March 28,2026
प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को प्रस्तुत किए जाने वाले स्पेशल विशेषांक की बात होगी तो इसके जन्म की “पृष्ठभूमि” तो लिखनी ही पड़ेगी, इसे Taken for granted तो लिया नहीं जा सकता कि सबको पता ही है, बार-बार दोहरा कर क्या मिलेगा। कोई पता नहीं कोई कब हमारे इन शब्दों को पढ़ ले।
पृष्ठभूमि की बात करने से पहले दो-दो Adjective लगाने की बात कर लें। जब स्पेशल ही हो गया तो विशेषांक लिखने की बात Grammatically गलत लगती है, जानते हैं, गलत ही है लेकिन अन्य शनिवारों को प्रस्तुत होने वाले विशेषांकों से इस विशेषांक को कैसे अलग करे? हमारे साथी, हम से कितने विशेष हैं यह सभी जानते हैं। दो Adjectives लगाकर कहीं यह धारणा न बन जाए कि हम अपने साथिओं से दुगने विशेष हैं, कदापि नहीं, ऐसा विचार तो हमारे मन में कभी आ ही नहीं सकता।
पृष्ठभूमि की बात करें तो हमारी आदरणीय, समर्पित एवं नियमित बहिन आदरणीय सुमनलता जी ने सुझाव दिया कि माह में एक दिन हमारे (अरुण त्रिखा) लिए सुरक्षित कर दिया जाए, जिसमें साथी हमारी मन की बात सुनें, हमारी अंतरात्मा में उठ रहे तूफ़ान को साथिओं के समक्ष व्यक्त कर सकें। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सुधार, अपडेट आदि के लिए जो भी सुझाव हों उनकी इस सेक्शन में चर्चा की जाए। अधिकतर साथिओं ने इस सुझाव का समर्थन किया और हमने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया।
सभी ने मान तो लिया लेकिन हमारे लिए यह बहुत ही बड़ी परीक्षा की घडी थी,अपने मन की बात कहना, अक्सर अपनी बढ़ाई का बखान करना ही समझा जाता है, अक्सर बकरी की भांति मैं-मैं करना, अपनी उपलब्धिओं का प्रदर्शन करना समझा जाता है लेकिन हमारे DNA में इस तरह का तत्व कहाँ बैठा है? जीवनयात्रा अंतिम साँस ले रही है लेकिन अभी तक हम मैं-मैं वाले तत्व को ढूंढ ही नहीं पाएं हैं ।
हमारी प्रवृति तो औरों की प्रगति पर ख़ुशी महसूस करना, साथिओं को प्रोत्साहित करना, उनकी उपलब्धिओं का जमकर विज्ञापन करना ही है।
उस दिन बेटी संजना से फ़ोन पर लगभग 30 मिंट बात होती रही, हम दोनों (मैं और नीरा जी) शॉपिंग करने के लिए एक स्टोर से दूसरे स्टोर के लिए ड्राइव कर रहे थे, जब भी गाड़ी में आकर बैठते तो बेटी से बात कर लेते, पूरी बात तो तभी हुई थी जब बेटी भोजन करके ,साधना आदि से निवृत होकर अपने रूम में आ गई थी। बातों बातों में हमने उस दिन को भी याद किया जब उसकी टंगस्टन वाली कविता का जमकर विज्ञापन किया था, यह उन दिनों की बात है जब वोह स्कूल की छात्रा थी, आज सौभाग्यवश यूनिवर्सिटी में Masters कर रही है।अरुण जी के प्रज्ञागीतों का, उनकी प्रतिभा का जमकर विज्ञापन कर रहे हैं।
आगे चलने से पहले, संलग्न स्लाइड में बेटी के लिखे शब्द देख लें तो अनुचित नहीं होगा
साथिओं की प्रतिभा का विज्ञापन करने के पीछे का कारण एक ही है और वोह यह है कि इनकी प्रगति हमें अपनी प्रगति लगती है, सभी प्रतिभाशाली सहकारी अपने ही तो हैं। गुरुदेव ने बोओ और काटो का सिद्धांत इसीलिए दिया था: आपका विज्ञापन सही अर्थों में हमारा ही विज्ञापन है, तो हम अपना स्वयं क्यों करें।
हमारे साथी हमसे जितना प्यार करते हैं समय-समय पर उनकी गतिविधिओं से पता चलता रहता है। अधिकतर साथिओं पर हम इतना स्नेह उड़ेलना चाहते हैं, इतना अधिकार अनुभव होता है कि लिखने के लिए असमर्थ और अयोग्य हो जाते हैं। ऐसे ही अधिकार की पूंजी प्राप्त करके हम शिकायत करने में भी नहीं कतराते।
पिछले अंक में बेटी संजना और आद निशा भारद्वाज, दोनों का नाम लेकर शिकायत की थी जो हमें कतई अच्छा नहीं लगता, परिवार के सदस्यों की कमज़ोरियाँ पब्लिक करना कहाँ की समझदारी है लेकिन यह सब अधिकारवश ही किया गया था, सभी अपने ही तो हैं। हमें कितना अच्छा लगा कि दोनों ने व्हाट्सप्प पर एकदम मैसेज करके Clarification भी कर दी थी। बेटी के साथ तो आधा घंटा बात भी हो गयी थी। बहिन निशा जी ने फ़ोन प्राप्त होने की देरी के कारण गायब होना बताया था। सुजाता बहिन जी ने पीडीएफ कॉपीज के लिए पुरुषार्थ किया, शक्तिपीठ में पूछा, शांतिकुंज में किसी बहिन ने सहयोग करने का आश्वासन भी दिया लेकिन बाद में कह दिया कि पीडीएफ कॉपियां बनाना बंद कर दिया है क्योंकि हार्ड कॉपीज की सब्सक्रिप्शन कम हुए जा रही है। ऐसा ही explanation हमें भी दिनेश जी ने दिया था।
गुरु साहित्य डिजिटाइज करके विश्व में कहीं भी बैठे गायत्री की गुरु संतान को उपलब्ध कराना बहुत बड़ा कार्य है। हमने तो केवल अखंड ज्योति और युगनिर्माण योजना का ही प्रयास किया है, शांतिकुंज तो समस्त गुरु साहित्य को डिजिटाइज कर रहा है। खैर जो भी हो, गुरुवर जैसा चाहेंगे,जिससे चाहेंगें,वैसा ही होगा। यह कोई अन्धविश्वास नहीं है, हम सब यथासंभव प्रयास तो कर ही रहे हैं, हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठे हैं।
आइये एक बार फिर से रुककर( लम्बी यात्रा में रुकना रुचिकर होता है) बता दें कि हम कोई लेखक तो हैं नहीं, जो मन में आये जा रहा है, यह सोचते हुए लिखे जा रहे हैं कि अपने परिवारजनों के सामने ही बैठे हैं। तीन घंटे में 3200 से भी अधिक शब्द लिख पाना कोई गुरुकृपा ही हो सकती है। साथिओं से करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं कि उनके द्वारा भेजे गए लगभग 200 क्लिप्स इस सेगमेंट में शामिल करना उचित नहीं समझ रहे हैं।
हमें तो यही चिंता खाए जाती है कि जिस परिवार ने हमारे अनेकों संकेतों का पालन किया, जिधर मोड़ा उधर मुड़ते रहे हैं, जो कहा सो मानते रहे हैं, जिधर चलाया उधर चलते रहे हैं और उस पर भी लोकोत्तर सद्भाव परम निःस्वार्थ भाव से प्रदान करते रहे हैं, उनसे ऋणमुक्त हो सकना संभव न हो तो कम से कम समुचित प्रतिदान किस प्रकार दिया जाय?
हमारी आदरणीय सुमनलता बहिन जी ने तो सभी साथिओं को लीड करते हुए समय-समय पर अनेकों अलंकारों से इतना लाद दिया है कि क्या कहा जाए !!! इतना सम्मान तो कोई अपना ही दे सकता है। बहिन जी को हम लीडर इसलिए कह रहे हैं कि उनकी ही तरह अन्य साथी (अरुण जी ने आज ही अग्रदूत कहा है) भी इस लाइन में चल रहे हैं। लेकिन समझ नहीं आता कि हम जैसे तुच्छ मानव के लिए, दुर्गणों का बोझा उठाए मनुष्य के लिए, झुकी कमर लिए मनुष्य पर अलंकारों का अतिरिक्त बोझा कैसे सहन हो रहा है। अवश्य ही कोई दिव्य शक्ति हमें ऊर्जावान बनाये रखे जा रही है, बच्चे तो यही कहते हैं कि आपको प्रशंसा अच्छी लगती है इसलिए आप खुश होते हैं, आपको उससे एनर्जी मिलती है : हम यही रिप्लाई करते हैं “अब दिल चीर कर दिखाएँ क्या ? हम हनुमान हैं क्या, अंतर्मन में बैठे भगवान् राम को दिखा दें ?
अपने दुर्गुणों की लिस्ट बनाना शुरू करें तो शायद लिखने के लिए कागज़ भी कम पड़ जाए। हमारा सबसे बड़ा दुर्गुण जिसने वर्षों से हमें ग्रस्त किया हुआ है वोह है “हमारा भावनात्मक, इमोशनल व्यक्तित्व।” इस दुर्गुण के कारण न जाने कितनी बार धोखा भी खा चुके हैं, दिल टूटने की स्थिति भी आ चुकी है, अपनेआप से प्रश्न भी किए हैं कि हम इतने इमोशनल क्यों हैं ? पहले तो बच्चे आरोप लगाते थे कि पापा आप तो इमोशनल ब्लैकमेल का शस्त्र प्रयोग करते हैं लेकिन अब तो उन्हें भी पता चल गया है कि हमारे पापा बहुत ही निर्बल प्राणी हैं। हम पर इमोशनल ब्लैकमेल जैसा आरोप तो तब लगे जब हमने अपने स्वार्थ के लिए कुछ माँगा हो, हमारी अपनी, स्वयं की तो कोई ज़रुरत है ही नहीं।
हमारे ज्ञानरथ परिवारजनों ने भी हमें पहचान लिया होगा।
नीरा जी बच्चों का इस दिशा में मार्गदर्शन करती रहती हैं,बच्चे किसी और की बात सुने न सुने, माँ की तो सुनते ही हैं। हमारे साथ रह रहे बेटा और बहु इतना ख्याल रखते हैं कि क्या कहा जाए, ज्यादा लिखेंगे तो Flattery समझी जाएगी, हमारी तरह उन्हें भी चापलूसी, चाटुकारिता बिल्कुल पसंद नहीं है। वैंकूवर वालों का तो क्या कहें, उन चार जनों का परिवार तो साक्षात स्वर्ग ही है।
उस परमपिता परमात्मा, सर्वशक्तिमान ईश्वर का किन शब्दों में धन्यवाद करें जिसने बिना मांगें ही इस गरीब की इस प्रकार झोली भर दी जिसके हम काबिल ही नहीं थे/हैं?
इमोशनल नेचर जैसे दुर्गुण ने हमें इतना कमज़ोर कर दिया है कि क्या कहा जाए। इसी स्वभाव ने कुछ वर्ष पूर्व डिप्रेशन के सागर में इस हद तक डुबो दिया था कि डॉक्टरों के डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट भी कुछ न कर पाए। सभी तरफ से लाचार,पूर्णतया असफल, अगर किसी ने हमारा साथ दिया तो वोह था “हमारा आत्मबल और आत्मशक्ति!!” हो सकता है गुरु की अदृश्य शक्ति सहायक हो लेकिन हमारी इतनी पात्रता कहाँ ? गुरु के अनुदान प्राप्त करने के लिए, पूर्ण समर्पण करना पड़ता है, हमने किया ही क्या है ? हमने कभी भी गुरु से कुछ नहीं मांगा है? सब उनका ही तो दिया हुआ है। पिता से मांगने की जरूरत कब से होने लगी ? वोह तो सबका संरक्षक होता है। बाल्यकाल से देखते आ रहे हैं, पांच भाईओं और एक बहिन में से किसी ने भी माता पिता से कोई मांग की होगी क्योंकि उन्हें सबकी ज़रूरतों की जानकारी होती थी।
हमारा दूसरा दुर्गुण “हमारी कर्तव्यनिष्ठा” है। कार्य तो सभी करते हैं, नौकरी भी सभी करते हैं, तनख्वाह भी सभी को मिलती है, कर्तव्यनिष्ठ को कोई अलग से स्पेशल पैकेज तो नहीं मिलता, तो फिर फिज़ूल में अपनेआप को उच्चस्तरीय अनुशासन, कड़ाई से समय के पालन, श्रद्धावान होने आदि से क्या हासिल हुआ। शायद इस दुर्गुण के लिए हम अपने आर्मी अफसर जैसे, हेडमास्टर पिताजी को ही ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं। हमारे जीवन का, समय के पालन का सबसे रोचक उदाहरण हमारे विवाह का है जब हमारी बारात इतनी समय पर पंहुच गयी थी कि दुल्हन अभी तैयार ही नहीं हुई थी, है न सच में रोचक, विशेषकर ऐसे समय में जब बारातें घण्टों लेट होती हैं। यह तो अच्छा हुआ कि नीरा जी के परिवार ने घर के पास ही हमारे विश्राम आदि का इंतज़ाम किया हुआ था, यदि सीधा उनके घर में ही आना होता तो हो गयी थी छुट्टी।
कर्तव्यनिष्ठ होने के कारण गलियां भी खानी पड़ीं, आज भी खा रहे हैं, ज्ञानरथ परिवार से ही गलियां खा रहे हैं जब बार-बार उन्हें एक ही बात के लिए,कहते रहते हैं,प्रेरित करते रहते हैं, अनसुना करने वाले यही तो कह रहे हैं, “इसको तो अपनी ही पड़ी है।” हमें तो खुद समझ नहीं आ रहा कि हमें क्या पड़ी है ?
आइए इन गालिओं को वर्णन करता साक्षात् किस्सा सुन लें :
बात शायद 1970s की होगी जब हम पीएचडी के विद्यार्थी थे। गाँधी दम्पति का किस्सा आज भी स्मरण करते हैं तो स्वयं को कर्तव्यनिष्ठ होने के लिए कोसते हैं। मिसेज गाँधी हमारी यूनिवर्सिटी (पटियाला) में संस्कृत की प्रोफेसर थीं और मिस्टर गाँधी कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। हम कुरुक्षेत्र कुछ कार्यवश आये हुए थे,कार्य समाप्त होने के बाद प्रोफेसर गाँधी ने हमें कुछ पौधों के गमले दिए और कहा कि रात को जब भी पटियाला पहुँचो यह पौधे हमारी पत्नी को ज़रूर दे देना, अगले दिन यह मुरझा जायेंगें। हम लगभग रात को 10:00 बजे मिसेज़ गाँधी के घर पंहुचे, बार-बार दरवाज़ा खटखटाने पर जब कोई नहीं आया तो हम जैसे मुर्ख को समझ जाना चाहिए था कि शायद मिसेज़ गाँधी सो गयी होंगीं। मिसेज़ गाँधी सच में सो गयी थीं। अंत में जब जाने लगे तो दरवाज़ा खुला, हमें देखकर उन्होंने बिना सोचे समझे ही ऐसी गालियां निकालीं जो कई थप्पड़ों से भी भारी थीं। तो साथिओ बेचारे अरुण त्रिखा को कर्तव्यनिष्ठ होने का यह इनाम मिला।
हाईवे पर गाड़ी रोक कर, डॉ ऑफिस से बाहर आकर, प्रज्ञामण्डल से उठकर, खाना छोड़कर, किसी भी सोशल गतिविधि को ज्ञानरथ के टाईमटेबल के अनुसार सेट करना, कर्तव्यनिष्ठा और समय के पालन करने के नियम तो हैं लेकिन इन सबका एक ऐसा साइड इफ़ेक्ट हुआ है कि अब ज्ञानरथ परिवार ही अपना सब कुछ है, रिश्तेदारी, दोस्ती यारी आदि पहले भी कोई अधिक न थी, अब तो बिलकुल ही कटती सी जा रही है। फ़ोन पर भी बात ज्ञानरथ की ही होती है, घर में अगर कोई आता है तो ज्ञानरथ, आध्यात्मिकता, ज्ञानार्जन के इलावा किसी अन्य विषय पर कोई बात होती है तो कोई बहाना बना कर, खीज कर,कन्नी काट कर, उठ कर चले जाते हैं।
कई बार सोचते हैं कि कहीं गुरुदेव के प्रति समर्पण ने हमें Antisocial तो नहीं बना दिया, असमाजिक तो नहीं बना दिया, फिर स्वयं ही उत्तर भी मिल जाता है
“अपने दरवेश गुरु का क्या कसूर है ? यह तो बोओ और काटो का परिणाम है। गुरु ने जो कुछ दिया है उसका बखान करने लगें तो न जाने कहाँ से कहाँ पंहुच जाएँ।
अब तो एक ही अंतिम इच्छा है कि चाहे गालियां पड़ें यां कुछ भी हो, ज्ञान के जिस महासागर में डुबकी मार कर उतर आये हैं उसमें अंदर ही अंदर उतरते जाएँ। ज्ञानप्रसाद लेखों में गुरुवर की अन्तःप्रेरणा,भावना,आकाँक्षा, अभिव्यक्ति, और शिक्षा अपने प्रेमी पाठकों के घरों में इस तरह छोड़ जाएँ कि हमारा शरीर न रहने पर भी वह एक ज्योतिर्मय दीपक की तरह प्रकाशवान बनी रहे। हमारे पाठक, उनकी सन्तानें और सन्तानों की पीढ़ियाँ उससे प्रकाश एवं प्रेरणा ग्रहण करती रह सकें। “गुरुवर का भावना शरीर” हर प्रेमी परिजन के समीप एक मूर्तिमान कलेवर की तरह विद्यमान होता रहे। अगर गुरुवर का साहित्य-रुपी शरीर प्रेमी पाठकों का भावनात्मक निर्माण कर सकने में सफल होता रहे, परिवार की, प्रियजनों की सेवा करते रहने का अवसर हमें मिलता रहे तो हमारे ऊपर चढ़ा हुआ परिजनों का ऋण कुछ सीमा तक उतर पायेगा।
पुराने ज़माने में पुस्तकों को दीमक लगने का डर रहता था,आज के डिजिटल युग में यदि कंप्यूटर फोन आदि क्रैश नहीं होते तो वर्षों तक सब कुछ सुरक्षित रह सकता है। ज्ञानप्रसाद लेख, विडियोज आदि इसी धारणा के साथ प्रकाशित किए जा रहे हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी लाभ उठाती रहेंगी, यही कारण है कि Best of best ही प्रकाशित करने का प्रयास रहता है। कल रात ही हमारी आदरणीय बहिन नीता जी को दिव्य सन्देश के बारे में कुछ संदेह था,मैसेज देखते ही कुछ ही मिनटों में उनका समाधान करने का प्रयत्न किया, awgp वेबसाइट डाउन थी, सुबह आँख खुलते ही सबसे पहला कार्य उन्हें स्क्रीनशॉट भेजना किया, उन्होंने प्रशंसा तो की ही लेकिन गुरुकार्य में जो संतुष्टि मिलती है, उस तृप्ति को गूंगा ही जान पायेगा।
यदि किसी परिवार में स्थापित गुरुदेव का साहित्य, उनके विचारों का ज्योति-दीप कोई प्रकाश दे सका तो हमें अपने श्रम की सार्थकता पर सन्तोष होगा। जिन साथिओं के लिए हमने सब कुछ त्याग दिया, जिन्हें हमने अटूट प्यार किया, उनके स्वजन सम्बन्धी भी यदि यह अनुभव करेंगे कि हमारे परिवार को जीवन विकास की प्रेरणा देने वाला कोई शिक्षक (गुरुवर का साहित्य) इस घर में “विचार शरीर” से अभी भी सजीव की तरह निवास करता है, भले ही उसका स्थूल शरीर समाप्त हो गया है तो हमें अत्यंत शांति प्राप्त होगी। इस शांति का श्रेय हमारे उन मुट्ठी भर समर्पित साथिओं को जाता है जो हमारे साथ पहले दिन से, बिना किसी प्रश्न के जुड़े हुए हैं। कितने सौभाग्यशाली हैं हम कि मुट्ठी भर ही सही यह साथी हमारे साथ आज तक जुड़े हुए हैं। स्वार्थ की दौड़ में,आज के युग में तो रिश्ते/सम्बन्ध इतनी तेज़ी से बदल रहे हैं जितनी तेज़ी से मनुष्य कपड़े भी नहीं बदलता। ज्ञानरथ परिवार में तो अनेकों साथी गुरुज्ञान के अमृत की बूँद इस आशा के साथ लेने के लिए आते हैं कि लेते ही चमत्कार हो जायेगा, कायाकल्प हो जायेगा,डॉलरों की बारिश हो जाएगी, आलिशान बंगला अपना हो जायेगा, लाटरी लग जाएगी लेकिन ऐसा है नहीं क्योंकि हमारा गुरु इतना होशियार नहीं है, वोह तो बेचारा दरवेश है,फकीर है, सीधा साधा है, स्पष्ट कहने वाला है, कोई पेच वगैरह उसे गवारा नहीं है। ऐसी स्थिति में तो मुकेश जी का 1955 का गीत ही फिट बैठता है:
सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
दुनिया ने कितना समझाया
कौन है अपना कौन पराया
फिर भी दिल की चोट छुपा कर
हमने आपका दिल बहलाया
खुद पे मर मिटने की ये ज़िद थी हमारी
खुद पे मर मिटने की ये ज़िद थी हमारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
दिल का चमन उजड़ते देखा
प्यार का रंग उतरते देखा
हमने हर जीने वाले को
धन दौलत पे मरते देखा
दिल पे मरने वाले मरेंगे भिखारी
दिल पे मरने वाले मरेंगे भिखारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
असली नकली चेहरे देखे
दिल पे सौ सौ पहरे देखे
मेरे दुखते दिल से पूछो
क्या क्या ख्वाब सुनहरे देखे
टूटा जिस तारे पे नज़र थी हमारी
टूटा जिस तारे पे नज़र थी हमारी
सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के संचालक और संरक्षक परमपूज्य गुरुदेव ही हैं। हम तो मात्र उनके दिव्य सन्देश ही आप सब तक पँहुचाने का कर्तव्य और उत्तरदायित्व निभा रहे हैं। लेकिन गुरुदेव बार-बार कह रहे हैं कि रोटी, कपड़ा, मनोरंजन, दवादारु या पढ़ाई की व्यवस्था मात्र कर देने पर ही संचालक का कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता। हर विवेकशील और दूरदर्शी परिवार-संचालक का यह भी कर्तव्य है कि वह अपने परिवारजनों के लिये “मानवीय मूल्यों का वातावरण” भी प्रस्तुत करे। ऐसे वातावरण के अभाव में परिवार वाले भले ही हृष्ट-पुष्ट, पढ़ाई की दृष्टि से सुशिक्षित और पैसे की दृष्टि से सुसम्पन्न हो जावें, लेकिन वे भावनात्मक दृष्टि से पिछड़े ही रह जायेंगे और अपनी असज्जनता के कारण स्वयं भी दुःखी रहेंगे एवं औरों को भी दुःख ही देंगे। यदि “भावनात्मक परिष्कार” नहीं हुआ तो परिजन न तो स्वयं जीवन का आनंद ले सकते हैं और न अपने साथियों को चैन से रहने दे सकते हैं।
ज्ञानरथ परिवार में मानवीय मूल्यों के पालन का बार-बार इसीलिए प्रचार किया जाता है ताकि इससे सम्बंधित किसी भी परिवार में सुखशांति का अभाव न रहे। प्रत्येक साथी की भावनाओं का सम्मान करने, उसके दुःख-सुख में सहकारिता दिखाने में यह परिवार “एक मॉडल परिवार” का चित्र प्रस्तुत कर सके,हमारा प्रयास सदैव इसी दिशा में रहता है।
कोई क्या करता है, कोई कैसा व्यवहार करता है, संसार में त्राहि-त्राहि मची पड़ी है, आग में घी डालने वाले पडोसी, सबंधी, और आज के युग के सबसे निकटवर्ती सम्बन्धी “सोशल मीडिया” तो नकारात्मक आंधी से लोगों का सत्यानाश कर ही रहे हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में इस परिवार के किसी भी सदस्य से बात करके सकारात्मिकता का वातावरण बनता है तो इससे बड़ी कोई भी उपलब्धि हो ही नहीं सकती।
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा रचित विराट साहित्य में हम कहीं पढ़ रहे थे जहाँ गुरुदेव हम बच्चों से आग्रह कर रहे थे कि हम खेतों से उखाड़ कर साग-भाजी लायेंगें, उसे धोकर, साफ कर,पौष्टिक भोजन बनायेंगें, एक पिता की भांति आपको परोसेंगें भी, आपको उस भाजी के गुण आदि भी बताएंगें ताकि आप उस भोजन को पचाकर शक्तिशाली बने। लेकिन बेटे कभी भी स्वार्थी मत बनना, हमारी साग-भाजी खाकर जो लाभ आपको हुआ है, उस लाभ के प्रचार का कार्य अवश्य करना।
“यही है गुरुदेव का विचार क्रांति अभियान, आप साग-भाजी (ज्ञानप्रसाद) का सेवन कीजिये, उसे पचाने का कार्य कीजिये ( ज्ञानसंचार) और और उस ज्ञान की लौ से अपने आसपास को, पड़ोस को, प्रकाशवान कीजिए (ज्ञानप्रसार), आज के युग में सहायता के लिए टेक्नोलॉजी बांहें फैलाये स्वागत करने को खड़ी है।”
तो साथिओ यदि हम इसी तरह लिखते रहे तो कहीं भी अंत न होगा,अपना नहीं तो आपके समय का तो ख्याल होना ही चाहिए इतने भी स्वार्थी नहीं हैं हम। हमारी बात सुनने के लिए हमारे साथी सप्ताह के शुरू में उत्सुकता व्यक्त करना शुरू कर देते हैं जिसके लिए हम सदैव ऋणी रहेंगें।
धन्यवाद् जय गुरुदेव