वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

तन, मन धन सब कुछ है तेरा, तेरा तुझको अर्पण 

2 जनवरी 2024 का ज्ञानप्रसाद

आज मंगलवार की ब्रह्मवेला में गुरुकुल की गुरुकक्षा में उन तीन विभूतिओं की चर्चा की जाएगी जो हम सबके जीवन को प्रभावित करती हैं। तन, मन और धन, यह तीन विभूतियाँ मनुष्य के लौकिक जीवन में इस तरह गुंथी हुई हैं कि अगर कोई कहे कि एक के बिना भी जीवनयापन किया जा सकता है तो शायद अविश्वसनीय हो। हर किसी को अच्छा, शक्तिशाली,सुडौल तन तो चाहिए ही, साथ में सुन्दर मन भी मिल जाए तो बात बन जाए और दोनों के साथ अगर धन  प्राप्ति भी हो जाए तो फिर जीवन स्वर्ग से कम नहीं है, कोई दुःख रहे ही न, लेकिन ऐसा होता नहीं है। अभी कुछ दिन पूर्व ही शेयर किया गया रफ़्तार मूवी का गीत, “संसार है इक नदिया, सुख दुःख दो किनारे हैं” आज फिर बिल्कुल फिट बैठ रहा है। संसार में कहीं भी दृष्टि घुमाकर देख लें किसी को भी मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता।   निदा फ़ाज़ली जी की सुप्रसिद्ध ग़ज़ल  “कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता” किसे भूली हुई है। 

अगर कहीं ऐसा हो जाए तो ईश्वर के अस्तित्व को कौन पहचानेगा, हर कोई स्वयं ही ईश्वर बन बैठेगा और ईश्वर बेचारे को चने के रेहड़ी लगानी पड़ेगी। 

तो आइए इन्हीं  रोचक ओपनिंग पंक्तियों से यह जानने का प्रयास करें कि तन, मन और धन की समस्याएं एक दूसरे के साथ कैसे बंधी हैं, क्या अध्यात्मवाद से यह अलग हो सकती हैं। 

ॐ असतो मा सद्गमय ।तमसो मा ज्योतिर्गमय ।मृत्योर्मा अमृतं गमय ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 

अर्थात 

हे प्रभु, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो ।मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।

मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥ 

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तन, मन और धन लौकिक जीवन की तीन विभूतियां मानी गई हैं। संसार के सुखों का आधार भी इन्हीं को कहा है। तन  स्वस्थ, रहे मन प्रसन्न रहे और आर्थिक अभाव का आक्रमण न हो तो साधारण  मनुष्य स्वयं को  सुखी ही मानता है। इन तीनों सम्पदाओं में से भी सबसे महत्वपूर्ण सम्पदा “स्वास्थ्य” को ही कहा गया है और स्वास्थ्य तन के साथ ही  जुड़ा हुआ है। अक्सर कहा जाता है, “Health is Wealth”, स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। स्वास्थ्य ठीक है तो  आर्थिक स्थिति तो स्वयं ही ठीक हो जाएगी, इसीलिए कहा गया है, “धन तो आता जाता  है।”      

हालाँकि जीवनयापन के लिए धन ही सब कुछ नहीं है लेकिन जीवन में उसका अपना ही  एक महत्व है,स्थान है। धन को नगण्य नहीं कहा जा सकता है। हमारी माता जी बाल्यकाल से ही यही शिक्षा देती रही थीं, “धन बहुत कुछ है लेकिन धन ही सब कुछ नहीं है” माता पिता के युग से एक और शिक्षा अक्सर हमारे परिवार में वर्षों से चलती आ रही है, “जिन संतोष कियो तिन  संतोषी पायो” और अब तो ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार से एक और सूत्र ने जन्म ले लिया है, “जो प्राप्त है वही पर्याप्त है।” नमन करते हैं इस परिवार को एवं इसके संचालक परम पूज्य गुरुदेव को जिनके माध्यम से हमें न जाने क्या कुछ सीखने को मिल रहा है।     

जब धन को ही “सब कुछ” मान लिया जाता है, रात दिन उसके पीछे ही भागदौड़ होती रहती है तो मनुष्य के “आत्मिक सुख” में बाधा पड़ती है। सुखपूर्वक जीवनयापन करना किसे  बुरा लगता है। मनुष्य तो इस  संसार में आया ही “सुख की खोज करने” के लिए है लेकिन एक बहुत ही सरल एवं तर्कसम्मत प्रश्न उठता है कि क्या मनुष्य  सांसारिक सुखों से संतुष्ट हो जायेगा ? उसको अथाह धन, ऐश्वर्य से शांति मिल जाएगी ?  

हमारा व्यक्तिगत उत्तर है, “नहीं, कदापि नहीं।” हो सकता है बहुत से लोग हमारे साथ सहमत नहीं होंगें लेकिन धीरज रखिये और आगे पढ़िए। 

मनुष्य का जन्म “सुख की खोज” के लिए तो हुआ है लेकिन उस सुख के लिए जो “शाश्वत है, सदैव है, Permanent है” ऐसा शाश्वत सुख केवल आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार द्वारा ही  प्राप्त होता है। मनुष्य को लौकिक सुखों (गाड़ी, बंगला आदि)  तक ही सीमित न रह  जाना चाहिये। उसे चाहिये कि वह उनसे ऊपर उठ कर अलौकिक (Divine) और आत्मिक सुख पाने का प्रयत्न करे। हां लौकिक सुख सुविधाओं को वह अलौकिक सुख के लिये सीढ़ी  बना सकता है। 

इसमें कोई संशय नहीं कि जो मनुष्य लौकिक सुखों  से सर्वथा वंचित है, हर समय दुःखों, क्लेशों और शोक सन्तापों से घिरे रहते हैं  उनके साथ आत्मिक प्रगति की बात करना ही अनुचित है। जो मनुष्य परिस्थितिवश  साधारण सांसारिक प्रगति तक नहीं कर पाता तो उसे  आत्मिक उन्नति का पाठ  पढ़ाना उचित नहीं है। आत्मिक प्रगति के लिए जिस अखण्ड साधना की आवश्यकता है वह दुःखी अवस्था में की ही नहीं जा सकती। जब तक पेट की आग सुलगती रहेगी मंदिर की घंटी भी अप्रिय ही लगेगी। मृत्यु शैया पर पड़े रोगी तो कहा जाए कि महामृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान करे तो नहीं करेगा।  भीषण गर्मी की ऋतु में सड़क पर रोड़ी कूटने वाले मज़दूर के लिए ज्ञानप्रसाद का अध्ययन करने और कमेंट करने की तुलना में पेट पालना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। स्वामी विवेकानंद ने विदेश जाने से पहले, पूर्व से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण, सम्पूर्ण भारत की यात्रा की और देखा कि ब्रिटिश दासता से ग्रस्त औसत भारतीय किस दशा में जीवनयापन कर रहे हैं, इस दशा में रह रहे मनुष्यों के साथ अध्यात्म की क्या बात की जाए? इतनी भीषण समस्याओं के रहते और उनकी हठपूर्वक उपेक्षा करने से जो परिस्थितियां उत्पन्न होंगी, वे आत्मिक साधना में अवश्य अवरोध बनकर खड़ी होगी।

सांसारिक समस्याओं की भी अपनी एक सत्ता (Power) होती है, इस पावरफुल triplet की  अवज्ञा कर सकना अगर असम्भव नहीं तो सरल भी नहीं है। हाँ इन्हें सरल करने के लिए निम्नलिखित जैसे मार्गदर्शन सहायता कर सकते हैं। 

एक प्रोफेसर कक्षा में दाखिल हुए । उनके हाथ में पानी से भरा एक गिलास था। उन्होंने उसे बच्चों को दिखाते हुए पूछा, यह क्या है ? छात्रों ने उत्तर दिया, गिलास। प्रोफेसर ने दोबारा पूछा, इसका वजन कितना होगा ? उत्तर मिला, लगभग 100-150 ग्राम। उन्होंने फिर पूछा, अगर मैं इसे थोड़ी देर ऐसे ही पकड़े रहूं तो क्या होगा ? छात्रों ने जवाब दिया, कुछ नहीं। अगर मैं इसे एक घण्टे पकड़े रहूं तो ? प्रोफेसर ने दोबारा प्रश्न किया। छात्रों ने उत्तर दिया, आपके हाथ में दर्द होने लगेगा। उन्होंने फिर प्रश्न किया, अगर मैं इसे सारा दिन पकड़े रहूं तो क्या होगा ? तब छात्रों ने कहा, आपकी नसों में तनाव हो जाएगा। नसें संवेदनशून्य हो सकती हैं। जिससे आपको लकवा हो सकता है। प्रोफेसर ने कहा  “बिल्कुल  ठीक ।” अब यह बताओ क्या इस दौरान इस गिलास में कोई फर्क आएगा ? जवाब था कि नहीं। तब प्रोफेसर बोले, यही नियम हमारे जीवन पर भी लागू होता है। यदि हम किसी समस्या को थोड़े समय के लिए अपने दिमाग में रखते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर हम देर तक उसके बारे में सोचेंगे तो वह हमारे दैनिक जीवन पर असर डालने लगेगी। हमारा काम और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होने लगेगा । इसलिए सुखी जीवन के लिए आवश्यक है कि समस्याओं का बोझ अपने सिर पर हमेशा नहीं लादे रखना चाहिए। समस्याएं सोचने से नहीं हल होतीं, उसके लिए आवश्यकता है विवेक की, ज्ञान की, परिश्रम की और सबसे बड़ी बात बुद्धि की। यही कारण है कि गायत्री उपासना को इतना महत्व दिया गया है। गायत्री मंत्र में यही तो याचना की जा रही है कि मेरी बुद्धि को हंसवृत्ति से  सन्मार्ग की ओर जाने के  लिए  प्रेरित करें। 

सांसारिक समस्याओं का तो कोई अंत ही नहीं है । किसी के सम्मुख शारीरिक समस्या होती है, तो किसी के सम्मुख मानसिक और किसी को आर्थिक समस्या घेरे रहती है।  किसी न किसी प्रकार की समस्या प्रायः सबके पीछे लगी रहती है। समस्याओं से सर्वथा रहित शायद ही कोई व्यक्ति होगा। कोई शरीर से दुःखी है, किसी को निर्बलता/ बुढ़ापा घेरे है तो कोई धन से upset  है, कहीं सम्मान में धक्का लग गया है, सन्तान नालायक निकल गई है और कोई विरोध उत्पन्न हो गया है। अनेकों मनुष्य तो ऐसे हैं जो  जीविका, व्यय और व्यापार/ व्यवसाय में उतार-चढ़ाव  के कारण आर्थिक संकट में फंसे हैं। इस प्रकार शारीरिक (तन), मानसिक (मन) और आर्थिक (धन) समस्याओं में से कोई न कोई समस्या सबके सामने खड़ी ही रहती है।

तो फिर मंदिर में जाकर भगवान् के समक्ष सच्चे मन से एक अबोध बालक की भांति अपने पिता से, परमपिता से फरयाद क्यों नहीं की जाती “तन, मन,धन, सब कुछ है तेरा,स्वामी सब कुछ है तेरा” एक बार सच्चे मन से बोल कर तो देख अरे मानव, भगवान् तो भागते आएंगें, भगवान अपने भक्त को दुःखी कैसे देख सकते हैं। महत्वपूर्ण बिंदु तो यह है कि हमारी जीभ तो बोल रही है तन, मन, धन सब कुछ है तेरा लेकिन दृष्टि तो हमारी किसी और के धन पर है, मन कहीं और भटक रहा है और तन घडी को देख रहा है, अस्थिर है।     

मनुष्य अपनी समस्याओं को यथासाध्य सुलझाने का यत्न करते भी हैं लेकिन यह तीनो संकट  एक दुसरे के साथ इतने गुंथे हुए हैं कि एक का समाधान करते समय दूसरा अवश्य ही घेरता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है : 

जब अर्थ संकट आता है तो मनुष्य सब कुछ भूलकर, शरीर की चिंता किए बिना, उसे  सुलझाने में लग जाते हैं, इस भागदौड़ में “शारीरिक समस्या” खड़ी हो जाती है। आर्थिक और शारीरिक समस्या दोनों इक्क्ठी होकर मानसिक समस्या को जन्म देते हैं  

उस प्रकार एक के बाद एक, कोई न कोई समस्या सामने आती रहती है और मनुष्य का सारा जीवन उनको सुलझाने में ही तबाह हो जाता है। जिस लक्ष्य के  लिए मनुष्य जन्म मिला था उसके लिए कुछ नहीं कर पाता। यदि कोई ऐसा उपाय निकल आए  जिसको प्रयोग में लाने पर सारी समस्याएं एक साथ शमन होती रहें तभी कुछ काम बन सकता है।

ऐसी सारी समस्याओं का एक ही सामान्य हल है  और वोह है अध्यात्मवाद । यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ हो सकता है। मनुष्य को अपने दृष्टिकोण में छोटे छोटे  परिवर्तन लाते ही सब कुछ ठीक हो सकता है।

यह सब कैसे हो सकता है, कृपया कल तक के लिए प्रतीक्षा कीजिये। 

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आज 6 युगसैनिकों ने 24 आहुति  संकल्प पूर्ण किया है।सुमनलता जी ,चंद्रेश जी और सुजाता जी  गोल्ड मैडल विजेता है । तीनों  को  हमारी हार्दिक बधाई एवं संकल्प सूची में योगदान के लिए धन्यवाद्।   

(1)निशा भारद्वाज-27,(2) सुमनलता-33 ,(3)अरुण वर्मा-24 ,(4)संध्या कुमार-24 ,(5) सुजाता उपाध्याय-30 ,(6)चंद्रेश बहादुर-34    

सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।


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