वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का 15वां ज्ञानप्रसाद लेख: शिव और शक्ति का परस्पर अंतर्मिलन

शुक्रवार वाले ज्ञानप्रसाद लेख का समापन इस संकल्प के साथ हुआ था कि सोमवार को एक नवीन ऊर्जा के साथ,स्थिर होकर साक्षात् उदाहरणों के साथ “गुरुदेव और माताजी यानि  शिव और शक्ति के अंतर्मिलन” का अति रोचक वृतांत का आँखों देखा हाल प्रस्तुत करेंगें । उसी संकल्प को पूर्ण करते हुए एवं प्रत्येक लेख को एक चलचित्र की भांति प्रस्तुत करने की दृष्टि से एक बहुत ही संक्षिप्त वीडियो संलग्न की है।  

“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी” रामचरितमानस की एक प्रसिद्ध चौपाई है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति के मन में जैसी भावना होती है, उसे ईश्वर वैसे ही रूप में दिखाई देते हैं।

इसी चौपाई को दोहराते हुए गुरुदेव शिवरानी देवी को कह रहे हैं कि 

दूसरे उदाहरण में विष्णु नारायण गोवरीकर जी ने अखंड ज्योति संस्थान में माताजी के हाथों परोसा हुआ भोजन ग्रहण किया, वहां से तपोभूमि आकर गुरुदेव से वही बातें  सुनी जो माताजी ने कहीं, लेकिन फिर भी विश्वास न हुआ, बार-बार शिविर साथिओं से पूछ कर Certify करते रहे। गुरुदेव/माताजी की शक्ति पर अनेकों लोग शंकाएं करते रहे लेकिन जिन्होंने विश्वास किया नाव तो उन्हीं की पार हुई। लेख का अमृतपान करते समय साथी अपनेआप को भूतों वाली बिल्डिंग और तपोभूमि में ही अनुभव कर रहे होंगें, तभी तो चलचित्र-इफ़ेक्ट की फीलिंग होगी।  

आइए शुरू करें आज का ज्ञानप्रसाद 

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योग साधना की परम प्रगाढ़ता में शिव और शक्ति का परस्पर अंतर्मिलन दो रूपों में प्रकट हुआ था।

अपने पहले रूप में “महायोगिनी माताजी” की अंतस्थ कुण्डलिनी महाशक्ति परिपूर्ण जागरण के पश्चात् विभिन्न शक्ति चक्रों (Energy centres) का भेदन और प्रस्फुटन करती हुई सहस्रार में स्थित “महाशिव” से जा मिली थी। योग साधकों के लिए इस अद्भुत एवं दुर्लभ सत्य के घटित होने से माताजी का समूचा अस्तित्व योगेश्वर का भंडार बन गया था। योग की उच्चस्तरीय विभूतियां एवं सिद्धियां उनके व्यक्तित्व के विविध आयामों से अनायास प्रकट होने लगी थीं। 

शिव और शक्ति में महामिलन का एक दूसरा रूप भी माताजी के जीवन में बड़ा ही स्पष्ट रीति से उजागर हुआ था जिसकी चर्चा प्रायः किसी योगशास्त्र में नहीं मिलती। इस दूसरे रूप में शिवस्वरूप गुरुदेव की आत्मचेतना शक्तिस्वरूपा माताजी की आत्मचेतना से घुल-मिलकर एक  हो गई थी। 

शिव और शक्ति के इस अद्भुत अंतर्मिलन का सत्य शिष्यों और भक्तों के साथ व्यवहार में जब-तब प्रकट होता रहता था। इसी अंतर्मिलन  को बल देते हुए कुछ ऐसे तथ्य थे जो आने-जाने वालों को, मिलने-जुलने वालों को अचरज में डाल  देते थे । उन्हें यह बात गहराई से महसूस होती कि 

इस तरह की अनुभूति लोगों को लगभग रोज़  ही होती थी। वे आपस में इसकी चर्चा भी करते। एक दूसरे से बताते कि हमने यह बात तो गुरुजी को कही थी, लेकिन माताजी तक कैसे पहुंच गई ! जबकि गुरुजी तो अभी तपोभूमि में ही हैं अथवा ये बातें तो अखण्ड ज्योति संस्थान में माताजी से कही गई थीं। तपोभूमि में बैठे हुए गुरुदेव को किस तरह पता चल गईं! उन दिनों तो वहां कोई टेलीफोन जैसे माध्यम भी न थे, जिससे ये अनुमान लगाए जा सकते कि टेलीफोन द्वारा बात कह दी गई होगी। बड़े ही तार्किक एवं बुद्धिकुशल लोगों को भी गुरुदेव एवं माताजी की आत्मचेतना के अंतर्मिलन का सत्य स्वीकारना पड़ता । कई बार तो कुछ लोग अपने अनुभव को दुगना-तिगुना यानि बढ़ा-चढ़ा कर बता देते, इसकी बाकायदा परीक्षा भी कर डालते। 

महाराष्ट्र के विष्णु नारायण गोवरीकर जी की अनुभूति कुछ इसी प्रकार की थी। आइए अपने टीवी  का स्विच ऑन करें और स्वयं अपनी सूक्ष्म दृष्टि  से विष्णु भाई साहिब की अनुभूति का अवलोकन करें:   

भाई साहिब गायत्री तपोभूमि के शिविरों में प्रायः आया करते थे। इस बार जब आए तब उनका मन कई तरह की घरेलू समस्याओं से आक्रांत था। मन को कितना भी समझाने की कोशिश करते लेकिन दिल है कि  मानता ही नहीं, बार-बार वह समस्याओं के जाल में जकड़ जाता। शिविर के दूसरे दिन जब गोवरीकर जी भोजन  के लिए अखण्ड ज्योति संस्थान गए, तब उनके मन की स्थिति कुछ ऐसी ही थी। वह अपने को कितना भी संभालने की कोशिश करते लेकिन चिंता किसी भी तरह मन को छोड़ नहीं रही थी।

इसी चिंतित  मनःस्थिति में वह खाना खाने के लिए बैठे। माताजी ने स्वयं अपने हाथों से उन्हें खाना परोसा। खाना परोसते हुए अंतर्यामी माँ  ने उनकी मनोदशा पहचान ली। वह प्यार से बोलीं:

माताजी के इस कथन का उन पर कोई खास असर नहीं हुआ। वह वैसे ही अनमने  भाव से खाना खाते रहे। विष्णु नारायण को इस तरह उदास देखकर माताजी कहने लगीं: 

माताजी की इन बातों ने विष्णुजी को अचरज में डाल दिया। सबसे बड़ा अचरज तो उनको इस बात का हुआ  कि उन्होंने तो अपनी समस्याएं किसी को भी नहीं बताईं। जब से वह यहां आए हैं, तब से लेकर इन क्षणों तक उन्होंने किसी से भी अपनी परेशानी की कोई चर्चा नहीं की। फिर भी माताजी को सारी बातें कैसे पता चलीं? इस प्रश्न के उत्तर में वे केवल इतना सोच सके कि 

यही सोचकर उन्होंने निश्चिंतता से खाना खाया और हाथ-मुंह धोकर माताजी को प्रणाम करके गायत्री तपोभूमि की ओर चल दिए। हां इतना अवश्य हुआ कि माताजी को प्रणाम करते हुए उनकी आंखें छलक आईं लेकिन  माँ  की वरदायी अभयमुद्रा (निडरमुद्रा ) देखकर उनके मन को गहरा सहारा मिला। 

लेकिन माताजी के साथ हुए आश्चर्य की श्रृंखलाओं का अभी अंत कहाँ हुआ था, वह जैसे ही तपोभूमि आए, उन्होंने देखा कि गुरुजी यज्ञशाला के पास टहल रहे हैं। वह उन्हें प्रणाम करने के लिए गए। गुरुदेव को प्रणाम करके विष्णु नारायण जैसे ही खड़े हुए, गुरुदेव ने कहा:  

गुरुजी की इन बातों ने विष्णु नारायण को एक बार फिर से हैरत में डाल दिया। वे सोच ही नहीं पाए कि अखण्ड ज्योति संस्थान में माताजी द्वारा कही गई बातें गुरुजी को कैसे पता चल गईं। उनकी इस हैरानी को दूर करते हुए गुरुजी ने कहा,

गुरुजी की बातों ने उन्हें और भी चकित कर दिया। उनकी बातों पर भरोसा करने के अलावा और कोई दूसरा उपाय न था। भरोसे के बावजूद  मन का संदेह अभी भी किसी कोने में छिपा हुआ था। अपने संदेह का निवारण करने के लिए विष्णुजी शिविर के सारे दिनों में कुछ-न-कुछ  प्रयास करते रहे लेकिन हर बार उनको मुंह की खानी पड़ी। 

जब उन्होंने अपनी शंकाओं की चर्चा साथ के शिविरार्थियों से की, तो वे सब खुलकर हंस पड़े। हंसी का कारण पूछने पर उनमें से सभी ने कहा, “अरे भई, यह भी कोई सोच-विचार की बात है। हम तो पहले से ही जानते हैं कि गुरुजी-माताजी को दो समझना एक बड़ा भ्रम है। वे दोनों एक ही हैं।” 

इन सबकी बातों को सुनकर विष्णु नारायण का संदेह दूर हुआ। घर वापस पहुंचने पर माताजी के प्रति उनकी श्रद्धा 100 गुना अधिक हो गई क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि अप्रत्याशित संयोगों से उनकी सभी समस्याएं एक के बाद एक निबटती जा रही हैं। घर-परिवार किसी दैवी शक्ति के प्रभाव से अनायास ही सुव्यवस्थित हो गया। 

अपने इस अनुभव को उन्होंने गुरुदेव को लिखे पत्र में बयान किया जिसे उन दिनों कई लोगों ने पढ़ा। विष्णु नारायण गोवरीकर जैसे अनेकों और भी हैं जिन्होंने माताजी की कृपा को अनुभव करने के साथ इस सच्चाई  को जाना कि गुरुजी और माताजी एक ही आत्मचेतना के दो रूप हैं। 

मध्यप्रदेश के ग्रामीण अंचल की एक महिला भक्त शिवरानी देवी की अनुभूति इस संबंध में बड़ी प्रगाढ़ थी। अल्पशिक्षित यह महिला भक्त कुछ खास पढ़ी-लिखी न होने पर भी बड़ी साधनापरायण थी। ब्रह्ममुहूर्त  से लेकर प्रातः तीन घंटे नियमित साधना करने का उनका बड़ा पक्का नियम था । गायत्री महामंत्र के प्रत्येक अक्षर को वह बड़ी भावपूर्ण रीति से जपती थी। उसके आचार-व्यवहार में भी बड़ी असाधारण पवित्रता थी। जपकाल के अलावा दिन के अन्य समय गृहकार्यों को करते हुए भी वह गायत्री मंत्र का मानसिक जप और सूर्यमंडलस्थ माता गायत्री का ध्यान किया करती थी। अपनी नियमित साधना में एक दिन उनका मन गहरे ध्यान में लीन हो गया। प्रगाढ़ ध्यान की इसी भावदशा में उन्होंने देखा कि सूर्यमंडलस्थ माँ  गायत्री ने माताजी का रूप ले लिया है। निरभ्र अनंत आकाश में केवल माताजी की तेजोमयी मूर्ति विराजमान है। अखिल ब्रह्माँड के सारे ग्रह-नक्षत्र उन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे हैं। धीरे-धीरे सब कुछ उनमें विलीन हो जाता है। देखते-देखते परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य मूर्ति भी उसी प्रकाश से निकलती दिखाई देती है। फिर दोनों साथ दिखाई देते हैं। ध्यान से उठने पर भी शिवरानी जी के  मन पर यही विचित्र अनुभूति छाई रही। हालांकि इसका अर्थ उन्हें ज़रा  भी समझ में नहीं आया। काफी दिनों बाद गायत्री तपोभूमि में एक शिविर में पहुंचने पर उन्होंने परमपूज्य गुरुदेव से इसकी चर्चा की। उत्तर में गुरुदेव ने गंभीरता से कहा:

शिवरानी  बहिन जी को गुरुदेव के इन  गूढ़ आध्यात्मिक वचनों का रहस्य कितना समझ में आया यह तो कहना कठिन है  लेकिन उन्हें  अपने मन की गहराई में महाशक्ति के  संचालन सामर्थ्य का अहसास अवश्य हुआ।

इन्हीं तथ्यों को चरितार्थ करती एक वीडियो यहाँ संलग्न की है :  

कल वाले लेख में माताजी की शक्ति के बारे में शंकाओं का विवरण होगा 


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