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शांतिकुंज में फरवरी 1986 का वसंत पर्व part2

ऑनलाइन ज्ञानरथ की ओर  से 2   मार्च 2021  की सुप्रभात एवं शुभ दिन की कामना 

फरवरी 1986  का वसंत एक ऐतिहासिक वसंत था। परमपूज्य गुरुदेव दो वर्ष की  सूक्ष्मीकरण साधना के उपरांत अपने बच्चों के समक्ष उद्बोधन कर रहे थे। अगर हम उस सारे के सारे उद्बोधन को आपके समक्ष प्रस्तुत करें तो एक लघु पुस्तिका ही बन जाएगी।  जैसे हमारे लेखों की प्रथा है कि हम आपको लेखों का source  अवश्य बतातें हैं , तो हमारे सहकर्मी गुरुवर की धरोहर पार्ट 1 में यह अविस्मरणीय लेख पढ़  सकते हैं।  

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विवेकानंद के पास रामकृष्ण परमहंस जाते थे और कहते थे कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए और हमारे पास भी हमारा गुरु आया था यह कहने कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए। उन्होंने कहा-हम चाहते हैं कि दुनिया का रूप बदल जाए, नक्शा बदल जाए, दुनिया का कायाकल्प हो जाए।हमने कहा “ तो आप खुद नहीं कर सकते?”  नहीं खुद नहीं कर सकते। 

जीभ माइक का काम नहीं कर सकती और माइक जीभ का काम नहीं कर सकता। जीभ और माइक दोनों के संपर्क से कितनी दूर तक आवाज फैलती है। हमारा गुरु जीभ है और हम माइक हैं।  हम  उनके विचारों को फैलाते हैं। हम चाहते हैं कि आप भी ‘लायक’ हो जाइए। अगर आपके भीतर ‘लायकी’ पैदा हो जाए तो मजा आ जाए। तब दोनों चीजें शक्तिपात और कुंडलिनी जो भगवान के दोनों हाथों में रखी हुई हैं, आपको मिल जाएंगी। शर्त केवल एक ही है कि  आप अपने आपको ‘लायक’ बना लें, पात्र बना लें। यदि लायक नहीं बने तो मुश्किल पड़ जाएगी। कुंडलिनी जागरण के लिए पात्रता और श्रद्धा का होना पहली शर्त है।

आगे चलने से पहले आइये देखें कुंडलिनी शक्तिपात क्या होता है ?

गुरुदेव इस दोहे से हमें समझाते  हैं 

जाके प्रिय न राम वैदेही। तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।

यह कविता नहीं शक्तिपात था। शक्तिपात के सिद्धांतों को पक्का करने के लिए यह मुझे पसंद आती है और जब तब मेरा मन होता है, उसे याद करता रहता हूँ और हिम्मत से, ताकत से भर जाता हूँ। मुझ में असीम शक्ति भरी हुई है। सिद्धांतों को पालने के लिए, हमने सामने वाले विरोधियों, शंकराचार्यों, महामंडलेश्वरों और अपने नजदीक वाले मित्रों-सभी का मुकाबला किया है। सोने की जंजीरों से टक्कर मारी है। जीवन पर्यंत अपने लिए, आपके लिए, समाज के लिए, सारे विश्व के लिए, महिलाओं के अधिकारों के लिए मैं अकेला ही टक्कर मारता चला गया। अनीति से संघर्ष करने के लिए ‘युग निर्माण’ का ‘विचार क्रांति’ का सूत्रपात किया। इस मामले में हम राजपूत हैं। हमारे भीतर परशुराम के तरीके से रोम-रोम में शौर्य और साहस भर दिया गया है। हम महामानव हैं। कौन-कौन हैं? बता नहीं सकते हम कौन हैं ? ये सारी-की-सारी चीजें वहाँ से हुईं जो मुझे गुरु ने शक्तिपात के रूप में दीं, हिम्मत के रूप में दीं।

कुंडलिनी क्या होती है? कुंडलिनी हम करुणा को कहते हैं, विवेकशीलता को कहते हैं। करुणा उसे कहते हैं जिसमें दूसरों के दु:ख-दरद को देखकर के आदमी रो पड़ता है। विवेक यह कहता है कि फैसला करने के लिए हमको ऊँचा आदमी होना चाहिए। कैसा विवेकशील होना चाहिए जैसे जापान का गाँधी ‘कागाबा’ हुआ। उसने अपना संपूर्ण जीवन बीमार लोगों, पिछड़े लोगों, दरिद्रों और कोढ़ियों की सेवा में लगा दिया। चौबीसों घंटे उन्हीं लोगों के बीच वह काम में रहता। कौन कराता था उससे यह सब? करुणा कराती थी। इसी को हम कुंडलिनी कहते हैं, जो आदमी के भीतर हलचल पैदा कर देती है, रोमांच पैदा कर देती है, एक दर्द   पैदा कर देती है। 

भगवान जब किसी इंसान के भीतर आता है तो एक टस्ट के रूप में आता है करुणा के रूप में आता है। भगवान मिट्टी का बना हुआ जड़ नहीं है, वह चेतन है और चेतना का कोई रूप नहीं हो सकता, कोई शकल नहीं हो सकती। ब्रह्मचेतन है और चेतन केवल संवेदना हो सकती है और संवेदना कैसी हो सकती है? विवेकशीलता के रूप में और करुणा के रूप में आदर्श हमारे पास हों और वास्तविक हों, तो उनके अंदर एक ऐसा मैग्नेट है जो इंसान की सहानुभूति, जनता का समर्थन और भगवान की सहायता तीनों चीजें खींचकर लाता हुआ चला जाता है। 

कागाबा’ के साथ यही हआ। जब उसने दखियारों की सेवा करनी शुरू कर दी तो उसको यह तीनों चीजें मिलती चली गईं। आदमी के भीतर जब करुणा जाग्रत होती है तो वह संत बन जाता है, ऋषि बन जाता है। हिंदस्तान के ऋषियों का इतिहास ठीक ऐसा ही रहा है। जब  किसी का कुंडलिनी जागरण होता है तो ऋद्धियाँ आती हैं, सिद्धियाँ आती हैं, चमत्कार आते हैं। उससे वह अपना भला करता है और दूसरों का भला करता है। मेरा गुरु आया मेरी कुंडलिनी जाग्रत करता चला गया। हम जो भी प्राप्त करते हैं अपनी करुणा को पूरा करने के लिए. विवेकशीलता को परा करने के लिए खर्च कर देते हैं और उसके बदले मिलता है असीम संतोष, शांति और प्रसन्नता। दुःखी और पीड़ित आदमी जब यहाँ आँखों में आँसू भरकर आते हैं तो सांसारिक दृष्टि से उनकी सहायता कर देने पर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। शारीरिक से लेकर मानसिक बीमारों तक, दुखियारों एवं मानसिक दृष्टि से कमज़ोरों से लेकर गिरे हुए आदमी तक, उनके जीवन में जब बदलाव आ जाता है तो उनको देख कर मुझे बहुत ही ख़ुशी होती है ,इतनी ख़ुशी जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह कुण्डिलिनी का ही चमत्कार है। कुण्डिलिनी शक्तिपात किसी महान गुरु द्वारा power  transfer की  क्रिया को   कहते हैं।  

आज का दिन ऊँचे उद्देश्यों से भरा पड़ा है। हमारे जीवन का इतिहास पढ़ते हुए चले जाइए, हर कदम वसंत पंचमी के दिन ही उठे हैं। हर वसंत पंचमी पर हमारे भीतर एक हूक उठती है, एक उमंग उठती है। उस उमंग ने कुछ ऐसा काम नहीं कराया जिससे हमारा व्यक्तिगत फायदा होता हो। समाज के लिए, लोकमंगल के लिए, धर्म और संस्कृति की सेवा के लिए ही हमने प्रत्येक वसंत पंचमी पर कदम उठाए हैं। आज फिर इसी पर्व पर तीन कदम उठाते हैं। पहला कदम सारे विश्व में आस्तिकता का वातावरण बनाने का है। आस्तिकता के वातावरण का अर्थ है-नैतिकता. धार्मिकता, कर्तव्यपरायणता के वातावरण का विस्तार । ईश्वर की मान्यता के साथ बहुत सारी समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। ईश्वर एक अंकुश है। उस अंकुश को हम स्वीकार   करें, कर्मफल के सिद्धांत को स्वीकार करें और अनुभव करें कि एक ऐसी सत्ता दुनिया में काम कर रही है जो सुपीरियर है, अच्छी है, नेक है, पवित्र है। उसी का अंकुश है और उसी के साथ चलने में भलाई है। यह आस्तिकता का सिद्धांत है। इसी को अग्रगामी बनाने के लिए हमने गायत्री माता के मंदिर बनाए हैं। गायत्री माता का अर्थ है विवेकशीलता, करुणा, पवित्रता एवं श्रद्धा। इन्हीं सब चीजों का विस्तार करने के लिए आप से भी कहा गया है कि आप अपने घरों में, पड़ोस के घरों में गायत्री माता का एक चित्र अवश्य रखें। घर-परिवार में आस्तिकता का वातावरण बनाएँ।

यज्ञ और गायत्री की परंपरा को हम जिंदा रखना चाहते हैं। इसके विस्तार के लिए चल पुस्तकालय( mobile library ) चलाने से लेकर ढकेल गाड़ी-ज्ञानरथ चलाने के लिए दो घंटे का समय प्रत्येक परिजन को निकालना चाहिए। यही दो घंटे भगवान का भजन है। भगवान के भजन का अर्थ है, भगवान की विचारणा को व्यापक रूप में फैलाना। हमने यही सीखा है और चाहते हैं कि आप का भी कुछ समय गायत्री माता की पूजा में लगे।

जैसे हमारे गुरुजी ने हमसे समय माँगा था और हमें निहाल किया था, वही बात आज आपसे भी कही जा रही है कि अपने समय का कुछ अंश आप हमें भी दीजिए आस्तिकता को फैलाने के लिए। पाने के लिए कुछ-न-कुछ तो देना ही पड़ता है। पाने की उम्मीद करते हैं तो त्याग करना भी सीखना होगा। आज के दिन हमने अपने ब्रह्मवर्चस का उद्घाटन कराया था। ब्रह्मवर्चस एक सिद्धांत है कि मनुष्य के भीतर अनंत शक्तियों का जखीरा सोया हुआ है, जिसे जगाना है। जगाने के लिए तप करना पड़ता है। तप करके हम अपने भीतर सोए हुए स्रोतों को जगा सकते हैं, उभार सकते हैं। तप करने का सिद्धांत यह है जिससे खाने-पीने से लेकर ब्रह्मचर्य के नियम पालने तक के बहिरंग तप आते हैं और भीतर वाले तप में हम अपनी अंतरात्मा और चेतना को तपा डालते हैं । तप करने से शक्तियों आती हैं, मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए सामान्य जीवन में आस्तिकता अपनानी और बहिरंग जीवन में तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या का अर्थ लोकहित के लिए, सिद्धांतों के लिए मुसीबतें सहने से है। तप करने की शिक्षा ब्रह्मवर्चस द्वारा सिखाते हैं। यह एक प्रतीक है, सिंबल है, एक स्थान है। 

मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण, यही हमारे दो सपने हैं। हमारी कुंडलिनी और शक्तिपात इन्हीं दो प्रयोजनों में काम आती है,  तीसरे किसी प्रयोजन में नहीं। तपपरायण और लोकोपयोगी जीवन-यही मनुष्य में देवत्व का उदय है। धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग वैकुंठ में ही नहीं होता, वरन जमीन पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे आदमी, शरीफ आदमी, अच्छी नीयत के आदमी ठीक पंरपरा को अपनाकर भले आदमियों के तरीके से रहते हैं, वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है। संत इमर्सन कहते थे, ‘मुझे कहीं भी भेज दो हम उसको स्वर्ग बनाकर रख देंगे।’ हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा मोहल्ला बना दें, एक ऐसा ग्राम बसा दें, जिसमें त्याग करने वाले, सेवा करने वाले लोग आएँ और वहाँ पर सिद्धांतों के आधार पर जिएँ। हलकीफुलकी, हँसती-हँसाती शांति की जिंदगी जिएँ, मोहब्बत की जिंदगी जिएँ और यह दिखा सकें कि लोकोपयोगी जिंदगी भी जी जा सकती है क्या? 

धरती पर इसका एक नमना बनाने के लिए हमने गायत्री नगर बनाया है और आपको दावत देते हैं कि यदि आप अपने बच्चे को संस्कारवान नहीं बना सकते तो उसको हमारे सुपुर्द कर दीजिए। आप कौन हैं? हम वाल्मीकि ऋषि हैं और वाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी औरत को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। दोनों संस्थाओं की वसंत पंचमी के दिन इसीलिए स्थापना की गई है। आस्तिकता के लिए, ज्ञान यज्ञ के लिए, विचार क्रांति के लिए यह एक नमूना है।

तपश्चर्या के सिद्धांतों को प्राणवान बनाने के लिए, ज्ञानविज्ञान के लिए, ब्रह्मवर्चस और आस्तिकता को जीवित करने के लिए, धरती पर स्वर्ग पैदा करने के लिए, हिल-मिलकर रहने और त्याग, बलिदान, सेवा की जिंदगी जीने के लिए गायत्री नगर बसाया गया है। लोग यहाँ हमारा प्यार पाने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। मेरा भी मन था कि  नैमिषारण्ये के तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आएँ और हिल-मिलकर काम करें, प्यार की बातें करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते हैं, ऐसा नगर बसाना चाहते हैं, जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन, भावी संसार, अगर होगा तो स्वर्ग जैसा कैसे बनाया जा सकेगा? स्वर्ग में शांति का, परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं ? ऐसा हम गायत्री नगर का उद्घाटन करते हैं । चूँकि हमारे गुरु ने यही दिया और उसके लिए वायदा किया कि अगर तेरा  उद्देश्य  ऊँचा है तो तेरे लिए कभी कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों, तो आपको कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा।

मेरी एक ही इच्छा और एक ही कामना रही है कि वसंत पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतर जो पक्ष है, उस पिटारी को खोलकर दिखाऊँ कि मेरे अंदर कितना दर्द है, कितनी करुणा है, जीवन को पवित्र बनाने की कितनी संवेदना है। यही खोलकर आपको दिखाना चाहता था। अगर आपको ये चीजें पसंद हों तो मैं चाहता हूँ कि आप इन चीजों को देखें, इनको परखें, छुएँ और हिम्मत हो तो इनको खरीद ही ले जाएँ। अपने गुरु का अनुग्रह मैंने खरीद कर लिया है और चाहता हूँ कि आप भी अपने गुरु का अनुग्रह खरीद कर ले जाएँ, शांति खरीदकर ले जाएँ, महानता खरीद कर ले जाएँ और जो कुछ भी दुनिया में श्रेष्ठ है, वह सब खरीद कर ले जाएँ तो आप धन्य हो जाएँ। खरीदने के लिए कहाँ जाएँ? हम देंगे आपको, जैसे हमारे गुरु ने दिया शक्तिपात के रूप में और कुंडलिनी के रूप में। यही है हमारी आकांक्षा और अभिलाषा।

जय गुरुदेव 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में

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