March 12,2026



ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी समर्पित साथी जानते हैं कि वर्ष 2026 में इस मंच के सारे कृत्य त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित होने का संकल्प लिया गया है। इसी संकल्प को सार्थक करने हेतु परम वंदनीय माता जी को समर्पित वर्तमान लेख श्रृंखला का पाँचवां लेख शब्दसीमा एवं लेख के महत्व के देखते हुए गूगल ड्राइव लिंक में शेयर किया जा रहा है।
हमारे अति समर्पित सहकारी आद अरुण वर्मा जी द्वारा पोस्ट किये गए कल वाले कमेंट को पढ़ने से ज्ञात हो रहा है कि श्रद्धेय डॉ प्रणव पंड्या जी की भावनाओं का स्पष्ट तौर से पालन हो रहा है।
118 पन्नों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” जिस पर वर्तमान लेख श्रृंखला आधारित है, उसकी भूमिका में श्रद्धेय जी ने लिखा था कि इस पुस्तक का पठन एवं श्रवण एक श्रेष्ठ साधना है। इसका पठन एवं श्रवण एक ऐसा जीवनदायक अमृतपान है जो वंदनीय माता जी की साक्षात् अनुभूति करने में समर्थ है। इसी भावना को एक स्टैप और आगे ले जाते हुए हम (नगण्य से लेखक) निवेदन कर रहे हैं कि जिस प्रकार पूजास्थली में साधना करके बाहिर आता साधक पूर्णतया संतुष्ट, तृप्त होता हुआ अनुभव करता है, ठीक उसी प्रकार की अनुभूति इन लेखों के अमृतपान से होनी चाहिए, इससे कम स्तर का पठन केवल रूटीन पठन ही होगा, ऐसे पठन से कोई भी लाभ की आशा करना पाठक का भ्र्म ही होगा। हम में से अनेकों को तो वंदनीय माता जी के साक्षात् दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है लेकिन इन लेखों के माध्यम से माता जी के अवतरण से महाप्रयाण तक का अद्भुत विस्तृत विवरण देने का प्रयास किया जा रहा है। हमारा विश्वास है की साथिओं को इस अमृतपान से अवश्य ही लाभ होगा।
17 नवंबर 2022 को प्रकाशित हुए लेख की एडिटिंग में न जाने क्या कुछ Add हो गया कि साधारण लेखों से लम्बा होने के बावजूद तृष्णा इतनी तीव्र हो गयी कि अकस्मात कहना पड़ा: “लेख इतनी जल्दी क्यों समाप्त हो गया ?”
जो परिजन बिहार स्थित गायत्री शक्तिपीठ मस्तीचक जा चुके हैं, आज के लेख के अमृतपान के बाद वहां स्थापित परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी की शिव-पार्वती प्रतिमा पर और अधिक श्रद्धा से विश्वास करेंगें।
तो आइए नियमियता से, पूर्ण श्रद्धा के साथ आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करके स्वयं गौरवान्वित और ऊर्जावान बनाएं।
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“लाली ” की दिव्य शक्ति:
दीनदयाल जी की पत्नी अर्थात “लाली” की भाभी को उनके पिता जी लिवाने के लिए आने वाले थे। 15-20 दिन पूर्व इस आशय की चिट्ठी भी आई थी जिसमें उनके आने की सुनिश्चित तिथि लिखी थी लेकिन उस तिथि को वह न आ सके और न ही कोई सूचना भी पहुंची। इससे भाभी की चिंता बढ़ गई। उन्होंने किसी से कुछ कहा तो नहीं परन्तु उदास रहने लगीं। घर के कामों, जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह हर पल, हर क्षण बेचैन रहतीं। मन की घबराहट चेहरे पर भी नज़र आ जाती। एक दिन “लाली “अर्थात हम सबकी माँ, वन्दनीय माता जी ने उनसे धीरे से पूछ ही लिया, “क्या बात है भाभी, आजकल आप इतनी परेशान क्यों रहती हो?” उन्होंने जवाब दिया, “कुछ नहीं, “लाली” ऐसी कोई बात नहीं।” माँ भगवती ने हल्के से मुस्कराते हुए कहा, “बात तो है भाभी, कहो तो बता दूं।” फिर धीरे से गंभीर स्वर में बोलीं,
“आप इसलिए परेशान हो न, कि आपके पिता नहीं आए, लेकिन अब आप ज़्यादा परेशान न हों क्योंकि उन्हें काफी तेज बुखार आ गया था। उन्होंने पत्र तो लिखा था लेकिन वह समय पर न पहुंच पाया। आज आपके पिताजी चलने की तैयारी कर रहे हैं। कल यहां पहुंच जाएंगे। जहां तक पत्र की बात है, वह आज ही आपको मिल जाएगा।”
अपनी इस छोटी-सी ननद की बातें सुनकर भाभी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ क्योंकि उन्होंने तो घर में किसी को भी अपने मन की बातें नहीं बताई थीं। यह आश्चर्य तब और भी बढ़ गया जब सच में सुबह डाकिया आकर पत्र दे गया। पत्र में वही सब बातें लिखी थीं जो उनकी “लाली ” ने उन्हें बताई थीं।
दूसरे दिन पिताजी भाभी को लेने के लिए आ गए। पिताजी ने घर-परिवार के, अपने स्वास्थ्य के जो समाचार बताए, वे सब वही थे जो “लाली” ने बताए थे। पिताजी को भी इस बात पर पक्का विश्वास हो गया कि “लाली” सच में ही कोई दिव्य शक्ति है। भाभी के हृदय में अपनी इस ननद के लिए प्यार तो पहले से ही था, अब सम्मान और श्रद्धा का भाव भी जाग उठा।
“लाली” के गुड़िया-गुड्डे के खेल:
भगवती के मन में भी अपनी भाभी के लिए विशेष लगाव था। अपनी आयु के अनुरूप वह उन्हें घर के छोटे-छोटे कामों में मदद करती। कभी-कभी भाभी और बड़ी बहन के साथ गुड़िया-गुड्डे के खेल खेलती। यह उनका प्रिय खेल था। गुड़िया-गुड्डे तैयार करने, रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाना, जब-कभी गुड्डा बीमार हो जाता, फिर वैद्य जी को बुलाना आदि बहुत ही मनमोहक था। बीमारी में जड़ी-बूटियां घिसी और पीसी जातीं जिन्हें खाकर और परहेज़ करके गुड्डा महाशय स्वस्थ हो जाते। स्वस्थ होते ही बालिका भगवती हंसी से खिलखिला उठती। गुड़िया-गुड्डे का यह खेल उनके बचपन का सच्चा सहचर था जिसमें घर के सभी लोगों को किसी-न-किसी रूप में उनका सहभागी बनना पड़ता था। कभी गुड़िया की शादी, तो कभी गुड्डे की बीमारी,कभी उनके लिए नए घर-मकान का इंतजाम। इस तरह के अनेकों काम और इंतजाम थे जो उनके बचपन को क्रीड़ामय एवं उल्लासमय बनाए रखते थे।
महाशक्ति की इन लीलाओं में उनकी दिव्य क्रीड़ा भी यदा-कदा उजागर होती रहती थी। खेल-खेल में ही अनेकों दिव्य भाव उमगते-पनपते और सृष्टि के आंगन में बिखर जाते।
शिव पूजा “लाली” का प्रिय खेल:
कई तरह के खेलों में उनका सबसे अधिक प्रिय खेल था, ‘शिव-पूजा’। इस खेल को वह दिनभर कम-से-कम एक बार अवश्य खेला करतीं। कभी-कभी तो उनका यह प्रिय खेल दिन में दो से भी अधिक बार दोहरा लिया जाता। खेल की शुरुआत भगवान महादेव के प्रतीक चिह्न बनाने से होती। अपनी बहन ओमवती और बालसखी सुखमती के साथ मिट्टी के शिव प्रतीक का निर्माण करती । उसकी विधिवत् स्थापना करने के बाद पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य एवं वेलपत्री से पूजा का क्रम चलता। यह पूजा बड़ी भक्ति और अनुराग से होती। पूजन के अंत में सभी को भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जप करना होता। खेल में सहभागिनी अन्य बालिकाओं का जप तो थोड़ी देर में समाप्त हो जाता लेकिन भाव-समाधि में डूबी “लीला” काफी देर तक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करती रहती। कभी-कभी तो उन्हें यह सब करते हुए घंटों बीत जाते। साथी बालिकाएं थकने और ऊबने लगतीं। कभी-कभी तो बालिकाएं उन्हें इसी तरह अकेला छोड़कर चुपचाप चली जातीं और फिर दूसरे दिन जब दुबारा मिलना होता तो वे पूछतीं कि तुम्हें शिव-पूजा करते-करते यह अचानक क्या हो जाता है? जप करने के लिए आंखें बंद करके जो बैठती हो तो बस उठने का नाम ही नहीं लेतीं। अरे भई, पूजा तो हम लोग भी तुम्हारे साथ ही करती हैं लेकिन इस तरह होश-हवास नहीं खोतीं। उत्तर में “लाली ” के बालमुख पर हल्की-सी रहस्यात्मक मुस्कान तैर जाती। इस मुस्कान में जो कुछ छिपा होता, उसे साथ खेलने वाली बालिकाएं कभी न जान पातीं। किसी को भी पता न चलता कि
यह पूजा “महाशक्ति” की अपने आराध्य “महाशिव” के प्रति आंतरिक अनुराग की अभिव्यक्ति है।
जब कभी भी भाभी पूछती कि “लाली”, तू इतनी पूजा क्यों किया करती है, जब देखो भगवान शिव के चित्र या प्रतीक के सामने आंखें बंद करके बैठी रहती है तो भाभी के सवालों के जवाब में वह हंस देती और कहती,
“अरे मैं कोई पूजा थोड़े ही करती हूं, यह तो बस खेल है। मुझे सब खेलों में यह खेल सबसे अधिक पसंद है।”
उनकी इस बात का किसी के पास कोई काट न होता और खेल का सिलसिला इसी तरह से प्रतिदिन चलता रहता।
इसी सिलसिले में नयापन जोड़ने के लिए पिता जसवंतराव का सहारा लेती। वह उनसे शिव पुराण की कथाओं को सुनाने का आग्रह करती । भगवान शिव के लीलाचरित सुनना उन्हें परमप्रिय था। भगवान महाकाल के दिव्य चरित्र का श्रवण उनके मन-प्राण एवं अंतरात्मा को भारी सुख पहुंचाता था। वह बार-बार इन्हें सुनने का आग्रह-अनुरोध करती । जसवंतराव भी अपनी लाड़ली को बड़े ही रसपूर्ण ढंग से महाशिव की लीलाएं सुनाया करते लेकिन उन्हें यह अहसास कभी न हो पाता कि लीलामयी उनके सामने स्वयं बालरूप में उपस्थित होकर अपने आराध्य, अपने सर्वस्व का चरित सुन रही हैं, इस आंतरिक भाव सत्य से सभी अनजान थे। प्रत्यक्ष सत्य बस इतना ही था कि श्रोता एवं वक्ता दोनों भगवान की लीलाओं को सुनते और कहते हुए भक्तिरस में डूबे रहते। इन शिव लीलाओं के कोई-न-कोई अंश अगले दिन की शिव पूजा में जुड़ जाते। कभी तो इसमें शिवरात्रि का प्रसंग जुड़ता, कभी इसमें शिव विवाह की कथा जुड़ती। इस तरह खेल में नयापन आता। साथ खेलने वाली बालिकाओं का उत्साह भी बढ़ जाता। सभी को खेल के लिए पूरे जोर-शोर से तैयारी करनी पड़ती। उनकी बालसखी सुखमती तो उनकी सहचरी ही नहीं, अनुचरी भी थी। उसे वह प्यार से सुखमन बुलाया करती थीं। सुखमन वही करती जो उसकी प्राणप्रिय सखी “लाली ” को प्रिय लगता।
शिव पूजा में दिव्य अनुभूतियाँ, परम पूज्य गुरुदेव की अनुभूति:
बालिका भगवती को तो शिव-शक्ति के खेल में कई तरह की दिव्य अनुभूतियां भी होने लगी थीं जिनके अर्थ एवं रहस्य अभी पूरी तरह से प्रकट नहीं हो पाते थे। शिवपूजन करते हुए जब वह भावमग्न होती तो उनकी अंतर्चेतना में कई तरह के दृश्य उभरते थे। उन्हें ऐसा लगता जैसे कि भगवान शिव ने एक गौरवर्ण के लंबे दुबले युवक का रूप ले लिया है। इस युवक की छवि पहले तो थोड़ी अस्पष्ट होती लेकिन बाद में काफी स्पष्ट हो जाती। यह युवक उन्हें प्रायः एक कोठरी में पूजा वेदी पर प्रज्वलित साधना दीप के सामने ध्यानस्थ नजर आता। उसके मुखमंडल पर उन्हें अपूर्व तेजस्विता दिखाई देती। यह दृश्य उनके अंतर्मन में बार-बार उभरता। वह बार-बार इस दृश्य को देखकर अचरज में पड़ जाती। वह सोचती कि शिव-पूजा करते हुए उन्हें यह कैसी विचित्र अनुभूति होती है। जब-तब यह भी मन में आता कि कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान शिव ने स्वयं अवतार ले लिया है। अपनी सृष्टि में युग प्रत्यावर्तन करने, एक नए युग का प्रवर्तन करने के लिए प्रभु स्वयं आ गए हैं। अपने इस विचार के बारे में वह जब-जब सोचती, उन्हें सच्चाई नज़र आती। बार-बार उस महायोगी युवक के रूप में उन्हें भगवान शिव का स्वरूप प्रत्यक्ष होता। मन-ही-मन वह उन्हें शिव-शिव कहते हुए प्रणाम भी कर लेती। पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय’ का जप करते हुए जब वह प्रगाढ़ भावदशा में होती तो उनके मानस-पटल पर यह दृश्य प्रत्यक्ष हो जाता। अपनी अंतर्चेतना में रोज-रोज उपस्थित होने वाले इस साधनारत युवक का उन्होंने अब “महायोगी शिव” ही नामकरण भी कर दिया, हालांकि यह “महायोगी शिव” रोज़ ही उनकी अंतर्भावनाओं में प्रत्यक्ष होते परंतु अभी तक वह यह नहीं जान पाई थीं कि ये कौन हैं? कहां हैं और क्या करते हैं? लेकिन जब कभी वह ध्यानरत होती अथवा अपनी शिव-पूजा में भावमग्न होतीं, तब उनके हृदय में यह तीव्र स्फुरण होता था कि ये महायोगी शिव जो कोई भी हों, पर ये हैं भगवान शिव ही। साथ ही यह भी स्पष्ट होता कि किसी-न-किसी तरह इनसे उनका अपना भविष्य जुड़ा हुआ है। शायद वह इन्हीं के द्वारा किए जाने वाले किसी कार्य में सहयोग करने के लिए आई हैं।
किशोरी “लाली” की ध्यान साधना:
जो शिव-पूजा उन्होंने खेल खेल में शुरू की थी, वह उन्हें दिव्य भावानुभूतियों में डुबोती जा रही थी, उन्हें अपने जीवन और भविष्य के प्रति जागरूक बना रही थी,उनकी बालक्रीड़ा में दिव्यता के तत्त्व सघन हो रहे थे। “लाली” का क्रीड़ामय बचपन किशोरावस्था की ओर बढ़ने लगा था, योग-साधना के जो तत्त्व खेल-खेल में अंकुरित हुए थे,अब वह पल्लवित होने लगे थे। उनके हृदय में साधनामय जीवन के लिए अभीप्सा बढ़ने लगी थी। अपने आराध्य से मिलन के लिए पुकार तीव्र होने लगी थी। इस पुकार में भक्ति की सघनता, प्रेम की तरलता एवं अनुराग की सजलता सभी कुछ था। बालिका भगवती एक प्रखर योग साधिका के रूप में रूपांतरित होने लगी थी। अपने प्रभु के प्रति भावभरी पुकार में उनकी योग साधना का स्वर संगीत गूंजने लगा था। शिव-पूजा के खेल में जो भावानुभूतियां हुई थीं, वे आयु के बढ़ने के साथ सघन और प्रगाढ़ होने लगीं। किशोरी भगवती के मन-प्राण व अंतःकरण में एक पुकार ने जन्म ले लिया। उनके प्राण अपने शिव को पुकारते रहते। रह-रहकर मन ध्यानस्थ चेतना में देखे गए दृश्यों को फिर-फिर निहारने लगता। कई तरह के सवाल अंतःकरण को कुरेदते रहते। वह सोचा करतीं कि यह “महायोगी शिव” कौन है, जिसे वह ध्यान में हमेशा देखती हैं? बार-बार ध्यान करते समय शिव के स्थान पर सुदर्शन व्यक्तित्व वाले इस महायोगी की छवि क्यों प्रकट हो जाती है? क्या सचमुच ही भगवान शिव ने धरती पर अवतार ले लिया है।
ऐसे अनेकों प्रश्न उन दिनों उनकी अंतर्चेतना में अंकुरित हो रहे थे।
इन सभी प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए उन्होंने ध्यान-साधना को और अधिक तीव्र करने का निश्चय किया। इस निश्चय के साथ ही उनमें एक अजीब-सा भाव परिवर्तन हो गया। घर के प्रायः सभी सदस्यों ने इसे अनुभव किया। इन दिनों उनकी दिनचर्या बड़ी ही अस्त-व्यस्त हो गई लेकिन इस बाहरी अस्त-व्यस्तता में एक आंतरिक सुव्यवस्था साकार हो रही थी। वह अपनी ध्यान-साधना में इतनी डूबी रहतीं कि उन्हें अपने उठने, नहाने, खाने की सुध-बुध ही न रहती। घर के सदस्य उनके इस आंतरिक परिवर्तन से अनजान थे। भाभी जो माँ की तरह उनकी साज संभाल किया करती थीं, उन्हें समझाती रहतीं, बार-बार कहतीं:
“लाली” , तू तो ऐसी न थी। आजकल तुझे क्या हो गया है। कहां तो तू सवेरे-सवेरे जल्दी उठकर नहा-धोकर तैयार हो जाती थी, खेलने लगती थी, घर का काम-काज भी करा लेती थी लेकिन आजकल तो तुझे जैसे अपना ध्यान ही नहीं रह गया है।”
भाभी की इन बातों को “लाली ” हंसकर टाल जाती, किसी तरह उन्हें बहला-समझा देतीं। वह जानती थी कि यदि वह बैठकर सुव्यवस्थित तरीके से दिन रात ध्यान-साधना करेगी, तो सबके-सब परेशान हो जाएंगे और वह अपने परिवार के किसी भी सदस्य को परेशान नहीं करना चाहती थीं इसीलिए उन्होंने यह अनूठा तरीका निकाला था। वह दिन-प्रतिदिन ध्यान-साधना की गहरी भावदशा में खोती जा रही थीं। अनेकों दिव्य अनुभूतियां प्रतिक्षण उन्हें घेरे रहती थीं। बाहरी तौर पर सब कुछ सामान्य होते हुए भी उनके आंतरिक जीवन में सभी कुछ असामान्य और अलौकिक हो गया था।
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
मध्यांतर