6 मई 2023 का ज्ञानप्रसाद
कुछ दिन पूर्व जब हमारे हाथ में 474 पन्नों का महान ग्रन्थ “पंडित श्रीराम शर्मा, दर्शन एवं दृष्टि” लगा तो अंतरात्मा ने यही कहा कि इसका एक एक पन्ना, एक एक पंक्ति पढ़ने योग्य है, समझने योग्य है और ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के माध्यम से अधिक से अधिक शेयर करने योग्य है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठा कि अगर हम इस ज्ञानकोष पर आधारित ज्ञानप्रसाद वितरित करते हैं तो पाठक कहीं यह न समझ लें कि यह तो हमें सब कुछ भलीभांति मालूम है, इसमें “नया क्या है” लेकिन ज्यों ज्यों लेख प्रकाशित होते गए लोकप्रियता और रोचकता का अनुमान लगता गया, परम पूज्य गुरुदेव से निर्देश मिलता गया और हमने यही अनुभव किया कि इस विशाल, विराट व्यक्तित्व एवं उनके क्रियाकलापों के बारे में जानने के लिए अभी बहुत कुछ बाकि है, अभी हमने जाना ही क्या है,हमें केवल superficial सा ज्ञान है। ज्यों ज्यों इस ज्ञान को और परिष्कृत करके प्रस्तुत करेंगें, श्रद्धा और समर्पण और परिपक्व होंगें।
आज का ज्ञानप्रसाद इस उद्देश्य से लिखा गया है कि अगर स्कूल लेवल के विद्यार्थी को गुरुदेव के बारे में संक्षिप्त सा निबंध लिखने को कहा जाए तो वोह क्या करेगा। जो बात हम अनेकों बार अपने सहपाठियों के साथ शेयर कर चुके हैं आज फिर कह रहे हैं कि किसी बात को कम से कम शब्दों में वर्णन करना बहुत कठिन होता है, लम्बा जितना भी कर लें।
हमारा अनुमान है कि गुरुदेव के बारे में निबंध लगभग तीन भागों में लिखा जायेगा, आज प्रथम भाग प्रस्तुत है। तीनों भाग पूर्ण होने के बाद pdf में इक्क्ठे कर दिए जायेंगें। शिक्षा और विद्या का सम्पूर्ण pdf अब इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है। वर्तमान निबंध से सम्बंधित कितने ही विस्तृत लेख हम लिख चुके हैं, जो कोई भी अधिक जानकारी जानने के इच्छुक हों, हमारी वेबसाइट/यूट्यूब चैनल की सहायता ले सकते हैं।
इन्ही शब्दों के साथ आइए सभी गुरुकुल पाठशाला में आज का lesson आरम्भ करें लेकिन विश्वशांति की कामना के बाद।
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः ।सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ।मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
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हमारे गुरुदेव
प्रकृति के नियम अटूट होते हैं। चक्रीय सिद्धान्त, जिसके अनुसार नियति का चक्र अनवरत चलता है ,ऋतुओं का बदलना,जीवन मरण आदि चक्रीय सिद्धांत के आधार पर चल रहे हैं। जन्म, युवा ,बुढ़ापा और मरण सब शाश्वत हैं, सनातन हैं। अनाचार, अत्याचार, अव्यवस्था के वातावरण की विभीषिकाओं को समाप्त कर सतयुग की वापसी का क्रम सदा से चलता आया है। यह सब परमसत्ता ईश्वर द्वारा निर्धारित है और समय के साथ बदलती परिस्थितियों को सुखद भविष्य की ओर ले जाने के लिए ईश्वरीय सत्ता का अवतरण होता आया है।
प्रकृति के इसी नियम को क्रियान्वित करने के लिए हमारे गुरुदेव का,परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के रूप में धरती पर अवतरण हुआ। साधना, तपस्या, त्याग और समर्पण के वरदानों को प्रतिभावनों पर लुटाकर गुरुदेव ने अल्प समय में ही युग शिल्पियों की सेना खड़ी कर दी है। अध्यात्म के पुरातन, आदिकाल से चले आ रहे मूल्यों को आधुनिक परिस्थितियों के साथ जोड़कर सदमार्ग पर चलने वालों की एक अन्तहीन कतार खड़ी करके पूज्य गुरुदेव ने विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। स्थूल शरीर के प्रयासों, प्रेरणाओं एवं मार्गदर्शन से कहीं अधिक सूक्ष्म शरीर की चेतनात्मक अनुभूति और अब कारण शरीर की रोमांचकारी संवेदनायें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रभावी हो रही है। 2 जून 1990 वाले दिन गुरुसत्ता के साथ जुड़ जाने के बाद गुरुदेव का जीवन नये युग के सोपान में पहुंचने जैसा अनुभव होता है। गुरुदेव के स्थूल शरीर की जीवन यात्रा साक्षात महाकाल की नर लीला है।
पूज्य गुरुदेव का जन्म 20 सितम्बर 1911 को आगरा जिले के एक छोटे से ग्राम आँवलखेड़ा में हुआ। यह ग्राम यमुनापार, आगरा-जलेसर मार्ग पर आगरा से 12 मील दूर स्थित है । आज तो यहाँ पूज्य गुरुदेव की माताजी की स्मृति में स्थापित माता दान कुंवरि इंटर कॉलेज (1963) , वंदनीय माता जी की स्मृति में माता भगवती देवी महिला डिग्री कॉलेज (1979 ), माता भगवती देवी शर्मा राजकीय सामुदायिक चिकित्सालय, शक्तिपीठ एवं जन्मस्थली स्मारक स्थापित हो जाने से अच्छी-खासी कस्बे स्तर की जनसंख्या है लेकिन पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि 100 वर्ष पूर्व यह गांव कैसा होगा। आंवलखेड़ा गाँव में पहुँचकर देश-विदेश के भावनाशील साधकगण उसी प्रकार भाव विभोर हो उठते हैं, जैसे चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन में पहुँचकर आनंदित हुए थे।
आंवलखेड़ा, जिसकी चर्चा हम इन पंक्तियों में कर रहे हैं, कभी यह छोटा-सा गाँव मात्र था। गुरुदेव ने जिस घर-परिवार में जन्म लिया, वह एक सम्पन्न परिवार था। 2000 बीघा जमीन थी, किसी चीज़ की कमी नहीं थी। संयोग से उनके पिता पंडित रूपकिशोर शर्मा एवं माता दानकुंवरि जी ने मनु – शतरूपा की तरह तप साधना कर साक्षात् भगवान को अपने घर जन्म लेने के लिए विवश कर दिया था। तप की अवधि में एक ही प्रार्थना रही होगी कि वे एक ऐसी सुसन्तति को जन्म दें जो अपने सत्कार्यों में विश्व-वसुधा को धन्य कर दे और हुआ भी ऐसा ही।
परम पूज्य गुरुदेव की प्राथमिक स्तर तक की तथा संस्कृत की शिक्षा घर रहकर ही एक उच्च संस्कारवान आत्मा पण्डित रूपराम जी के माध्यम से पूरी कराई गई । मास्टर जी उन्हें प्राकृतिक वातावरण में ले जाते, वहां अनौपचारिक तरीके से व्यावहारिक शिक्षा देते । गुरुदेव प्रतिभा के इतने धनी थे कि आगरा मंडल के प्राइमरी बोर्ड की परीक्षा स्कालरशिप के साथ उत्तीर्ण की लेकिन उसके बाद स्वयं ही इस “बाबू बनाने वाली शिक्षा” पर विराम लगा दिया। जब समय मिलता बालक श्रीराम अपने कुछ सखाओं को लेकर चले जाते और सघन कुंजों में बैठकर गायत्री व अध्यात्म-साधना की चर्चा करते। जो कुछ स्कूली शिक्षा से ग्रहण किया था उससे दलित,शोषित से लेकर हर उस बालक को जिसे विद्यार्जन का अवसर नहीं मिल पाया था, अक्षरज्ञान कराते ताकि इसके बाद वे व्यावहारिक जीवन की साधना सीखकर स्वयं को गढ़ सकें। विद्या विस्तार का उनका यह क्रम स्वयं के लिए और दूसरों को वितरित करने के लिये भी आजीवन चलता रहा।
पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा दिया गया गायत्री मंत्र और पिता द्वारा की गई मंत्र सारगर्भित व्याख्या उन्होंने गांठ बांध ली थी। जब भी अवसर मिलता, घर से निकल भागते व किसी वृक्ष के नीचे गायत्री जप में निरत तब तक बैठे रहते जब तक कि घर वाले ढूढ़ न लें। क्रमबद्ध अनुष्ठान भले ही पन्द्रह वर्ष की आयु में अपने हिमालयवासी गुरुरूपी परोक्ष सत्ता से मार्गदर्शन के बाद आरम्भ हुए हों, परन्तु उन्होंने अपने ब्राह्मणत्व को वेदमाता गायत्री की नियमित उपासना के माध्यम से उपनयन संस्कार के बाद ही जगाना आरम्भ कर दिया था । दैवी सत्ता का प्राकट्य जब किसी महामानव के जीवन में होता है तो सोने पर सुहागा का काम करता है। परोक्ष मार्गदर्शक सूक्ष्म शरीरधारी ढूंढ़ते भी उन्हीं को हैं, जिनके माध्यम से उन्हें मानव मात्र के कल्याण हेतु सारा ढांचा विनिर्मित करना होता है। जब स्थूल तनधारी में सामूहिक चेतना का अवतरण होता है तो वह तनधारी सामान्य न रहकर असामान्य अवतारी पुरुष हो जाता है। ऐसे तनधारी के क्रियाकलाप चर्मचक्षुओं से तो सामान्य ही जान पड़ते हैं, किन्तु वह जो कुछ कृतत्व करता चला जाता है, वही उस युग की नीति का आधार बन जाता है। युग परिवर्तन ऐसी ही आत्मबल-सम्पन्न आत्माओं के बलबूते बन पड़ता है।
पूज्य गुरुदेव के बाल्यकाल में 15 वर्ष की आयु में आए वसंत पर्व के ब्रह्ममुहूर्त में पूजा की कोठरी में, एक प्रकाशपुंज प्रकट हुआ। उस दिव्य प्रकाश से सारी कोठरी जगमगा उठी और प्रकाश के मध्य से एक योगी का सूक्ष्म छाया-शरीर उभरा। योगी का स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय (हड्डियों का पिंजर) सिद्धपुरुष के रूप में है, जो अनादिकाल से अकेले , नग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप-ऊर्जा द्वारा स्वयं को अधिकाधिक प्रचण्ड और प्रखर बनाता चला आ रहा है।
सूक्ष्म मार्गदर्शक जिन्हें गायत्री परिवार में दादा गुरु के नाम से जाना जाता है,एक दिगम्बर (नग्न) देहधारी स्थूल काया हैं जिनका नाम स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी है। गायत्री परिवार में यह बहुचर्चित एकमात्र चित्र गुरुदेव ने अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उन्ही के आग्रह पर स्वयं दादा गुरु ने उनके समक्ष प्रस्तुत किया।
जितना महत्वपूर्ण यह दुर्लभ चित्र है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण दादा गुरु का सूक्ष्म अस्तित्व है जिसमें वे गति, काल, दिशा को लाँघ कर निरंतर परिभ्रमण करते व अन्यान्य ऋषि-सत्ताओं की तरह प्रचण्ड प्राणधारी आत्माओं को मार्गदर्शन देते दिखाई देते हैं। वे ही अपने सूक्ष्म रूप में, दिव्य प्रकाश के रूप में गुरुदेव के समक्ष आये एवं उनके कौतूहल को समाप्त करते हुए बोले “हमारे तुम्हारे जन्म-जन्मान्तरों के सम्बन्ध हैं। तुम्हारे पिछले जन्म एक से एक बढ़ कर रहे हैं, किन्तु प्रस्तुत जीवन और भी विलक्षण है। इस जन्म में तुम्हे समस्त अवतारी सत्ताओं के समतुल्य पुरुषार्थ करना है, भारतीय संस्कृति के नवीन उत्थान के लिए देवमानवों का एक विशाल संगठन खड़ा करना है तथा इस कार्य के लिए प्रचण्ड तप-पुरुषार्थ करना है।”
1926 की वसंत के ब्रह्ममुहूर्त में 15 वर्षीय बालक से महान मार्गदर्शक (दादा गुरु) का सर्वप्रथम अनुग्रह था “सम्पूर्ण समर्पण” जिसमें उन्होंने समस्त जीवन ही मानव मात्र के हित हेतु जीने के लिए मांग लिया। गुरुदेव के मास्टर ने उन्हें सच्चे अर्थों में नग्न एवं निर्वस्त्र कर दिया। यह समर्पण कुछ इस स्तर का था कि अगर हम कहें कि गुरुदेव ने सब कुछ ही न्यौछावर कर दिया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गुरुदेव के पास अपना कहने जैसा कोई पदार्थ तो क्या, शरीर, मन, भावना, कामना कुछ भी नहीं बचा। एक अवधूत ( एक प्रकार के साधु) स्थिति में लाकर उन्हें छोड़ दिया गया ।
To be continued
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आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 11 युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। संध्या जी और सरविन्द जी दोनों bracketed स्वर्ण पदक विजेता हैं।
(1)सरविन्द कुमार-51,(2 ) संध्या कुमार-51 ,(3) सुजाता उपाध्याय-24 ,(4) अरुण वर्मा-33 , (5 )सुमन लता-27 ,(6 )रेणु श्रीवास्तव-46, (7 )चंद्रेश बहादुर-36 ,(8) मंजू मिश्रा-26 ,(9) वंदना कुमार-25,(10) पिंकी पाल-24,(11) कुमोदनी गौराहा-39
सभी को हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।