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हिमालय की अलौकिक शक्तियों को प्रमाणित करती है मिस्टर फैरेल की यह सत्यकथा – पार्ट 2  

21 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद -हिमालय की अलौकिक शक्तियों को प्रमाणित करती है मिस्टर फैरेल की यह सत्यकथा – पार्ट 2  

आज प्रस्तुत है मिस्टर फैरेल की सत्यकथा का पार्ट 2 आज के लेख में आपके लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये गए है जिसके लिए हमें विज्ञानं का सहारा लेना पड़ा है।  हमने अपने अल्पज्ञान से वैज्ञानिक पार्ट को अधिक से अधिक सरल रखने का प्रयास  किया है।  यह इस सप्ताह का अंतिम लेख होगा और अब हमारी मुलाकात सोमवार की सबह को होगी।  _______________________________

मिस्टर फैरेल कैंप में लौट आए, लोग उन्हें ढूंढ रहे थे। जब मिस्टर फैरेल ने राजा को घटना सुनाई तो  उन्होंने अपना टेंट वहां से हटा कर  करीब 200 गज़ दूर लगा  दिया।  उस दिन की शाम को एक युवक वास्तव में उस जगह की तलाश में आया भी  था। हर तरह से खुद को संतुष्ट करने के बाद, वह युवक  वहां बैठ गया। इस बीच, मिस्टर  फैरेल भी वहां पहुंच गए। जैसे जैसे समय व्यतीत होता मिस्टर  फैरेल की  जिज्ञासा और अधिक तीव्र होती जा रही थी। कुछ ही देर में साधु महाराज  भी वहाँ पहुँच गए। मिस्टर फैरेल और युवक ने उनके पैर छुए और उनके निर्देश की प्रतीक्षा में खड़े हो गए वह स्थान घने पेड़ों के बीच में था। अग्नि प्रज्ज्वलित करने के बाद साधु महाराज ने कुछ पूजा की, कुछ मंत्रों का पाठ किया और उन्हें  ध्यान की मुद्रा में बैठने के लिए  कहा। साधु महाराज के  माथे से प्रकाश की एक किरण निकली और एक  घने पेड़ के तने पर प्रकाश का एक गोलाकार पुंज  दिखाई दिया।उसके उपरांत उन दोनों ने जो कुछ भी इस गोलाकार प्रकाश पुंज में देखा वह एक सिनेमा जैसा था” उन्होंने पात्रों को देखा जो सचमुच  में चल रहे थे  और बातचीत कर रहे थे।  उन्होंने उस युवक के पिछले जन्म की घटनाओं को अपनी नग्न आंखों से देखा। बीच-बीच में युवक उत्तेजित हो जाता था और कहता- “हां-हां मैंने ऐसा किया था”। अंत में उस युवक ने  साधु महाराज  के पैर छुए और कहा  “भगवान! अब मेरा सांसारिक लगाव टूट गया है और  मैं अपने पिछले जीवन की  अधूरी  साधना को पूरा करने  के लिए तैयार हूं। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिये  ताकि मैं इस अधूरे कार्य को  पूरा कर सकूं ।”साधु महाराज ने कहा – “मेरे बेटे! आज तुम यहाँ विश्राम करोऔर कल प्रातः ही  अपने घर लौट जाओ। उचित समय पर मैं तुम्हें बुलाऊँगा।” 

उसके बाद मिस्टर फैरेल को पता ही नहीं चला कि उस युवक को दोबारा कब बुलाया गया? लेकिन मिस्टर फैरेल भारतीय धर्म और अध्यात्म के कट्टर भक्त बन गए।  मिस्टर  फैरेल ने स्वयं इस घटना का वर्णन  “सप्तहिक हिंदुस्तान” के 17 मई  1959 वाले  अंक में किया है। 

हमारे वरिष्ठ सहकर्मी हिंदी की इस साप्ताहिक पत्रिका से  भलीभांति  परिचित होंगें। बड़े पन्नों वाली इस मैगज़ीन  की याद ताज़ा करने के लिए हमने गूगल सर्च करके आपके समक्ष संलग्न चित्र में शामिल  की है। यह 1962  की कॉपी है और मूल्य केवल 40 पैसे। हमारे स्वर्गीय  मम्मी इस मैगज़ीन के बहुत ही फैन थे। उन दिनों TV तो होता नहीं था , यह मैगज़ीन ही उनकी सबसे बड़ी  साथी थी ।        

स्वामी योगानंद की पुस्तक ” Autobiography of a Yogi ” में एक ऐसी ही घटना का वर्णन एक प्रसिद्ध भारतीय योगी श्री श्यामा चरण लाहिरी के जीवन में हुआ है, जिन्हें लाहिरी महाशय के नाम से जाना जाता है। लाहिरी  महाशय योगानंद जी  के दादा गुरु थे। उन्हें भी हिमालय के एक सिद्ध बाबा जी ने बुलाया था जिन्होंने उन्हें क्रिया योग” का विज्ञान सिखाया। हमारे दादा गुरु सर्वेश्वरानन्द जी ने भी गुरुदेव को  हिमालय में बुलाकर उन्हें कितना ही ज्ञान प्रदान किया था।  सिद्ध योगीियों द्वारा  इन उच्स्तरीय आत्माओं को बुलाने का  उदेश्य था कि  कहीं  यह  पुरातन ज्ञान विलुप्त ही  न हो जाए। भारतीय शास्त्र शिव, भैरव, हनुमान, अश्वत्थामा और कई सिद्धों जैसी अमर आत्माओं के वर्णन से भरे हुए हैं। 

कल्कि पुराण में एक कथा है, जो इस प्रकार है: जब भगवान कल्कि ने देखा कि सारा संसार कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य आदि विकृतियों में डूबा हुआ है और आत्माओं का प्रकाश बुझ गया है  तो उन्होंने जनता का मार्गदर्शन करने का फैसला किया। अज्ञान का अंधेरा इतना  घना था कि  सारा संसार भौतिकवाद और इन्द्रियों के सुखों में   बुरी तरह फँसा हुआ था । भगवान कल्कि ने महसूस किया कि उनके पास जनता के इस जागरण के लिए आवश्यक शक्ति की कमी है। तब उनके आध्यात्मिक गुरु परशुराम ने उन्हें हिमालय में बुलाया और उन्हें उस स्थान पर तपस्या करने के लिए कहा, जहां उन्होंने स्वयं (परशुराम) की थी । इस तपस्या ने कल्कि के भीतर उस विशाल शक्ति को जगाया, जो युग परिवर्तन के लिए आवश्यक थी। भगवान परशुराम का जन्म वैदिक युग में हुआ था, जो कलियुग से बहुत पहले आया था। कलियुग में उनकी उपस्थिति भी उनकी अमरता का संकेत है और इस बात का प्रमाण है कि उनके जैसी अमर आत्माएं अभी भी हिमालय में मौजूद हैं। वैदिक युग वाले  सिद्ध ऋषि कलियुग वाली आत्माओं  को बुला सकते हैं , जो कि दो अलग -अलग युगों  की बाते हैं तो एक  जन्म का अधूरा  कार्य दुसरे जन्म में पूरा करना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है।     

इन्ही तथ्यों का एक और उदाहरण :

डॉ. हरि दत्ता भट्टा, शैलेश ने  साप्ताहिक मैगज़ीन धर्मयुग के 23  अगस्त 1964 वाले अंक में अपने पर्वतारोहण अनुभव का एक दिलचस्प विवरण दिया था । धर्मयुग भी उन दिनों की बड़े पन्नों वाली बहुचर्चित मैगज़ीन थी  गढ़वाल स्थित जनवाली  पहाड़ी की यह घटना अमर आत्माओं को और भी परिपक्व करती है।   यह पहाड़ी समुद्र तल से 22000 फीट से ऊपर है जहाँ डॉक्टर दत्ता अपने पर्वतारोहण दल के साथ जा रहे थे। उन्हें विश्वास था कि  किसी अलौकिक शक्ति ने उन्हें और उनके साथियों को  भूस्खलन ( landslide)  के नीचे दबने से बचा लिया। 

“ये सभी घटनाएं इस बात को साबित करती हैं कि उच्स्तरीय  अलौकिक शक्ति रखने वाली अमर आत्माएं अभी भी हिमालय में मौजूद हैं और वे अनंत काल तक वहीं रहेंगी। आधुनिक वैज्ञानिक भी “जीवन के अमृत” की खोज में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। जीवन के अमृत का अर्थ है जीवन को अनंत काल तक जीवित रखना – मृत्यु को रोक कर रखना। रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका आदि के प्राणी विज्ञानी लंबे समय से उम्र बढ़ाने  और मृत्यु की प्रक्रिया की जांच कर रहे हैं। अब तक प्राप्त परिणामों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि मृत्यु कोई आवश्यक  घटना नहीं है। कोई ज़रूरी नहीं कि मृत्यु होनी ही है – बुढ़ापा एक तरह की बीमारी है। यदि इसका इलाज खोजै जा सके  तो “ मनुष्य  एक हजार साल तक जीवित रह सकता है।” आयुर्वेद में वर्णित कायाकल्प  के तरीके भी इस तथ्य को साबित करते हैं। वास्तव में मृत्यु biological  systems के पतन का परिणाम है। जब धीरे-धीरे शरीर के अंगों की कार्यक्षमता कम  होती जाती है तो यही है  बुढ़ापे  का कारण है और इसी कार्यक्षमता की कमी के कारण  मृत्यु हो जाती है।यदि life style और biological systems   को स्वस्थ रखा जाए और नए cells  बनने  की प्रक्रिया को बरकरार रखा जाए, तो मनुष्य को अनंत काल तक जीवित रखा जा सकता है।” आयुर्वेद का अध्ययन करने के बाद, आसानी से यह  निष्कर्ष निकाल सकते  हैं  कि प्राचीन ऋषियों और विद्वानों ने कई जड़ी-बूटियों, फलों और chemicals  की पहचान की थी, जो शरीर के कायाकल्प में मदद करते हैं। काया और  कल्प  दो शब्दों से योग से कायाकल्प बनता है जिसका अर्थ है शरीर का बदल जाना -नया शरीर प्राप्त  करना एक प्रचलित मुहावरा है। “हम  भोजन नहीं करते, भोजन है जो हमें  खाता है। हमारा भौतिक शरीर रक्त से पोषित होता है। यही रक्त  पूरे शरीर को ऑक्सीजन प्रदान करता है। ऑक्सीजन और अन्य  द्रव शरीर में चेतना बनाए रखते हैं। यह सब  कार्य भावनाओं के माध्यम से पूरा होता है । यह विचार और भावनाएं ही हैं जो अलग-अलग hormones को  जन्म देती हैं। ये हार्मोन शरीर की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि शरीर को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी हमारी भावनाओं और विचारों पर है जो जीवन का वास्तविक सार है।” Hormonal science  का विवरण  किसी और लेख में करेंगें।   

मिस्टर  क्लार्क ने अपनी पुस्तक ‘स्पेस ओडिसी’ में लिखा है कि 200 से 400 वर्ष तक चलने वाली अंतरिक्ष यात्रा करने के लिए अंतरिक्ष यात्री को शून्य से कम तापमान पर सुप्त अवस्था में रखना आवश्यक होगा। इस वैज्ञानिक खोज से देखा जाए तो हिमालय के उन क्षेत्रों  में जहाँ सारा वर्ष बर्फ जमी रहती है, अमर प्राणियों के अस्तित्व को एक कल्पना” नहीं, सच्चाई , माना जा सकता है। वास्तव में, हिमालय क्षेत्र अनादि काल से सच्चे योगियों और महात्माओं का विशेष स्वर्गीय  स्थल रहा है। इस पवित्र क्षेत्र में रहने वाले महान योगी  कहीं और नहीं मिल सकते । कहा जाता है कि तिब्बत में ज्ञानगंज  योगाश्रम है जो योगियों का प्रशिक्षण संस्थान है। ऐसा माना  जाता है कि  सैकड़ों योगी यहाँ पर रहते हैं  और आंतरिक लोकों के रहस्यों पर शोध कर रहे हैं । भौतिक क्षेत्र में अलग  यह सिद्धाश्रम सामान्य व्यक्तियों के लिए सुलभ या दृश्यमान नहीं है । केवल मानसिक रूप से जागृत और प्रतिभाशाली साधकों को ही इस सिद्धाश्रम में प्रवेश का सौभाग्य प्राप्त है। 

बहुत बहुत धन्यवाद्।       

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली

किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। जय गुरुदेव

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