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दो गुरु-शिष्यों के मार्मिक ( दिल को छू जाने वाले ) संस्मरण

20 अक्टूबर 2020 का ज्ञानप्रसाद

आज का ज्ञान प्रसाद थोड़ा लम्बा अवश्य है लेकिन है बहुत ही प्रेरणा दायक और शिक्षाप्रद। लेख में दो अलग -अलग संस्मरण वर्णित किये गए हैं। पहला संस्मरण परमपूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत जी की आसाम यात्रा यात्रा को वर्णित करता है। यात्रा के दौरान घटित परिस्थितियों से मिली शिक्षा का वर्णन अति सुन्दर है। दूसरे संस्मरण में रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकनन्द का वार्तालाप बहुत ही मार्मिक है। मार्मिक का अर्थ touching दिल को छू जाने वाला होता है। इतने सम्पन्न ,समृद्ध परिवार की कभी ऐसी दशा हो जाएगी कि दाने -दाने के मोहताज हो जायेंगें। उनके पिता जी कोलकाता हाई कोर्ट में attorney थे। रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र को जगत गुरु बना दिया और परमपूज्य गुरुदेव ने पंडित लीलापत शर्मा जिम का काया कल्प कर दिया। वह स्वयं कहते थे ” गुरुदेव ने हमें क्या से क्या बना दिया “

विवेकानंद जी वाला संस्मरण हमारे सहकर्मी आदरणीय जसोदा सिंघानिया जी द्वारा भेजा गया था। आशा करते है कि इस पुरषार्थ से बाकि के सहकर्मियों को भी प्रेरणा मिलेगी। आप सब बहुत ही सूझवान है। हम आपको आपके द्वारा लिखे हुए संस्मरण ,लेख ,अनुभूतिआँ ऑडियो ,वीडियो हमें भेजने के लिए आमंत्रित करते हैं। हम अपने चैनल पर और सोशल मीडिया साइट्स पर शेयर कर सकते हैं


तो आईये ज्ञानगंगा में डुबकी लगाएं और धन्य हो जाएँ।


गुरुदेव के साथ आसाम यात्रा

एक बार गुरुदेव ने लीलापत जी को कहा :

” बेटा आसाम चलना है । उधर मिशन का विस्तार बिलकुल नहीं है ।”

उस समय आसाम के लिए मथुरा से बरौनी स्टेशन जाना पड़ता था । मथुरा से बरौनी पहुँचने के लिए एक दिन तथा एक रात लगती है । यह पटना से आगे है । वहाँ से आसाम के लिए दो दिन दो रात लगते हैं । आसाम जाने के लिए उस समय मथुरा से तीन दिन तीन रात का समय लगता था ।

लीलापत जी ने कहा:

” जहाँ भी जाने की आज्ञा होगी, चले जाएँगे ।”

तो सुनिए गुरुदेव और लीलापत जी के संवाद :

माता जी ने रास्ते में खाने के लिए चना मुरमुरा रख दिए थे । रास्ते में जब भोजन का समय हुआ तब गुरुदेव ने चना मुरमुरा खोलकर हमको दिए, हमने चना मुरमुरा खा लिए परन्तु, हमारा पेट नहीं भरा । हमने समझा कहीं अन्य जगह जहाँ अच्छा भोजन मिलेगा गुरुदेव वहीं पर भोजन कराएंगे, परन्तु गुरुदेव ने रास्ते में कहीं भी भोजन नहीं कराया । शाम को भोजन का समय हुआ तब गुरुदेव ने फिर चना मुरमुरा हमको दिए और स्वयं ने भी ले लिए । हमने चना मुरमुरा खाये, गुरुदेव से कुछ नहीं कह सके, परन्तु हमको रात भर नींद नहीं आई भूख लग रही थी । हमने सोचा अगर आसाम तक चना मुरमुरा ही गुरुदेव खिलाते रहे तब तो हमारे प्राण ही निकल जाएंगे । दूसरे दिन जब भोजन का समय हुआ तब गुरुदेव ने चना मुरमुरा फिर हमको दे दिए । हमने गुरुदेव को मना कर दिया और कहा गुरुदेव हमको रात भर भूख के मारे नींद नहीं आई । भोजन बगैर हम नहीं रह सकते । गुरुदेव ने कहा-बेटा अगला स्टेशन आएगा वहीं से पूड़ी ले लेना । अगला स्टेशन आया तब गुरुदेव ने कहा-जा बेटा पूड़ी ले आ । हम पूड़ी लेकर आए सब्जी भी साथ में थी उसमें प्याज भी पड़ी हुई थी जब हम भोजन करने लगे तब उस सब्जी में प्याज थी । हमने कहा-गुरुदेव इस सब्जी में तो प्याज डाली है रूखी पूड़ी खाना कठिन है । गुरुदेव ने कहा-बेटा चाय वाला डिब्बे में चाय बेच रहा है, उससे चाय ले लो, पूड़ी खाने में आसानी रहेगी । हमने चाय ली और उसके सहारे से पूड़ी खाई । हमने सोचा तीन दिन तीन रात में तो हमारे प्राण ही निकल जाएंगे । गुरुदेव के साथ बड़े बुरे फंस गए । हमने कहा-गुरुदेव जितने भी गुरु महात्मा हैं मिठाई फल दूध रबड़ी रस मलाई खाते हैं और चेलों को भी खिलाते हैं परन्तु आप चना मुरमुरा खा रहे हैं और हमको भी खिला रहे हैं इसका क्या रहस्य है ? गुरुदेव ने कहा-

    " बेटा जिसकी जीभ पर काबू नहीं जो मीठा, पूड़ी-कचौड़ी, पकौड़ी, फल दिन भर खाते हैं वे अध्यात्मवादी हैं ही नहीं । अध्यात्मवादी को सबसे पहले जीभ को ठीक करना पड़ता है । यह जीभ ही ताड़का है पूतना है । इससे मंत्र का जाप करते हैं । जब जीभ ही ठीक नहीं है तब जो मंत्र जप करेंगे वह कैसे सफल होगा । जब बन्दूक सही नहीं है तब कारतूस क्या करेगा । जीवन बंदूक है मंत्र-जप कारतूस है । शेर को मारने के लिए बढ़िया बन्दूक चाहिए । ऋद्धि-सिद्धि पाने  के लिए जीवन को ठीक करना पड़ता है । जो भी मंत्र जप करते हैं वे मरी हुई जीभ से जप करते हैं । इससे उनका मंत्र जप करना अनुष्ठान करना सफल नहीं होता है । मिर्च मसाले मीठा कचौड़ी पकौड़ी खाने से पेट भी खराब रहता है और आदमी बीमार रहता है । सबसे पहले जीभ को ठीक  करना पड़ता है। सबसे पहला संयम जीभ का संयम है । प्रत्येक व्यक्ति जप तो करता है, परन्तु उनकी जीभ काबू में नहीं होती, इसीलिए उनको मंत्र की सिद्धि नहीं होती । हमने यह शिक्षण जीवन में ग्रहण किया । इसी कारण हमारा स्वास्थ बिल्कुल ठीक है । इतनी उम्र  पहुंचकर भी हम अपने आपको जवान और स्वस्थ महसूस करते हैं । अगर किसी को अपना स्वास्थ ठीक रखना है और सौ
वर्ष जीना है तो सबसे पहले जीभ को काबू में करना पड़ेगा । जिसकी जीभ काबू में नहीं होती उसकामंत्र कभी सफल नहीं होगा । चाहे रात दिन जप करता रहे । मंत्र के चमत्कार देखने हैं तो जीभ को ठीक करना पड़ेगा । गुरुदेव ने चौबीस वर्ष तक गाय को जौ खिलाकर उसके गोबर से जो जौ निकले उनकी रोटी छाछ में मिलाकर खाते रहे तब उनका गायत्री मंत्र सिद्ध हुआ । गुरुदेव ने मंत्र सिद्धि का रहस्य हमको बतलाया । जो गायत्री मंत्र की सिद्धि चाहते हैं उनको जीभ को काबू में रखना पड़ेगा । " 

आसाम के दौरे में गुरुदेव से जीव पर काबू रखने की बात ही होती रही । गुरुदेव ने कहा-अगर कोई व्यक्ति स्वादेन्द्रिय पर काबू कर ले तो उसका सारी इंद्रियों पर काबू हो जाता है । गुरुदेव ने कहा-जो इंद्रिय सबसे अधिक परेशान करती है वह स्वाद इंद्रिय है और दूसरी कामेन्द्रिय । दोनों पर काबू करने पर गुरुदेव ने कहा-सारी इंद्रियों पर काबू हो जाता है । अब आसाम का स्टेशन तिनसुकिया आने लगा तब गुरुदेव ने कहा-सामान संभालो स्टेशन आ रहा है । हमने सारा सामान इकट्ठा कर लिया स्टेशन पर उतर गए । उस समय आसाम में कोई शाखा नहीं थी । एक धर्मशाला में ठहरे या किसी भाई के घर ठहरे थे ठीक याद नहीं है । रात भर हमको मच्छर काटते रहे । रात भर नींद नहीं आई ।सुबह गुरुदेव ने स्नान कर लिया । तब हमने गुरुदेव से कहा –

गुरुदेव युग निर्माण होगा या नहीं होगा यह हमको मालूम नहीं, परन्तु हमारा तो युग निर्माण हो गया । गुरुदेव ने कहा-क्या बात है बेटा बतला । हमने कहा रात भर मच्छरों ने सोने ही नहीं दिया है । अगर हम यहाँ तीन चार दिन रहे तो बीमार पड़ जाएँगे । । गुरुदेव ने कहा-बेटा इसका इलाज हम तुमको रात को सोते समय बतला देंगे । गुरुदेव ने हमसे कहा बेटा बाहर जा और एक दो आदमी ला उनसे कार्यक्रम के संबंध में कुछ बात करेंगे उन्हें अपना उद्देश्य बताएँगे । आठ दस भाइयों को लेकर हम आए । गुरुदेव उनसे बात करते रहे । पहले स्वास्थ्य के विषय में बच्चों परिवार, दुकान नौकरी सबके बारे में उनसे पूछते रहे फिर मिशन की बातें उनसे करने लगे । दिन भर वहाँ जिनको हम लाते थे उनसे बातें करते रहे ।

रात को सोने का समय आया तब हमने गुरुदेव से कहा-गुरुदेव मच्छरों ने तो अभी से हम पर वार करना शुरू कर दिया है इनका इलाज बताएँ । गुरुदेव ने कहा-बेटा तेरे पास चादर है इससे चारों तरफ बदन को ढक कर सो जा, सिर्फ थोड़ी सी आँखें ही खुली रहें । हमने कहा-अगर हम गुरुदेव के साथ एक माह दौरे पर रहे तब हम बीमार हो जाएंगे। हमने गुरुदेव से कहा-गुरुदेव हम जब अध्यात्मवादियों को, कथावाचक, महात्माओं, प्रवचनकर्ताओं को देखते हैं तो उनके खाने की अलग व्यवस्था होती है । प्रवचन जो करते हैं उनको गरम हलुआ खिलाते हैं जिससे गला ठीक रहे । भोजन में पूड़ी, मिठाई, सब्जी आदि चीजें होती हैं और ठहरने को अलग मकान । जो सबसे बड़ा पूंजीपति होता है जिसके मकान में सब साधन होते हैं उनके यहाँ सबको ठहराया जाता है । सोने का अलग तथा मिलने वालों का अलग कमरा होता है और चरण छूने वालों की लाइन लगी रहती है । दो तीन घंटे सुबह चरण छूने का ही कार्यक्रम चलता है । हम तो समझते थे कि हम भी ऐसे अध्यात्मादी बनेंगे पर आपने तो हमारा कचूमर ही निकाल दिया । गुरुदेव ने कहा-

” बेटा जो शारीरिक सुख सुविधाओं को देखते हैं उसको केवल शरीर ही दीखता रहता है । वह उसकी पूर्ति में ही लगा रहता है । ऐसे धर्माचार्य जो होते हैं वो अध्यात्मवादी नहीं होते । वे सब शरीर को ही भोजन कराते हैं उसी का ही ध्यान रखते हैं । शरीर का मालिक आत्मा है उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। इस समय यह परम्परा सी बन गई है कि गुरु के बाद जो उसका चेला होता है उसको गद्दी पर बिठा देते हैं । उसने कभी त्याग बलिदान किया या नहीं, वह अध्यात्म को जानता है या नहीं । जो व्यक्ति अध्यात्म से कोसों दूर है उनको अध्यात्म का पता नहीं है और वे गद्दी पा जाते हैं । अध्यात्मवादी शरीर का ध्यान नहीं आत्मा का ध्यान रखता है उसको भोजन कराता है । आत्मा का भोजन स्वाध्याय है । तुझे मालूम है कि रेल में सारे रास्ते हम पुस्तक पढ़ते आते हैं । व्यक्ति की आत्मा मर गई है । तभी तो अध्यात्म की ऐसी हालत हो गई है । कुछ प्रवचन कुछ मंत्र याद कर लिए हैं उनको ही कहते रहते हैं और अपने अहम् की पूर्ति करते रहते हैं । बेटा अध्यात्मवादी उसको कहते हैं जो अपने लिए कम से कम खर्च करता है और दूसरों की उदारता पूर्वक सहायता करता रहता है । अपने शरीर का नहीं आत्मा का ध्यान रखता है । “

गुरुदेव के आसाम के दौरे से हमको जो शिक्षण मिला,जहाँ तक हो सका अपने जीवन में धारण किया । यही कारण है कि हमको अध्यात्म का पूरा-पूरा लाभ मिला । कोई भी व्यक्ति उनके शिक्षण को अपना कर अध्यात्म का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है।


  • गुरू क्या है * यह लेख जसोदा सिंघानिया जी द्वारा भेजा गया था।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी कैंसर रोग से पीड़ित थे। उन्हें खाँसी बहुत आती थी और वे खाना भी नहीं खा सकते थे। स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु जी की हालत से बहुत चिंतित थे।

एक दिन की बात है स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने विवेकानंद जी को अपने पास बुलाया और बोले –

“नरेंद्र, तुझे वो दिन याद है, जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था ? तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था। परंतु अपनी माँ से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर खा लिया है, ताकि तेरी गरीब माँ थोड़े बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई* *को परोस दें। हैं न ?”

नरेंद्र ने रोते-रोते हाँ में सर हिला दिया।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस फिर बोले – “यहां मेरे पास मंदिर आता, तो अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा पहन लेता। परन्तु मैं भी झट जान जाता कि तेरा शरीर क्षुधाग्रस्त है। और फिर तुझे अपने हाथों से लड्डू, पेड़े, माखन-मिश्री खिलाता था। है ना ?”

नरेंद्र ने सुबकते हुए गर्दन हिलाई।

अब रामकृष्ण परमहंस फिर मुस्कुराए और प्रश्न पूछा – “कैसे जान लेता था मैं यह बात ? कभी सोचा है तूने ?”

नरेन्द्र सिर उठाकर परमहंस को देखने लगे।

“बता न, मैं तेरी आंतरिक स्थिति को कैसे जान लेता था ?”

नरेंद्र – “क्योंकि आप अंतर्यामी हैं गुरुदेव”।

राम कृष्ण परमहंस – “अंतर्यामी, अंतर्यामी किसे कहते हैं ?”

नरेंद्र – “जो सबके अंदर की जाने” !!

परमहंस – “कोई अंदर की कब जान सकता है ?”

नरेंद्र – “जब वह स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।”

परमहंस – “अर्थात मैं तेरे अंदर भी बैठा हूँ। हूँ ना ?”

नरेंद्र – “जी बिल्कुल। आप मेरे हृदय में समाये हुए हैं।”

परमहंस – “तेरे भीतर में समाकर मैं हर बात जान लेता हूँ। हर दुःख दर्द पहचान लेता हूँ। तेरी भूख का अहसास कर लेता हूँ, तो क्या तेरी तृप्ति मुझ तक नहीं पहुँचती होगी ?”

नरेंद्र – “तृप्ति ?”

परमहंस – “हाँ तृप्ति! जब तू भोजन करता है और तुझे तृप्ति होती है, क्या वो मुझे तृप्त नहीं करती होगी ? अरे पगले, गुरु अंतर्यामी है, अंतर्जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्यों के भीतर बैठा सब कुछ भोगता है। मैं एक नहीं हज़ारों मुखों से खाता हूँ।”

याद रखना, गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वह तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कहीं है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही, तब भी जीऊंगा, तेरे माध्यम से जीऊंगा। मैं तुझमें रहूँगा।

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णुः गुरुः देवो महेश्वरः
गुरुर्साक्षात परब्रह्मः तस्मै श्री गुरुवे नमः

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