वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 24वां ज्ञानप्रसाद लेख: महाशक्ति में समाने का शिव संकल्प एवं महाशक्ति का महातप भाग 2

कल के दिव्य सन्देश में भी साथिओं को गुरुसत्ता से जुड़ने का निवदन किया था। इस निवेदन के पीछे केवल एक ही सत्य छिपा था कि सारे विश्व में अशांति एवं नकारात्मकता का बोलबाला है, क्या हम मूक दर्शक बने बैठे रहेंगें, कदापि नहीं !!!! गुरुज्ञान के शक्तिशाली शस्त्र का प्रयोग करके और कुछ नहीं तो नकारात्मकता को सकारात्मकता से Neutralize करने का कुछ प्रयास तो कर ही सकते हैं। नकारात्मकता के वातावरण में हाय-हाय करके हम कुछ भी सार्थक नहीं कर रहे हैं बल्कि नकारात्मकता को ही बढ़ावा दे रहे हैं। 

दैनिक ज्ञानप्रसाद लेखों एवं अन्य प्रयासों के माध्यम से  हम सब परमपूज्य गुरुदेव के संरक्षण में पल रहे ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करने के लिए गुरुचरणों में समर्पित हो चुके हैं। जो साथी हमारे साथ पहले दिन से जुड़े हुए हैं, स्वयं ही अनुभव कर रहे हैं कि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा रचित साहित्य कोई साधारण, सस्ते समाचार पत्र की भांति विज्ञापनबाजी का स्रोत नहीं है। इन पंक्तियों को लिखने वाले साधारण से मानव का कर्तव्य बनता है कि जो इलेक्ट्रिक Vibrations उसे लिखते समय फील होती हैं पाठकों के रोंगटे (Goosebumps)भी इस साहित्य की शक्ति से खड़े होने चाहिए। यदि कोई फिजिकल/आध्यात्मिक प्रभाव नहीं दिखता है तो फिर इस मानव की लेखनी में ही नुक्स है, यह मानव कोई लेखक तो है नहीं। 

गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में अर्पित किया गया ज्ञानप्रसाद, वर्तमान लेख श्रृंखला का 24वां पुष्प है। यह पुष्प वर्ष 1990 की गायत्री जयंती के उन क्षणों को वर्णन कर रहा है जिसे  हम न जाने कितनी बार पढ़ चुके हैं, कितनी ही वीडियोस देख चुके हैं।

हमारे साथ नियमितता से जुड़े साथिओं को सम्बोधन करते हुए एक नया प्रयोग करने को कह रहे हैं। इस प्रयोग के अंतर्गत आज के इस मार्मिक लेख को पढ़ते हुए केवल “एक ही सन्देश” Extract करके निकालना है जिसने पाठकों के रोंगटे खड़े कर दिए। आज के दिन के लिए विस्तृत कमेंट को छोड़ कर अगर एक दो वाक्यों का ही कमेंट होगा तो प्रयोग सफल माना जायेगा। विज्ञान के विद्यार्थी है, प्रैक्टिकल करने में सदैव उत्सुक रहते हैं। 

आइए लेख का शुभारंभ करें।

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माताजी की बातों को सुनकर कोई कुछ नहीं बोला, बस एक गहरी चुप्पी छाई रही। मुश्किल से कोई-कोई इतना सोच पाया कि लगता है गुरुदेव ने माताजी से “सौभाग्य सिंदूर” न त्यागने के लिए इस कारण कहा है कि कहीं महालक्ष्मी के सौभाग्य चिह्न त्याग देने से समूचा विश्व सौभाग्यहीन न हो जाए।

वह दिन बीता, उसके बाद कई दिन बीते। अपने द्वारा निश्चित की गई तिथि एवं निर्धारित किए गए समय के अनुसार गायत्री जयंती 2 जून, 1990 को प्रातः 8:00 बजे के लगभग गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया। उनकी अंतर्चेतना महाशक्ति में लीन हो गई। माताजी उस समय उन्हीं के द्वारा किए गए आदेश के अनुसार प्रवचन मंच पर थीं। संपूर्ण सत्य से अवगत होते हुए भी उन्होंने दिन के सभी कार्य पूर्णतः संतुलित रहकर निर्धारित क्रम के अनुसार पूरे किए। शाम को सूर्यास्त होने से पहले महायोगी गुरुदेव की तपःपूत देह उनके जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में अग्नि को समर्पित हुई। देह के भस्म होने के साथ अग्नि का तेज और ताप, वंदनीय माताजी में समा गया। वह अविचल भाव से अपने प्रभु से हुए भौतिक वियोग को सहते हुए महातप के लिए प्रवृत्त हुईं।

परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण को लेकर हमने कितने ही विस्तृत लेख लिखे हैं,यह सब  लेख हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। पाठक सर्च विंडो  में “महाप्रयाण” शब्द टाइप करके  यह लेख ढूंढ सकते हैं।  

माताजी द्वारा अब तक जो कुछ भी तपश्चर्या व योग-साधना की गई थी, वह सब अपने प्रभु के आदेश व उन्हीं के सान्निध्य में हुई थी। बीच में जो वियोग के पल आए थे, वे सीमित थे। विश्वास था कि प्रभु गए हैं, तो आएंगे भी। उनके आने की अवधि प्रायः निश्चित थी। अपने आराध्य के सान्निध्य में अथवा उनके लौट आने की आशा में सहा गया महाकष्ट भी वंदनीय माताजी के लिए आनंददायी था।महाकंटकों को भी उन्होंने सुकोमल पुष्पों की भांति समझा था। असह्य वेदना भी परमपूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में घुलकर माताजी के  लिए आह्लादकारी बनती गई थी। पिछले जीवन की लंबी अवधि में उन्होंने बहुत कुछ सहा था। जीवन में कई तरह के संकटों को सहते हुए उन्होंने कठोर तप साधनाएं की थीं। उनकी सहनशक्ति इतनी अगाध और असीम थी कि गुरुदेव उन्हें ‘सर्वसहा’ कहने लगे थे। वह कहा करते थे कि माताजी सर्वकष्ट सहिष्णु हैं। वे सब कष्टों/संकटों को बड़ी आसानी से हंसते-हंसते सह जाती हैं। ऐसी सर्वसहा को भी गुरुदेव के  भौतिक वियोग का यह महातप असह्य लग रहा था।

इस असह्य कष्ट  को भी माताजी  हंसकर सह रही थीं, उन्हें स्वयं को संभालने के साथ, अपनी अनेकों  शिष्य-संतानों को भी संभालना था। प्रेममूर्ति गुरुदेव के न रहने का दुःख सभी को था, सबके मन भीगे हुए और भारी थे। इनमें से कई तो ऐसे थे, जिनकी आंखों से महीनों आंसुओं की झड़ियां लगी रहीं। उनकी भावुकता इन्हें हर पल भिगोती थी। इन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि अब कैसे जिएं? आज इन बातों में हो सकता है, किसी को विचित्रता या अतिशयोक्ति लगे लेकिन जिन्होंने गुरुदेव को देखा है, उन्हें छुआ है, उनके प्रेम को पिया है, उनके सान्निध्य में दो-चार घड़ी बिताई हैं, उन सभी को इन बातों में सच और केवल सच के अलावा अन्य किसी तत्व  की प्रतीति न होगी। जब सामान्यजनों की यह स्थिति थी, तो भावमयी माताजी की विह्वलता व विकलता की कल्पना करना सामान्यजन के लिए पूरी तरह से अकल्पनीय है। अपनी इस असीम वेदना को सहती हुई वे उन दिनों भी नियमित प्रणाम में बैठ रही थीं। उनके मिलने-जुलने का क्रम भी पहले की ही तरह निश्चित व नियमित था। अपने बच्चों के लिए उनका प्यार-दुलार व उन पर आशीषों की अजस्र वर्षा अब पहले से भी ज्यादा बढ़ गई थी।

लगातार विस्तार करते, मिशन की अनेकों  जिम्मेदारियों को निभाते हुए विश्व जननी, विश्वकल्याण के लिए अहर्निश तप कर रही थीं। बीच-बीच में वह अपने भावुक और नादान बच्चों को भी धीरज देती थीं, उन्हें दुलराती व पुचकारती थीं। पिता के न होने पर मां का अपनी संतानों के प्रति प्रेम और भी अधिक सघन और सजल हो गया था। इन्हें प्यार करते हुए वह जब-तब अपना उदाहरण देते हुए यह भी समझाती थीं कि 

अपनी अनुभूति का अमृत पिलाने के लिए माताजी कभी-कभी उन कार्यकर्ताओं  को अपने पास थोड़े समय के लिए बुला लेतीं जो इन दिनों बड़े विकल और बेचैन थे।

ऐसे ही एक “कार्यकर्त्ता” को उन्होंने गुरुदेव के न रहने के दो महीने बाद अपने पास बुलाया। यह कार्यकर्ता इन दो महीनों में ठीक से सो न पाया था। उसके जीवन के दैनिक काम-काज बिखर गए थे। गुरुदेव का अभाव उसके लिए असह्य था। अब क्या होगा, कौन करेगा उसकी जिंदगी की सार-संभाल। इस तरह के  प्रश्न-कंटक उसे बुरी तरह से चुभ रहे थे। विकल वेदना से ग्रस्त  इन्ही दिनों में उसने एक रात अर्द्धनिद्रा में स्वप्न में देखा कि वह लेटा हुआ है और वंदनीय माताजी अपनी गोद में उसका सिर रखे हैं। वह अपने हाथों को बड़े ही प्रेमपूर्ण ढंग से उसके सिर पर सहलाते हुए कह रही हैं:

स्वप्न के ये पल इतने ही थे, परन्तु यह पल  न जाने कैसे जादू भरे थे कि स्वप्न देखने वाले को दो महीनों में शायद पहली बार ठीक से नींद आई। स्वप्न बीतने पर भी उसकी अनुभूति यथावत् रही । एक दिन दोपहर को वंदनीय माताजी ने सचमुच उसे अपने पास बुला लिया। इस बुलावे पर उसे तब अचरज हुआ, जब माताजी ने  स्वप्न की भाषा यथावत् कह सुनाई। अपनी बातों के क्रम में वह कहने लगीं:

माताजी की इन बातों में उनके महातप की व्याख्या थी ।

इन बातों के क्रम में उन्होंने बताया:

उनकी इन बातों को सुनते हुए, सुनने वाले की आंखों के सामने वह दृश्य प्रत्यक्ष हो गया, जब वंदनीय माताजी ने परमपूज्य गुरुदेव के पार्थिव शरीर को अंतिम प्रणाम करते हुए अपने महातप का संकल्प लिया था। वोह बड़े ही भावपूर्ण क्षण थे । माताजी के कमरे के बगल वाले हॉल में गुरुदेव के पार्थिव शरीर को उठाने की तैयारी हो रही थी। एक पल पहले बिलख रहीं माताजी के मुखमंडल पर यकायक दृढ़ता की अनोखी दीप्ति छा गई, वह धीमे कदमों से उठीं। उन्होंने गुरुदेव के माथे पर तिलक लगाया और चरणों में प्रणाम करते हुए धीमे, किंतु दृढ़ शब्दों में कहा: 

माताजी की बातों में आज भी वही दृढ़ता थी। उनकी वाणी ने सुनने वालों को सचेत किया। वह अपनी भावनाओं से उबरा । माताजी उसे समझा रही थीं, भक्ति कोरी भावुकता नहीं है। यह रोते-बिलखते रहकर अकर्मण्य बनकर पड़े रहने का नाम नहीं है। भक्ति अपने भगवान् के आदेश पर तिल-तिल गलते हुए,क्षण-क्षण जलते हुए, सब कुछ सहते हुए  मिटने का नाम है। ऐसी भक्ति सर्वसमर्थ भगवान् को भी विवश और विकल बना देती है। इस भक्ति से बड़ा और कोई महातप नहीं। इससे अपरिमित एवं अपार शक्ति स्फुरित होती है। भक्तिमयी माँ अपनी संतान के समक्ष स्वयं के आदर्श को प्रस्तुत कर रही थीं। सर्वेश्वरी का यह कथन उन्हीं के अनुरूप था। इससे “महाशक्ति की महिमा प्रकट हो रही थी।”

धन्यवाद, जय गुरुदेव 


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