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लीलापत जी कहते हैं :

पूज्य गुरुदेव की लिखी हुई एक -एक पंक्ति हमारे लिए वेद -वाक्य की तरह हैं जो जितनी बार पढ़े जाएँ कम है और हर बार एक नया सन्देश लेकर आते हैं। परिजन इस पुरषार्थ से पता नहीं क्या अर्थ निकालेंगें लेकिन इनके प्रकाशन के पीछे अवश्य ही प्रज्ञावतार की कोई कल्याणकारी योजना होगी। इस संदर्भ में यह लिखे बिना मन नहीं भरता की जब गायत्री तपोभूमि में परमपूज्य गुरुदेव और वंदनीय माता जी के पार्थिव अवशेष पधारे ,उसी दिन से इस तरह की कई प्रेरणाएं मन में उभरीं।

नया साहित्य लिखना , विचार क्रांति की छोटी -छोटी पुस्तकें तैयार करनी ,सम्पर्क शिविर लगाने ,और सृजन सैनिकों से सम्पर्क बढ़ाने के अभिनव प्रयास उन्ही की प्रेरणा के परिणाम हैं। यह प्रयास कोई अधिक धूमधाम से तो नहीं हुए लेकिन परिजनों के responses ने हमें बहुत ही उत्साहित किया। नया साहित्य बहुत लोकप्रिय हो रहा है। वर्ष भर में कुछ पुस्तकों के 3 -4 editions निकल चुके हैं। मांग निरंतर बढ़ रही है। जहाँ इन पुस्तकों ने प्रेरणा दी वहीँ यह आदेश भी हुआ की गुरुदेव के पत्रों को सार्वजनिक किया जाये।

इन पत्रों में गुरुदेव के ‘ महामानव ‘ और ‘ युग पुरष ‘ वाले रूप के दर्शन होंगें। यह ऐसे रूप हैं जिनकी कल्पना और व्याख्या करना हमारी योग्यता से परे है। इन रूपों के देखने का जितनी बार भी प्रयास किया एक झलक देखते ही अर्जुन की तरह अपना मन कांप गया। गीता के ग्यारवें अध्याय में अर्जुन भगवान का विराट रूप देख कर कहता है :

” हे प्रभु ! आप मुझे अपना वही रूप दिखाइए जिसका दर्शन और सानिध्य मुझे हर पल मिलता रहा है “

पूज्य गुरुदेव का विराट रूप भी सभी को प्रेरित करता है परन्तु हम सब परिजनों ने उन्हें स्नेहिल पिता ,करुणा और अनुग्रह से भरी मार्गदर्शक सत्ता के रूप में अधिक अनुभव किया है। वही रूप हम सबको अधिक प्रिय भी लगता है और दैनिक जीवन में उपयोगी भी।

इन पत्रों में गुरुदेव द्वारा कई बहुत ही साधारण कार्यों का ( पुस्तकों का हिसाब -किताब ) विवरण भी है। पाठक इनको देख कर हैरान भी हो सकते हैं कि इतनी बड़ी मार्गदर्शक सत्ता को इन छोटे -छोटे झंझटों में पड़ने से क्या मिलेगा। अगर हम गम्भीरता से देखें तो इसमें चौंकने की कोई बात नहीं होनी चाहिए।

-भगवान राम भी तो बनवास के दिनों में फूल चुनने ,लकड़ियां बीनने जाया करते थे।
-लंका पर आक्रमण करने के लिए उन्होंने गुफाओं और कंदराओं में जाकर रीछ वानरों से सम्पर्क किया था। -भगवान कृष्ण ने गायें चरायीं, साथियों की खोई गेंदें तलाशी , रथ चलाने और घोड़ों को सँभालने जैसे काम किये।

ऐसे साधारण काम करने में भगवान की सत्ता कम नहीं होती बल्कि उस ” कर्म की महत्ता ही सिद्ध होती है “। हमारे दिल में एक दम प्रश्न उठता है – भगवान इस छोटे से कार्य को कितनी श्रद्धा से कर रहे हैं। कार्य चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो कुशलता से करना चाहिए। उस में भगवान के प्रति समर्पण और प्रीति भाव हो तो सफल होते देर नहीं लगती। गुरुदेव के पत्रों में ही नहीं उनके लीला चरित में भी कर्म को पूजा – work is worship ,आराधना और योग में परिणत करने के सूत्र छिपे पड़े हैं।

इस पुस्तक में दिए गए सभी पत्र 1961 से 1967 के बीच के हैं। उन दिनों हमारी मथुरा आने की तैयारी चल रही थी। कभी मन इतना तेज़ भागता कि अभी बोरिया बिस्तर बांध कर चल पड़ें और कभी उतनी ही तेज़ी से पीछे भागता। गुरुदेव के प्रत्यक्ष सानिध्य ने तो हमें सवारने और काटने -छाँटनें की कोई कसर नहीं छोड़ी , इन पत्रों से भी हमें भरपूर मार्गदर्शन मिला। कई बार किसी पत्र को निकाल कर पढ़ना शुरू हो जाते और कई -कई बार पढ़ते और फिर टकटकी लगा कर गुरुदेव के हाथ से लिखे शब्दों की लिपि ( script ) को घंटों निहारते रहते। इस तरह घंटों निहारना ” ध्यान ” बन जाता और मन में एक नया ही अर्थ उभरता। यह तो ध्यान साधना है। किसी वस्तु पर अपना ध्यान केंद्रित करना। इन पत्रों ने कई बार हमारी दुविधा ,संशय और परेशानियों का निवारण भी किया। जब भी कभी इस प्रकार की स्थिति आयी हम इन पत्रों को लेकर बैठ गए और घंटों गुरुदेव से बातें करते रहे। कई बार ” प्रकाश कौंधने ” ( बिजली कड़कने ) जैसी अनुभूति हुई। उस प्रकाश में समस्याएं तार- तार होती दिखीं और समाधान मिल गया।

परिजनों के समक्ष इन पत्रों के प्रस्तुत करने का अभिप्राय यही है क़ि उन्हें भी इस तरह का आंतरिक ,व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में वैसा ही प्रकाश मिलेगा जैसा हमें मिलता रहा है। हम तो यही कहना चाहेंगें क़ि इनको केवल हमारे पत्र न समझा जाये बल्कि ” मार्गदर्शक सत्ता द्वारा दिखाया गया प्रकाश समझा जाये।”

इसी तरह की अनुभूति हमें खुश्वाहा जी ने बताई जब वह हमें आंवलखेड़ा स्थित गुरुदेव की जन्म स्थली का दर्शन explain कर रहे थे। जन्म स्थली में unique सूर्य मंदिर को दिखाते हुए कहने लगे।

” हमारी जो भी समस्या होती है हम एक कागज़ के टुकड़े पर लिख कर गुरुदेव के चरणों में रख देते हैं और समाधान के लिए कहते हैं गुरुदेव आप ही इसका उपाय निकालो और सुबह वह समस्या सुलझी होती थी। “
आज के विज्ञान-युग और प्रत्यक्ष्यवाद युग में ऐसी बातों पर विश्वास करना कठिन सा प्रतीत होता है परन्तु श्रद्धा और विश्वास अटल हो तो कुछ भी सम्भव है -कुछ भी। लेकिन कहाँ से आए ऐसी श्रद्धा ,समर्पण और विश्वास -ज़रा सोचिये।

हम अपने पाठकों से अनुरोध करेंगें कि इस लेख को आप इतनी श्रद्धा से पढ़ें कि यह आप के ह्रदय के भीतर तक उतर जाये। यह एक गुरु का अपने समर्पित शिष्य के प्रति अनुग्रह है। आप विश्वास रखिये कि अगर आपकी श्रद्धा अटूट है तो यह पत्र भगवत गीता की तरह उपयोगी सिद्ध होंगें।

-लेकिन एक बात अत्यंत ज़रूरी है और वह है – ” शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण और पात्रता “

भगवत गीता भी तो अर्जुन और भगवान कृष्ण का पर्सनल संवाद ही तो है। यह महान ग्रन्थ हज़ारों वर्षों से करोड़ों साधकों को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रही हैं।

आज का लेख अंत करने से पहले :

आज का लेख पहले दिए लेख के साथ ही connected है। पाठकों द्वारा अनुरोध किया जा रहा है कि शीघ्र अति शीघ्र गुरुदेव और लीलापत जी के पत्रों पर लेख लिखा जाये। उनके लिए प्रतीक्षा करना कठिन हो रहा है। हम आपकी जिज्ञासा से पूरी तरह अवगत हैं। कईं दिनों से पत्रों का अध्यन,चिंतन ,मनन किया जा रहा है, points लिखे जा रहे है। कई बार रात को दो बजे उठ कर अध्यन करना आरम्भ कर देते हैं। जल्दी ही इस दिशा में आप हमारा पुरषार्थ देखेंगें लेकिन आज एक sample पत्र पोस्ट कर रहे हैं।

जय गुरुदेव

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