आज का प्रज्ञागीत संध्या जी के सहयोग से प्रस्तुत किया गया है
13 दिसंबर 2023 का ज्ञानप्रसाद
आज का ज्ञानप्रसाद लेख दो भागों में प्रस्तुत किया गया है। पहले भाग में हमारे समर्पित साथी आदरणीय चंद्रेश बहादुर जी द्वारा शेयर की गयी न्यूज़ आइटम है जिसमें कई वषों से अलग हुए पति पत्नी का मिलन वर्णित है। हमारे आदरणीय साथी हमें प्रश्न कर सकते हैं कि ऐसे अनेकों केस प्रकाशित होते रहते हैं तो इस केस में ऐसा क्या है जो इसे इस मंच पर प्रकाशित किया जा रहा है। इसके प्रकाशन के पीछे उद्देश्य है कि जिन मानवी मूल्यों की, संस्कारों की, अध्यात्म की रट हम दिन रात लगाए हुए हैं, अगर इनका पालन इस परिवार ने किया होता तो शायद यह दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति का जन्म ही न होता। हमारी गूगल रिसर्च के वशीभूत हम चंद्रेश जी द्वारा भेजे गए स्क्रीनशॉट प्रकाशित करने में असमर्थ हैं जिसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।
दूसरा भाग जन स्वास्थ्य का है। इस भाग में परम पूज्य गुरुदेव बता रहे हैं कि अध्यात्म द्वारा स्वास्थ्य की समस्या का समाधान कैसे हो सकता है। समाजपरक पांच समस्याओं में से जन स्वास्थ्य की समस्या पहली समस्या है।
आज शब्द सीमा सीधा गुरुकक्षा में जाने को कह रही है।
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आदरणीय चंद्रेश बहादुर जी ने सुप्रसिद्ध समाचार पत्र हिंदुस्तान में प्रकाशित जिस न्यूज़ आइटम को हमारे साथ शेयर किया है,उसको जब हमने सरसरे तौर पर पढ़ा तो हमें 2003 की बहुचर्चित बॉलीवुड मूवी “बागबान” का स्मरण हो आया। इस मूवी को 7 अवार्ड मिले थे। बाद में जब हमने ध्यान से दो तीन बार पढ़ा तो देखा कि समाचार पत्र ने भी “बागबान” का रेफरन्स दिया था, हमारा अंतःकरण समाचार पत्र से सूक्ष्म रूप से जुड़ गया दिखता है
हमारी इच्छा थी कि चंद्रेश जी द्वारा भेजी गयी समाचार पत्र का स्क्रीनशॉट ही अपने साथिओं के समक्ष प्रस्तुत कर देते और साथी स्वयं ही जान जाते कि हम क्या बात कर रहे हैं लेकिन जब हमने इस आइटम की गूगल सर्च की तो अनेकों और entries भी pop-up हुईं जिनमें अलग-अलग तथ्य वर्णित किये गए थे।
संक्षेप में बताएं तो यह दुःखभरी दास्तान 80 वर्षीय Married couple की है जिन्हें उनके बच्चों ने पहले एक दुसरे से अलग रहने पर विवश किया, फिर पत्नी को पति के ऊपर गुज़ारा भत्ता हासिल करने के लिए कोर्ट केस करने के लिए विवश किया। कई वर्ष ( शायद 15 वर्ष , अलग अलग समाचार पत्रों में अलग है ) तक यह स्थिति चलती रही और अंत में अदालत ने दोनों का मिलन करवा दिया। एक समाचार पत्र ने इस समाचार को TRP की दृष्टि से “90 बरस का दूल्हा, 86 की दुल्हन, अदालत में फिर मिले मन, बेटों ने सम्पत्ति की वजह से कर रखा था अलग” शीर्षक से प्रकाशित किया है।
जहाँ हम आदरणीय चंद्रेश जी का धन्यवाद् करते हैं अपने संवेदनशील विचार भी रखना चाहेंगें। हम बार-बार कहते रहते हैं कि परम पूज्य गुरुदेव के विचार केवल पढ़ने की बात नहीं है इन्हें जीने की आवश्यकता है। जिस आध्यात्मिकता को हम तोते की तरह बार-बार रट रहे हैं, इसी में संस्कारों का समन्वय है। हमने इस न्यूज़ आइटम को दुःखभरी दास्तान कहा है क्योंकि अगर बच्चों में संस्कार और मानवी मूल्यों का संचार किया होता तो ऐसी स्थिति न उठती। संस्कार देना माता पिता का कार्य है, बेटी काव्या, बेटी काशवी, हमारी पोती आर्या, रेणु जी की नातिन आदि के age group से ही संस्कार देने की कठिन ट्रेनिंग आरम्भ होनी चाहिए क्योंकि ज्यों ज्यों बच्चा बड़ा होता जाता है, यह ट्रेनिंग कठिन से कठिनतर होती जाती है। ऐसी स्थिति में हमारे पास एक ही वाक्य होता है “बच्चे तो सुनते ही नहीं हैं” ऐसी बात नहीं है, हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में ही कितने संस्कारवान बच्चे हैं। आदरणीय चिन्मय जी बार-बार कहते आये हैं “हमारा कर्म हमारे पीछे पीछे आता है”, इस दृष्टान्त में भी कर्मफल ही Self-explanatory है।
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हमारा राष्ट्र :
व्यक्तिवाद के आधार पर पनपने वाली स्वार्थपरता समूह रूप से असंगठित और सहकारिता की निंदा करने वाले प्रयोजनों की समस्या बनती है। मुनाफाखोरी, कामचोरी, आपाधापी, सार्वजनिक प्रयोजनों की निंदा करना , सहकारिता में अनुत्साह दिखाना , वर्ग-स्वार्थ और संघर्ष जैसे आचरणों से ही कोई देश दुर्बल बनता है। इन्हीं को किसी राष्ट्र का आंतरिक खोखलापन कहा जा सकता है।
व्यक्तिगत जीवन में आत्मिक दुर्बलता और सामूहिक जीवन में प्रयोजनों को नकारना ही चरित्र की कमजोरी है। मनुष्य की छोटी दिखने वाली समस्याएँ ही सामूहिक रूप से विशालकाय राष्ट्रीय अथवा सामाजिक समस्याएँ बन जाती हैं। इन्हीं दुर्बलताओं से शिक्षा, संपत्ति आदि साधनों से संपन्न देश आंतरिक दृष्टि से दुर्बल बने रहते हैं। इसके विपरीत जिन देशों में आंतरिक दृढ़ता, भावनात्मक एकता, साहसिक प्रखरता तथा एक चरित्रनिष्ठा होती है, वे स्वल्प साधनों के सहारे ही अपना वर्चस्व सिद्ध करते हैं और न अंतर्द्वद्वों में टूटते हैं और न बाहरी आक्रमणों से हारते हैं।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के जिन मानवी मूल्यों एवं सत्प्रवृत्तियों की हम बार-बार चर्चा करते रहते हैं, उनके समन्वय को ही सामाजिक प्रखरता अथवा “सामूहिक आध्यात्मिकता” कह सकते हैं। कर्त्तव्य पालन के लिए जागरूक, आदर्शों के प्रति निष्ठावान एवं उदार आत्मीयता से प्रेरित होकर सेवा सहायता के लिए आतुर उत्साह को आध्यात्मिकता माना गया है। यही है वह दिव्य क्षमता जिसे आत्मशक्ति कहते हैं। यही व्यक्ति को लौहपुरुष बनाती है और उसी के सहारे राष्ट्रों की सुरक्षा लौह प्राचीरों से अधिक सुनिश्चित बनी रहती है।
कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में हमने लिखा था कि समाज की प्रत्येक समस्या का समाधान अध्यात्म कैसे निकाल सकता है। जिन पाँच सामाजिक समस्याओं को कल वाले लेख में अंकित किया गया था, अब समझने का समय आ गया है कि इन समस्याओं का क्या समाधान है।
सबसे पहली समस्या जन स्वास्थ्य की है।
जन स्वास्थ्य की समस्या:
Cleanliness is next to Godliness, ईसाई समुदाय द्वारा प्रयोग किये जाने वाला बहुचर्चित स्लोगन है। इस स्लोगन का अर्थ है कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए स्वच्छता बहुत ही आवश्यक है यानि स्वच्छ मन ही ईश्वर की उपासना है। हमारे समाज में भी स्वच्छता को बहुत बड़ा स्थान दिया गया है। हम तो स्नान, पूजास्थली की स्वच्छता के साथ-साथ अंतःकरण की निर्मलता पर भी बल देते हैं।
अनेकों बीमारियां ऐसी हैं जो स्वच्छता का पालन करते ही अपनेआप भाग जाती हैं।
राष्ट्रीय अस्वस्थता की समस्या का समाधान करने के लिए अस्पतालों में सफाई, स्प्रे आदि का प्रबंध किया जाता है। सरकार आर्थिक स्थिति के अनुरूप कर्मचारियों की संख्या नियत करती है और सुविधा साधन जुटाती है लेकिन अस्पतालों की भी अपनी लिमिट है। अस्पताल कम हैं और बीमारियां अधिक। लाभ उठाने वालों की तुलना में बीमारों की संख्या कहीं अधिक है। जो इन अस्पतालों में चिकित्सा कराते हैं, वे सभी भी कहाँ अच्छे हो पाते हैं। अगर अच्छे हो भी जाएँ तो यह भी कहा नहीं जा सकता कि उन्हें वही बीमारी फिर नहीं आ घेरेगी। ऐसा भी हो सकता है कि वही बीमारी किसी दूसरे नये रंग-रूप में प्रकट हो उठे।
यह चर्चा इस बात को बिल्कुल सपोर्ट नहीं कर रही कि की अस्पतालों की कोई आवश्यकता नहीं है, अस्पताल निरर्थक हैं और न ही यह कहा जा रहा कि उन्हें न खोला जाय और उनसे लाभ न उठाया जाय।
प्रतिपादन केवल इतना है कि यदि जनसाधारण ने अप्राकृतिक जीवन न छोड़ा, आहार- विहार का असंयम न सुधारा, तो अस्पताल में दिया गया उपचार भले ही Short-term चमत्कार दिखा दें, स्वास्थ्य समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। असंयमी लोगों को प्रकृति की अवज्ञा का दंड भुगतना ही पड़ेगा और आए दिन नित नई बीमारियां उन्हें घेरते ही रहेंगीं, नई बीमारी और नई दवा का कुचक्र अपनी धुरी पर यथावत् घूमता रहेगा। संकट टलेगा नहीं।
स्वच्छता के महत्व से हर कोई भलीभांति परिचित है लेकिन कितने इस आदत का पालन करते हैं, यह देखने वाली बात है। सफाई कर्मचारी एक ओर कचरा साफ करेंगे, दूसरी ओर वहाँ रहने वाले अथवा उधर से निकलने वाले फिर गंदगी बरसाने लगेंगे। हर मनुष्य के साथ एक मेहतर घूमे तो बात दूसरी है अन्यथा गंदगी फैलाने की आदत सरकार की सफाई योजना को सफल न होने देगी। मक्खी मच्छर आदि हानिकारक कीड़े गंदगी की उपज हैं। DDT से एक दिन जितने मच्छर मारे जायेंगे, दूसरे दिन सड़ी गंदगी उतने ही नये पैदा कर देगी।
स्वास्थ्य-रक्षा के लिए जो उपाय किये जाते हैं, वे आवश्यक तो हैं लेकिन पर्याप्त नहीं। होना यह चाहिए कि शिक्षा संस्थाओं से लेकर धर्मतंत्र सहित प्रचार के प्रत्येक साधन से लोकमानस को स्वच्छता, संयम, श्रम, निष्ठा जैसी आरोग्यरक्षक आदतें सीखने के लिए प्रशिक्षित किया जाय। सामाजिक संगठन वैसा वातावरण बनाएँ और बीमार पड़ने को भी एक अपराध घोषित किया जाए । बार-बार बीमार पड़ने वालों को दया का पात्र और सहायता का अधिकारी तो माना जाय लेकिन साथ ही उनकी असावधानी और अव्यवस्थितता को कड़ाई से कसा भी जाए। जितने प्रयत्न गंदगी साफ करने के लिए किए जाते हैं, जितने प्रबंध चिकित्सा उपचार के होते हैं, उससे भी अधिक प्रयत्न इस स्तर के होने चाहिए कि हर मनुष्य स्वच्छता, संयम, श्रम, निष्ठा जैसे आधारों का सिर्फ महत्त्व ही न समझे बल्कि उन्हें जीवन नीति का अंग (Part of Life Policy) मानकर चले। यह कार्य कठिन कहा जा सकता है लेकिन उतना कठिन नहीं है, जितनी अस्वस्थता के कारण उत्पन्न होने वाली रुग्णताजन्य पीड़ा और आर्थिक हानि ।
समस्या के कारण को समझा जाय और उसका स्थिर समाधान ढूँढ़ा जाय, तो एकमात्र यही निष्कर्ष निकलेगा कि जीवनयापन की उस पद्धति को अपनाया जाय, जिसे “शरीर क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली आध्यात्मिकता” कहा जा सकता है। अध्यात्म एक मान्यता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में परिलक्षित होती है। शरीर क्षेत्र में बरती जाने वाली सतर्कता और संयमशीलता अध्यात्म की प्रेरणा कही जायेगी। यही है वह आधार जिसे अपनाकर स्वास्थ्य संकट से सदा सदा के लिए छुटकारा मिल सकता है। हमारे साथिओं को Nip the evil in the bud वाला मुहावरा भलीभांति स्मरण होगा जिसके अनुसार समस्या का सिर उठने से पहले ही कुचलना उचित होता है।
अक्सर देखा जाता है कि कई लोगों को बीमारियां बार-बार आ घेरती हैं। आधुनिक परिपेक्ष्य में कहा जा सकता है कि ऐसे मनुष्यों का Resistance बहुत ही कमज़ोर होता है और डॉक्टर लोग उन्हें Strong antibiotics देकर बीमारी को जड़ से खत्म करने के बजाए दबाने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। इस स्थिति के लिए डॉक्टर और मरीज़ दोनों ही ज़िम्मेदार हैं। मरीज़ छोटी से बीमारी से ही इतना घबरा जाता है कि सहनशीलता के आभाव में डॉक्टर को antibiotics देने के लिए विवश करता है और डॉक्टर, सही मार्गदर्शन न देकर अपने फ़र्ज़ के साथ विश्वासघात करता है। यही है अध्यात्मवाद, यही हैं मानवी मूल्यों का पालन करने के परिणाम।
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संकल्प सूची को गतिशील बनाए रखने के लिए सभी साथिओं का धन्यवाद् एवं जारी रखने का निवेदन। आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 15 युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज गोल्ड मैडल सूची में अद्भुत समन्वय है : माँ रेणु जी, बेटी अनुराधा और भाई सार्विन्द जी सभी को हमारी बधाई।
(1)वंदना कुमार -27 ,(2) सुमनलता-34 ,(3 ) संजना कुमारी-27,(4) संध्या कुमार-46 ,(5) सुजाता उपाध्याय-38 ,(6)चंद्रेश बहादुर-39,(7)रेणु श्रीवास्तव-69 ,(8 ) मंजू मिश्रा-33,(9) सरविन्द पाल-70 (10 )अरुण वर्मा-34 ,(11)अनुराधा पाल-70, (12)प्रेरणा कुमारी-24, (13 ) निशा भारद्वाज-24,(14)नीरा त्रिखा-26,(15) साधना सिंह-33
सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।