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अपने सहकर्मियों की कलम से -12 नवंबर   2022- संजना कुमारी और डॉ सुमति पाठक का योगदान  

अपने सहकर्मियों की कलम से -12 नवंबर   2022- संजना कुमारी और डॉ सुमति पाठक का योगदान  

परम पूज्य गुरुदेव, वंदनीय माता जी के सूक्ष्म संरक्षण और मार्गदर्शन में 12  नवंबर   2022  शनिवार का “अपने सहकर्मियों की कलम से” का यह लोकप्रिय सेगमेंट आपके समक्ष  प्रस्तुत करते  हुए बहुत ही हर्ष हो रहा है। दोनों बैटियों की अनुभूतियाँ बहुत ही दिव्य हैं और एक pdf बुकफॉर्म  में प्रस्तुत की जा रही हैं। संजना बेटी के बारे में तो आप सब जानते हैं लेकिन सुमति बेटी के बारे में  फिर से याद करा दें कि यह कुमोदानी जी की प्रतिभाशाली बेटी हैं और IT में अस्सिटैंट प्रोफेसर हैं। आप  दोनों की अनुभूतियाँ जानने को उत्सुक होंगें लेकिन जल्दी से हम और भी छोटी छोटी सी बातें कर लें ,संकल्प सूची भी तो  लिखनी है। 

1) राजकुमारी कौरव जी 3  से 6 दिसंबर को हो रहे 24 कुंडिय यज्ञ में बहुत ही सक्रियता से योगदान दे रही हैं।  उनकी सक्रियता की कुछ फोटो प्रस्तुत कर रहे हैं। 

2 ) ज्योति जी की बेटी सायानी अब बिलकुल ठीक है।  ज्योति जी गुरुकार्य में बहुत कुछ करना चाहती हैं और अकाज अलग क्षेत्रों में योगदान दे रही हैं। 

3 ) वंदना कुमार जी अभी कुछ दुविधा में हैं, गुरुदेव जल्द ही सब ठीक कर देंगें। 

आज की  24 आहुति संकल्प सूची में 8  सहकर्मियों ने संकल्प पूरा किया है। आज रेणु श्रीवास्तव  जी ने  सभी को पछाड़ कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। 

(1 )संध्या कुमार-28,(2 ) पुष्पा सिंह-26,(3) रेणु श्रीवास्तव-38,(4) प्रेमशीला मिश्रा-25 (5 )प्रेरणा कुमारी-28, (6)कुमोदनी गौरहा-27,(7) नीरा त्रिखा-25 (8)  पूनम कुमारी-25      

सभी को  हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।  सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय  के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हें हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। जय गुरुदेव,  धन्यवाद

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संजना कुमारी की लेखनी और विचारधारा

आज हमने एक लाईन पढ़ी कि ईश्वर न किसी से प्रेम करते हैं न किसी से द्वेष ,वह केवल दृष्टा और कारणरुप हैं। फिर हम सोचने लगे फिर गुरु जी क्यों करते हैं हम से  प्रेम! तो खुद को यही समझ आया कि तभी तो महाकाल को प्रज्ञावतार का अवतार लेकर, एक शरीर धारी बनना पड़ा, उन  सारे संघर्षों से गुजरना पड़ा जिनमें से  एक साधारण मनुष्य गुजरता है। यह सब इसलिए ताकि वह हम पर अपना करुणा बरसा सकें। परम पूज्य गुरुदेव हमेशा कहते हैं कि अगर कोई बोले कि मेरा  गुरु सबसे बड़ा  संत, सिद्ध, ज्ञानी है तो मान लेना,मेरा गुरु सबसे बड़ा ज्ञानवेत्ता है तो मान लेना, लेकिन अगर  कोई यह बोले कि मेरा  गुरु सबसे अधिक प्रेम करता है  तो कभी भी न मानना। गुरुदेव के स्नेह का जिन्हें भीआभास हुआ है  वह सच में जानते हैं कि  गुरुदेव हमारी  हर छोटी बड़ी चीज़ का ख्याल कैसे  रखते हैं। 

इस तथ्य को अभी दो दिन पूर्व हमारी वरिष्ठ, समर्पित सहकर्मी ने कमेंट करके  certify किया है। आप उनका  कमेंट स्वयं ही पढ़ लीजिये :

बहिन सुमनलता जी लिखती हैं कि आपने कुछ दिन पूर्व प्रेमशीला बहन जी के द्वारा लखनऊ में आयोजित 108 कुंडीय यज्ञ की फोटो,विडिओ ज्ञानप्रसाद में भेजी थी। हमने कमेंट में लिखा था कि काश ऐसा अवसर हमें भी प्राप्त हो पाता। भाई साहब हमें लगता है कि पूज्य गुरुदेव ज्ञानप्रसाद के लेखों और हम सबके कमेंट को भी अदृश्य रूप में पढ़ रहे हैं। हमारे आवास से सबसे नजदीक के गायत्री शक्तिपीठ में 108 कुंडीय यज्ञ हो रहा है। गुरुदेव ने किस अज्ञात स्रोत से उसकी सूचना हम तक पहुंचा दी कि विश्वास ही नहीं हो पा रहा है। ऐसा व्यक्ति जिसको हम न तो जानते हैं और न ही पहचानते हैं उस आयोजन का पैम्फलेट  हमारी बिल्डिंग के गार्ड को दे गया और गार्ड ने भी अंदाज से ही वो हमारे तक पहुंचा दिया। 10 नवंबर से 13 नवंबर, 2022 तक चलने वाले इस यज्ञ का आज पहला दिन था। आज कलशयात्रा थी। हम घर की पूजा आदि समाप्त कर वहां पहुंचे, हमें पहुंचने में थोड़ा  विलंब हो गया, यात्रा वापस आ गई थी, लेकिन पूजन आदि चल रहा था। हम इस शक्तिपीठ में पहली बार गए हैं।  

तो यह है गुरुदेव की दिव्य दृष्टि , इसलिए हमें अपने बारे में तनिक भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हमें बस यही भाव रखना है कि हम गुरु ऋण तो कभी नहीं चुका सकते लेकिन गुरु की  कृतज्ञता को हर पल याद रखें और अपना सब कुछ उन्हें समर्पित कर दें। 

जय गुरुदेव जय शिव शंभू 

 एक और उदाहरण : 

हम मनुष्य आकर्षणवश  क्षणिक सुख की ओर भागते हैं। सारी दुनिया अंधाधुंध भागे जा रही है लेकिन किसी को  पता नहीं हैं कि जाना कहां है या वहां क्यों जाना है! अपने हृदय और मस्तिष्क से हम जानना नहीं चाहते कि वह क्या चाहता है। इस अंधी दौड़ में हम खुद को भूल चुके हैं और अपने अंदर की आवाज सुनना ही नहीं चाहते। भगवान ने हम सभी मनुष्यों के अंदर के सिस्टम को सेट कर दिया है कि वह दया, करुणा, विश्वास, समर्पण, सहानुभूति, सहनशीलता, सत्यता, अहिंसा, त्याग, श्रद्धा, प्रेम,तप , पुरुषार्थ, हर्ष, उमंग, ज्ञान, विवेकशीलता आदि के रास्ते पर चलेगा। यदि हम इस रास्ते से अलग चलेंगे तो हमारे सिस्टम को सूट नहीं करेगा और हमें विपरीत प्रभाव दिखाई देंगे। गुरु इन गुणों को उभारने में हमारी सहायता  करता है । भगवान भी इन्ही  गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर हम इन गुणों को पैदा कर लें तब ही भगवान हमें अपनाएंगे यानी जब हमारा  और भगवान का स्वभाव एक जैसे हो जायेगा तभी आत्ममिलन संभव है । केमिस्ट्री में एक  सिद्धांत है Like Dissolves Like, पानी में पानी  मिला सकते हैं परंतु पानी में तेल को नहीं। जीवन के लिए turning point इन्ही गुणों को अपनाना है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं वे इन्हीं गुणों के कारण महान हो गये। हमारे गुरुदेव तो अपने में ही एक उदाहरण हैं इसीलिए  तो वें करोड़ों हृदयों  पर राज़ करते हैं,सबके जीवन के पथप्रदर्शक हैं , भगवान हैं, सब कुछ हैं। हमारी तर्कशीलता हमें भगवान पर विश्वास नहीं करने देती  , हमारा अहं हमें समर्पण नहीं करने देता और जिस दिन हम इस संसार से विदा हो जाएंगे तब तो छोड़ना ही हैं तो अभी ही क्यों न हम लोभ,मोह और अहंकार त्याग कर भगवान का प्यार, अनुदान पा लें और अपने जीवन को श्रेष्ठतम ऊंचाईयों पर ले जाएँ ।

आदरणीय महेंद्र शर्मा  जी से मुलाकात के बारे में संजना कुमारी लिखती है :

 “गुरु जी ने कहा था मेरे साथ चल”

अखंड दीप के दर्शन के दौरान मुलाकात हुई। मैंने बताया कि शांतिकुंज चैनल और डॉ अरुण त्रिखा सर के चैनल पर आपकी विडियो देखी और बहुत ही अच्छी लगी। फिर मैंने कहा आपका नाम  महेंद्र वर्मा जी है न ? तो उन्होंने ने कहा लोग कहते तो होगा ही  और मुस्कुराएं। हमने पूछा कि हम आपको disturb तो नहीं कर रहे, उन्होंने कहा नहीं। फिर मैंने उनसे पूछा कि मैं यहां थोड़ी देर और रुक सकती हूं ? तो उन्होंने कहा हां। मैंने बताया हम विश्विद्यालय में interview देने आए हैं। उन्होंने ने कोर्स के बारे में पूछा तो मैंने बताया बी. ए . तो उन्होंने खुद से ही बोला साइकोलॉजी ? फिर मैंने पूछा आपको कैसे पता चला तो उन्होंने कहा कि ऐसे ही कह दिया और हंसकर पीठ थपथपाई। उन्होंने कहा विश्वविद्यालय में यहां पढ़ना, अचानक किसी से मिल जाना, बातें हो जाना यह सब तो बहाना है ,बल्कि यह सब तो पहले से ही निश्चित है। फिर मैंने उन्हें अपने बारे में बताने को कहा। उन्होंने बताया:

“गुरु जी हमारे क्षेत्र में आने वाले थे तो मेरे दोस्त ने मिलने को कहा, मैंने कहा मुझे नहीं मिलना। फिर उसने जिद्द की तो मैंने मान लिया। फिर उसने कहा धोती पहननी पड़ेगी , मैंने कहा कि मैं नहीं पहनूंगा। बाद में हमने धोती खरीद ली और पहनी। वहां गुरु जी दीक्षा देने वाले थे।  मैंने कहा कि मैं किसी गुरु में विश्वास नहीं करता, मैं सिर्फ हिमालय के संन्यासी को ही गुरु बनाउंगा और किसी को नहीं। गुरु जी ने बताया कि पिछले जन्म से ही वो मुझे ढूंढ रहे हैं और इस बार उनसे उनके हिस्से का शेष कार्य पूर्ण करवाना है,इसलिए मुझे पकड़ लिया। 50 वर्षों से यहां हूं, बहुत काम किया और अभी भी जो मिल रहा है वो कर रहा हूं। शांतिकुंज की बिल्डिंग पहले ऐसी नहीं थी, इसे बनाया, विश्वविद्यालय की ज़मीन खरीदी और विस्तार किया। मैं पहले विश्वविद्यालय में धर्म विज्ञान का  हेड था। फिर जीजी ने कहा शांतिकुंज में कोई मैनेजर नहीं है यहीं आ जाइए इसलिए दो साल पहले विश्वविद्यालय छोड़ा  और अब शांतिकुंज में ही हूं। उन्होंने कहा कि श्रीराम ने त्रेता युग  को समाप्त किया, श्री कृष्ण ने द्वापर को और अब कलयुग को गुरु जी समाप्त कर रहे हैं। लक्ष्य बहुत बड़ा है, हम तो छोटे मोटे कार्य ही  कर रहे हैं, लेकिन यह सब छोटे- छोटे कार्य ही  जुड़कर उसमें भागीदारी निभाएंगे। गुरु जी ने बोला है अपने पेट का बच्चा ही केवल  बच्चा नहीं, बल्कि सभी बच्चे  अपने ही  हैं। इसलिए जब हमने घर छोड़ा तो गुरुदेव ने  कहा कि आपके पास सिर्फ एक ही परिवार, अपने ही बच्चे थे लेकिन यहां आपका बहुत बड़ा परिवार हो जाएगा, उन्हीं की सेवा करना। उन्होंने कहा कि ये गुरु जी और वंदनीय माता जी बाद में हैं पहले हमारे ये माता पिता हैं और ये ही सब कुछ हैं। इसलिए मैं जीजी को बहुत प्यार करता हूं और  वही मेरी बहन हैं। जीजी को मैं कहता हूं आप बैठिए मैं सारा काम देखता हूं। जब गुरु जी दीक्षा देने आए थें उस वक्त मैं भिलाई स्टील प्लांट छत्तीसगढ़  में नौकरी करता था तब गुरु जी ने कहा था मेरे साथ चल। मैंने बोला मैं नौकरी कैसे छोड़ दूं।  तब गुरु जी ने कहा ये सब रोटी के लिए ही कर रहा है न, चल मैं तुझे रोटी दूंगा। अब यहां जो काम भी मिलता है उसे करता हूं, कभी ये नहीं देखा कि कार्य छोटा है या बड़ा। इसी नवंबर में विश्वविद्यालय की दीक्षांत समारोह होने वाला है तो उसकी तैयारी के लिए भी जाना है। उन्होंने कहा गुरु को कभी धोखा नहीं देना चाहिए, अपने काम को ईमानदारी से करना चाहिए और हमेशा अपने गुरु पर भरोसा रखना चाहिए। उन्होंने आगे बताया जैसे मां बाप अपने बच्चों के लिए मकान बनाते हैं, उसी तरह उन्हें बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए रास्ता भी दिखाना चाहिए, यही सच्चा लाड़ प्यार होता है। Guardians  के जीवन का एक ही लक्ष्य होता है – बच्चे। ठीक उसी तरह गुरु जी ने युग निर्माण की सारी व्यवस्था और अपना सारा जीवन हम सब के लिए एक सुनहरे रास्ते की तरह तैयार किया है। उन्होंने आगे कहा कि हम तो बूढ़े हो गए,अब इस जिम्मेदारी  को पूरा करने के लिए बच्चों को तैयार करना होगा। फिर मैंने पूछा आप गुरु जी से मिलने से पहले कुछ करते थे तो उन्होंने कहा नहीं, बस हनुमान जी की पूजा करता था।”

अंत में उन्होंने हमसे हमारा नाम पूछा, कहां से आई हो और कौन कौन साथ में हैं , पापा क्या करते हैं,मन लगाकर पढ़ाई करना। उनके साथ थोड़ी देर ही रहकर उनकी विनम्रता,उनका frankly और friendly बातें करना,उनका हंसकर बातें करना, इस तरह जो भी ऊर्जा मिली उसे पाकर मेरा ह्रदय बहुत ज्यादा प्रसन्न हुआ, लगा कि उनसे बातें करके सारी समस्याएं खत्म हो गई।अंत में उन्होंने साथ में फोटो खिंचवाने की बात भी मान ली। इतने दिनों से उनसे मिलने की इच्छा पूरी हुई।

मेरी ऑनलाइन ग्यानरथ गायत्री परिवार से जुड़ी कुछ अनुभूतियां- संजना 

“कहते हैं हमारे जीवन में परेशानियों का आना पार्ट ऑफ लाइफ है और उनसे हंसकर बाहर आना आर्ट ऑफ लाइफ है।” जब मैं अपने जीवन के उलझनों में बहुत ज्यादा फंसी थी और अपने परिवारजनों से ही मिल रहे धोखों एवं रिश्तों के खोखलेपन को सामना कर रही थी तब जिंदगी पूरी अंधकारमय हो गई थी। जिन्हें अपना समझती  थी  वो तो कभी  अपने थे ही नहीं और जिसे जिंदगी का मायने समझते थे वो कसौटी भी ग़लत थी। 

आखिर  अपना है कौन? अपनी सिर्फ अंतरात्मा है और उस तक पहुंचने का राजमार्ग गुरु ही है। गुरु के मार्गदर्शन में जो भी आत्मज्ञान, सद्ज्ञान मिलेगा वो ही अपना है। ज्ञान की प्रचंड शक्ति से अंधकार के बादल छंटने लगते हैं , अंदर बाहर की  पीड़ा और पतन का निवारण होने लगता, आसपास प्रेममय वातावरण हो जाता है। इस तरह हमें अपने  जीवन का लक्ष्य (पीड़ा पतन का निवारण और प्रेम का फैलाव) भी मिल जाता है और लक्ष्य तक पहुंचने के पहुंचने के अस्त्र शस्त्र भी (यानी क्रांतिकारी विचार, जाग्रत विवेक बुद्धि, त्याग, तपस्या)। अस्त्र शस्त्र पता तो  हैं लेकिन इन्हे  ठीक से चलाना सीखना  होगा वो हम सीख सकते हैं उपासना, साधना, अराधना, स्वाध्याय,संयम और सेवा से। अंधकारमय जीवन में हम भटके हुए देवता बन जाते हैं और अपनी जगह उस अंधेरे में ही बनाने के लिए रोते रहते हैं, हमें पता ही नहीं चलता कि कहीं स्वर्णिम और उज्जवल भविष्य भी हमारा इंतजार कर रहा  है। हम उसी मोहमाया में रोते चले जातें हैं।

यह वह  समय था जब आदरणीय डॉक्टर सर हमें धारावाहिक महाभारत के  शुरू   में एक वाक्य की ओर ध्यान देने को कहते हैं – “मैं समय हूं “ यानी समय बलवान है।  जो आज है जरुरी नहीं हमेशा ऐसे ही हो। 

हमें जो निरंतर ज्ञानप्रसाद मिलता है उससे हमारा ज्ञान, ऊर्जा और रोचकता बढ़ती है। हम  अंधेरे में  एक एक सीढ़ी  पार करके ऊपर ही ऊपर जाते  रहते हैं , न जाने कब  हमारे जीवन में उल्लास, प्यार, वो खोई हुई संतुष्टि वापिस आ जाती है.पता ही नहीं चलता। जिसे समाज में अपना कहा जाता है वो जब हमसे दूर हो रहे थे तब इस परिवार का दामन (हमने तो नहीं कहेंगे) गुरु सत्ता ने पकड़ा दिया। जिस प्यार, अपनत्व, आशीर्वाद और मार्गदर्शन के लिए भटक रहे  थे वो मुझे मेरे ऑनलाइन ग्यानरथ गायत्री परिवार के एक एक सदस्य से मिला, जिसके लिए हम जीवन भर आभारी रहेंगे। इस अनमोल साथ के लिए आदरणीय डॉक्टर सर और सभी आत्मीय वरिष्ठजनों को हमारा भाव भरा सादर प्रणाम एवं हृदय से कोटि कोटि धन्यवाद। हमें अपनी खोई दीदी का प्यार मिला, चाची जी और चाचा जी के रिश्ते प्यारे और प्रेरणादायक भी हो सकते है, यह हमने  अनुभव किया।  किन्हीं को भी इस प्यार का सच्चा आनंद चखना है तो इस परिवार से ले सकते हैं। यह परिवार  प्यार, प्रोत्साहन और आशीर्वाद की खान है,   झूठी और दिखावे वाली नहीं । आदरणीय डॉक्टर सर के बारे में बस यही कहना चाहते हैं कि वो हमारे लिए फरिश्ता हैं  और जिस हीरें की मांग गुरु जी से किया करते थे वो हीरा हैं।

आप सबकी बेटी संजना कुमारी

डॉ सुमति पाठक की अनुभूति

आइये आज धनतेरस के मौक़े पर हम आप सभी को एक अपनी आपबी ती, अपनी एक देवीय शक्ति की अनुभूति सुनाते हैं। 

ये उस समय की बात है जब हम कॉलेज मे M.Sc. की क्लास अटैण्ड करने जाते थे,  डेली बस से  25 किलोमीटर अप- डाउन करते थे।  

आने जाने का समय निश्चित होने के कारण, आने और जाने वाला बस भी निश्चित था, रोज उसी समय पर आते- जाते थे, उसी बस मे आते जाते थे। बस के ड्राइवर भैया और कंडेकटर भैया  भी अब हमारे अच्छे जान पहचान वाले हो चुके थे।  हमे दूर से आते देखते तो गाड़ी रोक दिया करते थे।  

लेकिन  पता नहीं उस दिन क्या हुआ , बस में काफी  भीड़ थी और भैया  भी हमें  आते हुए  नहीं देख पाए।  हम रोड क्रॉस कर ही रहे थे की गाड़ी निकल गई। बहुत गुस्सा आया पर सोचा चलो अब अगले बस का ही इंतजार करना है ,और कर भी क्या सकते थे, प्यास के कारण गला सुख रहा था, तेज धूप  थी, पसीने और गर्मी से हालत खराब हो रही थी, कब घर पहुचें  ऐसा लग रहा था।  इंतजार करते करते डेढ़ घंटा बीत गया, हर 10 मिनट मे जिस रास्ते गाड़ी आती थी, वहाँ डेढ़ घंटे से कोई बस  नहीं आयी  😢 अब तो हद ही हो गई थी। 

भोलेनाथ पर बड़ा गुस्सा आया, मन ही मन उनसे लड़ पड़ी कि  ये कैसा साथ है तुम्हारा, जो तुम्हें  याद करे उसके साथ होने की बात कहते हो, मैं तो तुम्हे हर पल याद करती हूँ  और तुम्हारे साथ होने के बाद भी इतनी परेशानी उठानी पड़े … ये कैसा साथ है तुम्हारा… 

आखिरकार एक बस आई जिसमें  इतनी भीड़ थी की खड़े क्या लटक कर जाना पड़ता पर कर भी क्या सकते थे और कोई रास्ता भी नहीं था, पहले ही इंतजार करते डेढ़ घंटा बीत चुका था। यह  बस भी छोड़ देते तो न जाने कितनी देर और रुकना पड़ता इसलिए  मन मार कर उस बस पर चढ़ गई। भोलेनाथ से मन में  लड़ाई चल ही रही थी कि  एक तो मेरी बस निकाल दी आपने, दूसरी बस का इंतजार डेढ़ घंटे तक कराया, मौसम भी ऐसा जैसे आग उगलती गर्मी वो भी शान्त नहीं कर सका, दूसरी बस जल्दी नहीं बुला सका, अब जब बस आई भी तो इतनी भीड़, कम से कम खड़े होने की जगह ही आराम से दे देता, क्या मतलब है  तुम्हे हर याद करने का या तुम्हारे साथ रहने का जब तुम भगवान होकर इतनी  छोटी  छोटी  परेशानी को दूर नहीं कर सकते… 

यह सब सोचते सोचते थोड़ी दूर निकले ही थे कि  हमने देखा जिस बस मे हमारा रोज़  आना जाना होता था उस बस का जबरदस्त एक्सेडेंन्ट हुआ था , कितनों  के हाथ- पैर टूटे, जवानी मे दाँत टूट गये थे, किसी के सर से खून, भीड़ जमा थी, हमारी बस भी थोड़ी देर रुकी फिर निकल गई।  लगभग 12 बजे  अपने कॉलेज से निकली थी और 4 बजे  मैं  सही सलामत घर पर अपने मम्मी साथ लंच कर रही थी।  

बहुत इंतजार किया, बहुत भीड़ में  लटक कर आई, बस के न आने तक प्यास और धूप, पसीने से, गर्मी से परेशान थी,  बार लग रहा था कि  मैं  अब गिर जाऊंगी, तब गिर जाऊंगी, थोड़ा लंच का टाइम भी बिगड़ा, मम्मी से लेट आने के कारण डांट भी पड़ी, उनको सब बात बतानी पड़ी, पूरे रस्ते भोलेनाथ से लड़ती आई लेकिन  जब  बस का एक्सीडेंट हुआ  देखा तो सारे  जवाब मिल गए:

ऐसा लग रहा था जैसे भोले नाथ मुझ पर हंस  रहे हों  और कह रहे हों,  तुझे अपनी बस पकड़नी थी, तुझे छाया चाहिए  थी, तुझे जल्दी बस पकड़नी थी, तुझे आराम से खड़े हो के या बैठ कर आना था, तू अपना सुख और सुविधा देख रही थी पर मै तेरा भाई तेरी सुरक्षा देख रहा था,मैं   महाकाल हुँ, तेरे साथ हुँ इसलिए तेरे काल को टाल दिया। तेरे सुख और सुरक्षा में  से मैंने तेरी सुरक्षा चुनी… इसलिए अभी अपने मम्मी के साथ बैठ कर गप्पे लगा रही है…।

यह  तो केवल एक छोटी सी घटना है  लेकिन  आप सब  याद रखें  अगर जीवन मे कोई कष्ट है तो उसमे जरूर कुछ आपकी भलाई है। किसी के पास स्वास्थ्य नहीं, किसी को जीवन साथी सही नहीं मिला, किसी की संतान नहीं है या है तो अच्छी नहीं है, पैसे नहीं है, नौकरी नहीं है। पर इन सब के पीछे  कोई न कोई कारण होता है। उसकी लीला हमारी  समझ में  नहीं आती, हर चीज़ मे वोह  हमारी भलाई पहले देखते है, सुरक्षा पहले देखते है फिर कोई दूसरी चीजों को हमारे जीवन मे महत्व देते है। 

आप कहेंगे कि  मुसीबत देकर मुसीबत टाल रहे पर ईश्वर भी प्रकृति के नियमों  से बंधे है, वोह  हम पर आने वाली विपदा कम कर सकते है पर टाल नहीं सकते क्योंकि  जीवन की हर घटना हमारे कर्मो से जुड़ी होती है और कर्म टाला नहीं जा सकता।इसे इस तरह समझा जा सकता है कि  हमारी किसी गलती पर हमें जेल होनी थी पर समझा बुझा के छोड़ दिया जाता है, यही है दयालुता । 

ऐसे ही दयालू है हमारे ईश्वर जिनकी  दया की  कोई सीमा नहीं है और क्षमावान  हैं।  इसलिए उन पर भरोसा रखें , सकारात्मक रहें। 

प. श्री राम शर्मा आचार्य जी कहते है – ” ईश्वर का वास किसी मंदिर मे नहीं आपकी  श्रद्धा और विश्वास मे है ” और गुरुदेव  की कही बात और दिखाया मार्ग कभी गलत नहीं हो सकता। 


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