरुदेव  ?” 

शिष्य का प्रश्न सहज था किन्तु उसका उत्तर उतना सरल नहीं था। वास्तव में इस एक ही प्रश्न में सम्पूर्ण योग का सार छुपा हुआ है ।

गुरुदेव बोले – ” एक बात बताओ ! जिस मनुष्य के पास रहने का कोई ठिकाना न हो, वह क्या करेंगा ?”

शिष्य बोला – ” गुरुदेव ! तब तक दर-दर भटकता फिरेगा, जब तक उसे रहने के लिए कोई स्थाई  ठिकाना नहीं मिल जाता।”

गुरुदेव बोले -“मन के चंचल होने का यही कारण है। उसके पास ठहरने का  कोई स्थाई ठिकाना नहीं, कोई ऐसी जगह नहीं, जहाँ उसे असीम और अनंत आनंद की अनुभूति हो सके, जहाँ पहुँचकर उसे कहीं और जाने  की आवश्यकता न हो । ऐसा स्थान केवल एक ही है और वह है “परमात्मा की गोद”

आने वाले लेखों में इसी अनुभव की तलाश रहेगी। 

कल तक प्रतीक्षा कीजिये। 

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19  साधकों द्वारा 703 आहुतियां प्रदान होना एक कीर्तिमान है जिसके लिए सभी को बधाई एवं सामूहिक सहकारिता/सहयोग  के लिए धन्यवाद्     

जय गुरुदेव


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