MARCH 25.2026
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में उस महाशक्ति की शक्ति का बखान हो रहा है जिसे हम सब जगतजननी के नाम से सम्बोधित करते हैं। वंदनीय माताजी जननी और माँ के अंतर् को समझा रही हैं। परमपूज्य गुरुदेव बता रहे हैं कि वंदनीय माताजी कोई साधारण स्त्री नहीं हैं, वोह ऐसे-ऐसे कार्य कर लेती हैं जिन्हें मैं भी नहीं कर सकता।
आज के लेख में ठाकुर हनुमंत सिंह जी का एक प्रेरणादायक संस्मरण वर्णित है जिसमें “माताजी के चौके” के भोजन ने उनका ह्रदय परिवर्तन कर डाला। कुछ ऐसा ही मिलता-जुलता हमारे स्वर्गीय पिताजी का संस्मरण भी बताया गया है। माताजी के चौके में परोसे जाने वाले भोजन में वंदनीय माता जी के सशरीर न होने के बावजूद, आज भी वही दिव्यता देखने में मिलती है क्योंकि दोनों दिव्य सत्ताएं आज भी शांतिकुंज के कण-कण में व्याप्त हैं।
इसी सारांश के साथ, आज के लेख का विश्वशांति का कामना करते हुए शुभारम्भ होता है :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
***************
अपने बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए माताजी हमेशा प्रयत्नशील रहती थीं। गायत्री तपोभूमि व अखण्ड ज्योति संस्थान में रहने वाले, काम करने वाले और आने-जाने वाले सभी उनके बच्चे थे। वह सभी की अपनी सगी माँ थीं। माँ कौन होती है? इसके बारे में उनकी अपनी मौलिक दृष्टि थी। बातचीत में कहा करती थीं:
“जन्म देने वाली जननी होती है, लेकिन जो संतान को संस्कार देती है, उसके जीवन को संवारने के लिए हर पल, हर क्षण प्रयत्नशील रहती है, वही माँ है। अपने बच्चों को ऊंचा उठाने के लिए, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए, उनके आंतरिक विकास के लिए माँ दिन-रात जुटी रहती है। उत्तम संस्कारों के बीजारोपण से ही मनुष्य का जीवन सही मायने में संवरता है। इसी से माता की मातृत्व साधना की सफलता प्रमाणित होती है।”
वे कहती थीं,
“बेटा, मैं तुम सब की जननी तो नहीं, लेकिन तुममें से हर एक को अच्छे संस्कार देने वाली तुम्हारी सच्ची माँ हूं।”
अपने कथन के अनुरूप वह हर समय इसके लिए कोशिश करती रहती थीं। बात-व्यवहार में, उनके संपर्क के प्रत्येक आयाम में यह सत्य प्रकट होता था। उनके द्वारा कराए जाने वाले भोजन में इसकी सबसे अधिक सघनता रहती थी ।
परमपूज्य गुरुदेव इस बात को परिजनों से, कार्यकर्त्ताओं से जब-तब बड़े ही स्पष्ट निम्नलिखित शब्दों में कह देते थे:
“तुम लोग माताजी को साधारण स्त्री न समझो। वे शक्तिस्वरूपा हैं, महाशक्ति हैं। माताजी अपने आध्यात्मिक ऐश्वर्य को छिपाकर बड़े ही सामान्य ढंग से रहा करती हैं। उन्हें पहचानना, उनको सही ढंग से समझ पाना आसान काम नहीं है। वे तुम लोगों के लिए कोई भी कार्य जितना आसानी से कर देती हैं, उतना तो मैं भी नहीं कर सकता। पता नहीं, तुम इस सच्चाई को कितना समझ पाते हो,लेकिन सत्य यही है कि उनके संपर्क मात्र से पूर्वजन्मों के कषाय-कल्मषों, कलुषित संस्कारों का नाश होता है, व्यक्तित्व में नए दिव्य संस्कारों के बीज रोपित होते हैं।”
इस क्रम में परमपूज्य गुरुदेव और भी बहुत कुछ बताया करते थे। वे कहते थे:
“माताजी का भोजन दिखने भर में सादा और साधारण है, लेकिन तुम लोग इसे कभी साधारण समझने की भूल मत करना। इसमें उनकी असाधारण प्राण ऊर्जा समाई रहती है। यह पेट को तृप्त करने के साथ आत्मा तक को तृप्त करने वाला तत्त्व है। तुम लोगों को अनुदान देने के, तुम सबको संस्कारवान बनाने के, उनके तरीके बड़े अद्भुत हैं। वे कब, क्या और किस ढंग से करती हैं, इसे सही-सही वे ही जानती हैं, लेकिन यह बात सौ टका सच है कि उनके चौके का भोजन, उनके द्वारा किए जाने वाले शक्ति संप्रेषण (Power transmission) का, दिव्य संस्कारों के बीजारोपण का सबसे समर्थ माध्यम है। यह उनके द्वारा अपनाई जाने वाली बड़ी ही प्रिय विधि है।”
“माताजी के चौके” में हजारों-लाखों लोगों ने भोजन किया होगा, उनके संपर्क में शायद इससे भी अधिक लोग आए होंगे,लेकिन इस उपर्युक्त सच (आत्मा को तृप्त करने वाला सच) को बहुत कम ही लोग समझ पाए होंगे। हां, बुद्धि से न समझ पाने के बावजूद इसकी भावानुभूति ज़रूर बहुतों ने पाई होगी। कभी-कभी तो यह अनुभूति इतनी प्रगाढ़ होती थी कि अनुभव करने वाला इसे बताए बिना रह ही नहीं पाता था। इसके बखान से ही उसे संतुष्टि और संतृप्ति मिलती थी।
साथिओं को बताना अपना कर्तव्य समझते हैं कि गायत्री परिवार के भोजन कराने वाले डिपार्टमेंट का कोई भी नाम (माँ भगवती भोजनालय आदि) प्रयोग होता हो लेकिन “माताजी का चौका” वंदनीय माताजी द्वारा स्वयं Coin किया गया नाम था।
ठाकुर हनुमंत सिंह हाड़ा की माताजी के चौके की अनुभूति :
ठाकुर हनुमंत सिंह हाड़ा की अनुभूति कथा ऐसी ही है। इसे उन्होंने ही गायत्री तपोभूमि के एक शिविर में अपने साथी शिविरार्थियों को सुनाया था। इस प्रसंग को बीते हुए आज 70 वर्ष के लगभग होने जा रहे हैं लेकिन जिन्होंने उन दिनों इसे सुना, उन्हें आज भी ये बातें यथावत याद हैं। ठाकुर हनुमंत सिंह राजस्थान के बाड़मेर के पास रहने वाले थे। उनके पुरखे काफी बड़ी जागीर के स्वामी थे। स्वतंत्रता मिलने के बाद जागीरें तो न रहीं लेकिन उनके ऐश्वर्य में कोई विशेष कमी न आई थी। ठाकुर साहब में गुण काफी थे लेकिन दोष भी कम न थे। ऐश्वर्य व विलासिताजन्य कई दुष्प्रवृत्तियां उनके व्यक्तित्व में बुरी तरह समा गई थीं। उनकी धर्मपत्नी, परिवार के सदस्य उनके इन दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों से बुरी तरह परेशान थे। पता नहीं किस तरह परिवार के लोगों को “अखण्ड ज्योति पत्रिका” की एक प्रति हाथ लग गई। इसमें गायत्री तपोभूमि और यहां चलने वाले शिविरों के बारे में काफी कुछ छपा था। सारी बातें पढ़कर परिवार के सदस्यों एवं उनकी पत्नी ने सोचा कि ठाकुर साहब को वहां ले चला जाए। उन सब लोगों ने ठाकुर साहब से बात की। थोड़ी न-नुकुर के बाद वह तैयार हो गए।
जैसा खाए अन्न वैसा होवे मन:
निश्चित तिथि पर वे सभी मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि पहुंच गए। उन दिनों आने वाले परिजन ठहरते तो गायत्री तपोभूमि में थे लेकिन भोजन घीआ मंडी स्थित अखण्ड ज्योति संस्थान में ही करते थे। इसी नियम के अनुसार ठाकुर साहब भी अपने परिवार के साथ भोजन हेतु अखण्ड ज्योति संस्थान में गए। माताजी ने स्वयं अपने हाथों से परोसकर उन्हें भोजन कराया। मुर्गा-माँस-शराब के अभ्यस्त ठाकुर साहब हालांकि इस तरह के भोजन के आदी न थे, फिर भी न जाने क्यों उन्हें इस भोजन में कुछ अद्भुत स्वाद आया। भोजन करने के बाद वह फिर से तपोभूमि लौट आए। परिवार के सदस्यों के बहुत समझाने पर भी उन्होंने शिविर के किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया। हां खाना खाने के लिए अवश्य सबके साथ माताजी के यहां पहुंच जाते थे।
ठाकुर साहब ने निम्नलिखित शब्दों में भोजन के बारे में बताया:
“पता नहीं क्या था उस भोजन में! लेकिन कुछ अद्भुत जरूर था। दो-तीन दिन में ही मुझमें एक अद्भुत भाव परिवर्तन हो गया। हर समय आंखों के सामने माताजी की सौम्य मूर्ति उपस्थित रहती। पहली बात तो है कि तो गलत विचार, गलत भावनाएं मन में अब आती ही नहीं , पर यदि पुरानी आदतोंवश आ भी जातीं, तो मन में बड़ी गहरी शर्मिंदगी होती । ऐसा लगता कि माताजी सब कुछ देख रही हैं और मैं कैसी घटिया बातें सोच रहा हूं। घर वापस पहुंचने के बाद पुरानी बातों की ओर मन बिल्कुल भी न गया। परंतु मित्र वही थे, उनकी जोर- जबरदस्ती भी वही थी। इसी जोर-जबरदस्ती के कारण उनके साथ जाना पड़ा। बहुत मना करने के बावजूद भी उन्होंने माँस और शराब का सेवन करा ही दिया। इसके बाद ही हालत खराब हो गई। उल्टी-दस्त का सिलसिला चल पड़ा। जैसे-तैसे घर पहुंचाया गया लेकिन दिनोदिन बीमारी बढ़ती ही गई। दवा-डॉक्टर- इलाज सब बेअसर होने लगे।”
ठाकुर साहब के अनुसार घर के सभी लोग घबरा गए लेकिन उन्हें खुद एकदम घबराहट न थी। उन्हें हमेशा लगता कि माताजी उनके सिराहने बैठे उनका सिर सहला रही हैं और कह रही हैं,
“बेटा, इसे बीमारी नहीं, विरेचन (Detox, Purging ) समझ। इस बीमारी के द्वारा तेरे सारे पुराने कुसंस्कार धुल जाएंगे। अब तेरे अंदर वही रहेगा जो मैंने भोजन के साथ तुझे दिया है। तू परेशान न होना, सब कुछ बड़ी जल्दी ठीक हो जाएगा।”
सचमुच ऐसा ही हुआ। थोड़े ही दिनों में वह एकदम ठीक हो गए। ठीक होने के बाद उनका जीवनक्रम एकदम बदल गया। पुराने मित्रों का संग-साथ भी छूट गया। फिर से शिविर में गायत्री तपोभूमि आना हुआ। उन्होंने अपनी कथा विस्तार से सबको सुनाई। उनका बदला हुआ जीवनक्रम, कहे गए सत्य को प्रमाणित कर रहा था। नियमित ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री साधना, प्रातः हवन, उनके जीवन के अनिवार्य अंग बन गए थे। माताजी द्वारा दिए गए दिव्य संस्कारों ने उन्हें संपूर्ण रूप से बदल दिया था।
अपनी अनुभूतियों को सुनाते हुए कहा करते थे:
“श्रेष्ठ साधकों के लिए मार्गदर्शक परमपूज्य गुरुदेव हैं। वे अवतारी सत्ता हैं, परंतु हम जैसे निकृष्टजनों के लिए, अनेक तरह की गंदगी से लिपटी हुई संतानों के लिए तो माताजी ही सब कुछ हैं। उनके बिना भला हम जैसों का कल्याण और कौन करेगा? गुरु हमेशा साधक की पात्रता देखता है लेकिन माँ के लिए तो बच्चे हमेशा ही सत्पात्र (योग्य) होते हैं, भले ही वे मल-मूत्र से सने क्यों न हों। माँ को उन्हें गोद में उठाने में, उन्हें आगे बढ़ाने में,संस्कारवान बनाने में तनिक सी भी हिचकिचाहट नहीं होती। हालांकि इसके लिए माँ को अपार प्राण ऊर्जा खरच करनी पड़ती है, अनेकों कष्ट सहन करने पड़ते हैं, माँ प्रसन्न भाव से यह सब करती है।”
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन वर्षों पूर्व हमारे स्वर्गीय पिताजी के एक ऐसे ही संस्मरण से कर रहे हैं।
बात उन दिनों की है (1980s) जब शांतिकुंज आज की भांति विकसित नहीं था। हम अपने माता-पिताजी के साथ शांतिकुंज में प्रवास कर रहे थे। भोजनालय तो था लेकिन खाने के लिए नीचे कच्ची भूमि पर टाट आदि पर बैठना होता था। हम तीनों ज़मीन पर बैठे भोजन ग्रहण कर रहे थे, स्वयंसेवक लोग बड़े ही प्रेमपूर्वक भोजन परोस रहे थे। हमारे पिताजी को नमक मिर्च, चटपटा खाना न होने के कारण स्वाद नहीं लग रहा था, अचानक गुस्से हो गए और उठ कर चल पड़े, हम दोनों ने समझाया कि यह घर नहीं है, माता जी के चौके का खाना है, ऐसा नाराज़ होना ठीक नहीं है, स्वयंसेवकों ने भी कहा, भाई साहिब खाने से गुस्सा होना ठीक नहीं है, आपको नमक-मिर्च चाहिए, हम देते हैं। उन दिनों परमपूज्य गुरुदेव के आदेश अनुसार बिलकुल सात्विक,सादा भोजन सुनिश्चित किया जाता था। स्वयंसेवकों के समझाने पर उनका क्रोध शांत हुआ और उन्होंने भोजन-प्रसाद ग्रहण किया। माँ के भोजन का ही प्रभाव होगा जिसने ऐसे इंसान को गायत्री साधक बना दिया जिसने सारा जीवन पूजा पाठ आदि का विरोध ही किया था, हमारी माता जी को यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। जीवन के अंतिम दिनों तक, दृष्टि कमज़ोर होने के बावजूद ,स्वास्थ्य की अनेकों समस्याओं के बावजूद, लाठी लेकर चलते हुए, घर-घर जाकर दीपयज्ञ कराने वाली उस महान आत्मा को हमारा नमन है, श्रद्धा से शीश झुक जाता है।
जय गुरुदेव

