वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का 11वां ज्ञानप्रसाद लेख:माँ केवल माँ होती है !!!

गुरुकृपा से महाशक्ति की लोकयात्रा आज 11वें स्टेशन पर आ पंहुची है, स्टेशन की परिभाषा के लिए आदरणीय चंद्रेश जी का धन्यवाद् करते हैं। आज के लेख में ट्रेडिल प्रिंटिंग मशीन, मुस्लिम कार्यकर्ता अब्दुल, गायत्री साधक रामजीवन जी के संस्मरण एवं “धियो यो नः प्रचोदयात” के अर्थ के साथ-साथ बहुत कुछ जानने को मिल रहा है। तपोभूमि मथुरा के सम्बन्ध में वंदनीय माता जी एवं पूज्यवर की अंतरानुभूतियां जिस दिव्यता को प्रकट कर रही हैं उसे कथाकार ( आद सुमनलता जी का दिया गया एक और अलंकार)  ने शब्दों में संजोने का प्रयास तो किया है लेकिन उसके प्रयास की  सफलता का मूल्यांकन सत्संग में भाग ले रहे साधक ही  कर सकते हैं।आइये आज के सत्संग का “जय माँ भगवती” के उद्घोष से करें। चैत्र नवरात्रि के षष्ठम दिवस की माँ कात्यानी के चरणों में नतमस्तक हैं। 

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मार्च 1951 का समय था, बेटे ओमप्रकाश की इंटर की परीक्षाएं चल रही थीं। अंग्रेजी का दूसरा पेपर सेकिंड शिफ्ट में था। वह अपने कमरे में बैठे पढ़ रहे थे, सुबह  7:30 बजे का समय होगा । अब्दुल लतीफ ट्रेडिल प्रिंटिंग मशीन चला रहा था। चंदा नामक माता जी के कोई संबंधी प्रिंटिंग के लिए मैटर कंपोज कर रहे थे। इतने में सतीश (तपोभूमि मथुरा के आज के मृतुन्जय भाई साहिब)  ऊपर से आए और उन्होंने अचानक Accidently अपना हाथ  मशीन  में दे डाला। चंदा बहुत  ज़ोर से चिल्लाए, ”भैया!” ओमप्रकाश भागे-भागे आए। उन्होंने देखा, सतीश चुप हैं, उन्होंने  उठाकर गोद में ले लिया और सिर पर हाथ फेरा। उनको ऐसा लगा कि शायद चोट सिर में लगी है। तभी चंदा ने लगभग सुबकते हुए कहा, “भैया, हाथ! हाथ देखने पर पता चला कि आधी हथेली पलट गई है और उंगलियां लटक रही हैं। इस हृदय विदारक दृश्य को देखकर उन्होंने ताई जी और माता जी  को आवाज़ लगाई। दोनों भागी-भागी आईं, ओमप्रकाश की निक्कर और बनियान दोनों खून से तर हो चुके थे। मथुरा के सिविल सर्जन एस. के. मुखर्जी को दिखाया, उन्होंने सलाह दी कि आगरा ले जाओ। मुखर्जी साहब ने आशंका भी व्यक्त की कि कहीं हाथ काटना ही न पड़ जाए।

इसी बीच परम पूज्य गुरुदेव आ गए। उनके साथ रघुनाथ अग्रवाल, श्यामलाल और कंपाउंडर जगदीश के भाई लक्ष्मण भी थे। दवा-पट्टी की जा चुकी थी, इंजेक्शन भी लग गया था, लेकिन सतीश को बेहोशी आ गई थी। सभी सोच रहे थे कि क्या किया जाए । तभी माता जी  ने डॉ. मुखर्जी से कहा, “डॉ. साहब, आप भगवान पर भरोसा रखकर यहीं जो कुछ कर सकते हों, कीजिए ।” पूज्य गुरुदेव ने भी माता जी  के इस कथन में हामी भरी। ऑपरेशन किया गया। माता जी  धैर्य के साथ ऑपरेशन रूम के बाहर खड़ी रहीं। थोड़ी देर बात ऑपरेशन समाप्त हुआ,  बच्चे को  वार्ड में ले जाया गया। काफी दिनों के बाद स्थिति में सुधार आया। 2019 में जब हम आदरणीय मृत्युंजय भाई साहिब से  मिले थे तो इस घटना के चिन्न साफ़ दिख रहे थे।

आज इस लेख को लिखते समय Treadle printing machine के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई, फिर  क्या था, गूगल महाराज की जय की और बस चल पड़े मिशन पर। 

Treadle शब्द से प्रतीत हो रहा था कि कोई पैरों से सम्बंधित वस्तु होगी। एकदम मस्तिष्क में पुराने ज़माने की पैरों से चलने वाली सिलाई मशीन दिखने लगी, गूगल सर्च से भी ऐसा ही उत्तर मिला, Foot- powered printing machine, मात्र 19 सेकण्ड्स की वीडियो दिखा रही है कि ऑपरेटर कैसे पैरों से चलाकर प्रिंटिंग का कार्य का रही है।   

https://youtube.com/shorts/5bXW4WrpwPg?si=dheaXvtHFYqx7vwd

वीडियो देखकर हम सबका शीश उस गुरुसत्ता के चरणों में श्रद्धा से झुक जाना चाहिए कि वर्षों पहले गुरुदेव ने अखंड ज्योति एवं अन्य पुस्तकों की प्रिंटिंग कैसे की थी, आज इसी कार्य के लिए मथुरा में करोड़ों रुपयों की मशीनें उपलब्ध हैं, हमारे साथिओं ने हमारी ही वीडियो में इन मशीनों का दर्शन भी अवश्य किया होगा। आदरणीय ईश्वर शरण पांडे जी एवं अनिल पाठक जी का इन वीडियोस के लिए धन्यवाद् करते हैं ,   

माता जी  के ममत्व का दायरा जितना विशाल था उससे कहीं अधिक विस्तृत था। विस्तृत का अनुमान उनके इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उनके लिए जितने प्यारे सतीश ( मृत्युंजय) और शैलो थे, उतना ही प्यारा अब्दुल लतीफ भी था। अब्दुल लतीफ नामक यह मुस्लिम युवक अखण्ड ज्योति संस्थान में मशीनमैन था और  पत्रिका की छपाई का काम-काज देखता था। परिवार के सदस्यों के साथ माता जी  इसके खाने की भी व्यवस्था किया करती थीं। बड़े नियम से वह बीच-बीच में चाय-नाश्ते के लिए पूछ लेतीं। उनका यह व्यवहार कभी-कभी आने वाले संबंधियों को अखर जाता। उनमें से कोई-कोई तो कह भी देता,

संबंधियों की इस बात के उत्तर में माता जी  कहतीं: 

माँ की  ये बातें किसी को समझ में नहीं आतीं। काफी-कुछ समझाने के बावजूद संबंधियों के आग्रह यथावत बने रहे। वे अपनी रूढ़िवादी-पुरातन मान्यताओं को जब-तब माँ पर थोपने की कोशिश करते ही रहते। संबंधियों के इस बढ़ते आग्रह पर एक दिन उनके यहां काम करने वाली ‘ए जू’ ने भी माता जी  को  समझाया। ‘ए जू’ ने कहा, आखिर आप इन सबकी बात मान क्यों नहीं लेतीं? वे सब ठीक ही तो कहते हैं । कुछ भी हो, है तो वह मुसलमान ही न। उसके लिए अलग बर्तन  रखने  में बुराई ही क्या है? ‘ए जू’ की इन बातों ने माता जी  को व्यथित कर दिया। वे उठकर दूसरे कमरे में गईं, जहां अभी तक अब्दुल लतीफ के जूठे बरतन रखे थे। उन्होंने उन बरतनों को अपने हाथों से उठाया और बरतन माँजने वाली जगह पर ले आईं। ‘ए जू’ अभी कुछ और सोच-समझ पाती, इसके पहले ही माता जी  बोलीं: 

उनकी इन बातों को सुनकर ‘ए जू’ हतप्रभ रह गई। थोड़ी देर तक तो उसे समझ ही न आया कि वह क्या बोले। जब तक वह कुछ बोलती, तब तक तो माता जी  ने अब्दुल लतीफ के जूठे बरतन अपने हाथों से माँज  डाले। 

‘ए जू’ को ऐसे लगा जैसे माता जी कोई साधारण मानव नहीं, देवी हों! थोड़े दिनों के बाद पता नहीं किस तरह इस बात का पता अब्दुल लतीफ को भी लगा, सुनकर उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने आंसुओं से छलकती आंखों के साथ हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा,

हाथ जोड़े ,भाव-विह्वल स्वर में वह कितना कुछ ही कहता रहा। जब माता जी वहां से चली गईं, तो उसने उस जगह की धूल को अपने  माथे पर धारण किया  और दंडवत प्रणाम किया।

मातृत्व के इस अनंत विस्तार का परिचय कभी-कभार  विलक्षण क्षणों में माता जी  स्वयं भी दे देती थीं। एक बार एक प्रखर गायत्री साधक रामजीवन अखण्ड ज्योति संस्थान आए। पिछले कुछ वर्षों से वह कई कठोर व्रतों का पालन करते हुए गायत्री अनुष्ठान कर रहे थे। अखण्ड ज्योति संस्थान आने पर उन्हें माता जी  के चौके में परोसा हुआ भोजन खाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भोजन करते समय माता जी  की एक झलक पाकर वह अपनी किन्हीं अनुभूतियों में डूब गए। अचानक न जाने क्यों उनके मुख से निकला:

इस प्रश्न के उत्तर में माता जी  बोलीं, 

माता जी  के इन वचनों को सुनकर गायत्री के प्रखर साधक रामजीवन को लगा, जैसे कि आज वह गायत्री के तत्त्व और सत्य का साक्षात्कार कर रहे हैं। गायत्री माता ठीक उनके सामने खड़ी हैं। 

शायद पाठकों को ज्ञात होगा कि गायत्री तपोभूमि का निर्माण माता जी के अंतःकरण में अंकुरित हुई गायत्री तपोभूमि के निर्माण की प्रेरणा से ही हुआ था। उन्होंने भावदशा में क्या देखा था उसका अवलोकन तो आज कर लेते हैं लेकिन इस दिव्य एवं महत्वपूर्ण  विषय का शुभारम्भ कल ही होना उचित रहेगा। इस विषय पर, इसी मंच से पहले भी बहुत लिखा जा चुका है लेकिन स्मरण कहाँ रहता है, दोहराने में कोई हर्ज़ नहीं है :   

एक दिन प्रातः ध्यान की भावदशा में वंदनीय माता जी ने देखा कि “जगन्माता”  युगशक्ति गायत्री के रूप में एक मंदिर में विद्यमान हैं। अनेकों परिजन माता की पूजन-अर्चना कर रहे हैं और माता से प्रज्ञा, मेधा व सद्बुद्धि के साथ अपने कष्ट- कठिनाइयों से मुक्ति का वरदान पा रहे हैं। जगदंबा के इस मंदिर की एक और विशेष बात माता जी  ने अपने ध्यान में अनुभव की। उन्होंने देखा कि यह मंदिर सामान्य मंदिरों की तरह केवल पूजा-अर्चना भर का स्थान ही नहीं है बल्कि यहां से लोकहित की अनेकों गतिविधियों का संचालन हो रहा है। सद्ज्ञान की अगणित धाराएं यहीं  से “धियो यो नः प्रचोदयात्” का संदेश प्रसारित करती हुई संसार भर में व्याप्त हो रही हैं। 

हमारे पाठकों में से बहुतों को पता ही होगा फिर भी आइए संस्कृत के इन तीन शब्दों का अर्थ फिर से समझ लें। 

इसी सन्दर्भ में गुरुदेव के संरक्षण में पल रहे मूसरी इंटरनेशनल स्कूल के Emblem में अंकित धियो यो नः प्रचोदयात के दर्शन के लिए एक स्लाइड अटैच की है।  

माता जी ने देखा कि यहीं  से भगवान महाकाल अपनी युग-प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का सूत्रपात कर रहे हैं। इस अद्भुत अनुभूति में डूबी हुई माता जी उस दिन साधना से थोड़ी देर बाद उठीं। साधना से उठने पर अपने नित्य-नियम के अनुरूप उन्होंने घर और अखण्ड ज्योति कार्यालय के ज़रूरी काम निबटाए। इसके बाद  परिजनों के आए हुए पत्रों को पढ़ने और उनके उत्तर लिखने का क्रम आया। यह काम परमपूज्य गुरुदेव एवं माताजी मिलकर किया करते थे। इसी बीच कुछ बातें भी हो जाती थीं । उस दिन पत्रों को खोलते हुए माता जी ने अपनी अंतरानुभूति गुरुदेव के सामने खोली।

हम समझ सकते  हैं कि हमारे समर्पित साथिओं को गुरुदेव की अंतरानुभूति जानने की उत्सुकता अवश्य ही हो रही होगी लेकिन इसके लिए कल तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, इतने दिव्य एवं महत्वपूर्ण विषय का  चलते-चलते वर्णन करना कहाँ तक उचित है? आदरणीय चिन्मय जी अपने उद्बोधनों में अनेकों बार कह चुके हैं: बड़े कार्यों के लिए, बड़ी तैयारी करनी होती है, तो आइये गायत्री तपोभूमि पर आधारित इस लेख का स्वागत करें। 

जय गुरुदेव, धन्यवाद्      


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