हम सबकी माँ, जिसकी ऊँगली पकड़ कर हम यह लोकयात्रा कर रहे हैं, उन्हीं के आशीर्वाद से आज के लेख का शुभारम्भ हो रहा है। कल ही प्राप्त हुए आगरा शीतला गली स्थित महाशक्ति की जन्मस्थली के नव निर्माण के कुछ चित्र परिवार में शेयर करना अपना कर्तव्य समझते हैं।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख ऐसे तथ्यों का वर्णन कर रहा है जिन्हें अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त हुई जानकारी का विश्लेषण करके ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री मंच पर पहले भी प्रकाशित किया जा चुका है। हम सब अति सौभग्यशाली हैं कि 118 पन्नों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” हमारे हाथों में थमाई गयी, हम यथासंभव प्रयास करके साथिओं के समक्ष रख रहे हैं और साथिओं का भी भरपूर समर्थन प्राप्त हो रहा है, नतमस्तक होकर सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
विश्व में बहुत उथल पुथल हो रही है, ऐसी स्थिति में शांतिपाठ के साथ सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, इसी शांतिपाठ के साथ आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करते हैं।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
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भूमि खरीदने के थोड़े समय बाद यहां पर प्रारंभिक निर्माण कार्य शुरू हो गया। गुरुदेव बीच-बीच में मथुरा से आकर यहां की व्यवस्था देख जाते थे। साथ ही वे माताजी के साथ मथुरा की व्यवस्थाओं को भी अंतिम रूप दे रहे थे। घर-परिवार की सभी ज़िम्मेदारियाँ भी इसी समय निपटाई जानी थीं। इस क्रम में उन्होंने सबसे पहले पुत्र सतीश (मृत्युंजय शर्मा) का विवाह किया और उन्हें अखण्ड ज्योति संस्थान का कार्यभार सौंपना आरंभ कर दिया। बहू निर्मल ने आकर माताजी के गृहकार्य में सहयोग देना शुरू कर दिया। माताजी उसे घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ सौंपने लगीं। समस्त व्यवस्थाओं व ज़िम्मेदारियाँ के अंतिम चरण में पुत्री शैलो (शैलबाला) के लिए उन्होंने सुयोग्य, संस्कारवान वर की खोज कर ली। इस खोज के पीछे गुरुदेव- माताजी की गहन भविष्य दृष्टि थी।
“नियति के लेख में माताजी की पुत्री का विवाह और शांतिकुंज के प्रारंभिक दिनों की शुरुआत लगभग एक ही समय होना लिखा था। शायद इसके पीछे महाशक्ति का स्वसंकल्प भी क्रियाशील था।”
शांतिकुंज के प्रारंभिक दिनों की शुरुआत के कुछ समय पहले ममतामयी माताजी के मातृत्व को बड़ी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा। परीक्षा के ये पल उफनती-उमड़ती, विकल-विह्वल भावनाओं से घिरे थे। मथुरा छोड़ते समय गुरुदेव ने विदाई समारोह का आयोजन किया था ताकि परिजन उनके तीसरी बार (1971) हिमालय जाने से पूर्व मिल सकें,अपने मन की कह सकें और उनके मन की सुन सकें। यह हिमालय यात्रा पिछली सभी यात्राओं की तुलना में असाधारण थी। इसमें यह निश्चित नहीं था कि गुरुदेव वापस लौटेंगे यां अपनी मार्गदर्शक सत्ता की आज्ञानुसार वहीं उनके पास रहकर विश्वकल्याण के लिए तप करेंगे। परम पूज्य गुरुदेव के लिए यह विदाई बहुत ही हृदय विदारक थी क्योंकि गुरुदेव ऐसे परिजनों से, ऐसे बच्चों से बिछड़ रहे थे जिन्हें उन्होंने सदा अपना अंग-अवयव माना, जिन्हें अपने प्राणों के अनुदान देकर पाला। अपने हृदय की इस व्यथा को वह पिछले वर्ष -डेढ़ वर्ष से अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में लिखकर परिजनों को अवगत भी कराते रहे थे।
हमारे पाठक इन वर्षों के यह ऐतिहासिक अंक पढ़ सकते हैं, सभी ऑनलाइन उपलब्ध हैं। हमने तो कई बार इन अंकों को पढ़ा और अपनी अश्रुधारा को परमपूज्य गुरुदेव,वंदनीय माताजी के श्रीचरणों में अर्पित किया।
भावमयी माताजी सब कुछ सहकर भी मौन थीं,परन्तु उनके हृदय की व्यथा गुरुदेव से असंख्य एवं अनंत गुना गहरी थी। सबसे पहले तो वे एक माँ थीं जिसके ह्रदय में उमड़ने वाली भावनाएं शायद समुद्र से भी गहरी और आकाश से भी अधिक व्यापक थीं। माताजी का संपूर्ण अस्तित्व करुण, कोमल संवेदनाओं का ही घनीभूत पुंज था, उन भावमयी जगदंबा को इन दिनों एक के बाद एक “भावनात्मक आघात” झेलने पड़ रहे थे। सबसे पहले तो उन्हें अपनी कोख से जन्मी लाड़ली बेटी शैलो (शैलबाला, जीजी ) की विदाई करनी थी। गायत्री जयंती (3 जून, 1971) को हुई यह शादी उनके लिए संतुष्टि और अश्रुओं से भरी थी । संतुष्टि इसलिए थी कि वह अपनी बेटी के ससुराल के प्रत्येक सदस्य के गुणों के बारे में सुपरिचित एवं निश्चिंत थीं, उन्हें मालूम था कि उनके जामाता डॉ. प्रणव पंड्या एक सुयोग्य पात्र हैं, उनमें समस्त दैवी संभावनाएं विद्यमान हैं,उनके सान्निध्य में पुत्री सब तरह से सुखी रहेगी, अपने जीवन की पूर्णता प्राप्त करेगी लेकिन इस संतुष्टि के साथ ही माताजी की यह भी चिंता थी कि जब उनकी लाड़ली बेटी ससुराल से पहली बार विदा होकर मायके वापस लौटेगी तो बेटी के स्वागत के लिए माँ मथुरा में नहीं होंगीं,उसे छाती से लिपटाकर, हृदय में उमड़ते हुए प्यार को उस पर उड़ेल न पाएंगी क्योंकि उस समय वह गंगा की गोद और हिमालय की छाया में बनी “दिव्य साधना स्थली शांतिकुंज” में एकांत तप कर रही होंगी। बात केवल बेटी से अलग होने तक सीमित न थी, उन्हें तो बेटे और बहू से भी विदा होना था जिन पर कच्ची उम्र में अखण्ड ज्योति संस्थान का गुरुतर भार सौंपकर वे जा रही थीं। बेटे सतीश (मृत्युंजय शर्मा) को उस समय तक काम का कोई खास अनुभव नहीं था। बहू निर्मल भी अभी घर की सारी बातों पर प्रायः उन्हीं पर निर्भर थी। बहु के लिए अम्मा जी (माताजी) ही सब कुछ थीं परंतु माँ को अपने इन बच्चों से अलग होना ही था। विदा तो उन्हें अपनी इस छोटी-सी सुपौत्री गुड़िया से भी लेनी थी जो अभी मुश्किल से दो साल की हुई थी, जिसने हाल ही में जैसे-तैसे नन्हें कदमों से चलना सीखा था, जो बड़ी मुश्किल से अटक-अटककर उन्हें अम्माजी कह पाती थी, जिसके लिए वंदनीय माताजी का गोद ही सारा संसार था। इस नन्हीं सी बच्ची को यदि वे थोड़ी देर के लिए भी अलग करतीं तो बच्ची बिलख उठती थी, उसकी बड़ी-बड़ी आंखें आंसुओं का झरना बन जाती थीं । “भावमयी माताजी को स्वयं बिलखते हुए इन सभी बिलखते हुए बच्चों से अलग होना था।”
जिंदगी की अगणित पीड़ाओं को बड़ी आसानी से हंसकर सहने वाली माताजी को उनकी विकल भावनाएं इन दिनों विह्वल किए हुए थीं।
अपने साथ रहने वाले बच्चों के अलावा विश्व जननी के वे बच्चे भी थे जो हर पल उन्हें माताजी-माताजी कहते हुए थकते न थे, जिन्हें सुख में, दुःख में, संकट में, विपन्नता में केवल अपनी माँ को ही पुकारना आता था, जिन्हें इस भरे-पूरे संसार में केवल अपनी माँ पर ही भरोसा था। ऐसे अनेकों बच्चे इस समय उन्हें विदाई देने आए हुए थे, उन सभी की आंखें भीगी और भरी थीं, उम्र का भेद भले ही हो, लेकिन भावनाओं का कोई भेद न था। हर एक की भावनाएं शायद व्याकुल होकर यही कह रही थीं कि “पिता हमें छोड़कर महातप के लिए हिमालय जा रहे हैं और माँ एकांत साधना में जा रही है।” कोई कुछ भी बोल नहीं रहा था लेकिन सभी रो रहे थे, बिलख रहे थे, सब के मन-प्राण में महा-हाहाकार मचा हुआ था। अपनी असंख्य संतानों की इस हालत से जगदंबा विह्वल, व्याकुल और विकल थीं। अपनी प्राणप्रिय संतानों को इस तरह हिचकियों के हिचकोले खाते हुए देख कोई सामान्य माँ भी शांत नहीं रह सकती,फिर वे तो भावमयी भगवती थीं। बच्चे ही उनके लिए उनका जीवन थे। वेदना की गहरी टीस को अपने में समेटे असंख्य हृदय अपनी माँ को उनकी “एकांत साधना” के लिए विदा दे रहे थे। सभी को मालूम था कि वे हरिद्वार में रहेंगी। बहुत जरूरत पड़ने पर उनसे संपर्क हो सकता है, परंतु उस समय हरिद्वार में मथुरा जैसी सुगमता तो न थी।
एक और महाविछोह :
विछोह के इस करुण अधिपत्य में एक महाविछोह और भी था। विदाई की इस महाघड़ी में जब सभी विदा दे रहे थे, माताजी को भी अपने आराध्य को विदा करना था। यह ठीक था कि उनकी विदाई मथुरा में न होकर हरिद्वार में शांतिकुंज आकर होनी थी और गुरुदेव को सभी से विदा लेकर माताजी के साथ शांतिकुंज तक जाना था। उमड़ते, छलकते, बिखरते और सर्वव्यापी बनते अश्रुओं के बीच गुरुदेव और माताजी की लाड़ली सुपुत्री शैलो अपने सौभाग्य सिंदूर डॉ. प्रणव पंड्या एवं ससुराल के सदस्यों के साथ विदा हुई। अपनी उमड़ती हुई व्याकुलता के महातूफान के बवंडर भरे चक्रवात के साथ एक-एक करके सारे परिजन भी विदा हुए। गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ताओं को तो पं. लीलापत शर्मा के मार्गदर्शन में वहीं रहकर कर्त्तव्य साधना करनी थी। उनकी भावनाएं कितनी भी छटपटाई हों लेकिन श्रीराम एवं माता भगवती के प्रति उनकी मर्यादा साथ चलने की इजाज़त नहीं दे रही थीं। प्रभु का अनुशासन शिरोधार्य करके वे सब वहीं कर्म निरत हो गए।
गुरुदेव के साथ ममतामयी माँ ने शांतिकुंज के लिए प्रस्थान किया। साथ में 45 वर्षों की तप साधना से सिद्ध अखण्ड दीपक को संभाले हुए दो-तीन कार्यकर्त्ता थे। यह यात्रा भी समाप्त हुई। शांतिकुंज में गुरुदेव 10 दिन रहे भी लेकिन आखिर में माताजी को उन्हें तप के लिए हिमालय की ओर विदा करना ही था। घर-परिवार के सदस्य, स्वजन-परिजन, एक-एक करके नहीं, एक साथ सब छूटे, सभी को बिना एक पल की देर लगाए सब कुछ छोड़ दिया।
गुरुदेव का हिमालय के लिए प्रस्थान:
परम पूज्य गुरुदेव सुदूर हिमालय की गहनताओं में तप करने के लिए जा रहे थे। यह विछोह बड़ा ही करुण था । विदाई के ये पल बड़े ही वेदनामय थे लेकिन इस करुण वेदना को हर हाल में सहना ही था। वंदनीय माताजी के लिए विश्वहित में अपने आराध्य की विदाई के इस महाविष को शांत भाव से पी जाने के अलावा और कोई चारा न था। एक दिन प्रातः गुरुदेव हिमालय चले गए। गुरुदेव ने जिस समय प्रस्थान किया, उस समय माताजी के इलावा अन्य सभी लोग सोए हुए थे।
“गुरुदेव के इस तरह चले जाने के दृष्टान्त इसी मंच पर समय-समय पर अलग-अलग शीर्षकों से प्रकाशित हो चुके हैं।”
जगने पर माताजी ने सबको संभाला, दिलासा दी, सांत्वना दी। माताजी की आश्वस्ति पाकर सब अपने-अपने घर चले गए। केवल वही दो-तीन लोग बचे, जिन्हें विश्वजननी माताजी के साथ रहकर उनकी सेवा का सौभाग्य मिला था। उन्हीं के साथ माताजी अपने आराध्य का चिंतन करते हुए शांतिकुंज में अपने प्रारंभिक दिनों को गुजारने लगीं।
शांतिकुंज के प्रारंभिक दिन:
उस समय का शांतिकुंज आज की तरह विस्तृत व्यापक न था। जो भूमि गुरुदेव ने 1968 में 19000 रुपए में मात्र डेढ़ एकड़ खरीदी थी, आदरणीय चिन्मय जी की वीडियो के अनुसार,आज 2026 में 500 एकड़ का विस्तार पा चुकी है। इसे इस युग का मतस्यावतार न कहें तो और क्या कहें? ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथी समय-समय पर तीर्थसेवन के लिए जाते रहते हैं, वोह इस मतस्यावतार के प्रतक्ष्य साक्षी हैं। आज जहाँ अखण्ड दीप स्थापित है, उस समय बस यही दो-तीन कमरे बने थे । पानी के लिए एक कुआं था, एक गाय थी जिसके घी से परमपूज्य गुरुदेव की साधना से सिद्ध अखंड ज्योति दृश्य प्रकाशित होती थी। शांतिकुंज का समूचा वातावरण पुराणों में वर्णित प्राचीन तपस्वी ऋषियों के आश्रम की भांति था। तब यहां किसी का आना-जाना नहीं होता था। बस माँ की साधना ही यहां की समस्त गतिविधियों का केंद्र थी। उनकी इस साधना से ही समूचे गायत्री परिवार को प्राण व प्रकाश मिलता था।
कल तक के लिए मध्यांतर
जय गुरुदेव, धन्यवाद्