Life can be difficult with bad health. Learn how to stay healthy today

धर्म का मूल तत्व क्या है ?

धर्म के सम्बन्ध में कल वाले introductory लेख में हमने लिखा था कि हमारे सहकर्मी बहुत ही सूझवान, शिक्षित एवं अनुभवी हैं और हम सब इक्क्ठे होकर इन लेखों को समझने का प्रयास करेंगें। हमने यह भी लिखा था कि जो बात लेखों में नहीं लिखी जा सकती है, कमैंट्स के द्वारा communicate हो जाती है और कमैंट्स के सदृढ़ माध्यम को और गंभीरता से लेने के लिए करबद्ध निवेदन भी किया था। इसी रिस्पांस में हमारी परम आदरणीय रेणु श्रीवास्तव जी ने धर्म की परिभाषा देते हुए बताया है कि Religion is only faith behind supreme power, विज्ञान चाहे जितना भी advanced हाे पर अन्तिम सत्य ईश्वर को मानना पड़ता है। आशा करते हैं आपने यह कमेंट अवश्य देखा होगा, अगर मिस हो गया है तो फिर से देखा जा सकता है, इस कमेंट में बहुत सी अच्छी बातें हैं। 

इन्ही शब्दों के साथ आरम्भ करते हैं गुरुदेव की दिव्य पुस्तिका “धर्म की सदृढ़ धारणा” पर आधारित श्रंखला का प्रथम लेख जिसे आदरणीय संध्या कुमार जी की लेखनी सुशोभित कर रही है। हमने अपने अल्प ज्ञान से यत्र-तत्र संशोधन कर इस लेख को रोचक बनाने का प्रयास किया है। 

***************

गायत्री मंत्र का अट्ठारहवां अक्षर “यो” धर्म मार्ग पर स्थिर रहने का आदेश देता है। उसका सार है “जो धर्म संसार का आधार है,उस मार्ग पर आचरण करो, उसकी विडम्बना मत करो, धर्म ही मनुष्य का सहायक है।”

परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं : धर्म आधार है और समस्त विश्व का भार इसी आधार पर रखा हुआ है। यदि धर्माचरण उठ जाये तो सबको अपने प्राण बचाने एवं दूसरों को कुचलने की चिंता में निश-दिन डूबा रहना पड़ेगा और कोई भी चैन से बैठा नहीं रह सकेगा। धर्म आधार है इसीलिए दुष्ट और बुरे लोग धर्म की आड़ लेकर ठगी का जाल फैलाने, अपना लाभ लेने का भरसक प्रयास करते रहते हैं। दान पुण्य, धार्मिक कर्मकांड, पूजा पाठ आदि तो धर्म का एक साधन मात्र हैं। वास्तविक धर्म तो कर्तव्य पालन, दूसरों की सेवा, परोपकार, सच्चाई, और संयम में है। जो इन बातों को अपने विचार और कार्य में स्थान देता है, वही धर्मात्मा कहलाने योग्य है। इन सद्गुणों को अपने रक्त में घुला लेना, रोम-रोम में भर लेना और प्रत्येक कार्य इन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए करना ही वास्तविक धर्म पालन होता है न कि आडम्बरों, कर्मकांडों को करना धर्म पालन होगा। 

धर्म का मूल तत्व क्या है ?

परम पूज्य गुरुदेव बताते हैं कि जब सृष्टि का निर्माण हुआ और जीवों में चेतना शक्ति उत्पन्न हुई और वोह कर्तव्य-अकर्तव्य के संबंध में सोचने लगे। इस सोच ने उनके समक्ष एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया। यह प्रश्न था, धर्म और अधर्म का प्रश्न। उस समय भाषा, लिपि या धर्म पुस्तक आदि का सर्वथा अभाव था,कोई धर्मगुरु नहीं थे। ऐसी दशा में अपने अंदर से पथ प्रदर्शन करने वाली जो आध्यात्मिक प्रेरणा जागृत होती थी मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते थे। 

इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म का पुरातन,आदि स्त्रोत मनुष्यों द्वारा निर्मित नहीं है वरन सृष्टि के साथ ही अंतरात्मा द्वारा ईश्वर ने उसे मानवजाति के निमित्त भेजा था। वेद की भाषा या शब्द रचना, ईश्वर द्वारा निर्मित है, यह मान्यता ठीक नहीं है। वास्तविकता यह है कि प्रबुद्ध आत्माओं वाले ऋषियों के अन्तःकरण में ईश्वरीय संदेश आये और उन्होंने उन संदेशों को मंत्रों की तरह रच दिया। प्रायः सभी धर्मों की मान्यता यही है कि उनका धर्म अनादि है,पैगंबरो और अवतारों ने उसका पुनरुद्धार मात्र किया है। अनादि का अर्थ होता है “जिसका कोई आदि न हो, यानि जो पुरातन हो, कई दिनों से हो। 

परम पूज्य गुरुदेव आगे कहते हैं कि धर्म का मूल तत्व सत है। वही धर्म सच्चे ठहर सकते हैं जो सत् पर अवलंबित हैं। असत् तो अस्थायी है, शीघ्र नष्ट हो जाता है। एक ही अनादि सत्य का आश्रय लेकर सारे धर्म सम्प्रदाय उत्पन्न हुए हैं। यह आदि सत्य हमारी अंतरात्मा में ईश्वर द्वारा भली प्रकार पिरो दिया गया है। न्याय बुद्धि का आश्रय लेकर जब हम कर्तव्य- अकर्तव्य का निर्णय करना चाहते हैं तो अन्तरात्मा उसका सही-सही निर्णय कर देती है। विभिन्न सम्प्रदायों के अपने-अपने स्वतंत्र धर्म ग्रंथ हैं। वेद, कुरान, बाइबिल, जिन्दावस्ता( ईरानी ग्रन्थ), धम्मपद( नेपाली ग्रन्थ) आदि अनेक धर्म शास्त्रों में उसी सत् की व्याख्या की गई है। अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार इन महान शास्त्रों ने सत् की व्याख्या की है। फिर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ और अपने कथन की अपूर्णता को स्वीकार करते हुए ‘नेति नेति’ ही कहते रहे । नेति नेति (= न इति न इति) एक संस्कृत वाक्य है जिसका अर्थ है ‘यह नहीं, यह नहीं’ या ‘यही नहीं, वही नहीं’ या ‘अन्त नहीं है, अन्त नहीं है’। ब्रह्म या ईश्वर के संबंध में यह वाक्य उपनिषदों में अनंतता सूचित करने के लिए आया है। उपनिषद् के इस महावाक्य के अनुसार ब्रह्म शब्दों के परे है। सभी, धर्मों में नये सुधारक होते रहे और उन्होंने पुरानी व्याख्या को दोष पूर्ण बता कर, अपनी रुचि के अनुसार सुधार किये। इन सुधारकों का कथन था कि उन्हें ईश्वर ने ऐसे ही सुधार करने के निमित्त भेजा है। इन सुधारकों में भी सुधार करने वाले होते आये है और वे सब भी धर्माचार्य ही थे। सत्य एक है तो भी उसका प्रयोग करने को विधियाँ बदलती रहती हैं । शरीर को ऋतु प्रभावों से रक्षा करनी चाहिए, यह एक सच्चाई है पर इसका व्यवहारिक रूप समय-समय पर बदलता रहता है। जाड़े के दिनों में जिन कपड़ों की आवश्यकता पड़ती है गर्मी के दिनों में उनका कोई उपयोग नहीं है । इसलिये पोशाक में परिवर्तन करना जरूरी है। यह दोष लगाना उचित न होगा कि पैगम्बरों ने अपनी बात को ईश्वर की वाणी क्यों कहा? यदि उनके संदेश ही ईश्वर की वाणी थे तो अनेक धर्मों के पैगम्बर मतभेद क्यों रखते है? इन में से एक को सच्चा माना जाय तो बाकी सब झूठे ठहरते है। तथ्य बात यह है कि सभी पैगम्बरों की वाणी में ईश्वरीय संदेश था । उन्होंने जो कुछ कहा अन्तरात्मा की पुकार के आधार पर, ईश्वर की आकाशवाणी के संकेत पर कहा । समयानुसार प्रथायें बदलती हैं जैसे कि ऋतुओं के अनुसार पोशाक बदलती है। एक व्यक्ति दिसम्बर के महीने में यह शिक्षा देता है कि ऊनी कोट और स्वेटर पहनो तो उसकी शिक्षा सत्य से परिपूर्ण है किन्तु यदि दूसरा व्यक्ति जून के महीने में यह कहता है कि अब ऊनी कोट की य रुई के लिहाफ की कोई जरूरत नहीं है बल्कि पतले कपड़े पहनने चाहिए तो वह भी झूठा नहीं है। 

कई बार साम्प्रदायिक और सामाजिक रीति रिवाजों और मान्यताओं के सम्बन्ध में हमारे सामने बड़ी पेचीदा गुत्थी उपस्थित हो सकती है । विभिन्न धर्मों के पूज्यनीय अवतार और धर्मग्रंथ एक दूसरे से विपरीत उपदेश देते हैं। ऐसी दशा में बड़ा मतिभ्रम होता है कि किसे मानें और किसे न मानें । गुरुदेव इस गुत्थी को सुलझाने के लिये कहते हैं कि आपको यह बात हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि अवतारों का आगमन और धर्मग्रंथों का निर्माण समय की आवश्यकता को पूरी करने के लिये होता रहा है । कोई पुराने नियम जब समय से पीछे के हो जाने के कारण अनुपयोगी हो जाते हैं, तो उनमें सुधार करने के लिये नये-नये सुधारक, नये अवतार प्रकट होते है । देशकाल और व्यक्तियों की विभिन्नता के कारण उनके उपदेश भी अलग-अलग होते हैं। देश, काल और पात्र के अनुसार वेद एक से चार हुए, कुरान में संशोधन हुआ, बाइबिल तो अनेक अवतारों की उक्तियों का संग्रह है । जब वैदिक ब्रह्म उपासना आवश्यकता से अधिक बढ़ी तो भौतिकवादी वाम मार्ग की आवश्यकता हई । जब वाम मार्गी हिंसा की अति हई तो भगवान बुद्ध ने अहिंसा का मार्ग चलाया । जब अहिंसा का रोड़ा मानव जीवन के मार्ग में बाधा देने लगा तो शंकराचार्य ने उसका खण्डन करके वेदान्त का प्रतिपादन किया। इसी प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक और सामाजिक अन्तर होते रहते हैं । साम्प्रदायिक नियम और व्यवस्थाओं का अस्तित्व समयानुसार परिवर्तन की धुरी पर धूम रहा है । देश, काल और पात्र के भेद से इनमें परिवर्तन होता है और होना भी चाहिए । एक नियम एक समय के लिये उत्तम है तो वही नियम आने वाले समय में हानिप्रद हो सकता है । गर्मी की रातों में लोग नंगे बदन सोते हैं पर वही नियम सर्दी की रातों में लागू किया जायगा तो उसका बड़ा घातक प्रभाव होगा।

संसार के अनेक धर्मों के आदेशों को सामने रखें, उनके सिद्धान्त और आदेशों पर दृष्टिपात करें तो वे बहुत बातों में वह एक दूसरे से विपरीत जाते हुए प्रतीत होते हैं,उनमें विरोधाभास भी दिखाई देता है परंतु वास्तव में भ्रम में पड़ने की कोई बात नहीं है । इस बात को हम आगे दी गयी इस कहानी से समझ सकते हैं। 

एक बार अंधों ने एक हाथी को छू कर देखा और वे उसका वर्णन करने लगे। जिसने पैर छुआ था उसने हाथी को खम्भा जैसा, जिसने पूंछ छुई थी उसने बाँस जैसा, जिसने कान छुआ था उसने पंखे जैसा, जिसने पेट छुआ था उसने चबूतरे जैसा बताया । वास्तव में वे सभी सत्य वक्ता हैं क्योंकि अपने ज्ञान के अनुसार सभी ठीक कह रहे हैं। उनका कहना उनकी परिस्थिति के अनुसार ठीक ही है। परन्तु उसे पूरा नहीं माना जा सकता । देश, काल और पात्र की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अवतारी आत्माओं ने विभिन्न समयों पर विभिन्न धर्मों का उपदेश दिया है । इस बात को भगवान महावीर के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। 

भगवान महावीर को एक मांस खाने वाला आदिवासी मिला । उन्होंने उसे मांस भोजन त्याग देने के लिये बहुत समझाया पर कुछ भी असर न हआ। तब उन्होंने सोचा कि इसकी मनोभमि इतनी निर्मल नहीं है जो अपने चिरकाल के संस्कारों को एक दम त्याग दे । इसलिये उन्होंने धीरे-धीरे आगे बढ़ने का उपदेश देना उचित समझा । सोच विचार के बाद भगवान महावीर ने उस आदिवासी से कहा-अच्छा भाई, कौए का मांस खाना तो छोड़ दोगे यह भी बड़ा धर्म है? आदिवासी इसके लिये तैयार हो गया क्योंकि कोए का मांस खाने का उसे अवसर ही नहीं आता था । 

जब त्याग का संकल्प कर लिया तो उसके मन में धर्म भावना जाग्रत हुई और धीरे-धीरे अन्य त्यागों को अपनाता हुआ कुछ दिन बाद बड़ा भारी धर्मात्मा, अहिंसा का पुजारी और महावीर का प्रधान शिष्य बन गया । 

To be continued:

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण के साथ यह ज्ञानप्रसाद आपको ऊर्जा प्रदान करे और आप सारा दिन सुखमय रहें । हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

**************************

24 आहुति संकल्प 

11 अप्रैल 2022 की प्रस्तुति के अमृतपान उपरांत 4 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1)अरुण वर्मा -33 , (2 ) संध्या कुमार -26, (3) प्रेरणा कुमारी -24 ,(4) सरविन्द कुमार -25,(5 ) विदुषी बंता -25 

अरुण वर्मा जी आज फिर गोल्ड मेडल विजेता हैं जो हम सबकी बधाई के पात्र हैं। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s



%d bloggers like this: