परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित लेख श्रृंखला का आज 19वां लेख प्रस्तुत है। 118 पृष्ठों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” में समाहित दिव्य ज्ञान का एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक अध्ययन करके,अपनी समर्था के अनुसार समझकर, सरल करते हुए इस मंच पर प्रस्तुत करने का यह अद्भुत प्रयास केवल माँ की अनुकम्पा से ही प्राप्त हो सकता है, ज्ञान के अथाह सागर से अनमोल रत्न ढूंढ पाने में हम कहाँ समर्थ हैं? अपने साथिओं के सदैव आभारी रहेंगें जिनके कमैंट्स हमारा उत्साहवर्धन कर रहे हैं।
जिस दिव्य यात्रा का इन ज्ञानप्रसाद लेखों में वर्णन हो रहा है यह किसी साधारण माँ की न होकर, किसी माँ-शक्ति की न होकर “एक महाशक्ति की लोकयात्रा” है, हमारे परमपूज्य गुरुदेव की जीवनसंगिनी की लोकयात्रा है। लिखने वाले,पढ़ने वाले सभी ने जो अनुभव किया है उसे शब्दों में बांध पाना लगभग असम्भव ही है, बहुत कुछ अनुभव हो चुका है लेकिन उससे भी अधिक अनुभव होना बाकी है, जो साथी नियमितता से (बिना कोई भी लेख मिस किये) इन लेखों का अमृतपान कर रहे हैं वोह अपनेआप को अति-सौभाग्यशाली मान रहे होंगें, ऐसा हमारा अटल विश्वास है।


आज प्रस्तुत किये गए लेख में परम वंदनीय माताजी की साधना प्रणाली का वर्णन है। यह एक ऐसी सूक्ष्म साधना प्रणाली है जिसने शांतिकुंज को आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षय कोष बना दिया है। अक्षय (अ-क्षय) अर्थात कभी भी समाप्त न होने वाली सम्पति। बैंक में फिक्स्ड डिपाजिट कराने से प्रिंसिपल सुरक्षित रहता है और ब्याज से गुज़ारा चलता है, शांतिकुंज में ऐसा ऊर्जा कोष छिपा पड़ा है। यही कारण है कि गुरुदेव/माता जी हमें बार-बार उस विद्युत ट्रांसफार्मर से जुड़ कर चार्ज होने के लिए आमत्रित करते रहते हैं।
जो साथी शांतिकुंज जाने में असमर्थ हैं उनके लिए गुरूसाहित्य में से निकाले गए ज्ञानप्रसाद लेख ही साक्षात् शक्ति केंद्र हैं।
तो शुरू करते हैं इस श्रृंखला का 19वां ज्ञानप्रसाद लेख।
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परमपूज्य गुरुदेव के हिमालय प्रस्थान के बाद माताजी के संपूर्ण जीवन में तप की सघनता छा गई। इस तप की ऊर्जा के स्पंदनों से शांतिकुंज का कण-कण अलौकिक दिव्यता से प्रकाशित हो गया। भगवान महाशिव की भांति गुरुदेव हिमालय की गहनताओं में अपनी आत्मचेतना के कैलाश शिखर पर तपोलीन थे और माँ भगवती आदिशक्ति की भांति माताजी अपनी अंशभूता शक्तियों के साथ शांतिकुंज की दिव्य भूमि में साधनालीन थीं।
धन्य थे वे लोग जिन्होंने उन दिनों, कुछ क्षणों के लिए ही सही, शांतिकुंज में आकर अथवा रहकर माताजी को निहारा, उनके साथ कुछ पल अथवा दिन बिताए। बड़भागी वे भी थे, जो अपनी भावनाओं की गहराइयों में, इन पलों में उस अलौकिकता का साक्षात्कार कर रहे थे, सचमुच ही वह सब अलौकिक था।
सौभाग्यशाली तो हम( इन पंक्तियों का लेखक) भी कोई कम नहीं हैं जो इस समय वर्णन की जा रही दिव्यता का अनुभव अपने अन्तर्चक्षुओं से कर रहे हैं। उससे भी अधिक सौभाग्यशाली हम तब थे जब शांतिकुंज एवं कुरुक्षेत्र अश्वमेध यज्ञ में किये वंदनीय माताजी के दर्शन किये थे,चरण स्पर्श किये थे। हमारी छोटी भाभी राधा जी एवं भाई राजीव जी की फोटो माँ जगदम्बा के चरणों में बैठे शेयर कर रहे हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के असंख्य परिजनों ने गुरुदेव और वंदनीय माताजी के दर्शन तक नहीं किये हैं लेकिन इन लेखों के माध्यम से एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास किया गया है कि दोनों दिव्य आत्माओं के चरणों में ही बैठा अनुभव करें ।
आज (2026) का शांतिकुंज और उन दिनों के शांतिकुंज में ज़मीन आसमान का अंतर् है। उन दिनों शांतिकुंज के आस-पास कहीं भी मनुष्यों की भीड़ और वाहनों, मोटरगाड़ियों का जमघट नहीं दिखाई देता था । सब ओर एक गहरी आध्यात्मिक शांति का ही वास था । शांतिकुंज के अंदर भी आज दिखाई दे रहे भवनों का विस्तार और कार्यकर्त्ताओं की भारी संख्या जैसी कोई भी चीज़ न थी। बस मुश्किल से तीन कार्यकर्त्ता थे। “शारदा एवं रुक्मिणी” नाम की दो महिलाएं भोजन आदि में सहयोग देने के लिए थीं। इस शुरुआती दौर में माताजी के साथ रहने वाली 6 बालिकाएं भी थीं जिनकी संख्या बाद में बढ़कर 12 हो गई थी। इनकी पवित्रता, सरलता और गायत्री साधना के प्रति इनके समर्पित भाव को देखकर ऐसा लगता था जैसे माताजी ने स्वयं अपनी प्राणशक्ति को विभाजित कर ये कौमारी स्वरूप बना रखे हैं। इन बालिकाओं के पठन-पाठन, खान-पान, सार-संभाल आदि की सारी व्यवस्था वे स्वयं करती थीं। ये बालिकाएं वंदनीय माताजी के निर्देशन में अपने दैनिक काम-काज के अलावा “अखण्ड दीप की सिद्ध ज्योति” के सान्निध्य में साधना करती थीं। तीन-चार कमरों वाला यह शांतिकुंज प्राचीन ऋषियों का तपोवन लगता था। मन को मोह लेने वाले हरे-भरे कुंजों की छाया, कुछ थोड़े से ही सही लेकिन फलदार और छायादार पेड़ सब मिलकर यहां के वातावरण में बड़े ही निर्मल सौंदर्य की सृष्टि प्रदान करते थे। शोर जैसी कोई चीज़ यहां थी ही नहीं। आवाज़ों के नाम पर या तो कभी माताजी के सान्निध्य में रहने वाली बालिकाओं की हल्की-सी मृदु-मंद हंसी बिखर जाती यां फिर जब-तब गाय रंभा देती लेकिन ये सब भी वातावरण की शांति में मधुरता ही घोलते थे। तब दिन में भी सुनाई देने वाली माँ गंगा के प्रवाह की कल-कल ध्वनि आश्रम के वातावरण को स्वर्गीय संगीत से मधुमय बनाती थी। आगंतुक प्रायः नहीं थे, कभी कभार महीनों में कोई एक-आध व्यक्ति आ जाए तो बहुत थे । आश्रम में माताजी व यहां के थोड़े से निवासियों के लिए रोज़मर्रा की चीज़ों (सब्जी-तरकारी) आदि की व्यवस्था कार्यकर्त्ता हरिद्वार शहर यां ज्वालापुर जाकर करते थे। यह जाना भी प्रायः पैदल ही होता था। हां कभी-कभी थोड़ी-बहुत दूर के लिए बस सुलभ हो जाती थी।
माताजी की दिनचर्या में तप साधना के अलावा अपने परिजनों के पत्रों के उत्तर देना, अखण्ड ज्योति पत्रिका के संपादन की व्यवस्था करना, सभी के भोजन का समुचित रूप से इंतजाम करना शामिल था। इन सभी कामों के साथ वे अपने साथ रहने वाली बालिकाओं के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था भी जुटाती थीं, जिससे कि उनको अपने घर का अथवा माता-पिता का अभाव न खले। इस व्यवस्था में उन्हें कुछ-कुछ नई विशेष चीजें अपने हाथों से बनाकर खिलाना आदि शामिल था। इन सब दैनिक कार्यों में माताजी पर्याप्त व्यस्त रहती थीं। उनकी इस व्यस्तता को देखकर आस-पास रहने वाले यह समझ ही न पाते थे कि वे साधना कब करती हैं, करती हैं भी कि नहीं और यदि करती हैं तो क्या करती हैं। हालांकि अंतःकरण को कुरेदने वाले इन सवालों की भ्रांति में पड़ने वाले लोग माताजी की आध्यात्मिक शक्ति व सिद्धियों से अवगत थे फिर भी अपनी ऊहापोह भरी भ्रांति में वे सत्य को समझने में असमर्थ थे।
माताजी की रहस्य भरी साधना:
माताजी की साधना पर प्रश्न करते हुए एक दिन एक परिजन ने बड़ी ही हिचकिचाहट के साथ माताजी से पूछ लिया:
“माताजी, आप तो स्वयं सिद्धिदात्री हैं, फिर आपको साधना करने की आवश्यकता क्या है?”
इस सवाल के बाद थोड़ा डरते-डरते उन्होंने यह भी पूछा कि
“आप अपनी साधना कब करती हैं, कुछ पता ही नहीं चलता।”
अंतर्यामी माताजी परिजन की बातों पर पहले तो मुस्कराईं, हल्के-से हंसीं फिर थोड़ा-सा रुककर बोलीं: क्या करेगा यह सब जानकर, लेकिन उसे बड़ा मायूस और उदास देखकर वह समझाने लगीं:
“देख बेटा! तू इन बातों को अभी ठीक से समझ नहीं सकता। तेरी आंखें अभी बड़ी कमजोर हैं, वे हमारी साधना को देख नहीं सकतीं। फिर भी अगर तू ज़िद करता है, तो चल थोड़ा-बहुत बताए देती हूँ । देख, ये लड़कियां और मैं मिलकर साधना करती हैं। इन लड़कियों की साधना स्थूल है और मेरी सूक्ष्म । मैं जो कुछ भी करती हूं वह सूक्ष्म शरीर से, सूक्ष्मलोक में करती हूँ। साधारण लोगों को दिखाई न देने और समझ में न आने पर भी इस तरह से ब्रह्माँड में बिखरे-फैले शक्ति प्रवाहों में से अनंत शक्ति का अर्जन होता है। यह सूक्ष्म शरीर की ऐसी साधना है जिसकी चर्चा साधना की किसी किताब में नहीं है लेकिन इस तरह से किए जाने वाले शक्ति अर्जन की सार्थकता तभी है जब उसके अवतरण के लिए उचित आधार-भूमि हो। इस आधार-भूमि का निर्माण इन लड़कियों द्वारा मेरी देख-रेख में किए जा रहे गायत्री पुरश्चरणों की श्रृंखला से हो रहा है। पता नहीं तेरी समझ में ये सब बातें कितनी आएंगी लेकिन इतना जान ले कि यहां इन दिनों अद्भुत हो रहा है। इस पवित्र भूमि की पात्रता का विस्तार करके इसे “आध्यात्मिक ऊर्जा का भंडारगृह” बनाया जा रहा है। इसका उपयोग आगे चलकर होगा। तूने एक बात और पूछी थी, माताजी आपको साधना की क्या आवश्यकता है? तो बेटा, साधना मेरे लिए आवश्यकता नहीं, मेरा स्वभाव है। इसकी आवश्यकता मुझे नहीं तुम सब बच्चों को है। अब बच्चे तो बच्चे ठहरे, जाने-अनजाने उनसे न जाने कितने पाप-ताप हो जाते हैं और जब उनके परिणाम सामने आते हैं तो कहते हैं, माताजी बचाओ। बच्चे कैसे भी हों, धूल-मिट्टी, मल-मूत्र से सने हों या साफ-सुथरे हों, मेरे लिए तो बच्चे ही हैं। मैं उनकी माँ हूँ । वे जैसे भी हैं,मुझे बहुत प्यारे हैं। अपने इन बच्चों को आफत-मुसीबत से बचाने के लिए मुझे बहुत कुछ करना पड़ता है। गलती बच्चे करते हैं, प्रायश्चित उनकी माँ होने के कारण मुझे करना पड़ता है। इसी के चलते निरंतर साधना करती रहनी पड़ती है।”
सुनने वाले की आंखें माताजी की बातों को सुनकर भर आईं। वह उनके वात्सल्य के अनंत विस्तार को देखकर हतप्रभ था। माताजी अपने भावों में डूबी कहे जा रही थीं,
“बेटा, मैं तो इस भूमि का, यहां के आस-पास की बहुतेरी भूमि का कायापलट करने में लगी हुई हूं। जहां तक मेरे संकल्प का विस्तार है, यह जमीन “आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षय कोष” बन जाएगी। आगे चलकर यहां विस्तार होगा। यहां से बहुत बड़े-बड़े काम होंगे। उस समय देखने वाले लोग हैरान होंगे कि ये शांतिकुंज के सारे काम स्वयं कैसे हो जाते हैं। शांतिकुंज जो काम अपने हाथ में लेता है, वह बस स्वयं ही होता चला जाता है। दरअसल यह स्वयं नहीं, उस आध्यात्मिक ऊर्जा के एक अंश से होगा जिसे मैं आज जमा कर रही हूं। यहां जो लोग आएंगे और भावभरी श्रद्धा के साथ यहां रहकर साधना करेंगे,अनायास उनके प्राण प्रत्यावर्तित हो जाएंगे। आगामी दिनों में यहां आने वाले श्रद्धावान साधक अपने प्रत्यावर्तित प्राणों को अनुभव करेंगे।”
अपनी साधना की रहस्य कथा के कुछ अंशों को उजागर करते हुए माताजी अचानक उठ खड़ी हुईं। शायद उन्हें अपने भविष्यत् कार्यों को गति देनी थी।
श्वेत-श्वेत हिमशिखरों वाले हिमालय की गहनताओं में तपोलीन गुरुदेव और हरिद्वार की दिव्य साधना स्थली शांतिकुंज में साधनालीन माताजी एक-दूसरे की परिस्थिति एवं भावदशा को अपने हृदय की गहराइयों में सतत अनुभव करते थे। दोनों के कर्त्तव्य कठोर थे, दोनों की साधना बहुत ही कठिन थी। माताजी, गायत्री परिवार के अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने, उनकी कष्ट-कठिनाइयों में भागीदार होने के साथ शांतिकुंज के भविष्य के लिए “आध्यात्मिक ऊर्जा का अक्षय कोष” जुटाने में जुटी थीं। आदरणीय के पी दूबे जी द्वारा अक्षय कोष को वर्णित करती एक वीडियो इस लेख के साथ संलग्न की है, इस वीडियो को देखने से बहुत कुछ Revise हो जायेगा।
https://youtu.be/l3E5kDdaMzo?si=_8OQ8b7ih8o29Z1y
आज का लेख यहीं पर समाप्त होता है, सोमवार को आगे बढ़ेंगें।
जय गुरुदेव