परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित लेख श्रृंखला का आज 22वां लेख प्रस्तुत है। 118 पृष्ठों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” में समाहित दिव्य ज्ञान का एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक अध्ययन करके,अपनी समर्था के अनुसार समझकर, सरल करते हुए इस मंच पर प्रस्तुत करने का यह अद्भुत प्रयास केवल माँ की अनुकम्पा से ही प्राप्त हो सकता है, ज्ञान के अथाह सागर से अनमोल रत्न ढूंढ पाने में हम कहाँ समर्थ हैं?


अपने साथिओं के सदैव आभारी रहेंगें जिनके कमैंट्स हमारा उत्साहवर्धन कर रहे हैं, हमें अद्भुत शक्ति प्रदान कर रहे हैं, मन में उठ रहे नए विचार, नए-नए Nomenclature (एनर्जी/पावर ड्रिंक) स्वयं ही उभर रहे हैं। जो भी हो हमारा एकमात्र प्रयास यही है कि विश्व के प्रत्येक घर में ज्ञान का प्रकाश हो, विवेकशीलता हो, सभी सुखशांति से जीवनयापन करें, कोई भी दुःखी न रहे और सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ।मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने। हे भगवन हमें ऐसा वर दो! का समस्त विश्व में वातावरण बने।
कल वाले लेख में ज्ञानप्रसाद लेखों के लिए एनर्जी ड्रिंक/पावर ड्रिंक Terminology का प्रयोग करना जिस उद्देश्य से लिखा गया था उसका प्रभाव देखने के लिए ज्ञानप्रसाद का अमृतपान तो करना ही पड़ेगा, उसके बाद ही प्रभाव दिखेगा। हम गॉरंटी से कह सकते हैं कि इन लेखों की शक्ति के बारे में रत्तीभर भी शंका नहीं है, शंका केवल मनुष्य की मनःस्थिति में है, उसी को नियोजित करना ज्ञानप्रसाद लेखों का ध्येय है।
आज के लेख के लिए भी भूमिका लिख पाना बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है इतना ही कह कर लेख का शुभारम्भ करेंगें कि गुरुदेव कहते हैं कि माताजी के आशीष तुम्ही लोगों को नहीं मिलते, हमें भी मिलते हैं। गुरुदेव आगे कहते हैं कि माताजी अपनी माँ के पेट से ही माताजी होकर पैदा हुई हैं। सूक्ष्मीकरण साधना में यदि माताजी अपनी दिव्य शक्तिओं से हमारी सतत रखवाली न कर रही होतीं तो कौन जाने यह शरीर रहता भी या नहीं।
आज के लेख में डॉक्टर फूल सिंह जी की अनुभूति माताजी की शक्ति के बारे में बहुत कुछ कह रही है।
****************
परम पूज्य गुरुदेव का किसी से भी न मिलना:
सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत 1984 की रामनवमी से गुरुदेव का सर्वसामान्य से मिलना बंद हो गया था। इस विशिष्ट साधना काल में उन्होंने प्रायः “दो ही” लोगों को अपने आस-पास रहने व निरंतर मिलने-जुलने की अनुमति दी थी। इनमें से प्रथम स्वयं वंदनीय माताजी थीं जो उनसे सर्वथा अविभाज्य थीं, जिनके प्राण गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में घुल रहे थे, जो साधना करते समय गुरुदेव के स्थूल शरीर को अपनी दिव्य शक्तियों से सुरक्षित व संरक्षित करती थीं। दूसरे व्यक्ति के रूप में डॉ. प्रणव पंड्या थे जो उन दिनों गुरुदेव के प्रधान सेवक, निजी सचिव व उनके लेखन कार्य में एकमात्र सहयोगी का धर्म निभाते थे। गुरुतर सेवाधर्म में प्रतिपल डॉक्टर साहिब के मन-प्राण तल्लीन रहते थे । “सब ते सेवक धरम कठोरा” अर्थात दास का तो धर्म है कि जहाँ स्वामी का चरण पड़े वहाँ उसका सिर पड़े । इस सेवाधर्म उक्ति को उनके हृदय में छलकने वाली भक्ति संवेदना ने एकदम आसान कर दिया था। सूक्ष्मीकरण साधना के समय जब डॉक्टर साहिब दिन के सारे समय गुरुदेव के पास रहते उस समय वंदनीय माताजी अपने बच्चों को प्यार-दुलार बांटती, उन पर अपने आशीष बरसातीं । गुरुदेव के एकांत में चले जाने के कारण शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस एवं गायत्री तपोभूमि में रहने वाले कार्यकर्ता ही नहीं देश भर में रहने वाले गायत्री परिजन मन मसोस कर रह गए थे। गुरुदेव से मिलना नहीं होता, इस बात का दुःख सभी को था। शुरुआत के दिनों में एक गहन स्ट्रेस ने सबको घेर लिया था लेकिन माताजी के प्यार भरे आशीषों ने सबकी हंसी फिर से लौटा दी। प्रायः हमेशा अपने को बैकग्राउंड में रखने वाली सर्वेश्वरी माँ इन दिनों अपनी संतानों के दुःखों को हरने, उन्हें सुखों से सराबोर करने में लगी हुई थीं।
इस समय की अनेक घटनाएं व संस्मरण शांतिकुंज व युग निर्माण मिशन के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित हैं जिनका स्मरण कर आज भी मन माँ के प्यार से भर उठता है, हृदय श्रद्धा-विभोर हो जाता है। उन दिनों माताजी से मिलाने वालों व उनसे मिलने वालों को आज भी वे यादें भाव-विह्वल करती रहती हैं। ऐसी ही कुछ यादें इस समय भावनाओं की स्याही में भीगने के लिए आतुर हैं। इनमें से एक याद उन परिजन की है, जो राजस्थान प्रदेश के बारां जनपद में वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी रहे हैं।
आइए उस याद का अवलोकन करें।
सूक्ष्मीकरण अवधि में डॉक्टर फूलसिंह यादव जी की अनुभूति:
गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण में जाने के बाद यह भाई साहिब अपने परिवार के साथ शांतिकुंज आए। इनके मन के किसी कोने में टीस थी कि इस बार गुरुदेव से मिलना नहीं हो पाएगा। अपने मन की ऊहापोह को लिए जब वह माताजी के पास पहुंचे तो उन्हें पहली हैरानी तो यही हुई कि माताजी ने उन्हें उनका नाम लेकर पुकारते हुए कहा, “फूलसिंह, बेटा! कब आया तू?” फिर पत्नी-बच्चों में से एक-एक का नाम लेते हुए उन्होंने सभी का हाल पूछा और पूछा कि यात्रा कैसी रही। डॉ. फूलसिंह यादव को माताजी की इन बातों से हैरानी हुई क्योंकि वे पहले उनसे कभी मिले ही नहीं थे। पहले आते थे तो उनका मिलना गुरुदेव से ही होता था। आज माताजी की बातों ने उन्हें चकित कर दिया। वे कुछ और अधिक सोच पाते माताजी बोल पड़ीं :
“क्या सोच रहा है? माँ को अपने बच्चों की पहचान थोड़े ही करानी पड़ती है और हां गुरुजी नहीं मिलते तो क्या हुआ, मुझे तेरे प्रमोशन का ध्यान है। तू किसी बात की फिकर न कर । मैं तेरा प्रमोशन कराऊंगी।”
अंतर्यामी माँ की बातों को सुनकर डॉ. फूलसिंह की आंखें भर आईं। वह प्रणाम करके नीचे उतरे और यही सोचते रहे कि अगर माताजी अपनी पहचान न करातीं तो उन्हें भला कौन पहचान सकता है। गुरुजी कृपालु हैं लेकिन माताजी उनसे भी हज़ार गुना अधिक कृपालु हैं। यह ठीक है कि दया के सागर गुरुदेव माँगने पर कभी किसी को निराश नहीं करते परंतु माताजी तो बिना माँगे ही सब कुछ दे डालती हैं और देकर भी यही सोचती हैं कि बच्चे को कुछ कम दिया। माँ की कृपा और प्यार का कोई अंत नहीं।
आज भी डॉ. फूलसिंह के मन को माताजी की यादें भिगोती हैं और वे केवल इतना ही कह पाते हैं कि जो माँ शक्तिपीठ में प्रतिष्ठित हैं, वही माँ अपने बच्चों पर कृपा करने के लिए अवतरित हुई थीं।
माताजी से परिजनों को मिलाने वाले शिवप्रसाद मिश्रा आदि कार्यकर्तागण रोज़ ही उन्हें आशीषों की वर्षा करते हुए देखते थे। मिलने वाले परिजनों के कहे बिना ही माताजी समस्या कह डालतीं और उसके सार्थक समाधान का विश्वास दिलातीं। दुःसाध्य-असाध्य बीमारियां, घर-परिवार की जटिल उलझनें, सालों से लम्बित पड़े मुकदमे, बेटी की शादी और भी ऐसी न जाने कितनी ही समस्याएं माताजी अपनी तपःशक्ति से पल में हल कर देतीं। उनके पास लोग रोते हुए आते और हंसते हुए जाते। यह प्रभाव क्षणिक नहीं दीर्घकालीन होता। जब ये लोग अपने घर पहुंचते तो उन्हें अपनी परिस्थितियां बदली हुई लगतीं। इस बदलाव की सूचना व चिट्ठियों से देते और कभी-कभी तो खुशी में स्वयं ही भागे हुए चले आते। आकर कहते, माताजी आपकी कृपा से सब कुछ एकदम ठीक हो गया। उत्तर में वह कहतीं, हां बेटा, सो तो ठीक है, पर तू अपनी एक बात में सुधार कर ले।
“माँ अपने बच्चों पर कृपा नहीं करती, उन्हें प्यार करती है। वह जो कुछ भी करती है, बच्चों के प्रति प्यार से विवश होकर करती है।”
प्रेममयी माँ के इस प्यार का कोई अंत नहीं था। चाहे शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस में रहने वाले लोग हों या फिर बाहर से आने वाले, सब पर उनका प्यार निरंतर बरसता रहता था। अपने बच्चों को उनकी पसंदीदा चीजें बनाकर खिलाना उनका बड़ा ही मनपसंद कार्य था। वे किसी के भी बिना बताए यह बराबर ध्यान रखती थीं कि किसको बेसन का हलुआ पसंद है, किसे गाजर का हलुआ अच्छा लगता है, तिल के लड्डू, करेले की सब्जी, चने की दाल और भी ऐसी न जाने कितनी तरह की चीजों का वह प्रत्येक की पसंद के अनुसार ध्यान रखती थीं। बिना किसी पूर्व सूचना के वह जब-तब कोई चीज स्वयं बना लेतीं या फिर साथ में रहने वाली लड़कियों से बनवा लेतीं। आगंतुक परिजन जब उनसे मिलने के लिए आते तो वे उन्हें अपने सामने बिठाकर बड़े ही प्यार से खिलातीं। खाने वालों को हैरानी भी होती कि माताजी को कैसे पता कि मुझे यह चीज सबसे ज्यादा पसंद है और मैं आज आने वाला हूं लेकिन यह हैरानी अधिक देर तक नहीं टिकती क्योंकि लगातार के अनुभवों ने उन्हें विश्वास दिला दिया था कि “उनकी माँ अंतर्यामी होने के साथ योग की दिव्य विभूतियों से संपन्न हैं।”
सारा दिन संतानों पर प्यार और आशीष लुटाने के बाद माताजी शाम होते-होते गुरुदेव के पास ऊपर चली जातीं। वहां उनके साथ सूक्ष्मीकरण के उच्चस्तरीय प्रयोगों में भागीदार होतीं।
“गुरुदेव के द्वारा संपन्न की जाने वाली विश्वकुण्डलिनी के जागरण व पांच वीरभद्रों के निर्माण जैसी क्रियाएं माताजी की दिव्य शक्तियों के संरक्षण में चल रही थीं।”
सूक्ष्मीकरण साधना के उपरांत बाहर निकलने पर गुरुदेव ने इस विशिष्ट समय की चर्चा करते हुए एक बातचीत में कहा था,
“माताजी के आशीष तुम्ही लोगों को नहीं मिलते, उनके आशीष हमें भी मिलते हैं।”
फिर वह हंसते हुए बोले, “माताजी, माँ के पेट से ही,माताजी होकर पैदा हुई हैं। वह एक साथ सभी की माँ हैं।”
कुछ देर ठहर कर अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, यह शरीर अब तक उन्हीं की देखभाल के बल पर टिका हुआ है। मेरे जीवन के सारे जटिल प्रयोग उनके मातृत्व के संरक्षण के बल पर ही संभव हुए हैं। सूक्ष्मीकरण साधना की सफलता भी उन्हीं के दिव्य संरक्षण का नतीजा है। साधनाकाल में वे अगर अपनी दिव्य शक्तियों से सतत मेरी रखवाली न कर रही होतीं तो कौन जाने यह शरीर रहता भी या नहीं।
गुरुदेव की इस सूक्ष्मीकरण साधना के बाद बीतते वर्षों के साथ अनेकों घटनाचक्र तेजी से बदले और वह समय भी आया जब शिव- महाशक्ति में समाने की तैयारी करने लगे।
कल वाला लेख बहुत ही मार्मिक होने वाला है, So stay tuned.
धन्यवाद्,जय गुरुदेव