ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथी परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित लेख श्रृंखला का अमृतपान कर रहे हैं। 118 पृष्ठों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” में समाहित दिव्य ज्ञान का एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक अध्ययन करके, अपनी समर्था के अनुसार समझकर, सरल करते हुए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रस्तुत करने का यह अद्भुत प्रयास साक्षात् माँ के आशीर्वाद, महाशक्ति की अनुकम्पा से ही सम्पन्न हो रहा है। 118


पृष्ठों की दिव्य पुस्तक में अद्भुत,अविश्वसनीय कंटेंट तो उपलब्ध है ही, अनेकों साथिओं ने इसका समय-समय पर अपने तौर पर अध्ययन भी किया ही होगा लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर एक अद्भुत प्रणाली के अंतर्गत, सत्संग की भांति अमृतपान करना अवश्य ही अधिक प्रभावशाली साबित हो रहा है। इस तथ्य का साक्षात् प्रमाण हमारे समर्पित साथिओं के कमैंट्स ही हैं जिनके द्वारा बार-बार साक्षात् कायाकल्प का सन्देश प्रदर्शित हो रहा है। आशा करते हैं कि हमारे साथी इसी तरह हमारा सहयोग करते रहेंगें।
आजकल प्रकाशित हो रहे कंटेंट के बारे में साथिओं ने अनेकों पुस्तकों में, अखंड ज्योति अंकों में, हमारे ही पूर्व-प्रकाशित लेखों आदि में अवश्य पढ़ा होगा लेकिन इस दिव्य कंटेंट को बार-बार पढ़ने से जो आनंद प्राप्त होता है उसे शब्दों में वर्णित करना लगभग असंभव ही है, कई शंकाओं का निवारण हो रहा है।
शब्द सीमा का मापदंड रखते हुए, जहाँ भी उचित समझा गया इस Continuous content को ब्रेक लगाने का प्रयास किया गया है, जो भी हो हर बार की भांति आज का लेख भी ज्ञान के अथाह सागर में डुबकी मार कर अनमोल रत्न ढूंढ लाने का आमंत्रण दे रहा है।
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“महाशक्ति के दिव्य साधना स्थल” के रूप में शांतिकुंज के निर्माण की परिकल्पना परमपूज्य गुरुदेव की दूसरी हिमालय यात्रा (1960-61) के समय ही तैयार हो गई थी। उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने इसकी आवश्यकता एवं इस तरह के निर्माण की स्पष्ट रूपरेखा से उन्हें इस विशिष्ट अवधि में अवगत करा दिया था। हिमालय की गहनताओं में युगों से तप कर रहे दिव्य देहधारी ऋषियों की सम्मति भी यही थी।
“गुरुदेव की यह दूसरी हिमालय यात्रा पहली बार की तुलना में कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण थी।”
इस बार उन्हें अपने मार्गदर्शक (हम सबके दादा गुरु सर्वेश्वरानन्द जी) के साथ हिमालय की दिव्य ऋषि सत्ताओं के न केवल दर्शन मिले बल्कि उनसे चिंतन-परामर्श का विशेष अवसर भी मिला। सम्पूर्ण विश्व के विभिन्न घटनाचक्रों एवं इसकी भावी नियति पर विशेष चर्चा हुई । भारत भूमि के संकटपूर्ण वर्तमान एवं इसके दीर्घकालिक उज्ज्वल भविष्य का उन्हें दर्शन कराया गया। साथ ही इस संबंध में गुरुदेव की भूमिका भी निर्धारित की गई और इस भूमिका को निभाने के लिए अति अनिवार्य समझी जाने वाली तपश्चर्या की कुछ गुप्त प्रक्रियाएं उन्हें सुझाई एवं समझाई गईं जिससे ब्रह्मांडीय ऊर्जा( Cosmic energy ) का उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए आवश्यक प्रयोग एवं उपयुक्त नियोजन किया जा सके।
इसी समय यह भी निर्धारण किया गया कि आगामी दिनों गुरुदेव की यह भूमिका पूरी तरह से परोक्ष (Indirect) होगी। जीवन के 60 वर्ष पूरा होने के बाद वे हिमालय के ऋषितंत्र के साथ मिलकर गहन आध्यात्मिक प्रयोग करते हुए धरती के नवीन भाग्य एवं भविष्य के निर्माण के लिए प्रयत्नशील रहेंगे।
यही कारण है कि युगतीर्थ शांतिकुंज की स्थापना 1971 में की गयी जब गुरुदेव अपनी आयु के 60 वर्ष पूरा करते हैं। प्रत्यक्ष दायित्व (Direct responsibility) महाशक्ति के रूप में माताजी स्वयं संभालेंगी।
“इस प्रत्यक्ष दायित्व को पूरी तरह से संभालने से ही वंदनीय माताजी के अवतार कार्य का प्रारंभ और विस्तार होगा।”
उनके इस कार्य के लिए मथुरा बहुत अधिक उपयुक्त स्थान नहीं है। महाशक्ति ने अपनी हर अवतार लीला में गंगा की गोद, हिमालय की मनोहर छाया को ही तपस्थली के रूप में चुना है। इस बार भी यही ठीक होगा। वह जिस भूमि को अपने दिव्य साधना स्थल के रूप में चुनेंगी, वहीं स्थान भविष्य में संपूर्ण विश्व के लिए ऊर्जा अनुदान का केंद्र बनेगा। यह पक्तियां युगतीर्थ शांतिकुंज के बारे में ही लिखी जा रही थीं और हम आज 2026 में भी इन पंक्तियों को चरितार्थ होते देख रहे हैं। अपने इस निर्धारण में ऋषितंत्र ने यह भी स्पष्ट किया, इस युग के लिए विधि ने जो युग-प्रत्यावर्तन का विधान रचा है, उसमें “केंद्रीय भूमिका महाशक्ति स्वयं निभाएगी”। ऋषिगण एवं दिव्य लोगों की देव शक्तियों का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में महाशक्ति (माताजी) सहयोग करेंगी।
गुरुदेव के पास केवल 10 वर्ष का समय था:
हमारे समर्पित पाठकों को स्मरण हो आया होगा कि 1960-61 की यात्रा के बाद 1971 में फिर हिमालय प्रवास पर गए थे। हिमालय के ऋषितंत्र के निर्धारण के अनुरूप गुरुदेव ने आवश्यक कार्य योजना बनाते हुए अपनी तपश्चर्या की अवधि पूरी की और उन दिव्य विभूतियों से अनुमति लेकर मथुरा वापस लौटे। आगामी हिमालय यात्रा से पहले गुरुदेव को कितने ही कार्य पूर्ण करने थे, उनके पास केवल 10 वर्ष (1960 से 1970) का ही समय था। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ गायत्री तपोभूमि की व्यवस्था को भी चुस्त-दुरुस्त बनाना था।
“हिमालय से वापिस आने पर, गुरुदेव माताजी को कुछ अधिक विस्तार से बताते, माताजी ने पहले ही कह दिया कि मुझे आपका और हिमालय में तपस्यालीन पूज्य ऋषियों का प्रत्येक आदेश स्वीकार है।”
गुरुदेव जानते थे कि माताजी उनकी अंतर्चेतना में होने वाली प्रत्येक हलचल एवं स्पंदन (Vibration) को अपने अंतःकरण में अनुभव करती रहती हैं, इसलिए बिना बताए माताजी के सब कुछ समझ जाने पर गुरुदेव को तनिक भी आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ इतना अचरज जरूर हुआ कि वे मथुरा में फैले अपने ममता के धागों को इतनी तेजी से समेटने के लिए कैसे तैयार हो गईं। गुरुदेव अच्छी तरह से जानते थे कि
“माताजी महाशक्ति हैं,अगर उन के भीतर ममता की शक्ति है, तो दृढ़ता की शक्ति भी है। अगर वह भावस्वरूपा हैं, तो संकल्पमयी भी हैं। शक्ति के जितने भी स्वरूप हैं, सब उनकी आत्मचेतना में समाहित हैं। जीवन के विविध रूप उन शक्तिमयी का स्पर्श पाकर स्वयं ही शक्ति स्रोत में बदल जाते हैं। ममतामयी की अगाध ममता में दुर्बलता का कोई नामोनिशान नहीं है। न वे स्वयं कभी दुर्बल होती हैं और न ही अपने बच्चों को दुर्बल होते देखना चाहती हैं।”
माताजी के इस स्वरूप-सत्य से सुपरिचित गुरुदेव ने नई दिशा में सोचना शुरू कर दिया। गुरुदेव की दैवी योजना को पूरा करने के लिए देव शक्तियां स्वयं उपयुक्त पात्रों को जुटाने लगी थीं। चार-पांच वर्षों में ही गायत्री तपोभूमि को संभालने व भलीप्रकार चलाने के लिए पं. लीलापत शर्मा, वीरेश्वर उपाध्याय, द्वारिका प्रसाद चैतन्य आदि समर्पित व सुपात्र कार्यकर्त्ताओं की टीम आ जुटी। इन सभी लोगों के लिए गुरुदेव व माताजी आराध्य थे। उनकी प्रत्येक इच्छा हर रूप में उन्हें स्वीकार थी। विदाई सम्मेलन जो 17 जून से 20 जून को होना निश्चित हुआ था उसकी विराट व्यवस्था तंत्र भी इन सबने संभाल लिया। एक तरफ मथुरा की भावी व्यवस्था का नियोजन करना और दूसरी तरफ शांतिकुंज के लिए उपयुक्त भूमि खरीदने का कार्य भी करना बाकी था।
ध्यानस्थ भावदशा में गुरुदेव एवं माताजी दोनों ने ही देवभूमि हरिद्वार में स्थित विशिष्ट स्थान को पहचान लिया था, उन्होंने इस विशिष्ट स्थान से आध्यात्मिक ऊर्जा की दिव्य तरंगों को विकीर्ण (Radiate) होते हुए अनुभव किया था। उन दोनों ने यह भी जान लिया था कि
हजारों वर्षों पूर्व इसी दिव्य भूमि में कहीं देवमाता गायत्री युगशक्ति के रूप में महर्षि विश्वामित्र के अंतःकरण में अवतरित हुई थीं। माता गायत्री के इस अवतरण ने ही महर्षि विश्वामित्र को “ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ” बनाया था।
आगे बढ़ने से पहले महर्षि और ब्रह्मऋषि में अंतर् जानना उचित रहेगा।
महर्षि एक साधारण ऋषि को कहते है जिसके पास कुछ सिध्दियां, भक्ति एवं ज्ञान हो। जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है महर्षि यानि महान ऋषि। इसी परिभाषा के अनुसार परम तेजस्वी, भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुंचने वाले मुनि को ब्रह्मर्षि कहा जाता है। वे हमेशा लोककल्याण के कार्यों में ही लगे रहते है। उनकी भक्ति और तपस्या का एकमात्र उद्देश्य जनता की भलाई करना होता है। रामायण के संदर्भ में देखा जाए तो विश्वामित्र को “ब्रह्मर्षि विश्वामित्र” कहकर ही संबोधित किया जाता था और वाल्मीकि जी को “महर्षि वाल्मीकि” कहा जाता था।
युगतीर्थ शांतिकुंज की पावन भूमि की तलाश
हरिद्वार की पावन भूमि में गुरुदेव ने अत्यधिक आध्यात्मिक आलोक (प्रकाश) को उफनते-उमड़ते और फैलते हुए देखा था लेकिन ध्यान की प्रगाढ़ता में अनेकानेक आध्यात्मिक अनुभूतियों को स्फुरित करने वाली यह जगह हरिद्वार में ठीक-ठीक कहां है यह जानना अभी बाकी था। इसे जानने के लिए गुरुदेव ने अपनी यात्रा की तैयारी की। माताजी के अनुरोध पर वह अपने बड़े पुत्र ओमप्रकाश से गुड़गांव में मिलते हुए गाजियाबाद आए। यहां उनके बड़े जामाता रामेश्वर उपाध्याय रहते थे। उपाध्याय जी ने अपने देवतुल्य श्वसुर को आते हुए देखकर उनका आगे बढ़कर स्वागत किया। उस समय गुरुदेव के हाथों में एक छोटा बिस्तर और लोहे की संदूकची थी। गुरुदेव ने अपनी संदूकची खोलकर उन्हें माताजी द्वारा भेजी हुई छोटी-मोटी चीजें सौंपी और आगे के कार्यक्रम के बारे में बातें कीं। सारी बातों को सुनकर उपाध्याय जी उनके साथ हो लिए। शाम की ट्रेन से दोनों ने हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया। हरिद्वार पहुंचकर ये दोनों लोग हर की पौड़ी और भीमगोड़ा के बीच गंगा के सामने वाली धर्मशाला में ठहरे। बाद में उन्होंने अनेक एजेंटों से मिलकर कई जगहों को देखा। इन जगहों को देख लेने के बाद गुरुदेव ने इन लोगों से सप्त सरोवर के पास कोई भूमि बताने के लिए कहा। गुरुदेव की इस बात पर पहले तो एजेंटों ने हरिद्वार शहर से इतनी दूर की भूमि के बारे में काफी परेशानियां बताईं। बाद में दबाव देने पर वे उन्हें लेकर सप्त सरोवर के पास पहुंचे।
“सप्त सरोवर से थोड़ी दूर चलने पर गुरुदेव ने उस स्थान को पहचान लिया जिसे उन्होंने माताजी के साथ अपनी साधना की प्रगाढ़ दशा में अनुभव किया था।”
यह भूमि काफी दलदली थी। एक छोटा पहाड़ी झरना भी इसके बीच में बह रहा था। जब गुरुदेव ने इस भूमि को पसंद किया तो एजेंट उनका मुंह देखता ही रह गया। उसने काफी समझाने की कोशिश की लेकिन गुरुदेव ने उसकी कोई बात ध्यान देकर नहीं सुनी क्योंकि “गुरुदेव उस समय भी अपनी दिव्य दृष्टि से इस भूमि में सघनता से छाए हुए आध्यात्मिक प्रकाश को देख रहे थे।” उन्होंने एजेंट से केवल इतना कहा कि हमें यही भूमि लेनी है, आप इसके लिए उपयुक्त व्यवस्था करें।
जब हम यह पंक्तियाँ लिख रहे हैं तो घीया मंडी मथुरा स्थित अखंड ज्योति संस्थान वाली बिल्डिंग की बात स्मरण हो आयी। जब इस बिल्डिंग को किराये पर लेने के लिए बातचीत चल रही थी तो सभी ने बिल्डिंग लेने को मना किया था क्योंकि यह एक भूतहा बिल्डिंग थी लेकिन गुरुदेव ने कहा था कि हम भूतों से मित्रता कर लेंगें, वह हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते।
भला भगवान् के लिए भी कोई समस्या हो सकती है क्या ? शांतिकुंज के लिए भूमि खरीदने के समय भी कुछ ऐसा ही हुआ।
एजेंट के विरोध के बावजूद गुरुदेव ने इस दलदल भरी भूमि को खरीदने का निर्णय लिया और जुलाई 1968 में सप्त सरोवर क्षेत्र में 19 हजार रुपये में डेढ़ एकड़ भूमि खरीद ली गई। यह वोह दिव्य भूमि थी जहाँ पर बाद में “महाशक्ति की दिव्य साधनास्थली गायत्री तीर्थ शांतिकुंज को अवतरित होना था।”
कल यहीं से आगे चलेंगें।
धन्यवाद् जय गुरुदेव