ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पादित 118 पन्नों की दिव्य पुस्तक“महाशक्ति की लोकयात्रा” पर आधारित लेख श्रृंखला का आज 23वां लेख प्रस्तुत है। अन्य 1530 लेखों की भांति यह लेख भी हमारी वेबसाइट https://life2health.org/ का हिस्सा बनने जा रहा है। प्रत्येक ज्ञानप्रसाद लेख की भांति यह लेख भी अगर पाठकों के लिए एनर्जी ड्रिंक न साबित हो तो समझने में ही कोई समस्या हो सकती है, गुरु साहित्य पर प्रश्नचिन्न लगने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। पाठकों ने देख लिया होगा कि पिछले कुछ दिनों से दैनिक दिव्य सन्देश ज्ञानप्रसाद लेखों से ही सम्बंधित हैं। इस प्रयास के पीछे एक ही धारणा है कि यदि साथिओं के पास 1800 शब्दों के ज्ञानप्रसाद लेख पढ़ने का समय नहीं है तो इन संक्षिप्त से सन्देश से कुछ ग्रहण कर लें। पार्श्वभूमि में वंदनीय माताजी का चित्र सन्देश को और भी दिव्य बनाता दिख रहा है।


शीर्षक के अनुसार इस दिव्य मार्मिक कंटेंट दो भागों में (आज और कल) प्रस्तुत किया जायेगा। आज प्रस्तुत किया गया पहला भाग बहुत ही मार्मिक है जो “परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण” से पूर्व दिए संकेतों पर आधारित है। इसी भाग में “परम पूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म तत्व” का महाशक्ति ( वंदनीय माताजी ) में समाने का विवरण है।
आइए लेख की और चलें:
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महाशक्ति में समाने का शिव संकल्प एवं महाशक्ति का महातप:
सूक्ष्मीकरण साधना के बाद से ही परमपूज्य गुरुदेव शांतिकुंज सहित संपूर्ण युग निर्माण मिशन को सर्वथा नए आयाम में पहुंचाने में जुटे थे। इसके लिए उन्होंने अपने लेखन, साधना आदि नियमित कार्यों के साथ कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया था। सारे दिन एक के बाद एक गोष्ठियां चलती रहतीं। इन गोष्ठियों में वह भविष्य में होने वाले कार्यों का खुलासा करते, नई योजनाएं बनाते व समझाते। यह भी बताते कि उनके न रहने पर मिशन का किस तरह से विस्तार होगा। यह कैसे व किस ढंग से चलेगा। सारे कामों को करते हुए वह इन दिनों नई-नई पुस्तकों के रूप में “क्रांतिधर्मी साहित्य” का भी सृजन कर रहे थे। क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तक माला की 22 पुस्तकों एवं ऑडीओ बुक्स के लिए पाठक निम्नलिखित लिंक को क्लिक कर सकते हैं: https://www.geocities.ws/brijesh/amritvachan/kd/kd.html#gsc.tab=0
इस लिंक में गुरुदेव स्वयं लिखते हैं :
“बेटे, क्रांतिधर्मी साहित्य मेरे अब तक के सभी साहित्य का मक्खन है। मेरे अब तक का साहित्य पढ़ पाओ या न पढ़ पाओ, इसे जरूर पढ़ना। इन्हें समझे बिना मिशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही किसी को समझा सकते हो। बेटे ! ये इस युग की युगगीता है। एक बार पढ़ने से न समझ आये तो सौ बार पढ़ना। जैसे अर्जुन का मोह गीताज्ञान प्राप्त करने के बाद भंग हुआ था, वैसे ही तुम्हारा मोह इस युगगीता से भंग होगा।”
गुरुदेव आगे लिखते हैं:
“हमारे विचार बड़े पैने हैं, तीखे हैं। हमारी सारी शक्ति हमारे विचारों में समाहित है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं, वह सिद्धियों से नहीं, अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए। हमको आगे बढ़ने दीजिए, सम्पर्क बनाने दीजिए। मेरे जीवन भर का साहित्य शरीर के वजन से ज्यादा भारी है। यदि इसे तराजू के एक पलड़े पर रखें और क्रांतिधर्मी साहित्य को (युग साहित्य को) एक पलड़े पर, तो इनका वजन ज्यादा होगा।”
हमारा सौभाग्य है कि हमारी सबकी अतिप्रिय बेटी संजना ने इसी साहित्य पर ज्ञानप्रसाद लेख शृंखला लिखने का सुझाव दिया है। इस विषय पर, इस समय हम केवल इतना ही कहना उचित समझते हैं कि हमारी कहाँ इतनी समर्था कि हम कोई निर्णय ले सकें, जैसा गुरुदेव का निर्देश होगा उसका पालन करना हमारा परम धर्म है।
आइए गुरुज्ञान को आगे बढ़ाएं:
इन वर्षों में गुरुदेव की समस्त गतिविधियां तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम हो चली थीं। इस उत्तरोत्तर बढ़ती हुई तीव्रता को देखकर भक्ति संवेदना से स्पंदित हृदयों को सहज ही अनुमान लगने लगा था कि “भगवान शिव अपनी लोक लीला का संवरण करते हुए महासमाधि में लीन होने की तैयारी कर रहे हैं।”
शक्ति-स्वरूपा माताजी गुरुदेव के शिव संकल्प से अवगत थीं। उन्हें भली प्रकार मालूम था कि सत्य के मूर्तिमान स्वरूप गुरुदेव के संकल्प व योजनाएं कभी मिथ्या नहीं हो सकतीं। वह स्वयं भी उनकी योजनाओं के प्रति पूर्णतया समर्पित थीं। फिर भी उन्हें इतना कठिन परिश्रम करते हुए देखकर उनका मातृ-हृदय व्याकुल हो उठता था।
एक दिन इसी तरह गुरुदेव सुबह का लेखन एवं उसके बाद कार्यकर्त्ताओं की गोष्ठियां लेने के बाद दोपहर में फिर से लिखने बैठ गए। लगातार विभिन्न कार्यों के साथ लेखन करते हुए उनकी आंखें लाल हो गईं। शरीर के कष्ट तो सभी को होते हैं, फिर वह चाहे अवतारी सत्ता ही क्यों न हो। उस दिन अत्याधिक एवं लगातार लेखन करने के कारण गुरुदेव की आंखें एकदम लाल दिखने लगी थीं। इसके बावजूद वे देह-बोध से रहित, परमहंस महायोगी की तरह शाम तक यथावत् लेखन करते रहे। शाम को जब माताजी अपने दिन के सारे कामों को निबटाकर नीचे से ऊपर पहुंचीं, तो उन्होंने गुरुदेव की इस दशा को देखा, वह विह्वल हो गईं। भाव-बिन्दुओं से भरी हुई आंखों के साथ उन्होंने गुरुदेव के सारे कागज समेटकर एक साथ एक जगह रखे। उन्हें अपने हाथों से एक गिलास पानी पिलाया और उनसे पूछने लगीं:
आप इतना अधिक श्रम क्यों करते हैं?
इस प्रश्न के उत्तर में गुरुदेव कुछ देर तो चुप रहे, फिर थोड़ा मुस्कराते हुए बोले:
“दरअसल हम अपने जाने से पहले मिशन की गाड़ी को खूब जोर का धक्का लगा देना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि यह धक्का इतनी जोर से लगे कि मिशन सैकड़ों सालों तक आराम से चलता रहे। इसमें कोई बाधा न आए। अपने बच्चे इस मिशन की गाड़ी में बैठकर केवल स्टियरिंग ही संभाले रहें, उन्हें कुछ खास न करना पड़े,सब कुछ अपने ही आप इत्मीनान से होता चला जाए।”
गुरुदेव के इन शब्दों से माताजी को यह स्पष्ट आभास हो गया कि उनके भावमय भगवान् अपनी लोकलीला को पूरी तरह से समेट लेने के लिए संकल्पित हैं। इस सत्य से अवगत माताजी इन दिनों मिशन के सामान्य काम-काज के साथ अपने घर-परिवार की भी जिम्मेदारियां निबटाने के लिए प्रयत्नशील थीं।
उनकी सुपौत्री गुड़िया (मंदाकिनी), मथुरा के मृतुंजय भाई साहिब की बेटी बड़ी हो चुकी थी, उसके लिए वह सुयोग्य वर की तलाश कर रही थीं। सुपौत्री मंदाकिनी एवं नाती चीनू (चिन्मय भैया ) ये दोनों बच्चे अपने छुटपन से माताजी के साथ ही रहे थे। इन्होंने प्रायः अपना सारा बचपन माताजी की गोद में और गुरुदेव के आसपास खेलकर बिताया था। गुड़िया उनके शांतिकुंज आगमन के कुछ ही समय बाद मथुरा से उनके पास आ गई थी और चीनू का आना जीजी एवं डॉ. साहब के साथ ही हुआ था। उन्होंने स्वयं के साथ ही अपने शिशु को भी माताजी एवं गुरुदेव को सौंप दिया था। इन बच्चों की सारी परवरिश माताजी की वात्सल्य छाया में ही हुई। इन्हें पाल-पोसकर बड़ा करने व संस्कारवान बनाने का दायित्व उन्होंने स्वयं निभाया। बड़े होने पर गुड़िया के लिए वर की तलाश भी माताजी ने ही की। डॉ. साहब ने स्नेहशील अभिभावक की भांति इस कार्य में माताजी का हाथ बंटाया। अंततः 20 फरवरी 1989, माघ पूर्णिमा के दिन गुड़िया (मंदाकिनी) सादगीपूर्ण वातावरण में माताजी के गले लगकर अपने ससुराल विदा हुई।
इसके बाद 1989 के शेष महीनों में गुरुदेव के कार्यों की तीव्रता यथावत् बनी रही। इस वर्ष के अंत तक प्रायः संपूर्ण “क्रांतिधर्मी साहित्य” प्रकाश में आ गया।
इन दिनों वह बातचीत के क्रम में यह जता दिया करते थे कि वह सूक्ष्मजगत् के परिशोधन के लिए अब पूरी तरह से सूक्ष्मलोक में डेरा जमाएंगे। ऐसे ही वर्ष 1989 के अंतिम महीनों में एक दिन वह अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे, लेटे हुए बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा:
“जैसे लोग अपना कुर्ता उतारते हैं, वैसे ही मैं यह स्थूल शरीर उतारकर फेंक दूंगा।” यह जिज्ञासा करने पर कि इसके बाद फिर वह कहां रहेंगे? उत्तर में उन्होंने कहा: और कहां? सारा काम करते हुए मैं एक अंश से माताजी के भीतर रहूंगा।”
उनकी इन रहस्यमयी बातों में एक रहस्यपूर्ण सत्य था। 28 जनवरी 1990 वसंत पंचमी को परम पूज्य गुरुदेव ने अखंड ज्योति में एक पत्रक लिखा “महाकाल का संदेश।” जिसे यहाँ यथावत प्रस्तुत किया जा रहा है। साथिओं को स्मरण हो आया होगा कि अभी दो माह पूर्व ही इस विषय पर, गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित एक Full length लेख प्रस्तुत किया जा चुका है :
“यह युगसंधि के बीजारोपण का वर्ष हैं। अभी जो रूप दिखाई दे रहा है यह छोटा है, वह अगले दिनों विशालकाय बोधिवृक्ष का रूप लगा। अब से लेकर सन् 2000 तक के दस वर्ष जोतने, उगाने, खाद-पानी डालने और रखवाली करने के हैं। इस वसंत से इक्कीसवीं सदी के आगमन की उलटी गिनती ‘काउंट डाउन’ प्रक्रिया से आरंभ हो चुकी हैं। ऋषिकल्प इस सत्ता के जीवनरूपी दुर्लभ ब्रह्मकमल के अस्सी पुष्प पूरी तरह खिल चुके। सूत्र- संचालक सत्ता के इस जीवन का ‘प्रथम अध्याय’ पूरा हुआ। यह दृश्यमान स्वरूप था, जिसमें ‘जो बोया सो काटा’ की नीति अपनाई गई। अब जीवन का दूसरा अध्याय आरंभ होता है। सूक्ष्म व कारण इन दो शरीरों का प्रयोग एक शताब्दी तक किया जाना हैं। यहाँ से लेकर सन् 2001 के वसंत पर्व तक की अवधि में, विगत दो हजार वर्षों से जमी हुई गंदगी बुहारकर साफ कर दी जाएगी एवं उज्ज्वल भविष्य की नवयुग की आधारशिला रखी जाएगी।”
हमारे पाठक इस कंटेंट को अखंड ज्योति फ़रवरी 2000 के पृष्ठ 52 पर भी देख सकते हैं। इसमें गुरुदेव ने अपने भावी क्रियाकलापों को स्पष्ट किया था।
अपनी इसी योजना के अनुरूप वह वसंत पंचमी 1990 के दिन ही प्रणाम के बाद से पुनः परिपूर्ण एकान्त में चले गए। अब वह अधिक दिन स्थूल देह में नहीं रहेंगे, यह अहसास प्रायः सभी संवेदनशील हृदयों को हो चला था। सभी विकल किंतु विवश थे। भावमयी माताजी का समर्पण अडिग था। गुरुदेव के भौतिक जीवन के प्रति भी अविरल एवं असीम अनुराग के होते हुए भी वह उनके संकल्प के प्रति समर्पित थीं। अपने आराध्य की इच्छा ही उनकी अपनी इच्छा थी। अपनी असह्य आंतरिक विकलता को किसी तरह दबाए हुए वह दैनिक काम-काज में संलग्न रहती थीं।
अप्रैल 1990 के अंतिम दिनों में माताजी ने शांतिकुंज की गोष्ठी में गुरुदेव द्वारा किए गए स्थूल देहत्याग के शिव संकल्प को संकेतों में, लेकिन स्पष्ट रीति से समझाया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि गुरुदेव ने उनसे यह भी कहा है:
“मेरे देह त्याग देने के बाद तुम सौभाग्य-सिंदूर का त्याग न करना।” माताजी ने यह बताते हुए स्पष्ट किया कि गुरुदेव ने मुझसे यह कहा है कि तुम ठीक उसी तरह से अपने सौभाग्य-सिंदूर को धारण किए रहना जैसा कि पिछली बार तुमने माँ शारदा के रूप में किया था । उसी तरह लड़कों की देखभाल करती रहना। कुछ ही वर्षों में ये लड़के सक्षम हो जाएंगे, तब तुम भी देह का झंझट उतार फेंकना।
कल प्रस्तुत होने वाले दूसरे भाग में वंदनीय माताजी द्वारा गुरुदेव के विछोह के उपरांत सब कुछ सहते हुए मिशन की समस्त गतिविधियों को सम्पूर्ण गति प्रदान करते हुए “महातप का विवरण” होगा। माताजी की सहनशक्ति को देखते हुए गुरुदेव उन्हें “सर्वसहा” कहा करते थे।