वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का 14वां ज्ञानप्रसाद लेख: गुरुदेव एवं परम वंदनीय माताजी साक्षात् शिव और शक्ति का रूप 

118 पन्नों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” हमारे हाथ में न केवल थमाना,उसके एक-एक शब्द को न केवल इतने ध्यान से पढ़ना बल्कि समझकर, गूगल आदि उपलब्ध स्रोतों की सहायता से ज्ञानप्रसाद लेखों के रूप में प्रस्तुत कर पाना, अवश्य ही कोई बड़ी गुरुकृपा होगी। अपने साथिओं द्वारा, बड़ी ही श्रद्धा से इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करना, अपने भाव व्यक्त करना, इस सारी प्रक्रिया को एक सत्संग का वातावरण प्रदान करना,बहुत ही बड़ी कृपा हो सकती है। इस गोपनीय कृपा को शब्दों में पिरोने में यह तुच्छ सा लेखक पूर्णतया असमर्थ है। 

अलग-अलग माध्यमों से, समय-समय पर शांतिकुंज से बताया जा रहा है कि परमपूज्य गुरुदेव ने 3200 से ऊपर पुस्तकें लिखी हैं, सारी पुस्तकों को समझ पाना तो दूर, पढ़ने के लिए ही  कितने ही जन्म लेने पड़ेंगें। जिस किसी पुस्तक को भी पढ़ना शुरू किया, ज्ञान का ऐसा विशाल सागर अनुभव हुआ कि डूबते ही चले गए। वर्तमान ज्ञान यात्रा का अभी आधा ही सफर सम्पन्न  हो पाया है, पाठक स्वयं ही मूल्यांकन कर सकते हैं कि क्या कुछ प्राप्त हुआ है। 

आज के लेख में गुरुदेव की दिनचर्या और आधी रात को होने वाली वंदनीय माता जी की साधना, गुरुदेव के साथ एकाकार होना, योग साधना के गोपनीय प्रसंगों के  कुछ-कुछ संकेत बताना, आदि का वर्णन है। लेख का समापन तो शिव और शक्ति के अंतर्मिलन का सत्य उजागर कर रहा है लेकिन यह लेख साथिओं को सोमवार तक के लिए अनेकों जिज्ञासाओं के साथ छोड़कर जा रहा है। 

तो आइए विश्वशांति की कामना करें, गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के सत्संग का शुभारम्भ करें : 

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

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माताजी सच्चे अर्थों में अपने आराध्य की साधना-संगिनी थीं। परमपूज्य गुरुदेव उनके लिए गुरु, मार्गदर्शक, इष्ट, आराध्य सभी कुछ थे। उनका जीवन अपने आराध्य के श्रीचरणों में समर्पित सुरभित पुष्प की भांति था। रोजमर्रा किए जाने वाले छोटे-बड़े हर क्रिया-कलाप के माध्यम से उनके प्राण अपने आराध्य के महाप्राणों में समाहित होते रहते थे। बाहरी रूप से घर-परिवार, सगे-संबंधियों, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि के अनेकों लौकिक दायित्व निभाते हुए भी उनका आंतरिक जीवन इस लौकिकता से पूरी तरह से अछूता, एकदम अलौकिक था। सांसारिक कर्त्तव्यों को मनोयोगपूर्वक पूरा करने का सार्थक प्रयास करते हुए भी उनकी आंतरिक भावनाओं में कहीं भी सांसारिक विषयों की लेशमात्र गंध नहीं थी।

अपनी सारे दिन की व्यस्तताओं से घिरी हुई माताजी  स्वयं को मन-ही-मन “रात्रि में की जाने वाली विशिष्ट साधना” के लिए तैयार करती थीं। आगंतुकों के आवागमन, पत्रिका व अन्य साहित्य का प्रकाशन और गायत्री तपोभूमि के अनेकों क्रिया-कलापों की वजह से परमपूज्य गुरुदेव की व्यस्तताएं बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं। माताजी की भी इसमें बराबर की सहभागिता थी, इसलिए प्रातः सूर्योदय से लेकर रात्रि के प्रथम पहर तक कोई भी समय ऐसा नहीं था, जिसमें साधना की जा सके। इसलिए गुरुदेव ने मध्य रात्रि से लेकर प्रातः तक के समय को साधना के लिए सुनिश्चित किया था। दिनभर के क्रिया-कलापों को देखते हुए यही सबसे उपयुक्त समय था। हालांकि उन्हें सोने के लिए मुश्किल से तीन-चार घंटे मिल पाते थे, परंतु माताजी को अर्द्धरात्रि से कुछ पहले जगकर गुरुदेव के साथ बैठकर साधना करने में इतनी खुशी मिलती थी कि सारे कष्ट उनको नगण्य लगते थे। वह नियत समय पर जगकर स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा की कोठरी में पहुंच जाती थीं। वहां गुरुदेव उनका पहले से इंतजार कर रहे होते। आसन पर बैठते ही आराध्य की कृपा उन पर अवतरित होने लगती । प्राण संचालन की अनेकों गुप्त  क्रियाएं उनमें होने लगतीं। गोपनीय बीजमंत्रों के विस्फोट  से सूक्ष्म चेतना के दिव्य केंद्रों में शक्ति के सागर उमड़ने लगते। लेकिन ये तो प्रारंभिक क्षणों की बातें थीं, जिनका अनुभव पहले भी उन्हें किन्हीं अंशों में होता रहता था। गुरुदेव के साथ बिताए जाने वाले साधना के ये पल अति विशिष्ट थे। इन पलों में उन्हें उन सब सत्यों का साक्षात्कार होता था जिसके बारे में शास्त्र केवल संकेत मात्र ही करते हैं, जिसकी विस्तृत चर्चा विश्व के किसी भी साधना शास्त्र में नहीं मिलती। रियलिटी में देखा जाए तो कोई भी साधना शास्त्र आधारित होती ही नहीं है। यह तो हमेशा गुरु आधारित होती है। साधना के क्षेत्र में ऐसा भी कहा गया है साधना का अधिकार गुरु के ऐसे शिष्यों का ही होता है जिन्हें गुरु अपने प्राणों से भी प्रिय होते हैं। परम वंदनीय माताजी के अगाध समर्पण एवं परिपूर्ण निवेदन ने ही उन्हें इन सर्वथा गोपनीय योग साधनाओं का अधिकारी बनाया था।

गुरुदेव द्वारा बताई गई योग की गोपनीय  विधियों से वे इसे बड़ी ही आसानी से स्थूल शरीर से पृथक कर लेती थीं। ऐसी दशा में गुरुदेव उनके स्थूल शरीर की रक्षा करते थे और वह लोक-लोकांतर में जाकर वहां से आवश्यक तत्त्वों का अर्जन कर लेतीं। शिष्यों-संतानों की पुकार एवं प्रश्नों के भी उत्तर देतीं । 

गुरुदेव के सान्निध्य में योग साधना की तीव्रता के कारण उनके सूक्ष्मशरीर की क्रियाशीलता उत्तरोत्तर बढ़ती गई। कारण शरीर भी प्रभावान और प्रखर होने लगा। उनकी साधना की शक्ति इस कदर बढ़ गयी थी  कि वह प्रत्येक दृष्टि से परम समर्थ हो गई थीं।

यह स्थिति पहले से काफी अलग थी। इसे जानना-समझना किसी भी तरह से आसान नहीं है। विभिन्न प्रसंगों पर संकेत करते हुए माताजी के अनुसार अब गुरुदेव को उनके स्थूल शरीर की रक्षा करने के लिए रुकना नहीं पड़ता था। दिव्य महामंत्रों की कीलक शक्ति और उनकी महत् चेतना का संकल्प स्थूल देह की रक्षा के लिए पर्याप्त था। गुरुदेव तो पहले से ही योग की समस्त उच्चतम साधनाओं में एक्सपर्ट  थे। 

इस परिवर्तित भावदशा में भी नियमित साधना के लिए जगने और बैठने का बाहरी क्रम यथावत् बना रहा, परंतु सभी आंतरिक सत्य बदल गए। वह गुरुदेव के साथ साधना के लिए अभी भी बैठती थीं लेकिन किसी विशेष साधना के लिए नहीं, बल्कि उनके साधनात्मक कार्यों में सहभागी बनने के लिए। ऐसे कार्यों में शिष्यों-भक्तों की पीड़ा और उन पर आए संकटों का निवारण प्रमुख था। इसके लिए वे दोनों ही शिष्यों के पास पहुंचकर उन्हें आश्वासन देते, उनको ढांढस बंधाते और अपनी योगशक्ति से उनके कष्टों का पल में निवारण कर देते। संतानों की छटपटाती अंतर्चेतना अपनी महायोगिनी माँ  की कृपा को पाकर अपूर्ण शांति अनुभव करती।

साधना के क्षणों में ही जब-तब गुरुदेव के साथ सूक्ष्म शरीर से दिव्य लोकों, दिव्य भूमियों  एवं सामान्य मानवदृष्टि से ओझल दिव्य साधना केंद्रों की यात्रा करतीं। 

ऐसे प्रसंगों को उन्होंने संपूर्ण रूप से प्रायः कभी उजागर नहीं किया। फिर भी यदा-कदा गुरुदेव की महिमा बताने के लिए इसके कुछ अंशों को वह प्रकट कर देती थीं। ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने बताया:

माताजी की इन बातों को सुनकर सुनने  वाले भावविह्वल हो सोचने लगते, बच्चों को उनके पिता के स्वरूप का बोध भला माँ  के सिवा और कौन करा सकता है।

गुरुदेव के दिव्य स्वरूप का मुखर होकर बखान करने वाली माताजी अपने बारे में प्रायः मौन ही रहती थीं। किसी विशेष अवसर पर बहुत हुआ तो इतना कह देती थीं: 

अपनी बातों के क्रम में माताजी बताती हैं:

उन दिनों गुरुदेव के साथ मैं पूरी प्रगाढ़ता, तन्मयता एवं तत्परता के साथ साधना किया करती थी। वे बड़े अद्भुत दिन थे। शरीर इस लोक में रहता,चेतना कहीं और ही रहती थी। मेरा सब कुछ गुरुजी में घुलता मिलता चला जा रहा था।

उनकी इन बातों को सुन रहे बेटे-बेटियों की भावानुभूतियों में शिव और शक्ति के अंतर्मिलन का सत्य उजागर होने लगता।

आज के इस दिव्य ज्ञानप्रसाद लेख का समापन यहीं पर करना उचित रहेगा। सोमवार को एक नवीन ऊर्जा के साथ, स्थिर होकर साक्षात् उदाहरणों के साथ गुरुदेव और माताजी यानि  शिव और शक्ति के अंतर्मिलन का अति रोचक वृतांत प्रस्तुत करने का प्रयास होगा। 

जय गुरुदेव  


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