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अखंड ज्योति आई हस्पताल -एक प्रेरणादायक कथा Part 1

11  अप्रैल 2021का ज्ञानप्रसाद  पार्ट 1 

मृतुन्जय तिवारी जी  की कहानी आप सब के समक्ष रखते हुए अति हर्ष हो रहा है क्योंकि यह इतनी प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक है कि जब हमने पहली बार इसको देखा तो आश्चर्यचकित हो गए कि ऐसा भी हो सकता है। हम अपने पाठकों और सहकर्मियों को बताना चाहते हैं जिस शीर्षक पर हम आज चर्चा करने का प्रयास कर रहे हैं इतना विस्तृत है कि विकिपीडिया ,YouTube ,orbis  और पता नहीं कौन- कौन सी जगहों  पर इसके रेफरन्स हैं कि इस लेख को  compile करने में इतना परिश्रम करने के बावजूद अभी भी बहुत कुछ छूटता लगता है। हमारे विवेक के अनुसार इसका केवल एक ही विकल्प संभव है कि आप स्वयं भी गूगल सर्च करके इसके बारे में  जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करें और परमपूज्य गुरुदेव के इस शिष्य ( मृतुन्जय जी के दादा जी ), अखंड ज्योति नेत्र अस्पताल के अभिनव प्रयोग को  समझें, अधिक से अधिक  शेयर करें और गुरुदेव के कार्य में योगदान करें।    

अखंड ज्योति नेत्र  हस्पताल मस्तीचक  बिहार 

मृतुन्जय तिवारी  जी के दादा  श्री रमेश चंद्र शुक्ला  हमारे परमपूज्य गुरुदेव के विचारों से बहुत  ही प्रभावित थे।  उनका जन्म 1917 का बताया गया है लेकिन  उनका निधन कब  हुआ ,कुछ भी उपलब्ध  नहीं है। इस समय  मृतुन्जय जी की आयु लगभग 50 वर्ष  के करीब  होनी चाहिए। यह हम 26  दिसंबर 2018  में इंडिया टुडे में प्रकाशित  न्यूज़ आइटम के आधार पर कह रहे हैं जब उनकी आयु 47  वर्ष बताई गयी है। 

बिहार निवासी राष्ट्रिय फुटबॉल विजेता मृत्युंजय तिवारी अपने फैमिली  बिज़नेस के लिए  कोलकाता महानगर  में आकर  बस गए, और वहां अपने  परिवारक बिज़नेस  लदाई और ढुलाई ( carrying and forwarding ) में कार्यरत रहे । लेकिन विधाता ने कुछ और ही लिखा था। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि  महानगर का जीवन छोड़ कर  वापिस अपनी जन्मभूमि में आना होगा और वोह भी एक ऐसे कार्य के  के लिए , एक ऐसे पुरषार्थ के लिए जिसने मृतुन्जय जी को घर-घर में प्रसिद्ध कर दिया।  बिहार की ग्रामीण जनता ने कितना आशीर्वाद और दुआएं दी होंगी इस पुण्य कार्य के लिए जिसमें आज वह  कार्यरत हैं। शायद विधाता द्वारा अपनी जन्मभूमि का ऋण चुकाने का कोई पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम था।        

मृतुन्जय जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी जब  बिहार के एक नेत्रहीन किसान को  इलाज कराने  के लिए अपनी जन्म भूमि  बिहार के जिला अस्पताल में गए। छह महीने में वह तीसरी बार आए थे । अस्पताल ने इलाज के लिए अपनी  असमर्थता जता दी क्योंकि वहां कोई नेत्ररोग विशेषज्ञ ही  नहीं था।  उस किसान की व्यथा सुनकर मृत्युंजय अंदर से हिल गए। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि उन्होंने एक पिता को अपनी छोटी सी  बेटी को मात्र 1500  रुपए के लिए बेचते हुए देखा।  इतनी निर्धनता थी इस प्रदेश में।

इस प्रकार की  घटनाओं ने, और हमारे गुरुदेव की  शिक्षा और आदर्शों ने उन्हें इतना झकझोरा कि उन्होंने बिहार के एक छोटे से ग्राम  मस्तीचक में अखंड ज्योति आई  हॉस्पिटल शुरू करने की ठान ली। ठानना कुछ और बात है और उस को किर्यान्वित रूप देना दूसरी बात। इतने बड़े कार्य के लिए पैसा कहाँ से आएगा ,कौन सहायता करेगा, डॉक्टर कहाँ से आयेंगें इत्यादि इत्यादि।  यहाँ पर  यह  तथ्य  पूरी तरह से  लागु होता  है कि 

“जो भगवान की योजना होती है उसमें कोई भी अड़चन नहीं आती क्योंकि उसे भगवान खुद ही तो चला रहे होते हैं।” 

ठीक उसी तरह जैसे हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ के सारथि स्वयं गुरुदेव हैं और स्वयं ही आदर्शवादी ,संस्कारित,सामर्थ्यवान,परिश्रमी सहकर्मी जुड़ते चले जा रहे हैं। न केवल जुड़ते ही जा रहे हैं बल्कि  स्वयं ही इसमें अपने  पुरषार्थ का योगदान भी डाल रहे हैं।  

 मृत्युंजय जी   कहते हैं,

 ”मैं अपने बूते पर  बिहार की सारी समस्याएं तो हल नहीं कर सकता, इसलिए मुझे   केवल एक  ही चीज पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत थी  जिसमें मैं कुछ कर सकता था और वह है 

“इलाज योग्य अंधापन ” Curable Blindness 

तिवारी जी ने  जनवरी 2006  में मात्र 10 बेड का अस्पताल एक मंदिर प्रांगण में आरम्भ  किया  जो आज विश्व की उन ऊंचाइयों  को छू रहा  है  जो एकदम अविश्वसनीय है ,लेकिन है शत प्रतिशत सत्य।  यह सब कैसे हो गया ? इसका उत्तर तो हमने पहले वाली पंक्तियों में लिख ही दिया है कि यह भगवान की योजना है लेकिन  पौत्र ने अपने दादा के संस्कार कैसे प्राप्त कर लिए ,यह भी गुरुदेव की परमसत्ता पर मोहर लगाना ही हुआ न। 

हमारे पाठक ,सूझवान ,समर्पित सहकर्मी स्वयं ही इस बात का विश्लेषण करके निर्णय कर सकते हैं कि परमपूज्य गुरुदेव के कार्यक्रम कैसे तीसरी पीड़ी में स्थानांतरित हो गए और मृतुन्जय जी ने बने बनाये स्थिर बिज़नेस को त्याग कर बिहार के ग्राम वासियों  में अपना  समस्त जीवन समर्पित कर दिया।  उनके समर्पण ने उन्हें किस ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। 

युगतीर्थ शांतिकुंज में डॉक्टर गायत्री शर्मा जो डॉक्टर ओ पी  शर्मा जी  की सहधर्मिणी है “आओ गढ़ें  संस्कारवान पीढ़ी” नामक एक बहुत ही अद्भुत कार्यक्रम का संचालन करती है। दोनों पतिपत्नी शांतिकुंज में गुरुदेव के समय से जीवनदानी हैं। हमने भी उनके कई उद्बोधन सुने और देखे ,बहुत ही प्रभावित हुए।   डॉक्टर गायत्री शर्मा गर्भवती महिलाओं को मार्गदर्शन  देते हैं। यह परमपूज्य गुरुदेव की  दूरदर्शिता  और मार्गदर्शन ही तो है ऐसे अभिनव कार्यक्रम चल रहे हैं।  

हमारा अल्पज्ञान तो हमें इसी निष्कर्ष पर लाकर खड़ा करता है : जैसे  अभिमन्यु ने  माता  के गर्भ में चक्रव्यूह की  शिक्षा प्राप्त कर ली थी तो  ठीक उसी प्रकार अपने दादा के संस्कार मृतुन्जय जी ने प्राप्त   कर लिए हों।  

 बिहार से इलाज योग्य अंधेपन (curable blindness ) को खत्म करना अब उनका एकमात्र मिशन बन गया है।  दिसंबर 2018 के अनुसार  24 Eye Surgeons  की मदद से चलने वाला 350 बिस्तरों वाला यह अस्पताल न केवल पूर्वी भारत में आंखों के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है, बल्कि इसने लड़कियों के लिए रोजगार के मौके बनाने में भी अहम योगदान दिया है।  “फुटबॉल टु आइबॉल”  जैसे अभिनव कार्यक्रम से रोजगार पाने में भी सहायता मिल रही है। 

तिवारी जी  ने 2009 में  “फुटबॉल टु आइबॉल” कार्यक्रम शुरू किया जिसके तहत लड़कियों को फुटबॉल और ऑप्टोमीट्री ( optometry ) (आंखों की जांच), दोनों का प्रशिक्षण दिया जाता है।  आगे चल कर इस कार्यक्रम पर विस्तार से चर्चा करेंगें। 

क्रमशः जारी 

” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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