वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का 6वां ज्ञानप्रसाद लेख

March 15,2026

11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन्स (विश्व धर्म संसद) में स्वामी विवेकानंद ने ऐतिहासिक भाषण दिया था। उन्होंने कहा था कि जिस प्रकार विभिन्न नदियां अलग-अलग रास्तों से निकलकर अंत में समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही मनुष्य भिन्न-भिन्न मार्गों से उसी ईश्वर की ओर जाते हैं। 

इसी सिद्धांत के साथ आज का ज्ञानप्रसाद आरम्भ हो रहा है। आद बहिन पुष्पा सिंह जी ने हमें वर्तमान लेख श्रृंखला से सम्बंधित दो ऑडियो बुक्स भेजीं। परिवार की गतिविधिओं में भागीदारी के लिए बहिन जी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। शांतिकुंज ने “मातृशक्ति की लोकयात्रा” पुस्तक के लगभग प्रत्येक चैप्टर पर एक ऑडियोबुक अपलोड की हुई है, इस तरह जिस कंटेंट का  ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर विस्तृत लेखों द्वारा अमृतपान किया जा रहा है उसी तरह शांतिकुंज के यूट्यूब चैनल पर 30 ऑडियोबुक्स उपलब्ध हैं। 118 Scanned पन्नों की पीडीऍफ़ बुक में 34 चैप्टर हैं जिसके स्क्रीनशॉट आज के लेख के साथ संलग्न किये हैं। Text कॉपी में इतने अधिक  पन्नें  नहीं हैं। कहने का अर्थ यही है कि चाहे साथिओं के पास हार्ड कॉपी है, ऑनलाइन उपलब्ध सॉफ्ट कॉपी है, ऑडियो बुक्स हैं यां  ज्ञानप्रसाद लेख हैं सभी के अमृतपान का उद्देश्य केवल एक ही है:

इस त्रिवेणी शताब्दी वर्ष में वंदनीय माता जी के चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने, उनकी शक्ति को समझना। हम जैसों ने,जिन्हें वंदनीय माता जी के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है,कभी  उनकी शक्ति की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास ही नहीं किया था। उपरोक्त सभी साधनों से ज्ञानप्राप्त करने में ज्ञानप्रसाद लेख एक यूनिक ही स्थान प्राप्त  किये हुए हैं जिसके कारण इस प्रक्रिया को सत्संग का टाइटल देकर सम्मानित किया गया है। इतना ही नहीं इस सत्संग में समयदान देकर,इसे अधिक से अधिक समझकर,अंतर्मन में उतारकर लाभान्वित होने को प्रेरित किया जाता है। 

शनिवार वाले स्पेशल सेगमेंट में तो हमारी बड़ी बहिन आदरणीय रेणु श्रीवास्तव ने न केवल समयदान  की बात की बल्कि इसे अपना ही परिवार समझने के लिए कहा, तभी तो इस उपवन की सुगंध विश्व के कोने-कोने तक पंहुच रही है। 

आज का ज्ञानप्रसाद फिर से इतना लम्बा (11 पन्नें, 3100 के लगभग शब्द) और रोचक है कि इसे प्रस्तुत करने के लिए गूगल ड्राइव लिंक के इलावा अन्य कोई उचित विकल्प है ही नहीं। आज इस ज्ञानप्रसाद में Scanned कॉपी के समाहित तीन चैप्टर्स इतने रोचक हैं  कि  एक बार पढ़ना शुरू कर दिया तो पाठक शायद ही छोड़ पायेंगें।        

“महाशक्ति की लोकयात्रा” दिव्य पुस्तक के पृष्ठ 22-23 पर चैप्टर 7 जिसका शीर्षक  “ध्यान की गहनता में दिखाई दिया अतीत”, निम्नलिखित विवरण पढ़कर परम वंदनीय माता जी के विशाल व्यक्तित्व का ज्ञान मिलता है। ओछे लोग तो अपनी छोटी सी प्राप्ति के विज्ञापन के लिए क्या कुछ नहीं करते लेकिन इस जगत जननी माँ ने जब निम्नलिखित शब्द लिखे तो स्वत: ही हमारा शीश माँ के चरणों में झुक गया:

वंदनीय माता जी ने  ध्यान की गहनता में अपने साधनामय अतीत की झलकियां देखीं। गंगा की लहरों एवं मंदिर की घंटियों की गूंज के साथ जो सीन  उभरे, पहले वे अस्पष्ट थे लेकिन  बाद में धीरे-धीरे स्पष्ट दिखने लगे। उन्होंने अपनेआप  को दक्षिणेश्वर मंदिर में रामकृष्ण परमहंस के साथ पाया। उन्हें ऐसा लगा जैसे वह  परमहंस देव के साथ, उनके भक्तों व शिष्यों के साथ घिरी हैं। सभी उन्हें मां,माँ कहते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम प्रणिपात कर रहे हैं। इस अद्भुत दृश्यावली में वह कितनी देर खोई रहीं, कुछ पता ही न चला। तभी अचानक उनकी ध्यानस्थ चेतना में सीन बदला तो गंगा की लहरों और मंदिर की घंटियों की गूंज सुनाई दी । ऐसा लगा जैसे वह बनारस नगर  में कहीं पर हैं। संत कबीर के ताने-बाने के साथ उनके जीवन का ताना बुना हुआ है। वह अक्खड़–फक्कड़ कबीर के साथ हैं। अनेकों सामान्यजन उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी झोपड़ी के पास सच्चे योगी, गरीब, अनपढ़ सब एक साथ संत कबीर से ज्ञान पाने के लिए आए हैं। ध्यान की गहनता में उभरते इन दृश्यों को वह निहारती रहीं। इस कालशून्यता में काल-बोध का कोई प्रश्न ही न था लेकिन सीन यहाँ पर भी बदलते रहे।  चित् शक्ति का लीला-विलास यहां भी सक्रिय था। ध्यान की इस भावभूमि में उन्हें प्रत्यक्ष दिखाई दिया कि जो कबीर थे, वही श्रीरामकृष्ण परमहंस थे  और वही अब वह महायोगी हैं, जो उन्हें वर्षों से दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं के साथ उनके अपने भविष्य की डोर बंधी है। उन्हें विश्वास हो गया कि बीते दो जन्मों का सुपरिचित सान्निध्य उन्हें इस जीवन में भी मिलने वाला है। संत कबीर की लीला सहचरी  “लोई”  और श्रीरामकृष्ण परमहंस की लीला संगिनी रहीं  “माँ शारदा”  वही हैं। जिस आत्म-चेतना ने लोई के रूप में जन्म लिया, जिसने माँ शारदा के रूप में जीवन जिया, उसी ने अब “भगवती यानि हम सबकी माँ) का नाम रूप स्वीकार करके देह धारण की है।

कई वर्षों की तीव्र ध्यान-साधना के बाद उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गए। उनकी जीवनचर्या का बाहरी रूप फिर से पूर्ववत् सुव्यवस्थित हो गया एवं  घर के सभी सदस्यों को विश्वास हो गया कि “यह कोई दिव्य आत्मा हैं।” 

साधना तो पहले की भांति ही चलती रही  लेकिन पहले और अब में एक परिवर्तन नज़र आया। अब उनकी “लाली” प्रातः जल्दी स्नान करके शिव-पूजा के साथ “नियमित ध्यान” करने लगी है। अपने आराध्य से मिलने की उनकी तीव्र उत्कंठा को कोई समझ न पाया। लगातार तीव्र होती जा रही उनकी आंतरिक पुकार से परिवार के सभी सदस्य अनजान थे हालांकि इस बीच घटनाचक्र तेज़ी से बदल रहे थे। इन सबमें में महत्वपूर्ण घटनाचक्र वन्दनीय माता जी का विवाह था।

सरस्वती देवी से प्रथम विवाह के लिए भी ताई जी (गुरुदेव के माता जी) ने बड़ी कठिनता से मनाया था। चेतना की शिखर यात्रा 1 पर आधारित  लेखों में  वंदनीय माता जी के साथ विवाह की विस्तृत चर्चा हम कई बार  कर चुके हैं। गुरुदेव तो कई बार आनाकानि कर चुके थे लेकिन माँ जो  ठहरी, उनसे गुरुदेव का अकेलापन सहन नहीं हो रहा था। ताई जी ने गुरुदेव से  यह कह कर सहमति ले ली थी कि मुझे बच्चों की माँ चाहिए।      

उन दिनों की प्रथा के अनुरूप वंदनीय माता जी के पिता जसवंतराव शर्मा को अपनी प्यारी बेटी के विवाह की चिंता होने लगी थी। किशोरी भगवती की अंतर्चेतना में उफनती अलौकिकता के ज्योति सागरों के बीच पुकार के सघन स्वर गूंज रहे थे। आराध्य के चरणों के प्रति उनका अनुराग नित्यप्रति बढ़ता जा रहा था। उनमें आध्यात्मिक प्रेम के बीज अंकुरित होने लगे थे। आराध्य के चरणों में भगवती की प्रीति दृढ़ हो चली थी। उनके हृदय में भक्ति की अंतर्धारा प्रवाहित होती रहती । ध्यान-साधना में अपने विगत जन्मों की कथा स्पष्ट हो जाने के बाद उनमें एक भाव परिवर्तन हो गया था। वह पहले भी शांत रहा करती थीं। अब यह शांति और भी सघन हो गई। इन दिनों वह सर्वथा शांत-अचंचल रहकर अपने दैनिक क्रिया-कलापों में संलग्न रहतीं। बड़ी भाभी के घर-गृहस्थी के कामों में सहयोग, रामायण, महाभारत आदि धर्मग्रंथों का स्वाध्याय, अपनी नियमित ध्यान-साधना, बस यही उनकी दिनचर्या के अनिवार्य तत्त्व थे। घर में सबसे छोटी होते हुए भी वह परिवार के अन्य सभी सदस्यों की देखभाल किया करती थीं। किसको कब, क्या और कितनी जरूरत है, इस बात का उन्हें हमेशा ध्यान रहता।उनके दोनों बड़े भाई दीनदयाल और सुनहरी लाल उनके गुणों से प्रभावित रहते थे। भाभी को तो उन पर नाज़ था। बड़ी बहन ओमवती की शादी इस बीच हो चुकी थी। अब उनका घर में कभी कभी ही आना-जाना हो पाता था। वह अपनी छोटी बहन को चाहती बहुत थीं, इसलिए वह भाभी से, पिताजी से कभी- कभी ज़िद करती कि “लाली” को थोड़े दिनों के लिए उनके साथ भेज दें। मेरा तो यहां कभी-कभी ही आना-जाना हो पाता है। इस तरह मेरा मन बहल जाएगा और में  भी कुछ दिन और अपनी छोटी बहन के साथ रह लूंगी। ओमवती की इस जिद पर जैसे-तैसे पिता जसवंतराव सहमत हो जाते और भगवती थोड़े दिनों के लिए अपनी बड़ी बहन के ससुराल हो आती। वहां भी उनकी दिनचर्या यथावत बनी रहती। बहन को घर के कामों में सहयोग देने के साथ वह अपनी ध्यान-साधना का क्रम बनाए रखतीं।

इन्हीं  दिनों घर-परिवार के लोग बड़े ज़ोर-शोर से उनके लिए सुयोग्य वर की खोजबीन कर रहे थे। बड़े भाई दीनदयाल और पिता पं. जसवंतराव के बीच इस संबंध में काफी चर्चाएं हुआ करतीं। इस बार जब वह ओमवती के यहां से लौटीं तो देखा परिवार के एक बुजुर्ग रिश्तेदार किशनप्रसाद जी आए हुए हैं। यह रिश्ते में जसवंतराव के मामा लगते थे। वह इस समय किसी वर की चर्चा कर रहे थे। जसवंतराव एवं उनके बड़े बेटे दीनदयाल बड़े धीरज और उत्सुकता के साथ उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी बातों के कुछ शब्द भगवती के कानों में भी पड़े। वह कह रहे थे,

इन बातों के बीच में जसवंतराव ने टोका और पूछा,“आपने उन्हें मेरे बारे में सब कुछ सही-सही बता दिया कि नहीं?” 

प्रश्न के उत्तर में किशन प्रसाद कहने लगे, 

किशन प्रसाद की इन बातों को सभी लोग बड़े ध्यान से सुन रहे थे। वह बता रहे थे, 

किशन प्रसाद की बातों का सिलसिला अपने पूरे वेग में था। अपनी बातों में वे शायद यह भी भूल चुके थे कि सभी लोग लड़के के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं। दीनदयाल के टोकने पर उन्हें ध्यान आया और उनकी बातों की दिशा बदली। वह कहने लगे,

किशन प्रसाद की इन बातों की चर्चा घर में कई दिनों तक होती रही। चिंतन और चर्चा के अनेकों दौर चले। पहली पत्नी के स्वर्गवास और उसके तीन बच्चों के होने की बात दीनदयाल को थोड़ा खटकी। इस पर उन्होंने अपने पिता  जसवंतराव से काफी देर तक बातें कीं। बातों के बीच में उन्होंने यह भी पूछा, दादा, यह बताओ कि तुम्हारी ज्योतिष क्या कहती है ? उत्तर में जसवंतराव गंभीर होकर कहने लगे, 

जसवंत राव की बातें दीनदयाल को भी ठीक लगीं। अंत में पिता-पुत्र दोनों ने मिलकर यह तय किया कि कन्या की भाभी यह सारी बातें उसे बताकर उसके मन की बात जानने की कोशिश करे। जो कुछ होगा, सो “लाली” की सहमति से होगा। भाभी ने अपने पति और श्वसुर की आज्ञानुसार अपनी प्यारी ननद से सारी बातों की चर्चा की। वह सारी बातों को बड़े ही शांत भाव से सुनती रहीं। बातों की समाप्ति पर उन्होंने एक पल के लिए अपनी अंतर्चेतना को एकाग्र किया। इस एकाग्रता में सत्य उद्भासित हो गया। उन्हें इस बात का अहसास हो गया कि इस समय जिनसे उनके विवाह की चर्चा की जा रही है, उन्हीं के कार्य में सहयोग के लिए उन्होंने देह धारण की है। उनके पिछले जन्मों में पति और मार्गदर्शक रहे उनके आराध्य ही इस बार उनके पति होने जा रहे हैं।  अंतर्मन की इन सारी बातों को उन्होंने गोपनीय ही रखा। प्रत्यक्ष में उन्होंने बस केवल इतना कहा, 

लाली की सहमति व स्वीकृति पाकर सारे परिवार में उत्साह की लहर जग उठी । उल्लास की तरंगें घर के कोने-कोने में बिखरने लगीं। वर पक्ष के लोगों की सहमति भी आ गई। मंगल परिणय की तैयारियां होने लगीं।18 फरवरी 1945 (माता जी आयु लगभग 19 वर्ष थी और गुरुदेव 34 वर्ष के थे ) का दिन विवाह के लिए निश्चित हुआ। विवाह का दिन तय होने के बाद से पं. जसवंत राव जी के मन में खुशियों के साथ एक कसक भी घुल गई। उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे कि जगदंबा पार्वती ने पीहर छोड़कर भगवान भोले नाथ के साथ जा बसने का संकल्प ले लिया हो। अपनी इस कसक को दिल में लिए जसवंत राव बेटी के विवाह की तैयारी में जुटे रहे। अरेला गांव के ज्वाला प्रसाद इसमें उनके मुख्य सहयोगी बने। उन्हीं के माध्यम से सारी बातें बनीं। निश्चित तिथि पर विवाह संपन्न हुआ। विवाह में बहुत सादगी थी। दिखावे -प्रदर्शन का तो जैसे कोई नामोनिशान भी न था । 

अपने आराध्य के चरणों के सामीप्य में भगवती के जीवन का एक सर्वथा नया आयाम उद्घाटित हुआ था। माँ का मातृत्व अभिव्यक्त हो रहा था। मातृत्व की सजल भावनाएं अपना स्वरूप व आकार पाने की तैयारी में थीं। 

माँ का मातृत्व आंवलखेड़ा में पांव रखते ही छलक उठा। बारात विदा होकर यहीं आई थी। पूर्वजों की देहरी, अपने आराध्य की जन्मस्थली व उनकी प्रारंभिक तपस्थली में वह दुल्हन के रूप में डोली से उतरी थीं। लाल रंग की ज़री के काम वाली साड़ी पहने सौभाग्य श्रृंगार से सजी वह साक्षात् जगदंबा लग रही थीं। हिमवान की पुत्री पार्वती का पीहर से विदा होकर भगवान भोलेनाथ के साथ अपने ससुराल आने का दृश्य उन पलों में साकार हो गया। बाल मंडली शिवगणों की तरह उन्हें बड़ी श्रद्धा एवं आश्चर्य से देखे जा रही थी। ताई जी (उनकी सास व पूज्य गुरुदेव की माताजी) शुभ शगुनों वाले सारे लोकाचार पूरा करने में लगी थीं। यह क्रम काफी देर तक चलता रहा। एक-एक करके सभी रीति-रिवाज और विधि-विधान पूरे किए गए। इसके बाद उन्हे एक जगह चटाई पर बैठाया गया। बच्चे अभी तक उन्हें घेरे हुए थे। अचरज और कौतुक इन बच्चों के मनों को जब-तब कुरेद देता था। इसी के वशीभूत होकर वह थोड़ा-बहुत आपस में धीमे से बतिया लेते थे। तभी दया आगे बढ़ी और पास जाकर खड़ी हो गई। वंदनीय माता जी ने  उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया और बड़े प्यार से बोलीं, “मैं तुम्हारी माँ हूं, मुझसे संकोच की कोई जरूरत नहीं है।” इस कथन से दया को बड़ी आश्वस्ति मिली। उसने बड़े ही धीमे और लरजते स्वर में कहा, “माँ” इस एक अक्षर ने माता और पुत्री दोनों की अंतर्भावनाओं को एकरस कर दिया। अपरिमित मिठास उनके जीवन और घर-आंगन में बिखर गई। माँ के होने का अहसास मन को कितनी आश्वस्ति, सहारा, संबल, विश्वास और निश्चिंतता देता है, यह दया के मुख मंडल पर अचानक उभर आई । वह इतनी देर में कई बार अपने मन में माँ-माँ का एकाक्षरी महामंत्र गुनगुना चुकी थी। माँ के प्यार की तरलता ने उसके अंतस्तल को भावसिक्त कर दिया था। वह उन्हीं के पास सिमट- सिकुड़कर बैठ गई। दया की इस भावमुद्रा ने ओमप्रकाश को अचरज में डाल दिया। वह सोचने लगे कि उनकी छोटी बहन अचानक इतनी खुश क्यों दिखाई देने लगी। आखिर कुछ ही पलों में उस पर क्या जादू हो गया। अपने सोच-विचार में डूबे हुए वह भी हिम्मत करके आगे बढ़े। इस समय उन्होंने निक्कर-कमीज पहन रखी थी । कुछ कदमों का फासला तय करके वह पास जाकर खड़े हो गए। इतने में उधर से ताई जी गुजरी। उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप थोड़ा तेज आवाज में कहा, “खड़ा-खड़ा देख क्या रहा है? चल झुककर अपनी माँ के पैर छू।” ताई जी की आवाज से थोड़ा सहमते हुए ओमप्रकाश ने पांव छू लिए। चरण स्पर्श करते ही उन्होंने पूछा, “किस कक्षा में पढ़ते हो?” ओमप्रकाश ने बड़े हल्के स्वर में इस प्रश्न का उत्तर दिया, “मेरा नाम ओमप्रकाश है और मैं कक्षा सात में पढ़ता हूं।” 

इसके बाद के दृश्यों का वर्णन  हम बुधवार,18 मार्च वाले लेख में करेंगें। 


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