March 24,2026
महाशक्ति,जिन्हें हम सब अपनी माँ मान चुके हैं हमें अपने साथ लिए ऐसे-ऐसे लोकों की यात्रा करवा रही हैं जिनकी अनुभूति केवल उन्हीं को हो सकती है जो गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के साथ आत्मा से जुड़े हैं। जो साथी इन लेखों को केवल एक लेख की भांति पढ़ रहे हैं, एक साधारण सा कृत्य पूरा कर रहे हैं, वोह कहाँ उस दिव्यता का अनुभव कर पायेंगें।
आज का लेख कल वाले लेख की ही Continuation है जब वंदनीय माता जी को आत्मानुभूति हुई थी, पत्र खोलते और पढ़ते समय जब माता जी ने अपनी अनुभूति का वर्णन किया तो गुरुदेव ने कहा कि हमें भी ऐसी ही अनुभूति हुई है। तपोभूमि के लिए जगह ढूंढी गयी, रजिस्ट्री के लिए माता जी ने आभूषण समेत जमा किये हुए 6000 रुपए भी दे दिए। ऐसे सभी संस्मरण अनेकों बार, अनेकों पुस्तकों में प्रकाशित हुए हैं,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर ही प्रकाशित हुए हैं लेकिन बार-बार दोहराने का अभिप्राय उन्हें स्मरण करना भी होता है। यह बिलकुल ऐसा ही है जैसे एक नन्हें बच्चे को बार-बार पाठ दोहराया जाता है ताकि पूछने पर उसका उत्तर एकदम मिलना चाहिए।
माँ के साथ की जा रही इस लोकयात्रा में न जाने कौन-कौन दिव्य लोकों का अवलोकन होने वाला है, यह तो माँ ही जानती है !!! हमारा कर्तव्य तो मात्र इतना ही है कि हम एक आज्ञाकारी अबोध शिशु की भांति ऊँगली पकडे चलते जाएँ।
आज के लेख में तपोभूमि की बहुत ही संक्षिप्त जानकारी दी गयी है,तब से लेकर अब तक(2026) की प्रगति को इसी चैनल पर न जाने कितनी बार अपडेट किया जा चुका है।
इन्हीं दिव्य शब्दों के साथ, विश्व शांति की कामना करते हुए आज के लेख का शुभारम्भ होता है :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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हम सब जानते हैं कि परिजनों के आए हुए पत्रों को पढ़ने और उनके उत्तर लिखने का काम गुरुसत्ता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण समझा जाता रहा है। आधुनिक युग की तरह नहीं कि इतनी उच्चकोटि की टेक्नोलॉजी होने के बावजूद इस कार्य को कितना Lightly लिया जा रहा है, यह युग Take it easy, Who cares के सिद्धांत का पालन कर रहा है, भावनाशीलों का तो अकाल सा ही पड़ गया है। परम पूज्य गुरुदेव एवं हमारी सबकी माँ से यदि हम केवल भाव संवेदना की शिक्षा ही ग्रहण कर लें तो न जाने हम कहाँ से कहाँ पँहुच जाएँ। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक प्रयास इस दिव्य सत्ता को समझने की कोशिश है। खैर इस बात को यहीं छोड़कर आगे चलना उचित रहेगा।
पत्रों के उत्तर देने का काम परमपूज्य गुरुदेव एवं माताजी मिलकर किया करते थे। इसी बीच कुछ बातें भी हो जातीं। उस दिन पत्रों को खोलते हुए माताजी ने अपनी अंतरानुभूति गुरुदेव के सामने खोली ।
गुरुदेव को भी गायत्री तपोभूमि के निर्माण की अनुभूति हुई।
माताजी की सारी बातें (जिनका वर्णन हम कल वाले लेख में कर चुके हैं) सुन लेने के बाद परम पूज्य गुरुदेव ने कहा:
“आज हमें भी साधना के क्षणों में अपने मार्गदर्शक का कुछ ऐसा ही संदेश मिला है। इस संदेश के अनुरूप हमें ऐसा केंद्र स्थापित करने का आदेश मिला है जहां देश के विभिन्न भागों से अनेकों साधक आकर सच्ची अध्यात्म साधना कर सकें, साधकों को आध्यात्मिक तत्त्वदर्शन (Spiritual फिलॉसॉफी) की वास्तविक अनुभूति हो सके। साथ ही उस महत् कार्य का प्रारंभ हो सके जिसके लिए भगवान् ने हम दोनों को धरती पर भेजा है।”
माताजी और गुरुदेव की बातों का सारतत्त्व एक ही था। उन्होंने अपनी बातों के अंत में एक-दूसरे की ओर देखा और काम में लग गए लेकिन उस दिन से गायत्री तपोभूमि के निर्माण का संकल्प सक्रिय हो गया।
गायत्री तपोभूमि के निर्माण का संकल्प:
उपयुक्त भूमि देखी जाने लगी। घर में उस समय केवल 6000 रुपये की पूंजी ही थी जिसके आधार पर भूमि खरीदने की बात सोची गई। उस समय मथुरा में “किशोरी रमण कॉलेज के साथ जीर्ण अवस्था” में एक गायत्री मंदिर था। टीले पर स्थित होने के कारण इसे गायत्री टीला भी कहते थे। इसे लेने की बात जानकारों ने सुझाई लेकिन बात कुछ जमी नहीं। एक तो वह टीला था, नीचे से कटाव भी बहुत पड़ रहा था और भूमि भी बहुत थोड़ी थी। इन कारणों से इस भूमि को छोड़ना पड़ा। भूमि खरीदने के लिए “मंडी रामदास” में भी कई जगह प्रयत्न किए गए लेकिन कहीं ढंग से बात न बन सकी।
“महीनों किए गए इन प्रयत्नों के बेकार जाने पर माताजी ने साधना के क्षणों में उपयुक्त भूमि को तलाशने के प्रयत्न शुरू किए। एक-दो दिन के प्रयास में ही उन्हें एक भूमि पर प्रकाशपुंज सा उठता दिखा। इसके आध्यात्मिक स्पंदनों को उन्होंने अपनी अंतर्चेतना में अनुभव किया।”
एक दिन गुरुदेव के साथ घूमने जाते समय उन्होंने यह भूमि प्रत्यक्ष में देखी। यह स्थान मथुरा से लगभग एक किलोमीटर दूर मथुरा-वृंदावन मार्ग पर था। उस समय यहां एक कुआं, एक हॉल और एक बरामदा बना था। यह स्थान सड़क के बिल्कुल पास था। उन क्षणों में माताजी ने गुरुदेव से चर्चा की और गुरुदेव कहीं गहरे विचारों में डूब गए। कुछ पलों के बाद अपनी इस तल्लीनता से उबरने पर गुरुदेव ने कहा:
“आप एकदम ठीक कहती हैं। यह जगह पहले कभी महर्षि दुर्वासा की तपोभूमि रही है। अभी भी यहां उनकी तपस्या के प्रभाव शेष हैं। यह भूमि सब तरह से अपने कार्य के लिए उपयुक्त रहेगी।”
कभी बाल्यकाल में गुरुदेव यहां आए भी थे। इसको खरीदने के लिए बातचीत चलाई गई। जिस व्यक्ति की यह भूमि थी, वह व्यक्ति भी आसानी से तैयार हो गया। थोड़े ही दिनों में सारी सरकारी औपचारिकताएं पूरी करते हुए भूमि की रजिस्ट्री हो गई।
भूमि की समस्या का निवारण तो हो गया लेकिन इसी के साथ एक नई समस्या खड़ी हो गई।
भूमि खरीदने के बाद अब गुरुदेव, माताजी के पास बिल्कुल भी पैसे नहीं बचे थे। यद्यपि गुरुदेव को जानने-पहचानने वाले, उनके प्रति आस्था, निष्ठा एवं भक्ति रखने वाले कम नहीं थे फिर भी किसी के आगे याचना करना, अपनी आवश्यकताओं को जग-जाहिर करना, तपोमूर्ति गुरुदेव के तप के नियमों के विरुद्ध था।
अपूर्व अनुदान:
गुरुदेव के एक इशारे भर की देर थी, चरणों में धन की ढेरी लग जाती लेकिन यह बात उनके तपोनिष्ठ जीवन की मर्यादा के विरुद्ध थी । धन की ज़रूरत तो माताजी भी अनुभव कर रही थीं। उन्होंने कुछ सोचा और एक पल की देर लगाए बिना अपने सारे आभूषण और जमा किया रुपया पैसा गुरुदेव के चरणों में रख दिया। बिना कहे, बिना कोई हल्का-सा भी संकेत किए बिना तनिक-सा भी जताए बिना माताजी ने मौन भाव से अपना सब कुछ दे डाला। गुरुदेव ने उन्हें एक बार हल्के से टोका भी, आप ऐसा क्यों करती हैं? कहीं-न-कहीं से धन की कोई व्यवस्था हो ही जाएगी। गुरुदेव की इस बात पर माताजी कुछ भी नहीं बोली, बस उनकी आंखें भर आईं। उन्हें इस तरह देखकर गुरुदेव भी कुछ न बोल सके। बस चुपचाप उनकी निधि स्वीकार कर ली।
गायत्री तपोभूमि के निर्माण एवं गायत्री परिवार के संगठन के लिए माताजी का यह अपूर्व अनुदान था।
यहाँ पर अटैच की गयी मात्र 1 मिंट की शार्ट वीडियो में युगनिर्माण योजना पत्रिका के सम्पादक आदरणीय ईश्वर शरण पांडेय जी इस तथ्य को Certify कर रहे हैं। https://youtu.be/6jYQXwXEafE?si=xZMl52giadYtZnxt
सामान्यतया नारियों का अपने आभूषणों के प्रति अतिरिक्त मोह देखा जाता है। आयु के किसी भी मोड़ पर उनका यह मोह प्रायः कम होने के बजाय बढ़ता ही जाता है। पहले अपने लिए, फिर अपने लिए नहीं तो अपनी किसी बेटी या बहू के लिए वे आभूषणों को बनवाती, गढ़वाती रहती हैं। यह सिलसिला कहीं भी, किसी भी समय थमता नहीं, परंतु माताजी ने नारी प्रकृति की इस सामान्य कमजोरी के उलट जाकर यह अद्भुत कार्य कर दिखाया, वह भी बड़ी ही सहजता से। वे ऐसा इसलिए कर सकीं, क्योंकि उन्होंने इस सत्य को गहराई से जान लिया था कि
वास्तविक श्रृंगार शरीर का नहीं, व्यक्तित्व का होता है और व्यक्तित्व का श्रृंगार सुवर्ण के रत्नजटित आभूषण नहीं, तप और विद्या है। इन्हीं दोनों के सतत अर्जन से व्यक्तित्व अलंकृत होता है और यह अलंकरण भी ऐसा होता है जिसे देखकर भूतल के सामान्य नर-नारी ही नहीं, ऊर्ध्वलोकों के देव-देवी, ऋषि-महर्षि, सिद्धजन भी चमत्कृत रह जाते हैं।
इस सत्य को पहचानने वाली माताजी ने उस दिन केवल अपने आभूषण ही नहीं दिए, बल्कि बहुमूल्य वस्त्रों का भी परित्याग कर दिया और आंतरिक ही नहीं, बाहरी तपस्या के भी सभी आयामों के परिपालन के लिए संकल्पित हो गईं।उन क्षणों में ऐसा लगा, जैसे माता सीता ने वनवासी प्रभु राम के साथ चलने के लिए तपस्विनी वेश धारण कर लिया हो। जिन आंखों ने यह दृश्य निहारा, वे धन्य हो गईं और ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित पाठकगण इन क्षणों में इस दिव्य दृश्य का साक्षात् कर रहे हैं, उन पर भी माता भगवती और प्रभु श्रीराम की अद्भुत कृपा है।
गायत्री तपोभूमि अपना आकार पाने लगी। इसके ऊर्जा केंद्र (Energy centre) के रूप में युगशक्ति माता गायत्री का ठीक वैसा ही मंदिर बना, जैसा कि माताजी ने अपनी ध्यानस्थ स्थिति में अनुभव किया था। युगशक्ति की प्राण प्रतिष्ठा से पूर्व माताजी अपने आराध्य के साथ विशेष साधना में संलग्न रहीं। इस शुभ घड़ी में 2400 तीर्थों की रज एवं 2400 पवित्र स्थानों का जल यहां लाया गया। इसके अतिरिक्त और भी कुछ ऐसी दिव्य क्रियाएं गोपनीय स्तर पर संपन्न की गईं, ताकि माता की चेतना इस महामंदिर में सदा जाग्रत रहे और इस स्थान का अमोघ प्रभाव सभी को दीर्घकाल तक अनुभव होता रहे। मंदिर निर्माण के साथ अन्य गतिविधियों के संचालन की व्यवस्था भी यहां की गई। पवित्र यज्ञशाला में दिव्य अग्नि स्थापित हुई। साधना सत्रों के साथ अनेकों तरह की योजनाएं यहां से संचालित होने लगीं। दूर-दूर से लोगों के आने का सिलसिला चल पड़ा। जो भी यहां आते थे, उन सबका एक साथ सामूहिक परिचय एक ही था, वे सभी माताजी के बच्चे थे। उन सबके मन अपनी माँ के लिए हुलसते थे। उन सभी के प्राणों में अपनी माँ के लिए पुकार थी। माँ के प्यार का, दुलार का, उनके वात्सल्य का चुंबक उन्हें यहां खींच लाता था। माता भी अपने बच्चों को संस्कार देने के लिए प्रयत्नशील थीं। उनका सतत प्रयास यही था कि उनके बच्चों की चेतना उत्तरोत्तर निर्मल, पवित्र एवं परिष्कृत हो। इसके लिए जो भी आवश्यक होता, वह निरंतर किया करतीं।
जय गुरुदेव