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स्वाध्याय-सत्संग के लिए प्रेरित होना 

  

आज का ज्ञानप्रसाद आदरणीय संध्या बहिन जी की प्रस्तुति का द्वितीय भाग है। इस भाग में बहुत ही सरल तरीके से स्वाध्याय- सत्संग को समझने ,अपने ह्रदय में उतारने और इसके लाभ की चर्चा की गयी है।

तो आइये चलें आज के ज्ञानप्रसाद को अत्यंत श्रद्धापूर्वक ग्रहण करें। 

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स्वाध्याय के लिए प्रेरणा प्राप्त करें : 

हम सब एकलव्य- द्रोणाचार्य की बहुचर्चित कथा से परिचित हैं। गुरु द्रोणाचर्य ने एकलव्य को न केवल धनुर्विधा सिखाने से इंकार ही किया वरन दुत्कार भी दिया था। इस घटना से नाजुक उम्र के एकलव्य ने सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने मन को प्रबल बनाकर एकाग्रता एवं विवेक के साथ निरंतर अभ्यास द्वारा धनुर्विधा को लक्ष्य बनाया। उसने निपुणता अर्जित कर न केवल धनुर्विद्या सीखी वरन स्वयं को द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य अर्जुन से भी अधिक निपुण बना लिया। ऐसी होती है स्वाध्याय की शक्ति जो निरंतर अभ्यास से व्यक्तित्व को निखारते हुए, लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, चरमोतकर्ष पर पहुंचकर स्वाध्यायी का नाम अजर-अमर कर देती है।

स्वाध्याय का मर्म समझाते हुए आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरांन्द सरस्वती  जी ने कहा है कि स्वाध्याय स्वयं का अध्ययन है। हम अध्ययन द्वारा स्वयं के दुर्गुणों का नाश करते हैं एवं दूसरों के गुणों को ग्रहण करते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं: 

“स्वाध्याय द्वारा अपने दुर्गुणों पर विजय प्राप्त कर सद्गुणों का विस्तार सम्भव है। दुर्गुणों के नाश एवं सद्गुणों के विकास से मन निर्मल होता है और इससे मनोनीग्रह सम्भव होता है। मनोनिग्रह अर्थात मन के कण्ट्रोल से “आत्मा का परिष्कार” होता है।

इसी परिपेक्ष्य में योग के जनक पतंजलि कहते हैं : स्वाध्याय से “इष्टदेव की प्राप्ति” सम्भव है। 

मुनि व्यास ने भी स्वाध्याय की महत्ता बताते हुए कहा है: स्वाध्याय से “आत्मा परिष्कृत” होती है जिससे परमात्मा से साक्षात्कार सम्भव होता है। 

तो हम देख सकते है कि सभी महान एवं दिव्य आत्माओं ने स्वाध्याय को मनुष्य जीवन के परिष्कार हेतु अत्याधिक प्रभाव शाली बताया है।

स्वाध्याय और सत्संग में घनिष्ठ संबंध:

स्वाध्याय और सत्संग में घनिष्ठ संबंध है। दोनों को एक दूसरे का पर्यायवाची कहना शायद गलत न हो। सदसाहित्य यानि अच्छे साहित्य के सानिध्य में भी सत्संग सम्भव है। यदि हम सदसाहित्य का अध्ययन और पठन-पाठन करते हैं तो यही मानना चाहिये कि हम उससे वार्ता, चर्चा, प्रवचन, उपदेश सुनने की क्रिया कर रहे हैं। अध्ययन के पश्चात् मन मस्तिष्क में चिंतन-मनन आरम्भ हो चलता है। आज हमारे मध्य कई महान व्यक्ति नहीं हैं, किन्तु उनके द्वारा रचित साहित्य हमारे मध्य है जिनका अध्ययन, चिंतन,मनन कर इच्छुक व्यक्ति उनके जीवन चरित्र के बारे मे जानकर अपने चारित्र निर्माण का लाभ उठाते हुए सुधार कर सकते हैं। 

सदसाहित्य के अनेक लाभ हैं। उनमें से एक लाभ यह है कि यदि किसी साहित्य को एक बार पढ़ने से हमें अच्छी तरह समझ नहीं आती तो हम उसे बारम्बार भी पढ़ सकते हैं। दूसरा लाभ यह है कि स्वयं लाभ उठाने के बाद हम इसे अपने मित्र-बंधुओं को भी दे सकते हैं ताकि वह भी लाभांवित हो सकें। परम पूज्य गुरुदेव ने अखंड ज्योति पत्रिका के लिये स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा भी है कि स्वयं पढ़ने के बाद उसे घर में सामान की तरह मत रखिये वरन मित्र बंधुओं को पढ़ने के लिये दे दीजिये। इस तरह अखंड ज्योति पत्रिका की एक प्रति कितने ही व्यक्तियों में “ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल” बन कर जीवन उत्कृष्ट बनाने में सहायक होगी। 

माता पिता का कर्तव्य :

माता पिता का कर्तव्य बनता है कि बच्चों मे स्वाध्याय की आदत डाली जाए और घर का वातावरण पठन-पाठन वाला बनाया जाए। इस हेतु परिवारिक सदस्यों के जन्मदिन, विवाह, वर्षगांठ,या अन्य अवसरों पर सदसाहित्य को  “गिफ्ट” में देने का प्रचलन बढ़ाना चाहिये। ऐसे प्रचलन से साहित्य अध्ययन में रुचि बढ़ेगी और अगर एक बार आदत बन गयी तो अवकाश मिलने पर बच्चे साहित्य के पठन-पाठन में ही समय व्यतीत करेंगें। अभ्यस्त हो जाने पर खेल ही खेल में पढ़ कर जानकारी लेते जायेंगे जो उनके चारित्र निर्माण में मार्ग दर्शक की भांति लाभकारी सिद्ध होगा। कई समझदार माता – पिता इस ओर विशेष ध्यान देते हैं एवं प्रारम्भ से ही बच्चों में अध्ययन के प्रति दिलचस्पी बढ़ाने हेतु प्रयासरत रहते हैं। ऐसे बच्चों में साहित्य के पठन-पाठन की आदत सी हो जाती है और वह कितना कुछ ही पढ़ जाते हैं। ऐसा करने से उनके पास स्वतः ही अच्छी जानकारी का भंडार एकत्रित हो जाता है। एकलव्य का उदाहरण समाज में प्रयोग किया जा सकता है जो अत्यंत लाभकारी हो सकता है। हमारे समाज में निम्न वर्ग के बच्चे थोड़ी सी शिक्षा ग्रहण कर अपना सारा समय यूँ ही बर्वाद करते रहते हैं। उनके माता पिता घर चलाने के लिए दिन भर कड़ी मेहनत करते हैं। बच्चों को मज़बूरी में अभिभावक के बिना समय व्यतीत करना पड़ता है। कई बार बच्चे बुरी संगति में पड़ कर बुरी आदतें भी ग्रहण कर लेते हैं। यदि समर्थ वर्ग इस ओर ध्यान दे तो बहुत कुछ हो सकता है। अगर समर्थ वर्ग का कोई बच्चा किसी प्रतिभा में निपुण हो तो वह निम्न वर्ग के बच्चे को सिखाने का बीड़ा उठा सकता है। ऐसा करने से समयदान जैसा नेक कार्य भी हो जायेगा और थोड़ी सी सिखलाई से निम्न वर्ग के बच्चों के जीवन में एक अद्भुत सुधार दर्शित होता जायेगा। यदि इनमें से कोई एकलव्य की भांति धुन का पक्का हुआ ,संकल्पित हुआ तो अपना एवं सिखाने वाले का नाम अमर कर देगा। हमारा सौभाग्य है कि इस तरह के अनेकों लोग ऐसा पुण्य कार्य कर रहे हैं। इसी संदर्भ में मुंबई निवासी हमारे चाचा जी ने एक बच्चे को जो उनके घर में खाना पकाने ,सफाई वगैरह का कार्य करता था प्रोत्साहित किया ,आज वह ताज होटल न्यूयार्क  में सीनियर मैनेजर है।

सत्संग पारसमणि है :

सत्संग को पारसमणि की संज्ञा दी गयी है। हम सब जानते हैं कि पारसमणि एक अद्भुत पत्थर है जो लोहे को सोना बनाने का गुण रखता है। ठीक उसी तरह सत्संग साधरण व्यक्ति को दिव्य बनाने का सामर्थ्य रखता है। सदसाहित्य की भांति दिव्य एवं महान व्यक्तित्व का सत्संग भी अतिप्रभावशाली होता है । अक्सर ऐसा देखा गया है कि ऐसे दिव्य व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष दर्शनमात्र चुंबकीय प्रभाव डालने का सामर्थ्य रखता है। ऐसे महान व्यक्ति का उपदेश, प्रवचन के साथ ही उसकी भाव भंगिमाओं का भी विशेष प्रभाव पड़ता है। उसका उठना-बैठना,चलना-फिरना, हंसना-मुस्कुराना सभी पर बहुत प्रभाव डालता है। ऐसे प्रत्यक्ष सत्संग में व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता है। उदाहरण के लिये महात्मा गांधी जी का व्यक्तित्व ले सकते हैं जिनकी सादगी से प्रभावित होकर कितने ही फैशन परस्त लोगों ने सादगी एवं खादी को अपना लिया था।

स्वध्याय और सत्संग का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व:

इसमें दो राय नहीं है कि स्वध्याय और सत्संग का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व है। यह मनुष्य की बुद्धि का विकास करने में सहायक होता है। जब बुद्धि परिष्कृत होती है तो व्यक्ति का जीवन उन्नत होता है। परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी का जीवन चरित्र हम सबके समक्ष है जिन्होंने “स्वाध्याय और सत्संग” को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर अपने व्यक्तित्व-कृतित्व को चरमोतकर्ष पर पहुंचा दिया। परम पूज्य गुरुदेव ने सत्संग के महत्व को समझते हुए अपने समय के महान जनों से संसर्ग कर विचार विमर्श किए। गुरुदेव पॉन्डिचेरी गये जहाँ उन्होंने श्री अरविन्द स्वामी से मुलाक़ात की, कोलकाता गये जहाँ उन्होंने श्री रविंद्र नाथ टैगोर से मुलाक़ात की,अहमदाबाद गये जहाँ उन्होंने गांधी जी से मुलाक़ात की। इस प्रकार गुरुदेव पूरे देश में अनेकों दिव्य हस्तियों से भेंट मुलाक़ात करते रहे। परम पूज्य गुरुदेव स्वाध्याय के प्रबल पक्षधर रहे हैं। स्वयं तो निष्ठा से स्वाध्याय करते ही थे, अपने बच्चों,शिष्यों, मित्रों , बंधुओं यहाँ तक कि उनके सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक जन को भी इस दिशा में प्रोत्साहित करते थे। गुरुदेव ने प्रचूर मात्रा में साहित्य अध्ययन के साथ ही साहित्य का विशाल भंडार भी हमें प्रदान किया है। दिया है। 

इस साहित्य भंडार का स्वाध्याय-सत्संग कर हम अपने जीवन को तो परिष्कृत कर ही सकते हैं साथ में सम्पूर्ण मानव जाति को भी लाभान्वित कर सकते हैं। इतने विस्तृत साहित्य का सृजन करना किसी साधारण इंसान के बस की बात नहीं है, यह केवल परम पूज्य गुरुदेव ही कर सकते 

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित “स्वाध्याय और सत्संग” शीर्षक की पुस्तक एक ज्ञान का सागर पूर्णतः परिलक्षित होता है। केवल 24 पन्नों की यह लघु पुस्तक “गागर में सागर ” कहावत को चरितार्थ करती है। हम सबका का कर्तव्य ही नहीं, परम धर्म है कि हम इस पुस्तक को तो पढें ही, साथ में गुरुदेव के अन्य साहित्य का भी अध्ययन करें। इतना सरल साहित्य शायद ही कहीं और उपलब्ध हो सकता है -ऐसा हमारा विचार है। 

गुरुदेव कहते हैं :

मैं मंदिर में नही मिलूंगा। मुझे ढूंढना है तो मेरे साहित्य में ढूंढो ,मेरे विचारों में ढूंढो। 

गुरुदेव ने यह भी कहा है: हम पांच शरीर से काम करते हैं। एक शरीर निरंतर लेखन करता है, यदि तुम लोगों ने इस साहित्य को दुनिया में फैला दिया होता तो अब तक युग परिवर्तन हो गया होता। गुरुदेव के इस कथन से सोचा-समझा जा सकता है कि गुरुदेव के साहित्य में कितनी शक्ति है।

यदि हम सब स्वयं तो गुरुदेव के साहित्य का “स्वाध्याय और सत्संग” करें ही,साथ ही अन्य लोगों को भी इस दिशा में प्रोत्साहित करें,तब अवश्य ही व्यक्ति निर्माण होगा एवं युग परिवर्तन सम्भव होगा। गुरुदेव ने यह भी कहा है कि पढ़े लिखों को मेरा साहित्य पढ़ाओ और जो अनपढ़ हैं उन्हें सुनाओ। यह भी उपाय,स्वाध्याय और सत्संग हेतु बताया है कि मेरा विचार या माताजी का गीत लाउडस्पीकर पर लगा दो,लोग अपने दैनिक कार्य के साथ उसे सुनेंगे, उसकी उपयोगिता एवं मधुरता से प्रसन्न तो होंगे ही उन्हें ज्ञान भी प्राप्त होगा। देखिये गुरुदेव ने हमें स्वध्याय और सत्संग का सरलतम मार्ग दिखा दिया, जिसका पालन करना हम सबका कर्तव्य है।

आज के लिए इतना ही -कल प्रस्तुत करेंगें संध्या बहिन जी की प्रस्तुति की अंतिम कड़ी 

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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आज की 24 आहुति संकल्प सूची :

ऑनलाइन ज्ञानरथ की महायज्ञशाला में 8 समर्पित सहकर्मियों ने आदरणीय संध्या बहन जी की प्रस्तुति का स्वाध्याय करने के उपरांत कमैंट्स रुपी आहुतियां अर्पण कर पुण्य प्राप्त किया है। निम्लिखित सहकर्मियों को हमारे परिवार की ओर से साधुवाद,शुभकामनाएँ एवं बधाई हो। आप सब पर आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे।जय गुरुदेव

(1) सरविन्द कुमार पाल – 43, (2) राजकुमारी बहन जी – 33, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 28, (4) डा.अरूण त्रिखा जी – 25, (5) प्रेरणा कुमारी बेटी – 25; (7) रेनु श्रीवास्तव बहन जी – 25, (8) निशा भारद्वाज बहन जी – 24 

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