वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 20वां ज्ञानप्रसाद लेख- परम वंदनीय माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव की साधना के अद्भुत प्रभाव 

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित लेख श्रृंखला का आज 20 वां लेख प्रस्तुत है। 118 पृष्ठों की दिव्य पुस्तक  “महाशक्ति की लोकयात्रा” में समाहित दिव्य ज्ञान का एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक अध्ययन करके,अपनी समर्था के अनुसार समझकर, सरल करते हुए इस मंच पर प्रस्तुत करने का यह अद्भुत प्रयास केवल माँ की अनुकम्पा से ही प्राप्त हो सकता है, ज्ञान के अथाह सागर से अनमोल रत्न ढूंढ पाने में हम कहाँ समर्थ हैं? अपने साथिओं के सदैव आभारी रहेंगें जिनके कमैंट्स हमारा उत्साहवर्धन कर रहे हैं।

शुक्रवार प्रस्तुत हुए लेख में हम जान पाए थे कि शांतिकुंज में रहकर परम वंदनीय माताजी और हिमालय में प्रवास कर रहे परमपूज्य गुरुदेव कैसे अलग-अलग प्रकार की साधना कर रहे थे। उसी साधना प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए आज के लेख में 1971 के भारत-पाक युद्ध, बांग्ला देश का जन्म, गुरुदेव की अफ्रीका यात्रा एवं प्राण प्रत्यवर्तन प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन है।

इनमें से अधिकतर विषयों पर इसी मंच से विस्तृत लेख श्रृंखला प्रस्तुत हो चुकी हैं जो हमारी वेबसाइट पर सेव की हुई हैं। इन सेव किये हुए  लगभग 1500 लेखों को सर्च विंडो की सहायता से ढूँढा जा सकता है। 

सप्ताह के प्रथम दिन का यह ज्ञानप्रसाद लेख हमारी आदरणीय बहिन सुमनलता जी के सुझाव का एक शुभ सन्देश लेकर आया है जिसके लिए हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं। इस सुझाव के अंतर्गत सभी नियमित साथी जो ज्ञानप्रसाद लेखों का अमृतपान करते हैं, कमेंट-काउंटर कमेंट प्रक्रिया में अपनी भागीदारी दर्ज करते हैं, नियमितता से मात्र “जय गुरुदेव” ही लिखते हैं, “ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का गुरुकुल” नाम से अभिहित किया करेंगें। हमें तो लग रहा है कि इस नई Designation से परिवार एक सीढ़ी और ऊपर जा पंहुचा है। अपनी अल्प  बुद्धि से हमने बहिन जी के Nomenclature में “का” add किया है, अपनी नासमझी के कारण अगर कोई त्रुटि हुई है तो करेक्ट  करने की कृपा कर दें। कितना ही अच्छा होता, सभी प्लेटफॉर्मस पर यह नाम बदला जा सकता लेकिन कुछ टेक्निकल समस्याओं के कारण अभी इंतज़ार करना होगा, जिसके लिए क्षमाप्रार्थी  हैं। 

तो आइए आज के सत्संग का, ज्ञानप्रसाद के अमृतपान का, गुरुज्ञान को  अंतरात्मा में उतारने का शुभारम्भ, गुरुकुल की पावन भूमि पर, गुरुचरणों में समर्पित होकर करें। 

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गुरुदेव इन दिनों उन “आसुरी शक्तियों” को प्रचंड टक्कर देने में जुटे थे जो पड़ोसी देश की कुटिल गतिविधियों का बाना पहनकर हमारे  देश पर चढ़ आई थीं।

1971 की सर्दियों का आरम्भ हमारे  देश पर काफी भारी पड़ रहा था । सरहदों पर सेनाएं  अलग-अलग मोर्चों  में शत्रुओं  से जूझ रही थीं। पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्ला देश) में हो रहे अमानवीय अत्याचारों के कारण भारत भागे आ रहे शरणार्थी पलायन कर रहे थे। इन असंख्य  शरणार्थीिओं की  समुचित सहायता करने के लिए हमारे  देश के बहादुर सैनिक  प्रतिबद्ध थे। समूचे राष्ट्र के लिए यह बड़ा कठिन दौर था। समस्याओं के इस जटिल चक्रव्यूह के अनेक चक्र थे। राष्ट्र के कर्णधारों को कूटनीतिक मोर्चे  पर घेरने की कोशिश हो रही थी। दुनिया का सबसे शक्तिशाली कहा जाने वाला देश (अमेरिका) भारत के शत्रुओं (पाकिस्तान आदि)  को हर तरह से सहायता पहुंचाने में जुटा था। मात्र 13 दिन चले इस युद्ध में पाकिस्तान के साथ ब्रिटेन, अमेरिका और चीन थे और रूस भारत के साथ था। स्थिति यहाँ तक पँहुच गयी थी कि  अमेरिका का  सर्वशक्तिमान समझा जाने वाला सातवां बेड़ा भी भारत की ओर बढ़ा चला आ रहा था। इस स्थिति को और अच्छी तरह जानने के लिए एक वीडियो संलग्न की गयी है: 

छोटे-बड़े जो भी उस समय युद्ध की खबरों को सुनते थे, आपस में यही पूछते थे,सोचते थे,अब क्या होगा? अचानक घटनाचक्रों में कुछ ऐसे चमत्कारी परिवर्तन हुए कि बाज़ी  एकदम पलट गई। नया इतिहास नहीं, नया भूगोल भी रचा गया। दुनिया के इतिहास में शायद पहली बार 93000  हथियारबंद सेना ने अपने जनरल के साथ घुटने टेककर आत्मसमर्पण किया। विश्व के नक्शे में नई लकीरें खिंची, भूगोल में एक नए देश के मानचित्र ने आकार लिया। 

देश के कर्णधारों से लेकर सामान्य नागरिक तक ने अनुभव किया कि “यह तो सब कुछ चमत्कार जैसा हो गया। कैसे वापिस लौटा सातवां बेड़ा? कैसे किया दुश्मन की इतनी बड़ी फौज ने आत्मसमर्पण?” 

इन सवालों का जवाब सामान्य बुद्धि खोजने में असमर्थ थी। बस सभी ने यही  कहा कि 

“यह तो भारत की आध्यात्मिक दिव्य शक्तियों का चमत्कार है।” जिन दिनों यह सब हुआ, उन्हीं दिनों एक परिजन डॉ. अमल कुमार दत्ता जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, माताजी से मिलने आए। दत्ता भाई साहिब से अब्रॉड सेल में यां Acupressure पार्क में Walk करते हमारा भी कई बार मिलन हो चुका  है। मिलने पर उन्होंने माताजी से कहा, “माताजी आपने सुना, भारत ने युद्ध जीत लिया।” उत्तर में माताजी बड़े धीरे से बोलीं: 

परिजन को थोड़ा अचरज हुआ कि यह सुनना तो ठीक पर देखने का क्या मतलब है? उन्होंने माताजी से सारी बात का खुलासा करने की ज़िद  की। उनकी इस ज़िद  पर माताजी  कहने लगीं:

उन दिनों के अनेक संस्मरणों में एक संस्मरण और है, जिसे बाद में माताजी ने स्वयं अपने मुख से बताया। इस संस्मरण से ममतामयी माँ  का वात्सल्य प्रकट होता है। उन्होंने बातचीत के क्रम में अपनी यादों को कुरेदते हुए कहा: 

वापस आने के बाद गुरुदेव सबसे पहले सुदूर वास करने वाले प्रवासी परिजनों की पुकार का उत्तर देने के लिए अफ्रीका गए। सन् 1972 में गुरुदेव ने अपनी यह यात्रा समुंद्री  जहाज़  से संपन्न की। उनका यह प्रवास ऊपरी तौर पर साधारण रहने पर भी आंतरिक रूप से कई असाधारण अनुभूतियों से भरा रहा। अफ्रीका यात्रा पर 2022 में इसी  मंच से कई विस्तृत लेख प्रकाशित किये गए थे। यह सभी लेख हमारी वेबसाइट https://life2health.org/ पर सेव किये हुए हैं। लगभग 1500 प्रकाशित लेखों में से इन लेखों को सर्च विंडो की सहायता से ढूँढा जा सकता है। 

ऐसे ही एक लेख का लिंक इधर दे रहे हैं। इसी लिंक में अफ्रीका यात्रा से सम्बंधित और भी कई महत्वपूर्ण लिंक मिल जायेंगें।

अफ्रीका से वापिस  लौटने पर गुरुवर ने 1973 में पांच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन सत्र आयोजित किए। शांतिकुंज में आयोजित होने वाले यह सबसे पहले साधना सत्र थे। इसमें देशभर के परिजनों ने भाग लिया और अपने “प्राणों के प्रत्यावर्तन” की अनुभूति प्राप्त की। इन परिजनों में से अनेक परिजन आज शांतिकुंज और ब्रह्मवर्चस में वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं। अनेकों ऐसे कार्यकर्ता भी थे जो शांतिकुंज में न रह सके, ऐसे कार्यकर्ता  अपने-अपने क्षेत्र में जी-जान  से मिशन की गतिविधियों में जुटे हैं।

प्राणों का यह प्रत्यावर्तन सब तरह से अनूठा था। इस प्रक्रिया के अंतर्गत  पांच दिनों के एकांतवास में साधकगण गुरुदेव द्वारा बताई गई कई तरह की सरल किंतु प्रभावकारी साधनाएं करते थे। इन साधनाओं का उद्देश्य साधकों के प्राणों को उच्चस्तरीय आध्यात्मिक तत्त्वों के लिए ग्रहणशील बनाना था ताकि वे गुरुदेव के “महाप्राण के किसी लघु अंश”  को ग्रहण व धारण करने में समर्थ हो सकें। साधना की इस अवधि में प्रत्येक साधक को गुरुदेव के संग रहने का व चर्चा-परामर्श का भरपूर मौका मिलता था। इस साधना में साधकों को भोजन व औषधि कल्प के माध्यम से माताजी की “प्राण-सुधा (Life-drink)” पीने की मिलती थी। वे अपने बच्चों को इन्हीं माध्यमों से अपने तप का महत्त्वपूर्ण अंश देकर अनुग्रहीत करती थीं। इन प्रत्यावर्तन शिविरों से लेकर लगभग एक दशक की अवधि तक शांतिकुंज में अनेक तरह के साधना सत्रों का आयोजन संचालन हुआ। इनमें भागीदारी करने वाले देशभर के लाखों  साधकों ने परमपूज्य गुरुदेव के साथ माताजी की तप शक्ति और योग विभूतियों का साक्षात्कार किया। ये सभी सर्वसिद्धिदात्री माँ  द्वारा किए गए विशेष अनुदानों से लाभान्वित हुए। 

यह अवधि शांतिकुंज के स्वर्णिम कालों में से एक थी इसी अवधि में माताजी को सहयोग देने के लिए शैल जीजी  एवं डॉ. प्रणव पंड्या जी  का आगमन हुआ। अध्यात्म के वैज्ञानिक आयाम को प्रतिष्ठित करने के लिए ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना हुई। इसी के साथ आदिशक्ति जगदंबा को युगशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने एक नया अभियान छेड़ा। यह इस सत्य का उद्घोष था कि “युगनिर्माण मिशन की सूत्र संचालिका आदिशक्ति वंदनीय माताजी स्वयं हैं।” इस अभियान को गति देने के लिए गुरुदेव ने स्वयं देशभर की यात्राएं कीं। पहले चरण में संपूर्ण देश के चुने हुए पवित्र तीर्थ स्थानों पर चौबीस शक्तिपीठ स्थापित हुए। बाद में इनकी संख्या बढ़ती गई। 

साथिओं के बताना चाहते हैं कि हर लेख की भांति यह लेख भी बहुत ही ध्यानपूर्वक, कई बार पढ़ने के उपरांत ही आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा  है, अगर फिर भी अनजाने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो हम करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं। पाठकों से निवेदन है कि कोई भी त्रुटि दिखाई दे तो सूचित करें ताकि हम संशोधन  कर सकें।

साथिओं से  निवेदन है कि प्रत्येक ज्ञानप्रसाद को साधारण न समझें, इन अति दिव्य लेखों का अमृतपान करना ही एक परम सौभाग्य है जो हर किसी को प्राप्त नहीं होता। 

धन्यवाद् जय गुरुदेव    


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