वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का 8वां ज्ञानप्रसाद लेख: अखंड ज्योति संस्थान पर एक संक्षिप्त विवरण

चैत्र नवरात्रि  के प्रथम दिवस पर प्रस्तुत आज का ज्ञानप्रसाद लेख एक अद्भुत दिव्य साधना स्थली का दर्शन करा रहा है। जो कोई भी इस लेख का अमृतपान करेगा सच में धन्य हो जायेगा। चेतना की शिखर यात्रा 1, चैप्टर 20 एवं अनेकों Online sources से संकलित किए आज के लेख का समापन हमारी ही एक वीडियो से हो रहा है जिसे हमारे साथी पहले भी देख चुके हैं। 

उचित रहेगा कि गुरुचरणों में समर्पित होकर,सभी परिवारजन आज के सत्संग में डूब जाएँ, लेख से प्राप्त हुई ऊर्जा का अनुभव करें :

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परम पूज्य गुरुदेव के  कार्यक्षेत्र का विस्तार हो रहा था, अखंड ज्योति पाठकों की संख्या बढ़ रही थी, वर्तमान आवास कम  पड़ने लगा तो बड़े आवास की खोज आरम्भ हुई। 3-4 मकान देखे, परिस्थितियों के अनुरूप घीआ मंडी स्थित “अखण्ड ज्योति संस्थान” वाली बिल्डिंग  को किराये पर ले लिया। इन पंक्तियों के लिखने समय 2026 में इस बिल्डिंग की Renovation हो रही है। वंदनीय माता जी, ताई जी, बच्चों व अपने आराध्य के साथ यहाँ आकर वास करने लगीं। सड़क के किनारे बनी इस दोमंजली बिल्डिंग में 9 कमरे थे। Renovation  से पहले तक  “अखंड ज्योति ग्लोबल कार्यालय” इसी बिल्डिंग में था लेकिन अब सारा ऑपरेशन, मथुरा-वृन्दावन रोड जयसिंहपुरा स्थित अस्थाई कार्यालय से हो रहा है। 

यही वह “महिमामय स्थल” है जिसे लगभग 30 वर्ष (1942 से 1971) तक परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी की जीवन साधना का सतत सान्निध्य प्राप्त हुआ । मासिक अखण्ड ज्योति का प्रकाशन आगरा से प्रारंभ हुआ और इस स्थान पर पहुँचकर पनपता चला गया । हाथ से बने कागज पर छोटी  ट्रेडिल मशीन द्वारा यहीं पर अखण्ड ज्योति पत्रिका छापी जाती थी। ट्रेडिल मशीन एक तरह की छोटी प्रिंटिंग मशीन होती है।  

अखंड ज्योति संस्थान से ही  “देव परिवार” के गठन का शुभारंभ हुआ। व्यक्तिगत पत्रों द्वारा जन-जन की अंतरात्मा  को स्पर्श करते हुए एक महान स्थापना का बीजारोपन संभव हो सका। अगणित दुःखी, तनावग्रस्त व्यक्तियों ने नये प्राण, नई ऊर्जा पायी । परम वंदनीय माताजी के हाथों के  भोजन-प्रसाद की याद आते ही आध्यात्मिक तृप्ति मिलती है। इतने छोटे से स्थान में ही 30 वर्षों तक गुरुवर की प्रचण्ड साधना चली। 24-24  लाख के चौबीस महापुरश्चरणों का अधिकांश भाग यहीं पर हुआ । 

किराये का कॉन्ट्रैक्ट  तय होते ही पहली मंजिल पर अखंड दीपक और गायत्री के विग्रह की प्रतिष्ठा हुई। शुभारंभ के दिन लगभग 40 व्यक्ति गृह प्रवेश संस्कार आयोजन में आये। 

पास-पड़ोस के लोगों ने जब मकान लेने की  तैयारी देखी तो उन्होंने गुरुदेव को बताया कि इस बिल्डिंग में तो प्रेतात्माएं रहती हैं । वे लोग अपने हिसाब से सत्परामर्श ही दे रहे थे। गुरुदेव  ने उनकी बात सुनी और कहा कि प्रेतात्माएँ रहती है तो रहें। हमें उनसे कोई असुविधा नहीं होगी। हम उनसे बातचीत कर लेंगें,उन्हें समझा लेंगे। सुनने वालों को लगा कि गुरुदेव  उनके परामर्श का मज़ाक  कर रहे है लेकिन असल में  बात ऐसी नहीं थी। गुरुदेव ने अपनी बात को स्पष्ट किया और कहा:

परामर्श देने वाले सज्जन को अन्यथा न लगे, इसलिए उन्होंने अतीत में हुए माधवाचार्य का एक प्रसंग भी सुनाया। 

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ “माधव निदान” के निर्माता माधवाचार्य जी वृन्दावन में कठोर गायत्री उपासना करने में संलग्न रहते थे। लगातार 13 वर्ष उन्हें विधिपूर्वक पुरशरण करते हुए बीत गये लेकिन  उन्हें अपने में  कोई विशेषता दिखाई न पड़ी। तप का कोई फल दृष्टिगोचर न हुआ तो वे खिन्न रहने लगे और अपनी असफलता से खीज कर वे वृन्दावन छोड़ काशी चल दिये। उदासी उन्हें घेरे हुई थी। मणिकर्णिका घाट (जहाँ हर समय अंतेष्टीय होती रहती है) पर बैठे हुए सोच विचार में मग्न थे कि उसी श्मशान में रहने वाला एक कापालिक अघोरी बाबा उनके पास आया और उदासी एवं चिन्ता का कारण पूछने लगा। माधवाचार्य ने वस्तुस्थिति कह सुनाई। अघोरी ने कहा: योग की वैदिक उपासनाएं देर में फल देती हैं। बरगद की तरह वे भी  धीरे-धीरे बढ़ती हैं , समय आने पर ही  परिपक्व  होकर साधक का कल्याण करती हैं और चिरस्थायी फल देती हैं। इसमें धैर्यवान साधक ही सफल होते हैं लेकिन तांत्रिक साधना में यह बात नहीं है। उससे लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन ही है लेकिन  मिलता जल्दी है। जिन्हें धैर्य नहीं, उन आतुर लोगों के लिए, जल्दी लाभ दिखाने वाली तांत्रिक साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधना  करो। विधि मैं बता दूंगा।

माधवाचार्य सहमत हो गये और वे काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित श्मशान में रहकर बाबा  की बताई हुई अघोर क्रिया के अनुसार श्मशान साधना करने लगे। अघोरी ने उन्हें बता दिया था कि श्मशान में रहने वाली दुष्ट आत्मा उन्हें भय एवं प्रलोभन के दृश्य दिखा कर साधना भ्रष्ट करने का प्रयत्न करेंगी, सो वे किसी की ओर ध्यान न देते हुए अपने कार्य में एकनिष्ठ भाव से लगे रहें। माधवाचार्य वही करने लगे। रोज ही उन्हें डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते पर वे उनसे तनिक भी विचलित न होते। इस प्रकार उन्हें एक वर्ष बीत गया। एक दिन पीछे अदृश्य में से आवाज आई कि तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया, वरदान माँगों। माधवाचार्य अपनी साधना  में मग्न रहे,उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। ऐसे ही अटपटे अनुभव उन्हें रोज़ होते थे लेकिन  जब कई बार वही आवाज़  सुनाई दी तो उन्हें ध्यान देना पड़ा। माधवाचार्य जी ने पूछा, “आप कौन हैं? किस प्रकार का उपहार दे सकते हैं?” तो  उत्तर मिला: हम भैरव हैं, तुम्हारी इस साधना से प्रसन्न होकर वर देने आये हैं। माधवाचार्य ने कहा, “विश्वास नहीं होता, इसलिए कृपा कर सामने आइए  और दर्शन दीजिए ताकि मैं वस्तु स्थिति को समझ सकूँ। भैरव ने कहा: गायत्री उपासना के कारण आपको इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि मैं उसकी प्रखरता सहन नहीं कर सकता और आपके सामने नहीं आ सकता। जो कहूँगा पीछे से ही कहूँगा। इस पर माधवाचार्य को भारी आश्चर्य हुआ और उन्होंने  प्रश्न किया:

भैरव ने जिज्ञासा का समाधान करना स्वीकार कर लिया और माधवाचार्य को नेत्र बंद करके ध्यान भूमिका में जाने को कहा।  उन्हें तत्काल ही पूर्व जन्मों के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। पिछले 13 जन्मों में उन्होंने  एक से एक भयंकर पाप किये थे। इस दृश्य को जब वे देख चुके तब भैरव ने  कहा: 

माधवाचार्य प्रसन्न मन से वृन्दावन लौट आये। उन्होंने पुनः गायत्री उपासना आरंभ की और फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ।

माधवाचार्य जी  प्रसंग सुनाने का उद्देश्य पड़ोसियों की चिंता का निवारण कराना था। मकान में नहीं जाने की सलाह देने वालों को फिर भी संतोष नहीं हुआ। एकाध ने कह भी दिया कि आप भी इस मकान में अधिक  दिन नहीं रह पाओगे  लोगों के परामर्श या चेतावनी को गुरुदेव ने सहज भाव से लिया।

दो तीन दिन बाद लगा कि छत पर कुछ धमाचौकड़ी मची हुई है। रात के वक्त लोगों के भागने की आवाजें सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे बहुत से लोग चहलकदमी कर रहे हों या कबड्डी  खेल रहे हों गुरुदेव  एक लालटेन और डंडा लेकर ऊपर गये। जाकर देखा तो वहां कोई नहीं था। आसपास की छतों पर नजर दौड़ाकर वापस चले आये। कुछ देर बाद फिर वही धमाचौकड़ी मचने लगी। ताई जी ने कहा, श्रीराम अच्छा होता अगर लोगों की सीख मानकर हम यहाँ नहीं आते। वे दुष्ट आत्माएँ ही ऊधम मचा रही हैं, अब हमें नया घर ढूंढ़ना चाहिए। ताईजी की बात पूरी होते तक ऊपर फिर से शोरगुल की आवाजें आने लगीं। अपनी जीत की खुशी में जैसे बहुत से लोग चीखने चिल्लाने लगे हों। 

गुरुदेव ने कहा: 

ताई जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे चुप रहीं। ऊपर रह-रह कर शोरगुल मच रहा था। गुरुदेव  यह कहते हुए उठे कि मुझे अब ऊपर ही डेरा लगाना पड़ेगा। देखें तो सही किन लोगों को हम सबसे नाराज़गी  है। लालटेन और डंडा लेकर वे पिछली बार की तरह फिर ऊपर गये। दरवाज़े  से उन्होंने बुलंद आवाज में कहा, “देखिए आप लोग जो भी कोई हों, हमें आपका कोई डर नहीं है। आप लोग यहाँ रहना चाहते हैं, खुशी से रहिए। उपद्रव मत मचाइए। हम आपको तंग नहीं करेंगे लेकिन आपका उपद्रव भी नहीं सहेंगे।” जब किसी भी दिशा से कोई उत्तर नहीं आया तो गुरुदेव आसन बिछाकर छत पर ही  बैठ गए। चारों तरफ सन्नाटा छाया रहा। एक बार हल्की  सी पदचाप सुनाई दी, जैसे कोई धीमे-धीमे चलता आ रहा हो। गुरुदेव  ने उस दिशा में देखा तो कोई दिखाई नहीं दिया लेकिन पदचाप फिर भी सुनाई दे रही थी। गुरुदेव  टकटकी लगा कर उसी दिशा में देख रहे थे। आहट पास तक आती अनुभव हुई फिर लगा कि जैसे आने वाले ने अपना इरादा बदल दिया। आहट दूर जाती हुई अनुभव हुई। ऐसा लगा कि आने वाला वापस लौट गया था। गुरुदेव  पहले की तरह चुपचाप बैठे रहे। 10-15  मिनट बाद नीचे के कमरे से ताई जी की आवाज आई, वे बुला रहीं थीं। गुरुदेव  यह कहते हुए उठे कि 

इतना कहकर गुरुदेव नीचे चले गए। उस दिन के बाद से छत पर दोबारा कभी धमाचौकड़ी नहीं हुई। 

अगली पूर्णिमा को गुरुदेव ने उन आत्माओं की शांति के लिए छत पर ही एक यज्ञ किया। पास पड़ोस के लोगों को देखकर आश्चर्य हो रहा था कि गुरुदेव अपने परिवार सहित यहीं बसे हुए थे।

अखंड ज्योति संस्थान की चर्चा का समापन यहीं पर होता है। नीचे  दिए गए यूट्यूब लिंक को भी अवश्य देख लें, सही मायनों में एक दिव्य  तीर्थस्थल का अनुभव  होगा।

परम वंदनीय माता जी केवल परिवार की ही नहीं बल्कि सभी की माता थीं/हैं , कल वाले लेख में दिव्य पुस्तक के 10वें चैप्टर में यह सब जानने का प्रयास होगा। 

जय गुरुदेव, धन्यवाद्  


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