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पूज्यवर ने मूली खा कर ही पेट भर लिया :

24 मार्च 2021 का ज्ञानप्रसाद 

पूज्यवर ने मूली खा कर ही पेट भर लिया :

गुरुदेव का व्यवहार इतना सरल था कि उन्हें देख कर कोई समझ ही नहीं पता था कि  वह इतने बड़े महापुरुष हैं। एक बार वे नीचे किसी काम में  व्यस्त थे ।  उन्हें  भूख लगी। ठंड के दिन थे ,बगीचे में टमाटर ,मूली आदि लगे  थे। रामचंद्र जी पौंधों को पानी दे रहे थे।  उस समय  यहाँ केवल दो चार  परिवार ही रहते थे।  मूली को कोई पूछता तक नहीं था।   गुरुजी ने दो मूली  उखाड़ी । रामचन्द्र जी से उसे धुलवाया, कटवाया और बोले, जाओ, माताजी से नमक ले आओ और उन्होने वहीं बैठकर मूली  खा ली  और बोले नाश्ता हो गया, चलो काम करते है।

यह है गुरुदेव का सादापन।  एक हम हैं कि हर समय इस पापी पेट को ही शांत करने में चिंतित रहते हैं।  हमने तो कई बार लोगों को यह कहते भी सुना है “ यह सब पापी पेट का ही सवाल है” लेकिन शायद हमें इस बात का ज्ञान नहीं है कि  परमसत्ता ने जिसने हमें इस संसार में भेजा है ,हमारे लिए सारे इंतेज़ाम पहले ही किये हुए हैं।  इसका एक प्रतक्ष्य उदाहरण तो हम सबके समक्ष है जिसे कोई भी नहीं झुठला सकता। ठीक उसी दिन से जिस दिन माँ के पेट में जब प्रसव होता है ,पालन पोषण ,देखभाल ,संरक्षण होना आरम्भ हो जाता है और ठीक 9 मास  तक यह कार्यक्रम  अनवरत चलता है।  और बाहिर आते ही अभी पूरी तरह आँख भी खुली नहीं होती तीन -तीन ,चार -चार नौकर आपके आगे पीछे आपकी सेवा में कार्यरत होते हैं।  कोई आपको दूध पिला  रहा होता है ,कोई कपड़े बदल रहा होता है ,कोई आपका मनोरंजन और पता नहीं क्या -क्या। वाह रे भगवान ,तेरे रंग हज़ार -नतमस्तक ,नमन एवं नमन। इस argument को देते हुए हम जीवन के उस पहलु को “God helps those who help themselves” कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।     

दुष्ट लोग आचार्य जी को भोजन भी नहीं करने देते :

परमपूज्य गुरुदेव  काम को इतना महत्व देते थे कि काम के आगे भोजन को उन्होंने कभी महत्त्व नहीं दिया। परिजन  कभी भी पहुँच  जाते थे। कभी-कभी समय का ध्यान नहीं रहता था, तो ऐसे समय भी पहुंच  जाते जब वे भोजन कर रहे होते। भोजन करना बीच में ही छोड़कर पूछते, “बताओ क्या काम है?” मुझसे  अक्सर काम के ही  सिलसिले में जाना पड़ता था। मै चुप रहता, नहीं बताता तो भी खाना बीच में ही छोड़कर उठ जाते। कहते, अच्छा चलो। माताजी कभी-कभी स्नेहभरी नाराजगी  भी प्रकट करती , “दुष्ट  लोग, आचार्य जी को भोजन भी करने नहीं देते।” भोजन ठीक से नहीं  करने पर काम करते-करते उन्हें भूख  भी लग जाती थी।  माताजो उन्हें भुने चने दे देती  थीं । कभी भूख लगने पर उन्हे ही मुट्ठी  भर खा लेते। उन दिनो गुड़िया दीदी , (गुरुजी की पोती) यहीं  रहती थी। वह गुरुजी के आस पास डोलती रहती, कहती दादाजी, चीजी  दो। गुरुजी कहते, “जा माताजी से ले ले।” वह कहती, “दादाजी, आपके पास चने है ना गुरुजी   हंसते और अच्छा, अच्छा ले लो,” कहकर उसे दे देते।

गुरुदेव की काम की धुन:

काम की  धुन इतनी रहती थी कि एक बार सुबह-सुबह चार बजे ही  सबको बुला  लिया। हम सब आँख मलते हुए  भागे-भागे गुरुजी के पास पहुंचे । जब कभी कोई महत्त्वपूर्ण योजना उनके मन में आती तो वे समय का इन्तजार नहीं करते थे। कभी भी बुला लेते थे  फिर चाहे सुबह के चार ही क्यों  न बजे हों  ?

हमारा तो ऐसा विश्वास है कि जब आप गुरुदेव के काम में संलग्न होते हैं तो उनकी ही तरह कार्य करना आरम्भ कर देते हैं। क्योंकि यह हमारा वहम ( अहम् ) ही होता है कि हम काम कर रहे हैं ,असल में गुरुदेव ही हम  से काम करवा रहे हैं ,उन्हीं के निर्देशों का पालन हम कर रहे होते हैं। गुरुदेव ने   हमें कितनी ही बार आधी रात में उठ कर ज्ञानरथ के  निर्धारित कार्य करने को प्रेरित किया है। हम तो धन्य हो गए  गुरुदेव।   

गुरुदेव की सरलता :

गुरुदेव का  व्यवहार इतना सरल था  कि जैसे बड़े ही  साधारण व्यक्ति हों । वे  स्वयं को सदा ही छुपाये   रहे। इसीलिए  कहते भी थे, 

“मुझे मेरा काम कर लेने दो  जिसके लिये मैं इस संसार में आया हूँ। अभी लोग मेरे बारे में  जान जायेंगें , तो हर की पौड़ी  तक लाईन लग जायेगी। इसलिए तुम लोग मुझे चुप-चाप काम कर लेने दो। मेरे जाने के बाद लोग मुझे जानेंगे।”

गुरुदेव ने कैसे अपने आप को छुपाये रखा इसका उदाहरण तो हम पंडित लीलापत जी के संदर्भ में भी दे सकते हैं। पंडित जी  ने पूज्यवर को बार -बार कहा कि अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखो लेकिन गुरुदेव ने हर बार  टाल दिया।  हर बार यही कहा “ ऑटोबायोग्राफी तो बड़े लोगों की होती है ,हम तो बिलकुल ही साधारण पुरष हैं” जब पंडित जी नहीं माने तो उन्होंने यह कह कर टाल  दिया “हमारी ऑटोबायोग्राफी तो आप लोग लिखोगे” पंडित जी ने अपनी पुस्तक में अपने भाव व्यक्त करते हुए लिखा भी है कि अवतारी पुरषों की साधारण बात भी कई संकेत कर जाती है और यही संकेत हम से यह सब लिखवा रहे हैं।  गुरुदेव ने अपने जीवन पर आधारित केवल एक ही पुस्तक “हमारी वसीयत और विरासत” ही लिखी है और उस पुस्तक में  भी अपने बारे में बहुत ही कम और अनुभव अधिक वर्णन किये।   

हम लोग कभी-कभी काम को अधिकता के कारण गुरुजी से मिलने नहीं जाते थे। सोचते थे कि काम तो गुरुजी का ही कर रहे है। व्यर्थ उनका भी और अपना भी समय क्यों  खर्च करे। तब कभी-कभी गुरुजी कहते थे  तुम लोग अभी आ नहीं  रहे हो। आगे चलकर मेरो चरण पादुका पर प्रणाम करने के लिये भी धक्के खाओगे। इतनी लम्बी लाइन लगी रहा करेगी। 

जो सहकर्मी ,परिजन शांतिकुंज जा चुके हैं इस तथ्य पर भली भांति मोहर लगा सकते हैं कि गुरुदेव के कक्ष और अखंड ज्योति के दर्शन के लिए कितनी लंबी लाइन लगती है और कितनी श्रद्धा होती है उन परिजनों के ह्रदय में। 

तो मित्रो ऐसे हैं पूज्यवर के संस्मरण , क्या आप ,हम सब विश्वास कर सकते हैं कि  इस साधरण से दिखने वाले महापुरष ने पूरे विश्व को बदलने का संकल्प लिया और विशाल योजना जिसका नाम “युग निर्माण योजना” है की रचना की।  जिन लोगों को किसी बात का संशय है उन्हें केवल अपनी दृष्टि को ठीक मार्ग पर ,ठीक दिशा देने की आवशयकता है।  युग परिवर्तन तो हो ही रहा है ,और यह सच भी है कोई युग एक जैसा कभी नहीं रहा।  सतयुग ,द्वापर ,त्रेता ,कलयुग आदि आते ही रहे हैं लेकिन उन्हें गति देने के लिए हर बार कोई न कोई मसीहा उस परमसत्ता के सन्देश लेकर आता ही रहा। 

इन्ही शब्दों के साथ अपने लेख को विराम देने की आज्ञा लेते हैं और आपको सूर्य भगवान की प्रथम किरण में सुप्रभात कहते हैं। 

जय गुरुदेव 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित  

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