March 30,2026


पिछले 15 दिनों से हम परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित लेख श्रृंखला का अमृतपान कर रहे हैं। 118 पृष्ठों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” में समाहित दिव्य ज्ञान का एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक अध्ययन करके,अपनी समर्था के अनुसार समझकर, सरल करते हुए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रस्तुत करने का यह अद्भुत प्रयास साक्षात् माँ के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करना है। हमारे साथ जुड़े पाठक इस दिव्य ज्ञान का अमृतपान करके, कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स करके जिस अद्भुत प्रणाली द्वारा ज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं उसके लिए हम सदैव आभारी रहेंगें।
जगत जननी माँ का हाथ पकड़ कर जिस लोकयात्रा की दिव्यता की अनुभूति हो रही है उसे यदि गूँगें का गुड़ कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह लोकयात्रा किसी साधारण माँ की न होकर, किसी माँ-शक्ति की न होकर “एक महाशक्ति की लोकयात्रा” है, हमारे परमपूज्य गुरुदेव की जीवनसंगिनी की लोकयात्रा है। लिखने वाले,पढ़ने वाले सभी ने जो अनुभव किया है उसे शब्दों में बांध पाना लगभग असम्भव ही है, बहुत कुछ अनुभव हो चुका है लेकिन उससे भी अधिक अनुभव होना बाकी है, जो साथी नियमितता से (बिना कोई भी लेख मिस किये) इन लेखों का अमृतपान कर रहे हैं वोह अपनेआप को अतिसौभाग्यशाली मान रहे हैं।
लेख श्रृंखला के 16वें लेख में हम महाशक्ति के संचालन-सामर्थ्य का अध्ययन कर रहे हैं। वर्ष 1960-61 में जब परमपूज्य गुरुदेव महाशक्ति के कन्धों पर सारा भार डाल कर दूसरी बार हिमालय यात्रा पर प्रस्थान कर गए तो कार्यकर्ताओं ने भांति-भांति की बातें बनाईं। सहयोग देने के बजाये, कार्यकर्ताओं की निराशाजनक बातों ने इस महाशक्ति को टस से मस नहीं होने दिया क्योंकि वह माँ के साथ-साथ एक महाशक्ति थीं। ऐसे समय में परमपूज्य गुरुदेव ने माताजी के बारे में क्या कहा, कार्यकर्ताओं ने क्या कहा, इन सभी संस्मरणों का अमृतपान करना ही आज के लेख को दिव्य और रोचक बना रहा है।
हम सब विश्वशांति की बात से ही प्रत्येक दिन का शुभारम्भ करते हैं, आज भी उसी प्रथा का पालन करते हुए, शांतिपाठ को समझकर, गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के दिव्य लेख का अमृतपान करते हैं।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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गुरुदेव की हिमालय यात्रा के दौरान कार्यकर्ताओं की शंकाएं :
परमपूज्य गुरुदेव की 1960-61 की दूसरी हिमालय यात्रा पहली बार की तुलना में बहुत ही महत्वपूर्ण थी क्योंकि पहली यात्रा के समय गायत्री तपोभूमि के क्रिया-कलापों का कोई विशेष विस्तार न हुआ था। सारे काम-काज का केंद्र घीआ मंडी स्थित अखण्ड ज्योति संस्थान ही था। हर महीने निश्चित समय पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के अलावा दूसरी कोई विशेष ज़िम्मेदारी न थी। मिशन का प्रचार-प्रसार भी कुछ अधिक नहीं था जिसके कारण आगंतुकजन भी थोड़े ही थे। लेकिन इस बार की हिमालय यात्रा की स्थितियां एकदम अलग थीं।
1953 में गायत्री तपोभूमि का निर्माण होने और यहां शिविरों की नियमित प्रक्रिया चल पड़ने से श्रद्धालुओं एवं जिज्ञासुओं के आवागमन का तांता सा लग गया था। वर्ष 1958 के सहस्र कुंडीय यज्ञ आयोजन ने भी स्थिति को एकदम बदल दिया था। सहस्र कुंडीय यज्ञ के आयोजन से देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी, साधक, राजनेता व विशिष्टजन गुरुदेव के दैवी स्वरूप से काफी कुछ परिचित हो गए थे। इनमें से किसी-न-किसी का प्रायः प्रतिदिन मथुरा आना लगा ही रहता था।
स्थितियों के इस बहुआयामी परिवर्तन के बाद मिशन में “समर्थ संचालक” की ज़रुरत हर पल, हर क्षण अनुभव की जा रही थी। गुरुदेव के अभाव में उन्हीं की तरह समस्त दायित्व को निभाने की ज़िम्मेदारी माताजी पर ही थी। इस बारे में उन दिनों कई कार्यकर्त्ताओं के मन में काफी आशंकाएं-कुशंकाएं उभर रही थीं। यह सब कार्यकर्ता सोच भी नहीं सकते थे कि इतनी सीधी-सादी, सरल गृहिणी की भांति जीवनयापन करने वाली माताजी इतने बड़े एवं विस्तृत दायित्व को निभा पाएंगीं । वोह माताजी के भावपक्ष से परिचित होने के बावजूद उनकी बुद्धि कुशलता एवं लोक व्यवहार में दक्षता से प्रायः अपरिचित थे। कार्यकर्ताओं की चर्चाएं बड़ी निराशाजनक एवं हताशा भरी होती थीं। कभी तो वोह कहते कि गुरुदेव के जाने के बाद मिशन बिखर जाएगा, कभी कहते गुरुदेव का इस तरह माताजी के हाथों में सब कुछ छोड़कर हिमालय जाना ठीक नहीं है। सबको खाना खिला देना अलग बात है लेकिन इतने बड़े संगठन को ठीक तरह से चलाना एकदम अलग बात है।
माता जी का सामर्थ्य :
हिमालय यात्रा पर जाने से कुछ समय पहले इस तरह की चर्चाएं गुरुदेव के कानों में पड़ीं, उन्होंने मुस्कराते हुए कहा:
“शंका-कुशंका करने वाले भला माताजी के बारे में जानते ही क्या हैं? उन्हें क्या मालूम माताजी कौन हैं? उनकी सामर्थ्य क्या है? अपनी शक्ति सामर्थ्य के एक अंश से सबको समर्थ बनाने वाली माताजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं।”
माताजी के दिव्य स्वरूप एवं उनकी दैवी क्षमताओं से अच्छी तरह परिचित गुरुदेव ने बड़ी निश्चिंततापूर्वक हिमालय के लिए प्रस्थान किया। गुरुदेव के हिमालय चले जाने के बाद माताजी ने मिशन का सारा सूत्र संचालन अपने हाथों में ले लिया। उन दिनों माताजी पर घर-परिवार की जिम्मेदारियां भी बहुत थीं। पढाई के कारण बच्चों से तो किसी विशेष सहायता की आशा न थी। अपने अकेले के दम पर ही उन्हें साधना, गृहकार्य, पत्र-लेखन, अखण्ड ज्योति पत्रिका का संपादन-प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि के कार्यों की देखभाल करनी थी। यह ठीक है कि इन सभी कार्यों में सहयोग के लिए कार्यकर्त्ता थे लेकिन वे सब-के-सब सहयोगी नहीं थे। माताजी के दैवी स्वरूप के प्रति जानकारी न होने के कारण एवं श्रद्धा-भक्ति के अभाव में इनमें से कुछ की मनःस्थिति बड़ी दुःखित हो गई थी।अपनी मानसिक विपन्नता के वश होकर, ये कभी-कभी उल्टे-सीधे काम भी कर बैठते थे। परस्पर सहयोग से रहने की बजाय शत्रुता के बीज बोने में भी कोई कसर न छोड़ते।
अपने आराध्य के प्रति परिपूर्ण निष्ठा के साथ माताजी दिन-रात काम में लगी रहती थीं। घर और मिशन के अनेक तरह के कार्यों के अलावा, कष्टपीड़ित शिष्यों-भक्तों की आध्यात्मिक शक्ति से सहायता करने की जिम्मेदारी भी माताजी पर ही थी। वे कब-कब, क्या-क्या करती हैं, इसे उनके पास रहने वाले लोग भी ठीक तरह से समझ न पाते थे। सभी को बस इतना पता चल जाता कि सारे काम सुचारु ढंग से और सही समय से हो रहे हैं। माताजी के इस दैवी संचालन से वे अल्पबुद्धि लोग तो बहुत हतप्रभ होते थे, जो सहयोग की आड़ में विरोध करते दिखते, इतना ही नहीं ऐसे लोग विरोध के कुचक्र भी रचते रहते थे। ऐसे लोगों की षड्यंत्र भरी गतिविधियों से माताजी अनजान न थीं लेकिन अपनी इन बुद्धिहीन संतानों के प्रति उनका करुणा भाव था। इन कुपुत्रों के प्रति भी माँ के वात्सल्य में कोई कमी न आई थी।
कार्यकर्ताओं के बीच झगड़ा:
एक बार इन्हीं दिनों गायत्री तपोभूमि में कार्यकर्त्ताओं के बीच झगड़ा हो गया। इस व्यर्थ के झगड़े को सुलझाने के लिए माताजी को हस्तक्षेप करना पड़ा। माताजी ने सभी कार्यकर्ताओं को एक जगह इकट्ठा किया, सब के ठीक तरह से बैठ जाने के बाद उन्होंने कहना शुरू किया :
“बेटा! मैं तुममें से हर एक को बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ । मैं इस भीड़ में किसी का नाम लेकर उसे शर्मिंदा तो नहीं करूंगी लेकिन तुम में से जिसने जो कुछ किया है उसके कामों का खुलासा कर देती हूँ । उसी से तुम्हें अन्दाजा हो जाएगा कि मुझे क्या कुछ मालूम है।”
इसी के साथ माताजी ने बिना नाम लिए हर एक कार्यकर्त्ता की गड़बड़ियों को गिनाना शुरू कर दिया। आर्थिक गड़बड़ियों के साथ विरोध के कुचक्रों का एक-एक करके माताजी खुलासा करने लगीं। जैसे-जैसे वह बोलती जातीं सुनने वालों का सिर शर्म से झुकता जाता। सब कुछ कह चुकने के बाद उन्होंने कहा:
“बेटा, अब तक मैं चुप थी इसका कारण यह नहीं है कि मुझे कुछ भी मालूम नहीं था। कारण केवल इतना ही था कि मैं माँ हूं और माँ हर हाल में अपने बच्चों को प्यार करती है, बच्चे कैसे भी क्यों न हों। रही मिशन की बात, इसे तो भगवान् ने जन्म दिया है। वही इसे आगे ही आगे बढ़ा रहे हैं । चाहे जितने भी लोग, जितनी भी तरह से स्वार्थवश या अपनी कुटिलता के कारण इसका विरोध करें लेकिन इसे तो हर हाल में आगे बढ़ना ही है।”
माताजी की बातों को सुनकर, सुनने वाले अवाक् रह गए। उनमें से जिनकी भावनाएं अभी पूरी तरह से मरी नहीं थीं, जो किसी कारण बहकावे में आकर भटक गए थे, उन्होंने रोते हुए माताजी के चरणों में गिरकर माफी मांगी । माँ ने भी प्यार से अपने इन अज्ञानी बालकों के सिर पर हाथ फेरकर क्षमा कर दिया लेकिन कुछ के मन में कलुष अभी भी बाकी था। उन्होंने पहले तो यह पता करने की कोशिश की कि माताजी को यह सारी बातें कहां से पता चलीं। जब अपनी इस कोशिश में सब तरह से थक-हार गए, तब उन्हें भी माताजी की दिव्य क्षमताओं पर विश्वास करना पड़ा। हालांकि इसके बावजूद वे अपनी प्रवृत्ति को बदलने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने अपनी कारगुजारियां जारी रखीं लेकिन महाशक्ति की संचालन सामर्थ्य से मिशन की संपूर्ण गतिविधियां सुनियोजित एवं सुनियंत्रित रीति से चलती रहीं।
हिमालय यात्रा से गुरुदेव की वापसी:
इसी बीच गुरुदेव की हिमालय यात्रा की अवधि पूरी हुई और वह निश्चित समय पर वापस आ गए । उनके आते ही माताजी ने संचालन सूत्र फिर से उनके हाथों में सौंप दिया। अंतर्यामी गुरुदेव को बिना बताए ही सारी स्थितियां पता चल गईं और उन्होंने दोषीजनों के प्रति कठोर कार्यवाही करने का निश्चय किया लेकिन यहां भी माँ की ममता आड़े आ गई। उन्होंने गुरुदेव से कहा:
“अब रहने भी दीजिए, वे जैसे हैं, मेरे बच्चे हैं।”
जब गुरुदेव ने मिशन के भावी विस्तार का हवाला देकर उन्हें बहुत समझाया, तो वे जैसे-तैसे किसी तरह बहुत दुःखी मन से राजी हुईं लेकिन यहां भी उन्होंने अपनी शर्त रख दी। वे बोलीं कि उन्हें नया जीवन शुरू करने के लिए पर्याप्त धनराशि एवं आपके द्वारा लिखे गए ओरिजिनल एवं untranslated साहित्य के प्रकाशन का अधिकार दे दें। उनकी इन बातों पर गुरुदेव हंस पड़े और कहने लगे:
“आपकी ममता के सामने तो त्रिलोक के स्वामी को भी झुकना पड़ेगा। फिर मेरी क्या मज़ाल। आप जैसा चाहती हैं, वैसा ही होगा।”
सब कुछ माताजी की सहज संवेदनाओं के अनुसार ही हुआ। जिन आत्मदानियों को अलग किया गया, वे अपने हृदय में माताजी के असीम प्यार की अनुभूति लेकर गए। माताजी की दिव्य शक्तियों और गुरुदेव के तप-तेज ने मिशन को फिर से नए प्राण दिए। बीतते वर्षों के साथ “महाशक्ति के दिव्य साधना स्थल” के रूप में शांतिकुंज की पृष्ठभूमि बनने लगी।
युगतीर्थ शांतिकुंज की बात कितनी दिव्य होती है, सभी जानते है,कल इसी दिव्यता की अनुभूति होगी।
धन्यवाद्,जय गुरुदेव