वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

हमारे गुरुदेव: स्कूली विद्यार्थिओं के लिए एक निबंध भाग 2

7  जून 2023 का ज्ञानप्रसाद

 कुछ दिन पूर्व जब हमारे हाथ में 474 पन्नों का महान ग्रन्थ “पंडित श्रीराम शर्मा, दर्शन एवं दृष्टि” लगा तो अंतरात्मा ने यही कहा कि इसका एक एक पन्ना, एक एक पंक्ति पढ़ने योग्य है, समझने योग्य है और ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के माध्यम से अधिक से अधिक शेयर करने योग्य है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठा कि अगर हम इस ज्ञानकोष पर आधारित ज्ञानप्रसाद वितरित करते हैं तो पाठक कहीं यह न समझ लें कि यह तो हमें सब कुछ भलीभांति मालूम है, इसमें “नया क्या है” लेकिन ज्यों ज्यों लेख प्रकाशित होते गए लोकप्रियता और रोचकता का अनुमान लगता गया, परम पूज्य गुरुदेव से निर्देश मिलता गया और हमने यही अनुभव किया कि इस विशाल, विराट व्यक्तित्व एवं उनके क्रियाकलापों के बारे में जानने के लिए अभी बहुत कुछ बाकि है, अभी हमने जाना ही क्या है,हमें केवल superficial सा ज्ञान है। अधिकतर कमेंट इस बात को बता रहे हैं कि परम पूज्य गुरुदेव के बारे में जितना अधिक जानेगें उतने ही अच्छे से concepts क्लियर होंगें। ज्यों ज्यों इस ज्ञान को और परिष्कृत करके प्रस्तुत करेंगें, श्रद्धा और समर्पण और परिपक्व होंगें। आज का ज्ञानप्रसाद इस उद्देश्य से लिखा गया है कि अगर स्कूल लेवल के विद्यार्थी को गुरुदेव के बारे में संक्षिप्त सा निबंध लिखने को कहा जाए तो वोह क्या करेगा। जो बात हम अनेकों बार अपने सहपाठियों के साथ शेयर कर चुके हैं आज फिर कह रहे हैं कि किसी बात को कम से कम शब्दों में वर्णन करना बहुत कठिन होता है, लम्बा जितना भी कर लें। हमारा अनुमान है कि गुरुदेव के बारे में निबंध लगभग तीन भागों में लिखा जायेगा, आज दूसरा  भाग प्रस्तुत है। तीनों भाग पूर्ण होने के बाद pdf में इक्क्ठे कर दिए जायेंगें। शिक्षा और विद्या का सम्पूर्ण pdf अब इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है। वर्तमान निबंध से सम्बंधित कितने ही विस्तृत लेख हम लिख चुके हैं, जो कोई भी अधिक जानकारी जानने के इच्छुक हों, हमारी वेबसाइट/यूट्यूब चैनल की सहायता ले सकते हैं। इन्ही शब्दों के साथ आइए सभी गुरुकुल पाठशाला में आज का lesson आरम्भ करें लेकिन विश्वशांति की कामना के बाद। ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः ।सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ।मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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दादा गुरु द्वारा गुरुदेव को दिए गए आदेश : 

पहला आदेश था अगले दिनों में चौबीस  लाख के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करना। उन्होंने कहा “चाहे कितनी भी प्रतिकूलताएँ आएं, तुम्हें लक्ष्य अवश्य पूरा करना है, इस बीच कुछ समय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभानी पड़ सकती है,लेकिन  नियम-भंग मत होने देना। चाहे जिस तरह का भी समय हो तुम्हें  यह महापुरश्चरण पूरे करने ही हैं क्योंकि उनकी पूर्ति होने  पर तुमसे अनेकों महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करवाने हैं।” 

दादा गुरु ने इसी  बीच चार बार हिमालय बुलाने की बात भी कही, कभी एक वर्ष के लिए तो  कभी कम अवधि के लिए। हिमालय बुलाया जाना इसलिए जरूरी था कि हिमालय सिद्ध आत्माओं की साधना स्थली है, एक ऐसा पारस है जिसके स्पर्श मात्र से  व्यक्ति तपे कुन्दन की तरह निखर जाता है। हिमालय यात्रा कब करनी है, इसका निर्देश समय-समय पर सूक्ष्मप्रेरणा के रूप में दिए जाने की भी बात की। यह दूसरा निर्देश था। 

परोक्षसत्ता ने तीसरा निर्देश दिया कि जन्म जन्मांतरों से पुण्य संग्रह करती आ रही देवसत्ताओं की पक्षधर जाग्रतात्माओं को संगठित कर एक माला में पिरोया जाना है। यही वोह जागृतात्माएँ होंगीं जो नवयुग के  निर्माण में और  सतयुग की वापसी में प्रमुख भूमिका निभायेंगी। इस कार्य को सम्पन्न कराने के लिए  मार्गसत्ता ने  पूजागृह में जल रही दीपक ज्योति को ओर संकेत करते हुए कहा कि यह  ज्योति “अखण्ड दीप ” नाम से समय आने पर विचारक्रान्ति का अलख जगाने वाली पत्रिका बन कर प्रस्तुत की जाएगी। कोठरी में पड़े दीपक की ओर  संकेत करते हुए दादागुरु ने कहा कि इसे अब निरंतर जलते  रहना चाहिए। इस दीपक के  प्रकाश से तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेगी जिसके प्रवाह से वे सभी विचार प्राप्त होते रहेंगे जिनके माध्यम से अगले दिनों अध्यात्म तंत्र का परिष्कार और  नवयुग का सूत्रपात होना है। अखण्ड दीपक ही समय-समय पर परोक्ष जगत से आने वाले दैवीय मार्गदर्शन को तुम तक पहुंचाएगा, अतः जहां भी रहो, इसे अपने पास पूजागृह में रखना । अखंड दीप के मात्र दर्शन से ही  लोगों का कल्याण हो जाएगा ।’

चौथा मार्गदर्शन था चौबीस लाख  के चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति पर एक विशाल सहस्रकुण्डी महायज्ञ आयोजित करना था ताकि दैवी सत्ता की अंशधारी आत्माएं एक स्थान पर एकत्र हो सकें। दादागुरु ने इन्हीं बातों में  “गायत्री परिवार रूपी संगठन” का बीजारोपण एवं बाद  में एक विशाल  वृक्ष का रूप लेने की बात भी बता दी । यह भी कह गए कि समय-समय पर वे बताते रहेंगे कि उन्हें कौन सा कदम कब उठाना है? कब कहां स्थान परिवर्तन करना है, कौनसा  कार्यक्रम कहाँ से आरंभ करना है। दादा गुरु ने गुरुदेव को बता दिया कि तुम  केवल  एक समर्पित शिष्य की तरह अपना कर्तव्य निबाहते रहना, तुम्हें हमारी शक्ति निरंतर प्राप्त होती रहेगी।

दिव्य प्रकाशधारी सत्ता ने  निर्देश दिया कि अगले दिनों जो आत्मबल का उपार्जन  होगा, उसका नियोजन प्रतिकूलताओं से जूझने, नवसृजन का आधार खड़ा करने तथा देवताओं की, ऋषियों की, प्राणशक्ति का अंश लेकर जन्मी जाग्रतात्माओं का एक परिवार खड़ा करने के निमित्त करना है। उनका मूक निर्देश था कि “प्रस्तुत वेला परिवर्तन की वेला है”, इसमें अगणित अभावों की एक साथ पूर्ति होनी है, एक साथ अनेकों  विपत्तियों से जूझना है। इस सारे कार्य के लिए ऋषि सत्ताएं पहले  भी मोर्चेबंदी करती आयी हैं, अब भी करेंगीं, उसकी   झलक-झांकी भी तुम्हें दिखाएंगे। तुम्हें इतना विशाल कार्य कैसे  करना है, यह भी निरंतर बताते रहेंगे। दादागुरु ने आगे बताया कि “हम लोगों की तरह तुम्हें भी सूक्ष्मशरीर के माध्यम से अति महत्वपूर्ण कार्य करने होंगे, इसके लिए पूर्वाभ्यास हिमालय यात्रा द्वारा ही  सम्पन्न होगा।”

जब हम 1926 में हुई इस दिव्य भेंटवार्ता के बाद वाले  वर्षों का मूल्यांकन करते हैं तो  पाते हैं कि 1926, 27, 28 में तो उन्होंनें अनुष्ठानक्रम पूरी तरह चलाया लेकिन 1928 के उत्तरार्द्ध से 1936 के उत्तरार्द्ध तक,लगभग आठ वर्ष के लिए गुरुदेव  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में सक्रिय रहे। फिर बापू का निर्देश मिलने पर लेखन का कार्य, साधना- उपासना का नियमित क्रम 1937 से आरंभ कर 1941 तक यथावत चलाया एवं पूर्णाहुति के रूप में 1953 और 1956 में पहले दो शतकुण्डी गायत्री महायज्ञ  तथा 1958 में एक  सहस्र कुण्डी महायज्ञ सम्पन्न किए। पूर्णाहुति तक उन्होंने सारे व्रत एवं अनुशासनों को ठीक उसी प्रकार निभाया जैसा दादागुरु  ने  बताया था। इस बीच 1951 में  गुरुदेव  एक बार फिर  हिमालय यात्रा पर गए, जो कुछ माह की थी और  1961 में एक वर्ष के लिए दुर्गम हिमालय में  प्रवास किया। 

परम पूज्य गुरुदेव ने यह सब कार्य  एक निष्ठावान, आज्ञाकारी और समर्पित शिष्य की भांति   अपने मार्गदर्शक के बताए  निर्देशों के अनुरूप संपन्न किए।  

परम पूज्य गुरुदेव गायत्री महामंत्र के माध्यम से ऋतम्भरा, प्रज्ञा और ब्रह्मवर्चस की साधना करते थे। इन्हीं  तत्वों को वे अपने “आत्म-देवता” में समाविष्ट मानते थे। उनका मत था कि जिसने अन्तःकरण को “तपोवन” बना लिया व वहां एकनिष्ठ होकर ब्रह्मचेतना से कनेक्शन  स्थापित करने का प्रयास किया, वही सच्चा साधक है।

पूज्य गुरुदेव की साधना-पद्धति को जानने का सौभाग्य,जितना समीप से और गहराई से वंदनीया माता जी को मिला था उतना  शायद ही किसी और  को मिला हो । परम वंदनीय माता जी कहा करती थीं  कि गुरुदेव ने जितना कड़ा तप किया है, उतने ही दिव्य अनुदान भी  मिले हैं, उनका सारा जीवन ही  तपोमय रहा है। अनेक  साधन  उपलब्ध होने के बावजूद, कमाने  की असीम संभावनाएं होने के बावजूद, जो अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं पर कड़ा नियंत्रण लगा ले,वही  सही अर्थों में जीवन-संग्राम में प्रतिकूलताओं से लड़ने वाला  एक जुझारू योद्धा है।

चौबीस महापुरश्चरणों के बारे में लोगों को मात्र इतनी जानकारी है कि प्रतिदिन छह से आठ घण्टा बैठकर वे 40-90 मालाएं गायत्री का जप करते रहे । परम सात्विक, जौ की रोटी तथा छाछ पर निर्वाह करते रहे एवं अनुष्ठानकाल में प्रयुक्त बंधनों, प्रतिबंधनों का कठोरता से पालन करते रहे। गौ माता के गोबर में जो तिल जौ निकलता है, उसे निथारकर स्वच्छ कर उससे जितना अन्न मिल जाता उसी से शरीर यात्रा चलाते । गुरुदेव तीन वर्ष नैमिषारण्य में रहे, वहां के व्यक्ति अभी भी बताते हैं कि श्रद्धालुओं द्वारा सरोवर में डाले गए चावलों को वे कपड़े की आड़ लगाकर एकत्र कर लेते थे व उतने को ही पकाकर, बिना किसी मिर्च-मसाले के उदरस्थ कर, नित्य 5 घण्टे जल में खड़े रहकर जप किया करते थे। यह तो वह पक्ष है जो अभी तक ज्ञात है, दृश्य है, प्रत्यक्ष है लेकिन प्रसिद्धि से दूर रहने के कारण  बहुत सारी जानकारी प्रकाशित नहीं हुई  है । 

40  वर्ष तक की आयु जो युवावस्था का चरमोत्कर्ष मानी जाती है,गुरुदेव ने  कड़ी तप साधना में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार निराहार रहना पड़ा, मात्र मट्ठे  पर ही जीकर अपनी काया का अनिवार्य, किन्तु सीमित पोषण करते रहे। वस्तुतः यह तो उनकी स्थूल व दृश्य साधना थी, जो जितनी देखी जा सकी उतनी ही समझी  जा सकी परन्तु  गुरुदेव की  साधना किसी  क्रिया-कलाप तक ही सीमित नहीं थी ।

साधारणतया साधक अपने साधना के स्वरूपों को गोपनीय ही रहने देते हैं, किन्तु गुरुदेव का जीवन तो एक खुली किताब है। उन्होंने जो भी किया उसे लेखनी के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा दिया। जिस किसी ने  वाणी से उचित समझा तो उसे  वाणी से समझाया। जिस किसी ने लेखनी से उचित समझा तो उसे लेख उपलब्ध करा दिए।  जिसे और अधिक पात्र समझा तो उसके रोम-रोम में ही वह ज्ञान समाविष्ट कर दिया। 

1950 से 1961 के बीच की 11 वर्ष की अखण्ड ज्योति पत्रिका, गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्री तंत्र एवं गायत्री योग नामक पांच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा, गायत्री महाविज्ञान इस तथ्य का  साक्षी है कि परम पूज्य गुरुदेव ने  सभी साधनाएं एक प्रयोगशाला की भांति, स्वयं के ऊपर करने के बाद ही प्रकाशन किया   । 1977 में  विज्ञान सम्मत प्रतिपादनों को  साथ जोड़कर अपनी सुबोध शैली में गुरुदेव ने अखंड ज्योति के  चार विशेषांक (मार्च से जून 1977) प्रकाशित किये  जिसमें उन्होंने साधना विधान का निचोड़ लिख कर रख दिया।

आज के लिए बस इतना ही। अभी बहुत कुछ रोचक आने वाला है, so  stay tuned.

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आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 13  युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। गोल्ड मैडल की सूची में एक नहीं ,दो नहीं बल्कि तीन विजेता हैं। संध्या जी,अरुण जी और रेणु जी तीनों को  स्वर्ण पदक प्रदान किया जाता  हैं। 

(1)सरविन्द कुमार-36,(2 ) संध्या कुमार-43 ,(3) सुजाता उपाध्याय-36  ,(4) अरुण वर्मा-43  , (5 )सुमन लता-26  ,(6 )रेणु श्रीवास्तव-43, (7 )चंद्रेश बहादुर-28 ,(8) मंजू मिश्रा-26 ,(9) वंदना कुमार-25,(10)पुष्पा सिंह-25,(11) विदुषी बंता-28,(12)प्रेरणा कुमारी-25,(13) पूनम कुमारी-26   

सभी को हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।


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