वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 21वां ज्ञानप्रसाद लेख- वंदनीय माता जी की योगशक्ति   

ज्ञानप्रसाद लेखों को लिखते समय हमें  तरह-तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और हमारी प्रवृति ऐसी है कि चुनौतियाँ हमें पसंद ही बहुत हैं, सरल कार्य तो हर कोई कर सकता है। कठिनाइओं और चुनौतियों का सामना करके ही हम गुरुदेव के समक्ष अपनी पात्रता का प्रमाण दे सकते हैं। 

इन पंक्तियों को  लिखने के पीछे जो भावना छिपी बैठी है वोह बार-बार प्रश्न करे  जा रही है कि आज के लेख की भूमिका के लिए क्या लिखा जाए?  सारा लेख ही ऐसे इलेक्ट्रिक करंट जैसे ज्ञान से ओतप्रोत है कि इसका अमृतपान बिना किसी शंका के Mesmerize किये जा रहा है। पोस्ट करने से पहले दो बार पढ़ चुके हैं, कईं शब्दों को, वाक्यों को, पैराग्राफ्स को quote/unquote ( “ ”) से हाईलाइट कर चुके हैं, ऐसा लग रहा है कि सारा लेख ही हाइलाइटेड हो जायेगा। 

तो साथिओ आओ अगले कुछ मिंटों के लिए सब कुछ भूल कर, पूर्ण मनोयोग से  गुरुवर/माताजी  के दिव्य चरणों में समर्पित हो जाएँ, गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें एवं ध्यानपूर्वक समझने का प्रयास करें कि आज के गुरुज्ञान में कौन सी जन्मघूंटी समाहित है। यह एक ऐसी पॉवरड्रिंक है जो हम जैसों  को तो क्या, मृत्य शरीर में प्राण डाल दे। यही जीवनी शक्ति हम सबसे न जाने कैसे-कैसे कमेंट लिखवा ले, हम सब रोज़ इस चमत्कार को प्रतक्ष्य देख रहे हैं, जिन्होंने कभी हिंदी में एक शब्द भी नहीं लिखा था आज इतने बड़े-बड़े प्रभावशाली कमेंट लिख रहे हैं।

Here we go:

*****************         

यद्यपि शांतिकुंज आगमन के समय से ही वंदनीय माताजी सूत्र संचालिका के रूप में क्रियाशील थीं, गुरुदेव की हिमालय यात्रा के दौरान भी उन्होंने सारा कार्यभार अपने कन्धों पर लिया हुआ था लेकिन गुरुदेव के वापस लौटने के बाद उन्होंने फिर से अपनेआप को परोक्ष भूमिका (Indirect role)  में समेट लिया था । ऐसा करने के पीछे किसी तरह की  अयोग्यता जैसे  कारण नहीं थे, बल्कि वे श्रेय व यश-कामना विहीन,अपने गुरु-मार्गदर्शक और आराध्य के प्रति पूर्णतया समर्पित साधिका का आदर्श प्रस्तुत करना चाहती थीं। वे स्वयं जी कर अपने बच्चों को बताना चाहती थीं, सिखाना चाहती थीं कि “शिष्यत्व” क्या होता है, शिष्य कैसा होता है, साधना में समर्पण का क्या महत्त्व है। “OGGP गुरुकुल” जिसके अंतर्गत इन ज्ञानप्रसाद लेखों का अमृतपान किया जा रहा है, बार-बार हर कोई श्रेय/यश-कामना विहीन समर्पण की ही बात किए जा रहा है। कितनी प्रसन्नता की बात है कि अधिकतर साथी इस पालिसी का पूर्णतया पालन करते हुए गुरुकार्य कर रहे हैं।  

इसी चर्चा में यह समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि सर्वेश्वरी माँ  के अतिरिक्त भला और कौन अपने बच्चों के लिए ऐसा त्यागमय, कष्टमय एवं आदर्शपूर्ण जीवन जिएगा। अध्यात्म-साधकों के लिए माताजी की वह जीवनशैली कितनी ही आदर्शनिष्ठ क्यों न हो लेकिन  मिशन को उनके कुशल नेतृत्व की आवश्यकता थी । 

इसी के चलते गुरुदेव समय-समय पर माताजी को अकेले शांतिकुंज ही नहीं संपूर्ण मिशन के “सूत्र संचालन” के लिए प्रशिक्षित एवं प्रोत्साहित करते रहते थे। जब गुरुदेव शक्तिपीठों में आदिशक्ति की प्राण प्रतिष्ठा के लिए  प्रवास पर गए, तब उनका यह आग्रह काफी बढ़ गया। प्रवास के दौरान वह माताजी को प्रतिदिन एक पत्र लिखकर अपने कार्यों का व्योरा  भेजा करते थे। डाक व्यवस्था में गड़बड़ी के कारण पहले के पत्र पीछे और पीछे के पत्र पहले पहुंच सकते हैं इसलिए गुरुदेव प्रत्येक पत्र में “पत्र संख्या” लिखना नहीं भूलते थे। प्रतिदिन लिखे जाने वाले यह  पत्र अभी भी शांतिकुंज में सुरक्षित हैं। इन सभी पत्रों में यदि किसी भी एक सारतत्व  की खोज की जाए तो वह यही है कि गुरुदेव, माताजी को मिशन के प्रत्यक्ष सूत्र-संचालन हेतु तैयार कर रहे थे। 

“इन पत्रों की भाषा और शैली से बार-बार  यही सत्य ध्वनित होता है कि माताजी सूत्र-संचालन का कार्यभार अपने समर्थ हाथों में ले लें ।”

शक्तिपीठों का प्रवास कार्यक्रम समाप्त होने के कुछ ही समय बाद गुरुदेव पर असुरता ने आक्रमण  कर दिया। यह घटना सन् 1984 के प्रारंभ की है। आसुरी शक्तियों ने अपने नीच गुणों के अनुरूप एक व्यक्ति को माध्यम बनाकर गुरुदेव पर आक्रमण किया। उस समय शांतिकुंज में “कल्प साधना सत्र” चल रहे थे। शिविर में भागीदार होने आए सभी परिजन अपने साधनात्मक कार्यक्रमों में व्यस्त थे । उन दिनों गुरुदेव सभी के लिए प्रायः सभी समय सर्वसुलभ भी हुआ करते थे। इसी का लाभ उठाकर वह दुष्ट व्यक्ति ऊपर गया और उसने उन पर प्राणघातक हमला किया, गुरुदेव के समर्थ प्रतिरोध (Strong resistance) के कारण उसे बहुत ज्यादा सफलता न मिली और वह डर के मारे भाग निकला। 

कहा जाता है कि  करुणामूर्ति गुरुदेव ने स्वयं ही उस कायर और डरपोक को भाग जाने का अवसर दिया लेकिन इस घटना से एक बात तो साफ हो गई कि माध्यम कोई भी हो आसुरी शक्तियों का साहस इतना तो बढ़ ही गया है  कि “देव शक्तियों के केंद्र शांतिकुंज” में घुसकर “देव शक्तियों के महानायक गुरुदेव” पर हमला करने की हिम्मत जुटा सकती हैं।

गुरुदेव पर आक्रमण होना एक ऐसी चुनौती थी  जिसे गुरुदेव ने प्रसन्न भाव से स्वीकार किया और वे असुरता को समर्थ ढंग से उत्तर देने के लिए “सूक्ष्मीकरण साधना” में चले गए। पूरी तरह से  एकांत में चलने वाली इस साधना का उद्देश्य  विश्व-वसुधा पर छाए  जा रहे आसुरी आतंक को निरस्त करना था। साथ ही तीसरे विश्वयुद्ध की उन भयावह संभावनाओं को समाप्त करना था जिसकी भविष्यवाणी विश्व भर के भविष्यवक्ता बहुत समय से  करते चले आ रहे थे। 

वर्ष 1984 की रामनवमी को इस तरह योजनाबद्ध रीति से गुरुदेव के एकांत में चले जाने के बाद मिशन के सूत्र संचालन का सारा दायित्व माताजी पर आ गया। माताजी पर इस दायित्व के साथ ही एक अन्य गुरुतर दायित्व भी था, वह दायित्व था इस साधना में माताजी का सहयोग। गुरुदेव द्वारा की जाने वाली अत्यंत दुष्कर एवं दुरूह (Very difficult) सूक्ष्मीकरण साधना में माताजी  उनकी समर्थ सहयोगिनी भी थीं। गुरुदेव जिस सूक्ष्मीकरण साधना को कर रहे थे वह योग और तंत्र का मिला-जुला अत्यंत उच्चस्तरीय और गोपनीय प्रयोग था। इसकी दुरूहता और दुष्करता को इसी सत्य से समझा जा सकता है कि ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के बाद से सृष्टि के आध्यात्मिक इतिहास में किसी ने भी इसे करने की हिम्मत नहीं जुटाई थी। इसी से सोचा जा सकता है कि इस महानुष्ठान को करने वाले और इस कार्य में उनकी समर्थ सहयोगीनि  बनने वाली  वंदनीय माताजी में कितनी असाधारण आध्यात्मिक योग्यता और साधनात्मक समर्थता की आवश्यकता थी।

इस साधनात्मक समर्थता  के लिए गुरुदेव को  चौथी बार हिमालय यात्रा करनी पड़ी, लेकिन इस बार की यात्रा उन्होंने सूक्ष्म शरीर से की। इस दौरान माताजी ने अपनी समर्थ साधना शक्ति से गुरुदेव के स्थूल शरीर की आसुरी प्रकोपों से रक्षा की। 

इस हिमालय यात्रा में गुरुदेव को उनके द्वारा किये  जाने वाले “अलौकिक साधना का विधि-विधान” बताया गया । विश्वहित में इसके अत्यंत प्रभावकारी परिणाम बताने के साथ साधना के लिए आवश्यक सावधानियां भी गिनाई गईं। यह भी कहा गया कि साधना काल में आसुरी शक्तियां तरह-तरह से उपद्रव मचाने में, हर तरह के विघ्न पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोडेंगीं । इन विघ्नों और उपद्रवों के अलावा स्वयं की सूक्ष्म चेतना को “पांच समर्थ स्वरूप” प्रदान करने की इस प्रक्रिया में, गुरुदेव के अस्तित्व में इतनी तरह के शक्ति-विस्फोट होंगे कि कभी भी स्थूल देह छूटने का खतरा बना रहेगा। ऐसी स्थिति में स्थूल देह की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किसी “समर्थ शक्ति का स्थूल रूप से दिव्य संरक्षण” जरूरी है। यह कार्य केवल और केवल माताजी कर सकती हैं। 

हिमालयवासी ऋषिगणों ने बताया कि शक्तिस्वरूपा माताजी परम समर्थ हैं और सभी के लिए हैं, यहां तक कि हम सब (ऋषिगणों के लिए भी) के लिए भी परम वंदनीय हैं। उन्हीं के संरक्षण में यह साधना सफल हो सकती है।

मार्गदर्शक सत्ता (दादा गुरु) एवं हिमालयवासी ऋषि सत्ताओं के सम्मिलित निर्देशन के अनुरूप परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना का कार्यक्रम बनाया। परम वंदनीय माताजी पर दोहरी जिम्मेदारी आ पड़ी। दिन में मिशन के सभी काम-काज की देखभाल करनी और रात्रि में गुरुदेव की साधना में समर्थ सहयोग करना। दिन में सभी तरह की व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन देना, छोटे-बड़े सभी लोगों की प्रत्येक बात को ध्यान से सुनकर निर्णय देना, क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्ताओं  की समस्याओं के हल निकालने,  कष्ट और पीड़ा में पड़े अपने उन बच्चों का भी ध्यान रखना जो अपनी प्यारी माँ  के अलावा और कुछ जानते ही नहीं, जब-तब किसी भी छोटी-मोटी आफत- मुसीबत आने पर माँ-माँ  चिल्लाने लगते हैं। परम वंदनीय माता जी को  उनकी भी देखभाल करनी थी जो गुरुदेव से भांति-भांति की आशाएं लगाए बैठे थे । इन नादानों को तो यह भी  पता नहीं था कि गुरुदेव इस समय गहन साधना में हैं और उनकी एकाग्रता में व्यवधान डालना किसी भी तरह से ठीक नहीं है।

परम समर्थ, परम वंदनीया माताजी ने एक साथ न केवल  ये सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाई बल्कि बड़ी ही  खूबसूरती से निभाईं । सदा एकांत में रहने वाली माताजी को जब लोगों ने 1984 में पहली बार टोलियों की विदाई के समय प्रवचन मंच पर बोलते हुए सुना तो वे हैरान से  रह गए। अविरल प्रवाहित हो रही वाणी एवं अद्भुत व भावपूर्ण शब्द संयोजन से अभिव्यक्त होती उनकी आध्यात्मिक शक्तिधारा ने सभी को हैरान तो कर ही दिया साथ में  उल्लास से भी भर दिया। सभी के मन परम वंदनीय माताजी की जय-जयकार  करते हुए नाच उठे।

इन्ही दिनों की एक और सच्चाई  

सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान  क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्ता  जब माताजी से मिले तो अंतर्यामी माँ  ने खुलकर उन्हें अपनी “योगशक्ति का परिचय” दिया। इससे पहले वे सदा अपने क्रियाकलापों को गोपनीय  रखती थीं और  किसी के द्वारा कोई भी समस्या बताने पर वे प्रायः कहती थीं, 

लेकिन इस बार तो  स्थिति एकदम बदली हुई लगी। मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने अनुभव किया कि उनकी अपनी माँ  ने सारा सूत्र-संचालन अपने हाथों में ले लिया है और माँ  जब सूत्र संचालिका होती है तो वह व्यवस्था और प्रशासन के माध्यम से दोनों हाथों से अपने मातृत्व को, अपने वात्सल्य को लुटाती है। परम वंदनीय माताजी  तो मिशन की व्यवस्था एवं प्रशासन की सामान्य लौकिक शक्तियों के साथ अपनी उच्चस्तरीय आध्यात्मिक शक्तियों को लुटाने लगी थीं। सभी परिजनों पर उनके आशीष बरसने लगे थे। सर्वेश्वरी अपनी समस्त संतानों पर अतिशय कृपालु हो उठी थीं। समस्त सूत्र-संचालन में उनका मातृभाव छा गया था। वे अपने आंचल से आशीषों के अनुदान बरसा रही थीं। “माताजी के आशीषों की वर्षा परम पूज्य गुरुदेव के एकांत साधना में चले जाने के बाद बहुत ही घनी हो गई थी।” 

कल इससे आगे की बात करेंगें। 

जय गुरुदेव,धन्यवाद् 


Leave a comment