आद. रामबाबू माहेश्वरी जी की अनुभूति- Submitted by Anil Mishra

2 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद- आद. रामबाबू माहेश्वरी जी की अनुभूति- Submitted by Anil Mishra

अनिल मिश्रा भाई साहिब का ह्रदय से आभार व्यक्त करते हुए आज के ज्ञानप्रसाद में आदरणीय रामबाबू माहेश्वरी जी की एक अद्भुत अनुभूति प्रस्तुत कर रहे। इस अनुभूति में गायत्री तपोभूमि गोण्डा का रिफरेन्स तो है ,लेकिन गूगल सर्च में कुछ भी प्राप्त न हो सका। अनिल जी से भी वीडियो कॉल करके कुछ शंकाएं clear करने का प्रयास किया था। 

प्रेमशीला बहिन जी और निशा भारद्वाज जी की अनुभूतियाँ, राजकुमार वैष्णव जी का लिंक, रजत जी की कवितायेँ, प्रेरणा बिटिया की ऑडियो बुक, ज्योति जी की बेटी की कलाकृति और न जाने क्या-क्या कुछ line up हुआ पड़ा है, समय आने पर सब प्रतिभाएं अपने परिवार के समक्ष रखने का प्रयास करेंगें। आपसे निवेदन करते हैं कि अब between the lines पढ़ने वाली स्थिति आ रही है, ऐसा न हो कि कोई महत्वपूर्ण कंटेंट मिस हो जाए। 

कल वाला ज्ञानप्रसाद गुरुभक्ति का एक उच्स्तरीय उदाहरण होगा। 

तो इन्ही opening lines के साथ करते हैं आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान। 

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बात गायत्री तपोभूमि, मथुरा की चल रही है, तो पाठकों की दृष्टिगत हो जाये कि उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले में भी तपोभूमि बनाने की चर्चा व मानसिक मान्यता बनी थी, भले ही वह मथुरा की तरह दृढ़ संकल्पित रुप न ले सकी। 

उन दिनों गुरुदेव लखनऊ से सटे गोण्डा जिले में अक्सर आया जाया करते थे। गायत्री मंत्र जप के लाभ की चर्चा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक गोष्ठियों के माध्यम से की जाती थी। चूँकि गोण्डा के वन्य क्षेत्रों में आज भी उसी तरह अनेकों संत-महात्माओं के स्थान हैं, शायद इसी कारण इसे गायत्री तपोभूमि गोण्डा नाम दिया गया होगा य गुरुदेव अक्सर यहाँ आया-जाया करते थे, यहभी एक कारण हो सकता है। 

गुरुदेव जब भी यहाँ आते उनका ठहरना प्रायः रामबाबू माहेश्वरी के घर ही हुआ करता था। माहेश्वरी बाबू अत्यन्त ही निष्ठावान गायत्री साधक थे। प्रतिदिन सुबह चार बजे ही उठ जाते, नहा-धोकर अत्यंत तल्लीनता से बड़े ही ही प्रबल वेग से डेढ़ दो घंटे गायत्री मंत्र-जप अवश्य करते थे। 

अनिल जी लिखते हैं: ऐसा करते हमने अपनी आँखों से देखा है। 1998 में माहेश्वरी जी बोले, “युगपरिवर्तन के लिएअब समय ही कहाँ बचा है, 2000 ईस्वी तक का ही समय तो है। अत: जो कुछ करना है जल्दी कर लो, नहीं तो गुरुदेव दूर चले जायेंगे” 

प्रस्तुत हैं आदरणीय रामबाबू माहेश्वरी जी के मुखारविन्द से सुनायी गई अनुभूति :

उस समय हमारी आयु कोई 18 वर्ष होगी, दीपावली की रात्रि थी,करीब सात-आठ बजे होंगें, दिया वगैरह जला देने के बाद हम थोड़ा टहलने निकले। घूमते-घामते देखा कि एक जगह पर दस-बीस लोग भूमि पर बैठकर गुरुदेव को सुन रहे हैं। हम भी गुरुदेव का प्रवचन सुनने के लिए बैठ गए। गुरूदेव बताये जा रहे थे कि गायत्री मंत्र को जपने से क्या-क्या लाभ मिलते हैं। हमने बैठकर सारी बातें बड़े ही ध्यानपूर्वक सुनी। प्रवचन के अंत में सब लोग गुरुदेव को अपना नाम एवं क्या करते हैं आदि परिचय देकर प्रणाम करने लगे। हमने भी अपना परिचय दिया और बताया कि हम हाई स्कूल में पढ़ते हैं । गुरुदेव ने प्रसाद के रूप में गायत्री चालीसा दी। हमने उसी दिन से गायत्री मंत्र का नियमित जप क्रिया शुरू कर दिया। हाई स्कूल पास हो गया, जब भी समय मिलता मिशन के कार्यक्रमों में भी भाग लेते रहे । 

नौ कुंडीय यज्ञ का आयोजन:

गायत्री के प्रचार-प्रसार के लिए हमने एक बार गुरुदेव के साथ गोरखपुर के पथिक जी नामक एक सन्त जी को भी बुला लिया। चूँकि सन्यासी पथिक जी के कुछ लेख गीताप्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका कल्याण में छपते थे, तो हम सभी उनको भी गायत्री के पक्षधर के रूप में मानने लगे थे। निश्चित तिथि पर आने का निमंत्रण भेजा। हम सभी ने खूब धूमधाम से नौ-कुण्डीय यज्ञ आयोजन की तैयारी भी कर ली और तय किया गया कि गुरुदेव और पथिक जी, दोनों संतों को एक ही जगह पर ठहराया जाय। सारी व्यवस्थाएँ पूरी कर ली गई और तय हुआ कि पथिक जी की ट्रेन गोरखपुर से आती है इसलिए पहले पथिक जी को उतार लिया जाए और उसके बाद लखनऊ से आने वाली ट्रेन से गुरुदेव को उतार लेंगे। हम सभी ने गुरुदेव के लिए खूब धूमधाम से तैयारी की थी कि जब गुरुदेव ट्रेन से उतरें तो उनके पांव जमीन पर नहीं पड़ने देंगे। इसके लिए हमने दो-थान रंगीन कपड़ो़ंं की व्यवस्था कर रखी थी। फूल-मालाओं को लेकर 40-50 लोग इक्ट्ठे हो गये थे। हमने सोच रखा था कि गुरुदेव का स्वागत खूब ज़ोरदार ढंग से करेंगें, उन्हें जयकारा लगाते हुए ले जायेंगे। 

परन्तु गोरखपुर से आनेवाली ट्रेन लेट हो गई और दोनों ट्रेन का क्रासिंग एक ही स्टेशन गोण्डा में करा दिया गया। ट्रेन कम्पार्टमेंट के मुख्य द्वार पर हम सभी को गुरुदेव हाथ जोड़े खड़े दिख गये तो हम सभी स्वागत में उसी दिशा में फूलमाला लेकर दौड़ पड़े। ऐसा करने से हुआ यह कि हमारा ध्यान लखनऊ से आनेवाली ट्रेन की ओर ही लगा रहा और गोरखपुर से आने वाली ट्रेन से उतरने वाले सन्यासी संत पथिक जी की ओर ध्यान ही नहीं गया।जब गुरुदेव को धूमधाम से आवास तक पहुँचा दिया गया, तब जाकर यह याद आया कि पथिक जी को तो हम लाना ही भूल गये। अब क्या होगा ? उनकी ट्रेन तो कब की जा चुकी होगी, उनको कहाँ खोजा जाये ! कार्यक्रम में उनका भी नाम छपा है,उनका भी वक्तव्य होना है, अब क्या करें? तब मस्तिष्क में आया कि उनके एक शिष्य वकील साहब हैं, जो रेलवे क्रासिंग के पास रहते हैं, क्यों न वहां देखा जाये। वकील साहब के घर पहुंच कर देखा कि पथिक जी उनके पास बैठे हैं तो मन को थोडी़ शांति मिली । हम सभी अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगने लगे परन्तु क्रोधवश वह मान ही नहीं रहे थे और चलने के लिए टस से मस नहीं हुए। शिष्य वकील साहब से हम अपनी हुई भूल बताकर पश्चाताप करते हुए अनुनय-विनय करते रहे। अंत में वकील साहब ने जब कहा कि उत्साह में गलती हो गई है, ये आपका ही स्वागत करना चाहते थे परन्तु ट्रेन की क्रासिंग होने से दोनों ट्रेन एक ही समय पर स्टेशन पर खड़ी हुई इसलिए ऐसा हो गया। आप इनको क्षमा कर दीजिए, तब जाकर पथिक जी चलने को राज़ी हुए। परन्तु बात इतनी ही नहीं थी, उन्होने देखा था कि एक गृहस्थ का इतना सम्मान हो रहा है और मेरे लिए कोई भी नहीं आया। यह देख उनका मन आक्रोश से भर उठा था। राजी हो जाने पर हम सभी ने सन्यासी पथिक जी को भी वहीं बगल के कमरे में ठहरा दिया जहाँ गुरुदेव को ठहराया था। 

गायत्री परिवार की प्रथा के अनुसार कलश यात्रा बड़े ही धूमधाम से निकाली गयी। सम्पूर्ण वातावरण में उत्सव जैसा वातावरण छाया हुआ था। परम पूज्य गुरुदेव और सन्यासी पथिक, दोनों महान आत्माओं को संध्याकालीन प्रवचन के लिए अलग-अलग कुर्सियों पर बैठाया गया था। जब प्रवचन का समय आया तो, वरिष्ठ सन्यासी पथिक जी को सर्वप्रथम बोलने को कहा गया कि गायत्री उपासना के बारे में बोलें। पथिक जी ने प्रवचन देना सहर्ष स्वीकार करते अपनी बात आरम्भ की, लेकिन यह क्या, वह तो गायत्री उपासना के बिल्कुल विपरीत बोलते रहे व कहते रहे कि गायत्री मंत्र जपने का अधिकार सभी को नहीं है। महिलाओं और शूद्रों के लिए गायत्री नहीं है आदि आदि बातें कहते रहे। परम पूज्य गुरुदेव पथिक जी की बातें सुनकर बहुत ही खिन्न हुए और उन्होने मंच पर से ही इशारा करके हमें अपने पास बुलाया। पास आने पर गुरुदेव ने पूछा, इनको किसने निमंत्रण दिया था। हमने कहा: गुरुदेव, कल्याण मासिक पत्रिका में इनके लेख पढ़-पढ़ कर हमारे मन में बुलाने की इच्छा हुई थी। यह गायत्री का बहुत बखान भी करते थे,परन्तु आज तो बिल्कुल ही विपरीत बोले जा रहे हैं। गुरुदेव ने निर्देश दिया कि आज के बाद इस मंच से केवल युगनिर्माणी कार्यकर्ता को ही बोलने का अधिकार होगा, किसी अन्य को मत बुलाना। हमें अपनी भूल का अहसास हुआ। अब गुरुदेव के बोलने का अवसर आया। गुरुदेव धीरे-धीरे एक-एक करके बताते हैं कि गायत्री मंत्र क्या है और इस मन्त्र का जप करने के क्या प्रभाव हैं। परम पूज्य गुरुदेव ने गायत्री की फलश्रुतियों का ऐसा सकारात्मक और विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया कि सारा वातावरण बिल्कुल गायत्री के पक्ष में खड़ा हो गया। सभी गुरुदेव की जय-जयकार करते गायत्री के लाभ का स्मरण करते हुए अपने अपने घरों को विदा हुए। 

प्रवचन की समाप्ति के उपरांत :

प्रवचन की समाप्ति के उपरांत गुरुदेव ने हमें अपने कक्ष में बुलाया और कहा कि तुम पथिक जी से मिलकर पूछो कि आचार्य जी आपसे मिलने के लिए समय चाहते हैं, वह जो समय दें मुझे बता देना। हमने पथिक जी से पुछा तो उन्होंने कहा कि कल प्रातः का समय उचित रहेगा, हमने गुरुदेव को बता दिया। गुरुदेव ने हमें पूछा कि आपके पास मेरे लिखे हुए आर्ष वाङ्गमय के कौन-कौन से ग्रन्थ हैं ? हमने बताया कि हमारे पास आपके लिखे चारों वेद, उपनिषद्, मनुस्मृतियाँ और पुराणों के कई खण्ड मौजूद हैं। गुरुदेव ने कहा कि जब मैं पथिक जी को मिलने जाऊँ तो यह सारा साहित्य लेकर आना। हमने वैसे ही किया, प्रातः गमछे में भरकर सारा आर्ष साहित्य लेकर हाज़िर हो गए। पथिक जी की अनुमति लेकर हम दोनों ने उनके कक्ष में प्रवेश किया। कक्ष में प्रवेश करते गुरुदेव ने साष्टांग जमीन पर लेटकर सन्यासी-वेशधारी पथिक जी को प्रणाम किया और हमसे बोले- यह सभी साहित्य यहीं रख दो और बाहर चले जाओ। हमारे मन में इन दो महान आत्माओं की वार्ता सुनने की प्रबल इच्छा थी, इसलिए बाहर आकर भी भीतर क्या-क्या बातें हो रहीं हैं, इसी आशा से, हम सुनने के लिए दरवाजे पर कान लगाये बैठे रहे। 

गुरुदेव ने बड़े ही शांत और विनम्र भाव से पूछा: महाराज, कल जो आप मंच से बोल रहे थे कि गायत्री सबके लिए नहीं है,आपने कहाँ पढ़ा है,आपने कहांँ से देखकर बोला है ? हमने आर्ष-वांङ्गमय का अध्ययन किया है और उसका हिन्दी में भाष्य भी लिखा है किन्तु हमें कोई भी वैदिक ऋचा, श्लोक ऐसी नहीं मिली जो गायत्री को सार्वजनीन होने से रोकती हो। आप स्वयं देखिये यह ऋचा और श्लोक जो गायत्री की शक्ति एवं महिमा का बखान करते हैं। परम पूज्य गुरुदेव उच्चारण करते हुए पन्ने पलट-पलटकर पथिक जी को दिखाने लगे। गुरुदेव के मुख से वैदिक मंत्रों एवं ऋचाओं का उच्चारण सुनकर पथिक जी अचंभित हो उठे, उनकी समझ में कुछ नहीं रहा था कि क्या उत्तर दें। 

उन्होने हाथ जोड़कर गुरुदेव से कहा: आचार्य जी! आप तो साक्षात् वेद स्वरूप हैं, आपको मेरा नमन हैं। मुझे तो अक्षरज्ञान भी नहीं है। मंच से मैंने जो कुछ भी कहा था वह अपने गुरु के मुख से ही सुना था। मैंने जैसा सुना वही दोहराया था। हमारा स्वयं का तो कुछ भी अध्ययन नहीं है। ऐसा सुनने के बाद गुरुदेव का स्नेह छलका और उन्होने पथिक जी को समझाया कि वर्तमान समाज की दशा को ऊँचा उठाने में केवल गायत्री शक्ति ही सक्षम है और कोई नहीं। 

इति श्री 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प 

1 मार्च 2022 वाले लेख के स्वाध्याय के उपरांत 3 सहकर्मियों ने संकल्प पूर्ण किया है 

यह सहकर्मी निम्नलिखित हैं :(1)अरुण वर्मा-28 ,(2 )सरविन्द पाल-25 ,(3 )प्रेरणा कुमारी -24;

अरुण वर्मा जी 28 अंक प्राप्त करते हुए गोल्ड मैडल विजेता घोषित किये जाते हैं। अरुण वर्मा जी ने संकल्प ले लिया है कि किसी को भी आगे नहीं निकलने देना है। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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