वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का 9वां ज्ञानप्रसाद लेख: वंदनीय माता जी के विवाह में वर पक्ष के महत्वपूर्ण संस्मरण 

आज के लेख में वंदनीय माता जी के विवाह की चर्चा में वर पक्ष से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण संस्मरण प्रस्तुत किये गए हैं। परम पूज्य गुरुदेव की पहली पत्नी सरस्वती देवी, तीन बच्चों को छोड़ कर स्वर्ग सिधार गयी थी। गुरुदेव की माता जी, जिन्हें ताई जी के नाम से जाना जाता है, उन्होंने देवर रामप्रसाद की सहायता से किस प्रकार बेटे को मनाकर पुनर्विवाह संम्पन्न कराया, आज के लेख का मुख्य आकर्षण है। ताई जी को समर्पित,  आंवलखेड़ा का माता दान कुंवरि कॉलेज से भला ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का कौन सदस्य अपिरिचित है। अगर कोई है भी तो इस सन्दर्भ में हमारे यूट्यूब चैनल पर अपलोड वीडियोस देख सकता है। 

आज के लेख का दूसरा आकर्षण वंदनीय माता जी के विवाह की अलग-अलग तिथियां हैं, इसके बारे में हमारी सफलता/असफलता की चर्चा भी की गयी है। आशा है साथिओं के कमेंटस इस असफलता में हमारा सहयोग करेंगें। 

तो आइए गुरुचरणों में समर्पित होकर,आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें, गुरुज्ञान से, गुरुवाणी से अपने जीवन को ऊर्जावान करें, विश्वभर की नकारात्मक शक्तियों का सर्वनाश  करें, निम्नलिखित शांतिपाठ को गुनगुना कर:

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

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गुरुदेव की पहली पत्नी सरस्वती देवी का TB के कारण देहांत हो गया। उनके तीन बच्चे:एक बेटा, दो बेटीआं ओमप्रकाश,दया और श्रद्धा थे। वैसे तो गुरुदेव को पारिवारिक दुनिया से कोई ज़्यादा  लगाव नहीं था लेकिन फिर भी पत्नी के निधन के बाद वह उदास रहने लगे। अंतिम संस्कार के उपरांत ताई (गुरुदेव की माता जी ) ने इस स्थिति को भांप लिया। लेखन, साधना, अखंड दीप, स्वतंत्रता संग्राम इत्यादि सारे कार्य यथावत नियमित चल रहे थे परन्तु उदासी इतनी थी कि हँसना और बोलना जैसे बंद ही कर दिया हो। पहले जब लोगों से मिलते थे तो कभी कभार हास्य विनोद कर लेते, परिजन भी हँसते और यह हँसियां कई बार रोगियों के चेहरों से उदासी दूर करने में सहायक होती।

ताई  ने देखा बहू के न रहने से श्रीराम उदास रहते है। कई मुँह बोले  लोगों ने भी ताई  से यह बात कही थी। ताई ने यह परिवर्तन बहुत बारीकी से देखा। तीनों  बच्चे दादी माँ के साथ ही सोते थे। पिता से घुल मिल नहीं पा रहे थे। एक तो शुरू में पिता जी का सानिध्य न मिला और अब माँ के चले जाने ने उन्हें उम्र से बड़ा बना दिया था। बच्चे पिता जी को व्यस्त देखते तो घर का काम कर देते। जब कभी ताई इधर-उधर होतीं तो  बच्चे पिता जी तथा ताई  के कपड़े  धो देते। ओमप्रकाश ने एक बार पिताजी को कपड़े  धोते देखा तो कहने लगा, “लाइए पिता जी, मैं धो देता हूँ” श्रीराम ने कहा, “नहीं बेटा तू अपनी पढाई पूरी कर ले।”  पिता की बात सुन कर ओमप्रकाश बोले,”नहीं पिता जी आप थक गए होंगे, मैं झटपट निपटा लेता हूँ ” ओमप्रकाश उस वक़्त 10-12 वर्ष के होंगें, श्रीराम ने हर बार समझाया लेकिन पितृभक्ति आड़े आ रही थी। श्रीराम ने कहा, “तुम्हारे हाथ बहुत छोटे हैं थक जायेंगें।” ओमप्रकाश फिर भी ज़िद करते रहे और फिर पिताजी ने डाँट  दिया। बेटा रोता हुआ दादी के पास चला गया। दादी ने समझा बुझा कर चुप करा दिया।

एक दिन की बात है,रात के 10:30 बजे थे, श्रीराम अपने कमरे में जाग रहे थे। ताई ने देखा तो आकर पूछा, “कि तुम तो 8-9 बजे सो जाते हो, सुबह जल्दी जो उठते हो,आज क्या बात है।” बिना कोई भूमिका बनाये ताई ने पूछा:

गुरुदेव  चुपचाप सुने जा रहे थे, ताई ने जीवन की कठिनाइयों को बताते हुए श्रीराम को एक ही स्वर में कह दिया:

श्रीराम ताई की चतुराई पर हँसे। अगर कहती कि मैं तुम्हारे दूसरे विवाह की बात कर रही हूँ तो शायद मना कर देते लेकिन उन्होंने फिर भी कुछ ऐसा ही कहा :

इतना कहना ही था कि ताई फट पड़ी, कहने लगी:

ताई  ने इतने उलाहने दिए कि श्रीराम बीच में ही रोककर बोले:

ताई ने कहा:

इतने सारे उलाहने से न कुछ स्वीकारते, न टालते बना। श्रीराम तो अपने जीवन की रूपरेखा निर्धारित कर चुके थे। “महापुरश्चरण साधना” पूरी  होते ही अपनी मार्गदर्शक सत्ता के प्रतक्ष्य सानिध्य में चले जाना है। लोकरंजन के लिए जो कुछ करना है इसी अवधि में Plan  किया हुआ है।

ताई इतनी बात से संतुष्ट न हुई, आखिर माँ थी, श्रीराम की यह दशा कैसे चुपचाप देखती रहती। गुरुदेव  को पूछे बिना ही ताई ने आँवलखेड़ा  गांव में अपने देवर रामप्रसाद शर्मा के पास तुरँत संदेशा भिजवाया। श्रीराम को इस बात का पता तब ही लगा जब चाचा तीसरे ही दिन मथुरा आ गए। उन दिनों श्रीराम मथुरा के कोतवाली क्षेत्र, चूना कंकर मोहल्ला में रहते थे। यह मोहल्ला 2025 में Sattelite tower को आग लगने के कारण समाचार पत्रों की सुर्खियां बना था। रामप्रसाद जी ने आते ही ताई को बताया कि उनके बेटे जगन्नाथ का विवाह वैशाख में निश्चित हुआ है लेकिन  आपकी देवरानी नहीं चाहती कि बड़े भाई का घर बसने से पहले छोटे का रिश्ता किया जाये। आप चिंता न करें जल्दी ही आपके घर में भी चूड़िआं खनकेंगीं। चाचा ने अपना हक़ जताते हुए श्रीराम से कोई भी परामर्श नहीं माँगा। कहने लगे: ताई को तंग मत करना अगर काम करने में कोई दुविधा आ रही हो तो कोई नौकर रख लेना। श्रीराम इस स्थिति को भांप रहे थे लेकिन  कोई समाधान नहीं मिल रहा था। फिर अंतर्मन से यही आवाज़ आई कि

योगक्षेम दो शब्दों से बना है: योग (जो प्राप्त नहीं है उसे प्राप्त करना) और क्षेम (जो प्राप्त है उसकी रक्षा करना)। इसका सामान्य अर्थ कुशल-मंगल या भरण-पोषण है। 

कुछ दिन के बाद रामप्रसाद फिर आए, देहरी में पांव रखते ही कहने लगे, भाभी, श्रीराम के लिए बहू मिल गयी है। बहुत ही सुशील कन्या है। खेलने कूदने में उसका मन कम ही लगता है, चिड़ियों को दाना चुगाने, गाय-बकरी-कुत्ते आदि चौपायों को चारा, रोटी खिलाने, घर आने वालों की सेवा करने में ही मन लगता है। घर परिवार की सब छानबीन कर ली है। आगरा के सांवरिया बोहरे के जसवंत राय बोहरे परिवार में जन्मी भगवती देवी रंगरूप में सांवली और दुबली पतली है। अपने पिता की चौथी संतान है और भजन पूजन में ही ज़्यादा समय बिताती है। चार-पांच वर्ष के होते ही शिव की आराधना आरम्भ कर दी थी। बिना सिखाये ही पंचाक्षरी मन्त्र (ॐ नमः शिवाय ) का जाप करना शुरू कर दिया था, पालथी मार कर मकान के ही एक हिस्से में बैठकर ॐ नमः शिवाय पढने लगी। कुछ दिन बाद पूर्व से सूर्य की लालिमा को देख कर सविता को जल अर्पण करने लगी।

पाठकों को बताना उचित समझते हैं कि वंदनीय माता जी के बाल्यकाल के बारे में अभी-अभी इसी मंच से विस्तृत लेख प्रकाशित हुआ है, रिपीट करने का कोई औचित्य नहीं लग रहा। 

रामप्रसाद देवर से वन्दनीय माता जी की श्रद्धा, भक्ति और अतिथि सत्कार देख कर ताई ने बिना कोई पूछताछ किये रिश्ते को हाँ कह दी। पिता जसवंत राय जी एक बार आकर कुंडली देख कर रिश्ता पक्का कर गए, उन्होंने श्रीराम के बारे कोई जाँच नहीं की। कुंडलियां इतनी अच्छी मिलीं कि शिव पार्वती की जोड़ी की संज्ञा दी जा सकती है।

सम्बन्ध तय हो गया और 10 मार्च 1946 सोमवार वाला दिन विवाह के लिए निश्चित हुआ। विकर्मी कैलेण्डर के अनुसार फाल्गुन मास की सप्तमी इसी दिन को थी। 

सम्बन्ध तय होने के दौरान यह भी निश्चित हुआ कि “लाली”, वंदनीय माता जी के साथ उनकी आत्मीय सगी श्यामा गाय भी आएगी। कन्याधन और गोधन दोनों को एक साथ विदा किया जायेगा और विवाह बिल्कुल सादगी और बिना शोरशराबे के ही सम्पन्न किया जायेगा। विवाह में श्रीराम ने एक खादी की धोती और कुर्ते का कपड़ा ही स्वीकार किया। बारात में ताई के अलावा केवल चार लोग ही गए थे। एक पारिवारिक उत्सव की तरह विवाह सम्पन्न हुआ। वधु के मथुरा आने पर गायत्री यज्ञ का आयोजन किया गया। श्रीराम के मित्र और परिचित इसमें ही इक्कठे हुए। वधु ने आते ही घर का वातावरण आत्मसात कर लिया था।

अपने समर्पित साथिओं से करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं कि कल वाले लेख में 10वें चैप्टर की बात हुई थी लेकिन आज के कंटेंट के  बिना गुरुदेव-वंदनीय माता जी के विवाह का विवरण कुछ अधूरा सा लग रहा था। वंदनीय माता जी के मायके से विवाह की बातचीत का विवरण तो मिल गया था, गुरुदेव की तरफ से जानने की भी जिज्ञासा थी।    

जय गुरुदेव, धन्यवाद्


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