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क्या स्वर्ग इस धरती पर ही था ? -पार्ट 8

आज के ज्ञानप्रसाद में  2020 का  एक वीडियो लिंक दे रहे हैं जिसमें आप तपोवन,गोमुख का वातावरण तो देखेंगें ही लेकिन संत सुभद्रा माता जी की कुटिया भी देखेंगें  जिसमें उन्होंने 9 वर्ष तक लगातार घोर  साधना की। 2021 में 90 वर्ष की आयु में  सुभद्रा माता जी तो ब्रह्मलीन हो गयीं लेकिन शैलन्द्र सक्सेना द्वारा लिखित माताजी की  दिव्य पुस्तक ‘समुद्र से हिमशिखर तक ’  उनको सदैव जीवित रखेगी। उडुपी कर्नाटक(समुद्र) में जन्मी माता जी -तपोवनी माताजी- को हमारा नमन वंदन।

हम सभी जानते हैं कि परमपूज्य गुरुदेव ने  दादागुरु के निर्देश और मार्गदर्शन में हिमालय यात्रायें सम्पन्न करी थीं। आजकल  जिन लेखों का हम अमृतपान कर रहे हैं यह दिसंबर 1960 और जनवरी 1961 की  अखंड ज्योति में परमपूज्य गुरुदेव के करकमलों से प्रकाशित हुए थे। मूल कंटेंट को यथावत रखते हुए, लेखों को  रोचक एवं  ज्ञानवर्धक बनाने और वर्तमान के साथ जोड़ने  के उदेश्य से हम कई प्रकार की वीडियो क्लिप्स, फोटोज़ और घटनाएं include किये जा रहे हैं। लगभग 60 वर्ष पूर्व इस हिमालय क्षेत्र -धरती के स्वर्ग क्षेत्र में आवागमन के क्या साधन थे वह तो गुरुदेव बता ही रहे हैं लेकिन उसके बाद के वर्षों में क्या कुछ प्रगति हुई, कैसे यह यात्रायें सुगम हुईं, हम वर्तमान  की वीडियोस में देख रहे हैं। प्रगति के नाम पर मानव ने प्रकृति के साथ क्या-क्या  खिलवाड़ किये – यह स्वर्गीय  ग्लेशियर, यह स्वर्गीय  हिमशिखर कौन-कौन  से घाव अपने सीने में लिए हुए हैं हम सब जानते हैं। 2018  में  देवप्रयाग की दिव्य यात्रा में हमने स्वयं देखा था कि विकास के  नाम पर प्राकृतिक सम्पदा का किस प्रकार सर्वनाश किया जा रहा है। हमारी कार निर्माणाधीन हाईवे पर च्यूंटी की स्पीड से , धूल भरे  वातावरण में तो रेंग ही रही थी लेकिन दाएं बाएं पर्वतों और उन पर अमूल्य जड़ी बूटियां और वृक्षों की कटाई देखकर ह्रदय कांप सा उठा था। इसी स्थिति  पर एक मार्मिक लेख तैयार कर रहे  हैं- इन लेखों के अंत में प्रकाशित करने की योजना है।

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परमपूज्य गुरुदेव इन लेखों में क्षेत्र की जानकारी को प्राथमिकता दे रहे हैं और व्यक्तिगत अनुभवों को अपनी अन्य रचनाओं -हमारी वसीयत और विरासत, सुनसान के सहचर, चेतना की शिखर यात्रा आदि-  के लिए सुरक्षित रख रहे हैं।

हिमालय के जिस क्षेत्र में हम आज विचरण कर रहे हैं वहां नीचे  की भूमि से सुमेरु  के दर्शन नहीं  हो  सकते हैं। किसी  शिखर से दर्शन तो  हो सकते हैं  पर इतना  ऊपर चढ़ सकना सम्भव नहीं। चिकनी  बर्फ और सीधी  चढ़ाई होने के कारण बिना विशेष उपकरणों  की सहायता के यहाँ के किसी शिखर की चोटी पर  केवल पैरों के बलबूते चढ़ना बहुत ही कठिन प्रतीत होता है । इसलिए सुमेरु के दर्शन के लिए अभी  गंगा  ग्लेशियर से  ही आगे बढ़ना होता है  और ‘गहन हिमिधारा’ से  ‘वरुण वन ‘ तक पहुँचना पड़ता है । यहाँ से सुमेरु के दर्शन भली प्रकार होते हैं। वरुण वन  में भी मिट्टी है, वहाँ रिसाव  होने के कारण पानी में  नमी  रहती है।  नन्दनवन जैसी  वनस्पतियां  भी यहाँ है। इससे आगे का मार्ग जाने  योग्य नहीं है । चौखम्बा  शिखर जिन पर पांडवों  ने स्वर्गारोहण किया था  यहाँ से दिखाई देते है। बस, दर्शनों  का लोभ अब  यहीं छोड़ना पड़ता है। इससे आगे का मार्ग अवरुद्ध है। यहाँ से ऊँचाई के साथ-साथ मार्ग की  दुर्गमता  भी अकथनीय होती  है। इसलिए धरती  का स्वर्ग देखने की आकांक्षा  वालों  को इतने से ही सन्तोष करके वापिस लौटना पड़ता है। 

अग्निपुराण  के अनुसार शिवजी ने ताण्डव नृत्य यहीं  किया था।  जब यह दुनिया पापों के भार से डूब रही थी और प्राणियों के लिए  इस धरती पर   शान्तिपूर्वक रहना कठिन हो गया था तो उन्होंने अपना डमरू और त्रिशुल  उठा कर थिरकना आरम्भ कर दिया था। उस तांडव  नृत्य से प्रलय उत्पन्न हो गई, प्रचण्ड अग्नि  ज्वालाएँ दशों  दिशाओं में उठने लगीं। वह सब उपलब्धियां जिन पर यह  पापी मानव इतराता फिरता था देखते  ही देखते क्षणभर मे नष्ट हो गयीं । 

पुरातत्व वेताओं  ने मानव जाति की  उत्पति मेरु पर्वत पर मानी है। ऑदम-हव्या ( Adam and Eve) का स्वर्ग  से पृथ्वी पर आना  भी इसी स्थान पर कहा जाता  है। मारकण्डेय ऋषि  को बालक  के रूप में दर्शन होने की घटना भी इसी स्थान से सम्बन्धित बनाई जाती है। इन सब विशेषताओं के कारण प्राचीनता के  प्रति प्रेम रखने वाले किसी भावुक हृदय व्यक्ति के लिए ऐसा स्थान एक प्रकार की विशेष भावनाओं का उद्रेक करने वाला बन सकता है। गुरुदेव कहते हैं: अपने लिए भी इस भूमि के कण -कण मे से अतीत की अनेकों  महत्वपूर्ण  घटनाएँ अपने सत्स्वरूप  को प्रकट करती हुई अन्तःकरण को भावनाओं से ओत-प्रोत-कर रही हैं। 

पुराणों मे पढ़ा  था कि सिद्ध योगी, सद्गुरु अभी भी हैं; परन्तु  कलियुग के प्रभाव से हिमालय के किसी गुप्त  स्थान पर अदृश्य रूप में  रहते हैं। गुरुगीता में ऐसे सद्गुरुओं  का वर्णन आता है जो साधक के ज्ञान-चक्षु को खोल कर उसका अज्ञान एवं अन्धकार  दूर कर देते है। ये गुरु स्वयं त्रिमूर्ति और परब्रह्म  स्वरूप हैं। इन सद्गुरुओं का अजर-अमर  ऋषि महर्षियों से ही तात्पर्य है जो अब युगप्रभाव से दिखाई नहीं  दे पड़ते । लिंग पुराण के सांतवें अध्याय में इन सद्गुरुओं का वर्णन है और उनका निवास हिमालय  के सुमेरु पर्वत पर ही बताया  गया है। श्रीमद्भागवत  के 12वें  स्कन्ध के  दूसरे अध्याय के 37वें  श्लोक में इन सिद्ध पुरुषों  का निवास स्थान कलाप ग्राम में बताया गया है। इस ग्राम को बहुत ही सुन्दर चित्रों से सजाकर कुछ समय पूर्व हमने  एक लेख लिखा था जो हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध है। 10वें स्कन्ध के अध्याय 57 के  श्लोक 5 ,6 और 7  में भी ऐसा वर्णन है और महाभारत में भी कलाप ग्राम  में सिद्ध पुरुषों के निवास  का वर्णन है। 

यह सिद्ध भूमि यही है। उन अदृश्य आत्माओं  के दर्शन चर्मचक्षुओँ   से कर सकना तो किन्हीं विरलों  का ही सौभाग्य हो सकता है पर इस पुण्य प्रदेश मे ऐसा अनुभव अवश्य होता है कि जिस क्षेत्र में प्राचीनकाल में इतनी उच्च  आत्माएँ वास्  करती  रही हैं वह आज भी उस पूर्वकालीन प्रभाव से अछूती नहीं है और इनका प्रभाव कभी -कभी, किसी-किसी को हो ही जाता है। अश्रद्धालु और अविश्वासी अपनी  आस्तिकता की निष्ठा को साबित करने  के लिए बहुत प्रकार के  अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।  श्रद्धा, शांति,वैराग्य और विवेक की भावनाएं स्वयं  ही अंतःकरण में उठने लगती हैं और ऐसा अनुभव होता है मानो यहाँ बिखरी हुई कोई अदृश्य दिव्य  शक्तियां इन भावनाओं को अपनी करुणा,दया और प्रगति का विश्वास दिलाने के लिए प्रसाद के रूप में मिलती  रहती हैं। 

गुरुदेव बताते हैं कि धरती के स्वर्ग प्रदेश का यह एक छोटा सा भाग है। मुख्य केंद्र स्थान- सुमेरु- के केवल दर्शन ही  किये गए लेकिन जितने क्षेत्र में प्रवेश किया गया, जो कुछ देखा गया वह भी अपनी तुच्छता और साधनहीनता को  देखते हुए कम सौभाग्य की बात नहीं है। दुसरे लोगों को यहाँ पहुँचने पर कैसा अनुभव होता होगा कह सकना कठिन है पर अपने को पूरी अनुभूति के साथ देवभूमि का अनुभव हुआ। हमें ऐसा अनुभव हुआ कि यहाँ की प्रत्येक वस्तु अपने अंदर देवत्व को धारण किये हुए है और इनमें से  आत्म सन्देश देने वाली दिव्य किरणें प्रचंड वेग से उद्भूत हो रही हैं।

इस शिखर में फैले हुए शिखरों की ऊंचाई और गहनता का अनुमान लगाने के लिए कि कौन सा स्थान  कितना ऊँचा है, यह जानने से स्थिति का सही अनुमान लगाने में सुगमता हो सकती है। तो आइये देखें यह दिव्य स्थान समुद्रतल से कितनी ऊंचाई पर हैं। 

ऋषिकेश-2000 फुट, गंगोत्री-10000 फुट, गोमुख-12770 फुट, नंदनवन-14230 फुट ,भगीरथ पर्वत-22495 फुट, मेरु पर्वत-21850 फुट, सतोपथ शिखर- 23213 फुट ,केदारनाथ शिखर-22770 फुट, सुमेरु-20700 फुट, स्वर्गारोहण शिखर-23880,चंद्र पर्वत-22073 फुट, नीलकंठ पर्वत-21940 फुट। इतने ऊँचे पर्वतों और शिखरों पर पहुंच सकना अत्यंत उच्कोटि  के साधनों से सम्पन्न लाखों  रुपया खर्च करने वाले पर्वतारोही दलों का ही काम है। केवल  शारीरिक बल और पूरे   साधन सामग्री के आधार   पर ही वरुण वन तक पहुँच पाना  संभव है। यहाँ पहुंचने से धरती के स्वर्ग  के प्रायः समी प्रमुख दिव्य  स्थानों के दर्शन हो सकते हैं। 

आइये ज़रा पर्वतारोहियों का एक उदाहरण देखें :

एवरेस्ट  शिखर पर चढ़ने के लिए भारत सरकार की सहायता से 13 व्यक्तियों का एक दल  गया था  जिसे 18  टन (लगभग 16000 किलोग्राम ) आवश्यक उपकरण  अपने साथ ले जाने पड़े और इस सामान  को ढोने के लिए  650 कुली तथा  मार्ग बनाने के लिये 52  शेरपा साथ  गये थे। लाखों रूपया खर्च हुआ था। अन्य पर्वतरोही दलों  को भी ऐसी ही व्यवस्था करनी  पड़ती है। केदार  शिखर पर स्विट्ज़रलैंड और हंगरी के  दल चढ़ाई कर भी चुके हैं। इन शिखरों पर पहुंच सकना निसंदेह कठिन है पर जितना  अपनी इस यात्रा में पहुँच सकना संभव हुआ वह भी भावना से जाने वाले व्यक्ति के लिए कम संतोषजनक  नहीं है।  

इस पुण्य प्रदेश में पहुंचने पर किसी भौतिक दृष्टिकोण के व्यक्ति का  मन कह  सकता है कि  कुछ- कुछ  प्राकृतिक सौंदर्य दृष्टिगोचर हैं ,परन्तु  जिसके ह्रदय में श्रद्धा है उसके लिए  उस श्रद्धा-भावना को जागृत और विकसित करने के लिए बहुत कुछ है। अंतःकरण के सात्विक तथ्य यहाँ के दिव्य वातावरण में बड़ी तीव्र गति से विकसित होते हैं  और उसे लगता है कि  पृथ्वी के समस्त सतोगुण एकत्रित होकर उसकी अंतरात्मा में प्रवेश कर रहे हैं। 

To be continued : 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प 

26   मार्च 2022 की  प्रस्तुति  के अमृतपान उपरांत 3 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1) सरविन्द कुमार -31 , (2 ) संध्या कुमार -25 , (3)  अरुण वर्मा -25  (4)रेणु श्रीवास्तव-25 

इस सूची के अनुसार सरविन्द जी    गोल्ड मैडल विजेता हैं। उन्हें  हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्

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