वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ज्ञान की दो धाराएं -शिक्षा और विद्या। 

24 मई 2023 का ज्ञानप्रसाद

आज फिर ज्ञान की ही बात हो रही है तो क्यों न आज का प्रज्ञा गीत फिर से  ज्ञान की देवी वीणा वादिनी के चरणों में ही समर्पित हो। 

ज्ञानप्रसाद आरम्भ करने से आइए अपने दो समर्पित साथियों को शुभकामना प्रदान करें। चंद्रेश बहादुर जी एवं जयश्री बहिन को उनकी वैवाहिक वर्षगांठ पर हम सपरिवार बधाई देते हैं, ईश्वर से उनके वैवाहिक सुख की कामना करते हैं। दूसरी बधाई हम आदरणीय वंदना बहिन जी के शुभ जन्म दिवस (belated) की दे रहे हैं। पुष्पा बहिन जी का धन्यवाद् करते हैं जिन्होंने हमारे साथ यह जानकारी और फोटो शेयर की। 

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की चर्चा के साथ ही शिक्षा और विद्या में  अंतर समझना बहुत ही ज़रूरी है। यह विषय देखने  में बहुत ही जाना, पहचाना लगता है लेकिन इसे बार-बार पढ़ना और अपने ऊपर apply करना बहुत आवश्यक है, नहीं तो हम व्यक्ति निर्माण की कोरी बातें ही करते रहेंगें। 

इन्ही शब्दों के साथ नियमितता का स्मरण करते,सूर्य भगवान की प्रथम किरण की लालिमा से ऊर्जावान होते हुए, विश्वशांति की कामना करते हुए, सीधा चलते हैं आज की गुरुकुल पाठशाला की ओर।   

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परम पूज्य गुरुदेव पूछते हैं:  ज्ञानवान और ज्ञानहीन मनुष्य में क्या अंतर  है? ज्ञानहीन होने के कारण मनुष्य सदैव निम्न स्तर का ही गिना जाएगा। ईश्वर ने कितनों को ही जीवन दिया हुआ है। मक्खी,मच्छर, कीड़े, मकोड़े- सभी में भी तो जीवन है; मेढ़क में भी जिंदगी है, मछली में भी जिदंगी है, कछुए  में भी जिदंगी है,चिड़िया में जिदंगी है, तो फिर हम उन्हें निचले स्तर का क्यों मानते हैं, क्योंकि उनमें केवल एक ही कमी है। वह कमी है, “ज्ञान की कमी।” 

मनुष्य ज्ञान का देवता माना गया है। ज्ञान के कारण, मननशील होने के कारण, विचारशील होने के कारण ही मनुष्य का स्तर ऊँचा उठा है। कल्पना कीजिए प्राचीनकाल में जब मनुष्य वनमानुष रहा होगा, जब उसको ज्ञान नहीं रहा होगा, सामाजिकता का ज्ञान नहीं रहा होगा, जीवन की जिम्मेदारियों का ज्ञान नहीं रहा होगा, अपनी गौरव-गरिमा गुण, कर्म, स्वभाव की विशेषताओं के बारे में जानकारी नही रही होगी, तो कैसा होगा। Theory of Evolution के मालिक चार्ल्स डार्विन  के अनुसार जो मनुष्य आज सृष्टि का स्वामी बना बैठा है, बन्दर की औलाद होने के कारण बंदर जैसा ही रहा होगा। बंदर से चलकर मनुष्य तक  की यात्रा में हाथ,पाँव, नाक, कान,आँख आदि की बनावट में कोई ज़्यादा  अंतर नहीं हुआ है। सबसे बड़ा अंतर जो दिखाई तो नहीं देता लेकिन सब कुछ उसी अंतर के कारण हो रहा है; वह है ज्ञान का अंतर। प्राचीन काल की तुलना में आधुनिक मनुष्य का ज्ञान बढ़ता ही चला गया है/जा रहा है। 

ज्ञान की दो धाराएं :  

ज्ञान की दो धाराएँ हैं और दोनों को ही बढ़ाया जाना चाहिए। एक वह  धारा  है, जो हमारी “जीविका” प्राप्त करने के काम आती है। उसको शिक्षा कहते है । लोकव्यवहार उसी  के आधार पर सीखा जाता है। बच्चों को जो हम स्कूल में पढ़ाते हैं, वह शिक्षा पढ़ाते हैं। शिक्षा का मतलब है उनको लोकाचार आए। उनको यह मालूम पड़े कि संसार का बनावट क्या है? भूगोल क्या है? इतिहास क्या है? दुनिया में इंसान के  चालचलन का  क्या हो  रहा है? दुनिया में किस तरह के उतार-चढ़ाव आते रहे हैं? यह हम इतिहास से सीखें। पेड़ कैसे पैदा होते हैं? यह सृष्टि क्या है? राजनीति क्या है? समाज क्या है? नागरिक कर्त्तव्य क्या है? जीविका उपार्जन कैसे करना चाहिए? अर्थशास्त्र क्या है। इस तरह की  बातें सीखकर हम “जीविका उपार्जन” (Earn a living)  कर सकते हैं और जीविका उपार्जन की तरह से लोक व्यवहार में प्रवीण हो सकते हैं। लोक व्यवहार में प्रवीण बनने के सम्बंध में और जीविका उपार्जन के सम्बंध में जहाँ से हमें जानकारी मिलती है उसे  शिक्षा कहते हैं। शिक्षा तो सदैव ही आवश्यक रही है, शिक्षा न होगी तो मनुष्य अपना पालन पोषण कैसे करेगा, अपनी संभाल कैसे करेगा, समाज के साथ तालमेल किस तरह बैठा पाएगा,लोक व्यवहार के लिए  अपनी बुद्धि  का उपयोग किस तरह कर पाएगा। जीवन की इस रेस में compete करने  के लिए शिक्षा तो निसंदेह आवश्यक है।

शरीर को जीवित रखने के लिए, भौतिक जीवन को ठीक ठाक  बनाए रखने के लिए शिक्षा बेहद जरूरी तो  है,लेकिन केवल भौतिक जीवन ही तो जीवन नहीं है। भौतिक जीवन में जब रेस लगना आरम्भ हुई, lifestyle बढ़ते ही गए, मानवी मूल्यों का पतन होता ही गया और आज यह स्टेज आ चुकी है कि ज्ञान की देवी सरस्वती लुप्त होती जा रही है और पदार्थ की देवी लक्ष्मी का बोलबाला है। 

भौतिक जीवन के इलावा हमारा एक और जीवन भी तो  है, जिसको हम “आध्यात्मिक जीवन” कहते हैं। मनुष्य के भीतर चेतना भी तो है, आत्मा भी तो है, विवेक भी तो है, भाव  संवेदनाएँ भी तो हैं। इन सब को ठीक हालत में  रखने के लिए हमें विद्या की ज़रुरत पड़ती है। विद्या ही  ज्ञान की दूसरी धारा  है।  अगर हम विद्या को पूरे  नाम “अध्यात्म विद्या” से सम्बोधन करें तो कोई भी हर्ज़  नहीं है। इसी को  ऋतंभरा प्रज्ञा कहने में भी कोई हर्ज नहीं है, गायत्री कहें, प्रज्ञा कहें तो भी हर्ज नहीं है। 

विश्व  की अनेकों  जानकारियों के बारे में ज्ञान रखने वाले न जाने कितने ही मनुष्य मिल जाएँ जो बहुत ही  होशियार हैं। एक से एक होशियार और  समझदार मनुष्य मिल जायेंगें। किसी और स्थान की तो बात ही क्या,कैदखाने में, जालसाजों में पढ़े लिखे ही ज्यादा होते हैं। नासमझ आदमी तो जालसाजी  नहीं कर सकता। नासमझ मनुष्य तो छोटी- मोटी जेबकटी ही  कर सकता है। दुनिया में जो भी बड़ी-बड़ी जालसाजियाँ हुई हैं, अधिकतर  पढ़े-लिखे लोगों ने ही की हैं। हम शिक्षा की बात नहीं कर रहे, शिक्षा अपनी जगह पर मुबारक है,सम्मानीय है। 

यह चर्चा विद्या के बारे में की जा रही है। विद्या के महत्त्व के बारे में की जा रही है, अगर सही मायनों में  विद्या का मतलब समझ आ जाए तो फिर कहना ही क्या। 

विद्या का अर्थ है अपने विचारों का सही प्रयोग करना। आप अपने शरीर का इस्तेमाल किस तरीके से करें। साधनों का प्रयोग कैसे करें, परिस्थितियों को कैसे हैंडल करें, मिले हुए पदार्थों का कैसे प्रयोग करें,अनचाहे पदार्थों और साधनों को खरीद-खरीद कर, उनके बोझ तले दबे जाना और फिर झुंझलाहट में यही कहना “ समय किसके पास है, पैसे का तो पता ही नहीं चलता कहाँ जा रहा है, बरकत ही नहीं है ,दिन रात कड़ा परिश्रम करके भी भूख और लालसा बढ़ती ही जा रही है आदि आदि”    

ज्ञान की इसी धारा का नाम विद्या है। ज्ञान की इस धारा को प्राप्त करने के लिए सामान्य लोकज्ञान से काम नहीं चलता। मनुष्य को ऊँचे स्तर पर बैठकर चिंतन करना पड़ता है और यह देखना पड़ता है कि मनुष्य  की गरिमा और महत्ता की सुरक्षा किस तरीके से की जाए, ज्ञान की इस धारा को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को करना चाहिए, बस इसी प्रयास का नाम विद्या है। मनुष्य को जब यह विद्या मिल जाती है तो वह धन्य हो जाता है। 

शास्त्रों में विद्या की महत्ता के लिए  क्या कुछ नहीं कहा गया है, विद्ययाऽमृतमश्नुते अर्थात  विद्या अमृत है, जिसे ज्ञान की इस धारा (विद्या) की समझ आ गयी वोह तो अमरत्व को प्राप्त कर गया। जो मनुष्य किसी स्थिति/ समस्या का ठीक तरीके से उचित और अनुचित हल जानता है उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं रह जाता। अगर मनुष्य को यह मालूम हो जाए  कि समस्याएँ कहाँ  से पैदा होती हैं तो जीवन सुखमय होते एक पल भी नहीं लगेगा।

यह मनुष्य की अज्ञानता ही है कि उसे इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि  परिस्थितियों के कारण समस्याएँ पैदा नहीं होती हैं, दूसरों के कारण  समस्याएँ उत्पन्न नहीं होतीं, बल्कि मनुष्य की अपनी मनःस्थिति परिस्थितिओं के लिए जिम्मेदार हैं। अधिकतर लोगों को यह साधारण सी बात/ तथ्य समझ नहीं आती, यही है अज्ञानता। जब मनुष्य अपनी अज्ञानता के वशीभूत औरों को कोसना बंद कर देगा तो जीवन स्वर्गीय बनते देर नहीं लगेगी। 

इस सत्य को जानने के लिए महापुरुषों के इतिहास से सहायता मिल सकती है। हम आसानी से जान सकते है कि समस्याएँ कहाँ से उत्पन्न हुई और वोह मनुष्य  किस तरीके से बढ़े, कौन से  मार्ग का चयन किया। अब्राहम लिंकन,जार्ज वाशिंगटन,गाँधी जी, महात्मा बुद्ध का इतिहास तो सर्व विदित है। इन सबकी  परिस्थितियों में क्या विशेष  बात थी ? इन महापुरषों की परिस्थितियां सामान्य लोगों के बराबर या उससे भी गई गुज़री थीं, लेकिन गई गुज़री  परिस्थितियों में भी उनकी मनःस्थिति इतनी उच्च कोटि की थी  कि न जाने कहाँ से उठे  और कहाँ से कहाँ बढ़ते ही  चले गए। शंकराचार्य में क्या विशेषता थी, समर्थ गुरु रामदास में क्या विशेषता थी, कबीर की क्या परिस्थितियाँ थीं, हमारे गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा जी की क्या परिस्थितियां थीं, केवल मनःस्थिति थी, विवेकशीलता थी, साहस था, कर्तव्यपरायणता थी, निष्ठा थी। अगर मनुष्य की मनःस्थिति में विवेक का वास हो जाए तो वह  अपनी समस्याओं को हल स्वयं ही कर सकता है, किसी दूसरे  के आगे हाथ फैलाने या किसी दूसरे  को कोसने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। विवेकशील होने पर मनुष्य अपनी क्या, दूसरों की समस्याओं को समाधान  कर सकता है।अपने साधनों और पदार्थों का  ठीक तरीके से इस्तेमाल कर सकता है। 

ईश्वर ने मनुष्य को  जिन सम्पदाओं से मालामाल किया हुआ है उसे तो ज्ञान भी नहीं है। मनुष्य के पास श्रम है, समय है, अच्छा सदृढ़ शरीर है, बढ़िया कुटुंब मिला हुआ है, अच्छा कार्यक्षेत्र मिला हुआ है और न जाने क्या क्या मिला हुआ है। 

इतनी सम्पदाओं के बावजूद स्थिति यह है कि उसकी भूख और अधिक बढ़ती ही जाती है, उसे उचित और अनुचित का समाधान निकालना ही नहीं आता,क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए,ज्ञान ही नहीं है।   मनुष्य बस यहीं पर भटक जाता  है और कहाँ से कहाँ पँहुच जाता है।  जो उसे  करना चाहिए वह कर नहीं पता  और जो नहीं करना चाहिए, वह कर देता  है। 

इसका  क्या कारण है, इसका कारण  यह है कि मनुष्य के  पास विशेष तरह का अनुभव, जिसे हम विवेक कहते हैं,नहीं है।  इसी विवेक/ अनुभव/ ज्ञान का अर्थ यहाँ विवेक है। ज्ञान का अर्थ वह नहीं है, जिसे नॉलेज कहते हैं। ज्ञान का अर्थ है wisdom; यदि हमारे पास  wisdom  है तो हम हर चीज को उचित और अनुचित की कसौटी पर कस सकते हैं और सिर्फ उसी चीज को अपने जीवन में धारण कर सकते हैं, जो करनी चाहिए, जो उचित है। 

ज्ञान की इस धारा को प्राप्त करने के लिए DSVV में Life Management का compulsory कोर्स कम्पलीट करना पड़ता है, पहले इस कोर्स का नाम Art of Living हुआ करता था। इस कोर्स के कंटेंट से ही परम पूज्य गुरुदेव की दूरदर्शिता और vision का  ज्ञान हो जाता है। विद्या के ज्ञान में  Art of Living की बात होती है जबकि शिक्षा के ज्ञान में Earn of  Living  की बात होती है।

शब्द सीमा के कारण संकल्प सूची प्रकाशित करने में असमर्थ हैं , क्षमा प्रार्थी हैं।     

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