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2.जीवन साधना एक बहुत कठिन तपस्या -सरविन्द कुमार पाल 

26 अक्टूबर  2021 का ज्ञानप्रसाद:  2.जीवन साधना एक बहुत कठिन तपस्या -सरविन्द कुमार पाल 

परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत   द्वितीय  लेख।

जब हम आज वाले लेख की एडिटिंग कर रहे थे तो हमारे मन में दुविधा थी कि इसका शीर्षक क्या रखा जाए क्योंकि  शीषक ही लेख को आकर्षित बनाते हैं। जो कुछ भी इस लेख में लिखा गया है वह  हम सब जानते हैं ,घर- घर की कहानी है।  Joint family system , Nuclear Family system जिन्हे हमने संयुक्त परिवार और छोटे परिवारों के नाम दिए हुए हैं, हर कोई इनसे परिचित है। हम में से हर कोई इनके  लाभ ,हानि से भी  परिचित है। अपने दिल से पूछने की आवश्यकता है कि क्या हम परमपूज्य गुरुदेव द्वारा निर्देशित  मापदंडों का पालन कर रहे हैं ? अगर कर रहे हैं तो फिर  समस्या  कहाँ है ? क्या हम  रोज़मर्रा की छोटी -छोटी समस्यायों के लेकर राई का पहाड़  नहीं बना रहे ? परिवारों में गिरते मानवीय मूल्यों को रोकने का हम क्या प्रयास कर रहे हैं  ? बुज़ुर्ग पीढ़ी  तो यही कहेगी -हमारे ज़माने में ऐसा नहीं होता था। नई पीढ़ी यही कहेगी -बूढी हो गयी आपकी पीढ़ी। हमारे गुरु ने तो  युगनिर्माण का संकल्प लिया हुआ है और हम हैं कि परिवार निर्माण में ही उलझे हुए हैं। 

अगर हम सब  आज का लेख पढ़कर इन दो पीढ़ियों  में पनप रही खाई को समाप्त करने में सफल हो गए तो अवश्य ही आदरणीय सरविन्द भाई साहिब का और हमारा प्रयास सफल समझा जायेगा।  यह हम इसलिए कह रहे हैं कि इस लेख में  परमपूज्य गुरुदेव स्वयं हमें बता रहे हैं कि जीवन साधना “एक बहुत बड़ी तपस्या है , इसे केवल तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी प्रवृत्ति के मनुष्य ही कर सकते हैं। इस प्रवृति के मनुष्य मर भले ही जाएं पर कृपणता नहीं करते। अग्नि बुझ भले ही जाए,पर ठंडी नहीं होती।” 

तो मित्रो इन्ही opening remarks के साथ हम सीधा चलते हैं आदर्श परिवार के द्वितीय लेख की ओर ।

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परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक एक लघु पुस्तक का स्वाध्याय कर विश्लेषण करते हुए लेख की अगली कड़ी में चलते हैं जिसमें परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि दुर्भाग्यपूर्ण परिवार को ऐसी स्थिति से बचने  के लिए हम सबको कुशल नेतृत्व की जरूरत है।  अगर हम छोटे-छोटे परिवारों की अपेक्षा बड़े संयुक्त परिवार  बनाने  की परम्परा  के  चलन पर विचार करें तो  बहुत ही लाभदायक परिणाम निकल सकते हैं। ऐसे परिवारों की  उपयोगिता इसी शर्त पर निर्भर  है कि पारिवारिक सदस्यों में आपसी सघन-सद्भाव और सहकारिता का माहौल बना रहे।  यदि परिवार में द्वेष-दुर्भाव की,अवज्ञा और उपेक्षा  की व आपाधापी की दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही हों तो घर को नरक बनाने से  अच्छा है कि लोग अपना-अपना परिवार लेकर अलग हो जाएं। सद्भाव की स्थिति में तो संयुक्त परिवार का लाभ लिया जा सकता है लेकिन  दुर्भाव पनपने की स्थिति में परिवार का बिखर जाना ही श्रेयस्कर है। बुज़ुर्गों  को चाहिए कि परिवार में एक पक्षीय (one-sided)  अनावश्यक आग्रह नहीं करना चाहिए।  स्थिति के अनुरूप संयुक्त परिवार को बनाए रखने की तरह ही दुर्भावग्रस्त परिवार को शांति व सद्भावनापूर्वक अलग करने में भी सहायता करनी चाहिए।  इससे  परिवार में पारदर्शिता परिलक्षित होगी और सुख-शांति का माहौल, स्नेह व प्यार के रूप में स्पष्ट दिखाई देगा जिसकी आज हम सबको महती आवश्यकता है। 

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं , “परिवार संस्था की सफलता उसकी भावनात्मक स्थिति और आदर्शवादी आचार संहिता पर टिकी हुई है। “

जब तक मनुष्य के अंतःकरण में यह आधार बने रहेंगे, तब तक अभावग्रस्त घर-परिवारों में भी ऐसी स्थिति सुख की अनुभूति कराएगी जिन पर स्वर्ग भी न्योछावर किया जा सके क्योंकि “शरीर की भूख” रोटी, कपड़ा और मकान, अन्न, जल एवं हवा तक ही सीमित है, परंतु “आत्मा की भूख” स्नेह, सम्मान व सहयोग की परिस्थितियाँ मिलने पर ही मिटती है।  परिवार में सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना लाने के लिए हम सबको कुशल नेतृत्व (leadership ) की जरूरत है जिसमें  परिवार के सभी बड़े सदस्यों का  नैतिकता के आधार पर उत्तरदायित्व बनता है। बड़े-बुजुर्ग  छोटे लोगों का विशेष ध्यान रखें ताकि वह बिगड़ने से बच सकें।  हम सबका परम कर्त्तव्य बनता है कि घर में स्वस्थ परम्पराएं डाली जाएं, परिवार का हर कोई सदस्य श्रमनिष्ठ बने, बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों  तक सभी सदस्य परिश्रमरत रहें।  किसी भी सदस्य का समय बरबाद न हो क्योंकि समय अमूल्य होता है। 

आज हर इंसान कितना भी सुखी सम्पन्न क्यों न हो पर वह गरीब है तो केवल  “समय”  के लिए। हर किसी को समय की कमी है । इस  युग की सबसे बड़ी मांग “समय” है -अक्सर हम लोगो को कहते सुने हैं -Time is money   यह आवश्यक है कि  हर कोई समय के महत्व को समझे और  उसे बिल्कुल व्यर्थ न जाने दें।  परिवार के छोटों  को हर बड़े सदस्य का सम्मान तो अवश्य ही  करना चाहिए परंतु  बुजुर्गो का  निठल्ले बैठे रहना तथा बात-बात पर बनावटी बादशाह की तरह हुक्म चलाना  अपना अधिकार नहीं मान लेना चाहिए। छोटे सदस्यों व बच्चों का परम कर्त्तव्य है कि सभी बड़ों  का सम्मान करें  परंतु बड़ों को भी चाहिए कि  छोटों को अपने पीछे नहीं आगे लेकर चलें।  बड़ों का  सम्मान करना ,शिष्टाचार बरतना, सम्मान-सूचक शब्द जैसे-आदरणीय या आप शब्दों को लगाकर संबोधित करना,नित्यप्रति प्रणाम करना, उनके शारीरिक कार्यो में सहयोग देना, कोई नया काम करते समय उनका आशीर्वाद लेना और उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना परिवार के सभी छोटे सदस्यों का परम कर्त्तव्य होना चाहिए।  यह सारी  आदतें  निहायत आवश्यक व न्याय संगत हैं  जिन्हें  धर्म भी स्वीकार करता है। 

परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं : कई बार  परिवार के  बड़े सदस्यों के विचार अनुपयुक्त, असामयिक एवं अवास्तविक होते हैं जो कि छोटे सदस्यों व बच्चों को सूट नहीं करते, फिर भी ऐसे हुक्म ठोकते हैं जो कि मानने लायक नहीं होते हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि यह बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ अभद्रता, छुआछूत, दहेज, धूमधाम में अपव्यय जैसी विकृत परम्पराओं को अपनाने का पुरजोर समर्थन करते हैं लेकिन  समाज-सेवा जैसे सर्वश्रेष्ठ कार्यों में अड़चन डालते  हैं। इस टेंशन की  स्थिति में वह केवल  अपने काम से मतलब रखने  की शिक्षा देने लगते हैं जो कि सरासर गलत है। ऐसे वातावरण में  सारे परिवारजनों  पर  प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और परिवार में मनुष्यता की जगह बैमनुष्यता जन्म ले लेती है।  ऐसी स्थिति  अशांति का कारण बनती  है।  इसलिए  आवश्यक है कि

“हम सबको उचित-अनुचित की बात विवेक की कसौटी पर परखने के बाद ही किसी आज्ञा का पालन करना चाहिएI” 

इस बात का  हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम सबको अनुचित आज्ञा का निसंकोच उलंघन या उपेक्षा अवश्य करना चाहिए लेकिन मर्यादा के बीच ही रहकर। यही कहेंगें कि परिवार में भी आनलाइन ज्ञान रथ  के  12 स्तम्भों  का पूर्णतया पालन करते हुए नम्रता बनाए रखनी चाहिए। यह 12 स्तम्भ – शिष्टाचार, स्नेह, समर्पण, आदर, श्रद्धा , निष्ठा, विश्वास ,आस्था, सहानुभति, सहभागिता,सद्भावना एवं अनुशासन हैं। परिवार के सभी सदस्यों को एक-दूसरे का परस्पर सहयोग करना एक संस्कारित परिवार की स्वस्थ परम्परा होनी चाहिए। यदि  परिवार में कोई सदस्य बीमार होता है तो सभी सदस्य आपस में मिलकर पूछताछ करें, देखभाल करें – चिकित्सा, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना व्यक्त करने के लिए सक्रियता दिखाएँ जिससे घर का माहौल सुखमय व शांतिमय होगा। परिवार के बड़े बच्चे छोटे बच्चों को पढ़ाएं, बड़े-बुजुर्ग फालतू न बैठे, बच्चों को कहानियों के माध्यम से  हँसाने, टहलाने, खेल-खिलाने, गृह-उद्योग सिखाने, प्रश्नोत्तरी से ज्ञानवृद्धि करने के नए  नवीन साधन ढूंढें।  अपनी सामर्थ्य के अनुसार पारिवारिक कार्यो में हाथ बँटाने में निरंतर सक्रिय रहें। आपस में मिल-जुलकर एक साथ काम करने की परम्परा डाली जाए तथा खाना बनाने, सफाई रखने, कपड़े  धोने  जैसे दैनिक कार्यो का बोझ किसी एक पर न डालकर ,सहयोग और  सहकार करें। ऐसा करने से  सबकी मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय होगी जो कि बहुत ही प्रेरणादायक और  अनुकरणीय  होगी।   हम आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सभी आत्मीय सदस्यों  से करबध्द निवेदन  करते हैं कि  कुशल नेतृत्व गुणों ( expert leadership qualities) ) के साथ ही परिवार का संचालन करें  और इस दुर्लभ  जीवन साधना को निरंतर आगे बढ़ाते  जाएँ।  

हमें अपने व्यक्तित्व को उपरोक्त सिद्धांतों के अनुरूप ढालना चाहिए और परिवार में समयानुकूल परम्पराओं का समर्थन करना  चाहिए। ऐसे ही माहौल में पलकर बच्चे सुसंस्कारी बनते हैं।  परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं : यदि आपके पास अगली पीढ़ी के लिए सम्पत्ति छोड़ कर मरने की  स्थिति न भी हो तो कोई  बात नहीं है परन्तु  यदि आपने उस पीढ़ी को  सद्गुणी व सुसंस्कारी बना दिया  तो निश्चिंत है  कि वे हर परिस्थिति में सुखी रह सकेंगे। जिस किसी ने भी  अपने परिवार के साथ रहकर  कुशलता- पूर्वक  नेतृत्व किया ,  परिवार को सुसंस्कारी बनाकर सुखी व समुन्नत बना दिया तो समझ लेना चाहिए कि  इससे बड़ी और कोई  उपलब्धि नहीं हो सकती क्योंकि  यही तो है  “परिवार निर्माण की  जीवन साधना। ”  जीवन साधना एक ऐसी साधना है जो चौबीस घंटे अनवरत चलती रहती है, जिसे हम परिवार में रहकर आजीवन कर सकते हैं।  इस साधना से हम अपनेआप में  व अपने परिवार में अमूल-चूल परिवर्तन ला सकते हैं। लेकिन यह साधना  एक बहुत बड़ी तपस्या है , इसे केवल तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी प्रवृत्ति के मनुष्य ही कर सकते हैं। इस प्रवृति के  मनुष्य मर भले ही जाएं पर कृपणता नहीं करते। अग्नि बुझ भले ही  जाए,पर ठंडी नहीं होती। अतः परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि

“बिना संघर्ष प्रगति असंभव है ज्ञान से कर्म , कर्म से समृद्धि की उपलब्धि होती है।”

इसलिए हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इस प्रस्तुत लेख से आप सबको बहुत बड़ी प्रेरणा मिलेगी और आप सबका दृष्टिकोण व दिशा बदलेगी और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। 

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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