ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में आज का ज्ञानप्रसाद, गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद, परम वंदनीय माताजी की उस शक्ति का वर्णन कर रहा है जिसे सुनकर/देखकर सभी स्तब्ध रह जाते हैं। अधिकतर लोग माँ की शक्ति से भलीभांति परिचित थे लेकिन ऐसों की भी कमी नहीं थी जो शंकाओं से घिरे थे।


आज के लेख से हमें शिक्षा लेने की ज़रुरत है कि गुरुदेव के महाप्रयाण के मात्र चार-पांच माह बाद ही माँ ने इतना भव्य “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” का कैसे आयोजित करा लिया, हमें संकल्प लेने की आवश्यकता है कि घर-परिवार के कार्य तो चलते ही रहेंगें, गुरुकार्य सर्वोपरि है। ऐसा नहीं है कि घर-परिवार की ज़िम्मेदारी (जो हमारा परम कर्तव्य है) को छोड़कर गुरुकार्य में ही समर्पित हो जाएँ, यह Time management का विषय है, 24 घंटों में से मात्र 1-2 घंटे में ही बहुत कुछ हो जाता है।
आज के लेख के लिए साथिओं से समयदान की विशेष याचना कर रहे हैं क्योंकि लेख में दिए गए दो लिंक (एक “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” की वीडियो और दूसरा “शताब्दी समारोह स्मारिका”) अवश्य देखने चाहिए
दोनों ही होमवर्क बहुत बड़े हैं लेकिन टुकड़ों में ही सही, देखने का प्रयास अवश्य करें।
कल का लेख 1992 की उस ऐतिहासिक वीडियो को लिए हुए है जिसने आज तक न जाने कितनों के आँसुओं की बाढ़ लगा दी है।
तो साथिओ अब समय है गुरुसत्ता के चरणों में समर्पित होकर, गुरुज्ञान के अमृतपान का।
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ऑनलाइन/ऑफलाइन दोनों स्रोतों पर उपलब्ध ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पादित 118 Scanned पन्नों और 32 Text पन्नों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” पर आधारित लेख श्रृंखला का प्रथम लेख हमने 8 मार्च 2026 को प्रस्तुत किया था। परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित इस लेख श्रृंखला का आज 25वां लेख प्रस्तुत किया गया है।
शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस व गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ता एवं गायत्री परिवार के परिजन तो पहले से ही अपनी माँ की महिमामयी शक्ति से सुपरिचित थे लेकिन अनेकों बाहरी लोग ऐसे भी थे जो अनेको शंकाओं-कुशंकाओं से घिरे थे। वे सोचते थे कि अब मिशन का संचालन कैसे और किस तरह से होगा। ऐसी बातें लोगों के टूटे ह्रदय से रिस-रिसकर हवाओं के साथ घुलकर वंदनीय माताजी के पास भी आतीं लेकिन इन सबका माताजी पर कभी कोई असर नहीं हुआ। वह तो ब्रह्मदीप यज्ञ समाप्त होते ही अपने आराध्य के चरणों में भावभरी श्रद्धांजलि अर्पित करने की तैयारियों में जुट गई थीं। इसे उन्होंने व्यापक समारोह का स्वरूप देने का निश्चय किया ताकि उनके साथ उनकी सभी संतानें अपने प्रभु को अपनी भाव श्रद्धा समर्पित कर सकें।
क्या थे ब्रह्मदीप यज्ञ ?
28 अप्रैल 1990 को (महाप्रयाण के 35 दिन पूर्व) ब्रह्मदीप यज्ञों का निश्चय परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं किया था। इस दिन एकांतवास के बावजूद उन्होंने कुछ निकटवर्ती कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठी बुलाकर यह तय किया था कि 7-8 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भोपाल, कोरबा, मुजफ्फरपुर, अहमदाबाद, लखनऊ एवं जयपुर में यह यज्ञ आयोजित किए जाएं।
परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद, हालांकि हर एक के मन में यह अटूट इच्छा थी कि वह शांतिकुंज जाकर अपने प्रभु को श्रद्धांजलि अर्पित करे, उन्हें अपने भाव सुमन चढ़ाए लेकिन किसी ने भी ब्रह्मदीप यज्ञों को करवाने में कोई कोताही नहीं बरती, गुरु का आदेश एवं इच्छा का पालन करना हर शिष्य का परम धर्म है। 2 जून, 1990 को गुरुदेव के महाप्रयाण का समाचार मिलने के बावजूद, अनुशासित परिजन अपने सद्गुरु के आदेश को शिरोधार्य करके सौंपे गए कार्य को पूरा करने के लिए जुटे रहे। सभी की भावनाएं कसमसाईं, छटपटाईं, तड़फड़ाईं तो बहुत थीं लेकिन गुरुदेव का आदेश सर्वोपरि था।
अपने बच्चों के इन मनोभावों से माताजी परिचित थीं। उन्हें अपनी संतानों की वेदना का ज्ञान था। इसी वजह से उन्होंने “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” के आयोजन की घोषणा की थी । इसकी तैयारियां बहुत चुनौती भरी थीं। जून के पंद्रह दिन और जुलाई, अगस्त एवं सितंबर के महीने ही थे। इसमें भी ज्यादातर समय वर्षा-काल का था। इस छोटी सी अवधि में कुंभ जैसे आयोजन की पूरी तैयारी करनी थी। कुंभ के लिए प्रशासन अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ एक वर्ष तैयारी करता है लेकिन यहां सब कुछ बिना किसी सरकारी सहायता के किया जाना था। अपनी माँ के एक इशारे पर उसकी संतानें क्या कुछ कर सकती हैं इसका एक अनूठा उदाहरण पूरे उत्तर भारत की जनता को वर्ष 1990 में देखने को मिला।
यह समारोह 1-4 अक्टूबर 1990 को आयोजित हुआ था। लगभग 78 मिनट की विस्तृत वीडियो, जिसका लिंक यहाँ दे रहे हैं, देखकर इस समारोह की छटा देखते ही बनती है। पाठकों से निवेदन है कि समय निकाल कर ( चाहे टुकड़ों में ही सही ) वंदनीय माताजी की शक्ति को दर्शाती इस वीडियो को अवश्य देखें।
शिक्षक, किसान, न्यायाधीश, चिकित्सक, इंजीनियर, आई.ए.एस. अधिकारी सभी इस मिशन से जुड़े हुए थे। 20000 से अधिक स्वयंसेवक तो 25 सितंबर से ही आ गए थे। आते ही ये बिना किसी शिक्षा, जाति या वर्ण के पूर्वाग्रह के सब-के-सब एकजुट होकर कार्यक्रम में लग गए। टेंट, शामियाने, जल-बिजली आदि की व्यवस्था, ऊबड़-खाबड़ स्थानों की सफाई, विशाल भोजन भट्ठियों का निर्माण आदि सभी काम इन्हीं सबने मिल-जुलकर पूरे किए। इन सारे कामों का दायरा काफी व्यापक परिक्षेत्र में फैला हुआ था। पूरे हरिद्वार नगर की 15 मील की लंबाई व 8 मील चौड़ाई में कनखल से मोतीचूर तक 24 नगरों को बसाने की व्यवस्था की गई।
इस लेख को पढ़ रहे अनेकों साथी (इस लेखक की भांति) ऐसे भी होंगें जो इस भव्य समारोह में भाग लेने से वंचित रह गए होंगें लेकिन अभी इसी वर्ष 19 जनवरी 2026 को वैरागी द्वीप में सम्पन्न हुए शताब्दी समारोह के प्रथम चरण तो अवश्य ही देखा होगा। जिस प्रकार का उत्साह 1990 में देखने को मिला था, ठीक उसी तरह इस चार दिवसीय शताब्दी समारोह में देखने को मिला था। हमारा सौभाग्य है कि गुरुकृपा से हम शताब्दी समारोह को समर्पित 251 पृष्ठों की रंगीन स्मारिका का संकलन कर पाए, दिए गए लिंक से वैरागी द्वीप का दिव्य दर्शन किया जा सकता है।
https://archive.org/details/google-docs_202602
आइए अब आगे चलते हैं।
जब “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” का काम चल रहा था तो वंदनीय माताजी स्वयं पूरे क्षेत्र में गईं। एक-एक स्थान पर वह मोटर-वाहन से उतरीं, काम कर रहे लोगों का उत्साहवर्द्धन किया। काम करने वाले कार्यकर्ता भी उन्हें अपने समीप पाकर आनंदित हो गए। माताजी का इस तरह इन सभी जगहों पर जाना एक दिन बड़े ही अचानक ढंग से हुआ था। इसके बारे में पूछने पर पहले तो वह बोलीं कि बच्चे काम कर रहे हैं, मैं जाऊंगी, तो उनका उत्साहवर्द्धन होगा। जब उनसे पूछा गया कि क्या आप केवल उत्साहवर्द्धन के लिए ही गयी थीं, तो वह कुछ सोचते हुए कहने लगीं:
“देखो जिन जगहों पर बच्चे काम कर रहे हैं, वहां कई भयानक विषधर हैं, अगर वह काट लें, तो आदमी पानी भी न माँग सके। मैं उन्हें वहां से हटाने गई थी। मैंने इन विषैले जीवों से कह दिया है कि तुम लोग यहां से चले जाओ, अभी यहां पर काम हो रहा है, यहाँ बहुत सारे लोग आएंगे और ऐसे में तुम सबका यहां रहना ठीक नहीं है। उन सबको यह बात समझ में आ गई है, अब वे चले जाएंगे।”
पूछने वालों को शायद माताजी की बातें ठीक से समझ में नहीं आईं, वह बोले , माताजी इन विषैले जीवों को मारा भी तो जा सकता है। यह बात सुनते ही उनका स्वर काफी तीखा हो गया:
“क्यों मारा जा सकता है? क्या बिगाड़ा है तुम लोगों का उन्होंने? एक तो तुम लोग उनकी रहने की जगहों को तहस-नहस किए जा रहे हो, ऊपर से उन्हें मारोगे भी। क्या वे सब मेरी संतान नहीं है?”
माताजी की इन बातों ने सुनने वालों को झकझोर दिया। वह यह सोचने पर विवश हो गए कि माताजी मनुष्यों की ही नहीं, प्राणि-वनस्पतियों, पशु-पक्षियों आदि सभी की माँ हैं, तभी तो वोह प्राणी भी माताजी की बातों को समझते हैं और माताजी भी उनकी बातों को समझती हैं।
ऐसी ममतामयी माँ के ममत्व से भीगे हुए हज़ारों परिजन इस “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” की तैयारियों में जुटे थे। इन तैयारियों के प्रत्येक चरण से उनकी महिमा प्रकट हो रही थी। हालांकि कुछ शंकालुजन अभी भी यही सोच रहे थे कि जितने व्यापक स्तर पर तैयारियां की गई हैं, क्या उतने लोग आएंगे भी कि नहीं। इन लोगों का सोचना कई अर्थों में सही भी था क्योंकि उस समय “अयोध्या प्रकरण व मंडल कमीशन” की प्रतिक्रिया स्वरूप देशव्यापी आंदोलन भड़का हुआ था। बसें, ट्रेनें, यहां तक कि फायर ब्रिग्रेड की गाड़ियां तक जलाई जा रही थीं। सड़कों एवं प्लेटफार्मों पर एक अजीब सूनापन छाया हुआ था। बिहार प्रदेश के बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में मंडल कमीशन ने अपनी सिफारशें दीं जिनके फलस्वरूप 49.5 प्रतिशत रिजर्वेशन का द्वार खुला लेकिन सम्पूर्ण भारत में इसके विरोध में आंदोलन हुए। ऐसी स्थिति होने के बावजूद महाशक्ति की महिमा ने अपना कमाल दिखाया। श्रद्धांजलि समारोह में जितने व्यक्तियों को आना था, सभी आए। इन लाखों लोगों के मार्ग में न कोई उपद्रव आड़े आया और न कोई जन-धन की हानि हुई। जिन लोगों ने 1 अक्टूबर से 4 अक्टूबर तक सभी कार्यक्रमों में नियमित रूप से भाग लिया, उनकी संख्या 5 लाख से अधिक रही। एक लाख से अधिक तो वे लोग थे जो प्रतिदिन आते-जाते रहे। सारा हरिद्वार पीले वस्त्र पहने, पीत दुपट्टाधारी स्त्री-पुरुषों से भर गया था। नगर व प्रांत के पत्रकारगण, दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रतिनिधि सभी समारोह की व्यवस्था को देखकर चकित थे। उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम सत्यनारायण रेड्डी भी इस कार्यक्रम में आए थे। उन्होंने सब कुछ देखकर अपनी मुखर अभिव्यक्ति दी कि यह सब कुछ दैवी एवं दिव्य है। पाठक संलग्न वीडियो में 64 मिंट पर आदरणीय राज्यपाल जी के शब्द सुन सकते हैं /देख सकते हैं। शरद पूर्णिमा की सायं इस दिव्यता से और भी अधिक दीप्त हो उठी। शाम 6.30 बजे दीपयज्ञ आरंभ होने से पूर्व पूरा विशाल सभागार खचाखच भर गया। विराट् सवालक्ष दीपों का महायज्ञ प्रारंभ हुआ। ‘यन्मण्डलम् दीप्तिकरं विशालम्’ की धुन के बीच सब दीप जल उठे। यह दृश्य देखते ही बनता था। शरद पूर्णिमा की रात थी लेकिन पूर्णिमा का चांद भी छोटे-छोटे दीपों की समन्वित आभा-ऊर्जा के सामने मद्धिम लग रहा था। महाशक्ति की महिमा इन अगणित दीपों की कोटि-कोटि ज्योति किरणों से प्रकट हो रही थी।
4 अक्टूबर 1990 को जब विदाई की वेला आई, तब सभी के हृदय भरे और भीगे थे। उनकी महाशक्ति के अनेकों चमत्कार इन दिनों देखने को मिले। इनमें से एक चमत्कार यह भी था कि
लाखों लोगों के नित्य भोजन करने के बावजूद शांतिकुंज के अन्न भंडार यथावत् परिपूर्ण रहे। कहीं कोई कमी नहीं आई। पता नहीं अन्नपूर्णा ने कैसे और किस तरह यह चमत्कार कर दिया था। अपनी माँ से विदा लेते हुए सभी परिजन अनुभव कर रहे थे कि माताजी उनकी अपनी माँ होने के साथ समूचे राष्ट्र की माता हैं।
धन्यवाद्,जय गुरुदेव