वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का चौथा ज्ञानप्रसाद लेख

अक्सर हम रिपीट करते रहते हैं कि गुरुदेव स्वयं ही हमारी उँगलियों को चला देते हैं और आगे का मार्गदर्शन कर देते हैं। नवंबर-दिसंबर 2022 में “चेतना की शिखर यात्रा एवं महाशक्ति की लोकयात्रा” पुस्तकों पर आधारित कुछ लेख लिखे थे, जब गुरुदेव के मार्गदर्शन का प्रमाण इन लेखों से मिला तो 2026 के  लिए संकल्प को पँख मिलते दिखे। आने वाले लेखों में उन लेखों का Revision और editing  हो सकता  है। 

आज के लेख में वंदनीय माता जी की जननी का मात्र 4 वर्ष की आयु में छोड़कर इस संसार से विदा ले लेना, नन्हीं “लाली” की दिव्यता, अपने से बड़े भाई बहिनों के साथ इतने Matured वार्तालाप, आगरा जो  विश्वभर में ताजमहल के लिए प्रसिद्ध है, उससे सम्बंधित ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं का संकल्प आदि का वर्णन है। 

हमारे साथी हमारे साथ सहमत होंगें कि ज्ञानप्रसाद लेख इतने रोचक होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कब उनका अंत हो गया । इस सम्बन्ध में आद सुमनलता जी के कमेंट का समर्थन करते हुए इतना ही कहेंगें कि प्रत्येक दवा की नियमित Dose होती है, समयानुसार, ठीक Dose ही लाभ करती है। 

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पिछले लेख में जिस दिव्य अवतरण की बात हुई थी उसी को आगे बढ़ाते हुए आगे चलते हैं :  

पिता का ज्योतिषज्ञान पुत्री को गोद में लेते ही सार्थक हो गया। उन्होंने कन्या के जन्म मुहूर्त पर मन-ही-मन विचार किया। होरा, लग्न, ग्रहों की युति और उनकी भावदशा के बारे में गणनाएं कीं और उनके चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएं झिलमिला उठीं। ज्योतिष की गणनाएं एक के बाद एक उन्हीं तथ्यों की ओर संकेत कर रहीं थीं, जिनका अहसास उन्हें अपनी ध्यानस्थ चेतना में हुआ था। साधनाकाल में और ज्योतिष विद्या का गहन अवलोकन करते समय उन्हें बार-बार इस तथ्य की अनुभूति होती थी कि “वर्ष 1926 महान आध्यात्मिक शक्ति के अवतरण का वर्ष है”, परंतु कैसे और किस तरह? यद्यपि इतिहास उनकी साधनात्मक एवं ज्योतिषीय अनुभूतियों का साक्षी बन रहा था, इन प्रश्नों के हल वे नहीं खोज पा रहे थे।

वर्ष 1926 की वसंत पंचमी को “विश्व की महानतम आध्यात्मिक घटना” घट चुकी थी। 15 वर्षीय बालक  श्रीराम ने अपने हिमालयवासी महागुरुदेव के मार्गदर्शन में अखंड साधना दीप प्रज्वलित किया था। उनके चौबीस-चौबीस लाख के चौबीस गायत्री महामंत्र के पुरश्चरणों की यात्रा इसी वर्ष प्रारंभ हुई थी। इसके अतिरिक्त श्रीअरविंद आश्रम पांडिचेरी में महायोगी अरविंद पूर्णयोग की विशेष सिद्धि को अवतरण करने की सफलता प्राप्त कर रहे थे। महर्षि अरविंद के प्रति श्रद्धा से प्रेरित इस श्रृंखला के तुच्छ लेखक के ह्रदय में बार-बार उठ रही जिज्ञासा के कारण ऐसा अनुभव हो रहा है कि वर्ष से उनका 1926 के साथ क्या सम्बंध रहा होगा, का निवारण अवश्य होना  चाहिए। वंदनीय माता जी पर आधारित इस लेख श्रृंखला को किसी दिन रोककर इस प्रश्न के निवारण का प्रयास करना शायद अनुचित न हो।   

अभी के लिए इतना ही  कहना पर्याप्त होगा कि वर्ष 1926  के अंतिम महीनों में ही अतिमानसिक चेतना ( Supramental consciousness) धरती पर अवतरित हुई थी और महायोगी अरविंद अतिमानसिक चेतना के अवतरण के लिए परिपूर्ण एकांत में चले गए थे।

जिस आध्यात्मिक शक्ति के अवतरण के साक्षी आज जसवंतराव थे, वह उपर्युक्त दोनों ही घटनाओं से कहीं अधिक विशिष्ट थी, क्योंकि इसमें “आध्यात्मिक महाशक्ति” ने स्वयं ही स्थूल देह धारण करके अवतार लिया था। आदिमाता स्वयं ही अपनी लीलाभूमि में आविर्भूत हुई थी। नीलगगन में सूर्यदेव बड़े ही सुखद आश्चर्य से इस दृश्य को निहार रहे थे। उन्हें अपनी शत-सहस्र किरणों से अभी-अभी  अवतरित जगदंबा के अर्चन-वंदन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। समूचे वातावरण में आज एक दिव्य शांति, शीतलता व्याप्त हो रही थी। धरती का यह छोटा-सा कोना तीर्थभूमि बन गया था। यहां एक ही पल में अनेक परिवर्तन घटित हो गए थे। 

आगरा नगर ताजमहल के लिए तो विश्वभर में प्रसिद्ध है, आइए हम सब पाठकगण परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीय माता जी के संस्मरणों का अमृतपान करते हुए संकल्प लें कि गुरूजी के ग्राम आंवलखेड़ा, जो आगरा से मात्र 20 किलोमीटर ही दूर स्थित है और माता जी की जन्मस्थली की दिव्यता को विश्वभर में प्रसारित करेंगें।  टेक्नोलॉजी के वर्तमान युग में ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सामूहिक प्रयास ने इस संकल्प को इतना सरल बना दिया है कि मात्र क्लिक करने से ही गुरुज्ञान विश्व के ऐसे कोनों तक पंहुच जाता है जिनके नाम की भी जानकारी न हो। ऐसा अनुभव अनेकों बार हो चुका  है   

जसवंतराव जी  की भावभूमि बिलकुल अटल एवं स्थिर थी। वह तो बस सुरभि-भरी कुसुम-कलिका की भांति कमनीय कांति को बिखेरती अपनी कन्या को गोद में लिए बस देखे ही जा रहे थे। 

यदि पड़ोस की महिला उन्हें न टोकती, तो वह न जाने कब तक यों ही खोये रहते। इस पड़ोसन के पूछने पर कि ऐसा क्या है इस लड़की में, जो तब से देखे जा रहे हैं, उनकी भाव-समाधि भंग हुई और वे बड़े ही हर्षित स्वर में बोले, 

हमारे पाठकों को विश्वभर में फैले गायत्री शक्तिपीठों में “माता भगवती देवी भोजनालय” अवश्य ही स्मरण हो आया होगा 

पड़ोस की महिला को पिता की ये गूढ़ बातें कुछ भी समझ में न आईं। वह तो बस लोक-प्रचलन के अनुसार मात्र इतना ही जानती थी कि लड़का होना अच्छा होता है और लड़की होना बुरा। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि जसवंतराव जी  घर में लड़की होने पर इतना खुश क्यों हो रहे हैं। उनकी बातों से उसे केवल इतना समझ में आया कि उन्होंने अपनी पुत्री का नाम “भगवती” रखा है। 

उसने कन्या को उनकी गोद से लेकर लेडी लायल अस्पताल के एक कक्ष में विश्राम कर रही माँ  के पास लिटा दिया। भगवती नाम के स्वर कन्या की  माँ के कानों में भी पड़े। उन्होंने बड़े ही लाड़ से अपनी बेटी की ओर निहारा। सदा हंसमुख, लीला-चंचल उस नन्हीं-सी बालिका के नेत्रों में जैसे कोई सम्मोहिनी शक्ति (Mesmerizing power) थी, जिसे देखकर वह बरबस सोचने लगीं, अहा! कितनी सुंदर आंखें हैं, मानो देवी के नेत्र हैं! मेरी यह बेटी सचमुच ही माता भगवती है। माता के ममत्व एवं पिता के स्नेहमय लालन में भगवती शशिकला की भांति दिनोदिन बढ़ने लगी। स्वजनों के साथ उसका बचपन बीतने लगा।

स्वजनों के साथ बीत रहे बचपन के इन पलों में बड़ी ही मिठास थी। यदा-कदा इनके अनूठेपन के झरोखे से अलौकिकता झांक उठती। भगवती अपनी  माँ के साथ सभी भाई-बहनों की लाड़ली थी। रंग-रूप सामान्य होते हुए भी उसमें “एक दैवी मोहिनी” थी। अड़ोस-पड़ोस के लोग, रिश्ते-नातेदार, सगे-संबंधी सभी इस दिव्य सम्मोहन में अनायास ही बंध जाते थे। वह सभी की प्रिय “लाली” थी। हमारे साथी जानते होंगें कि ब्रज क्षेत्र (मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र) में यह शब्द बहुत प्यारी, लाड़ली, छोटी बालिकाओं के लिए प्रयुक्त होता है। कथा-किवंदती  तो यह भी है कि इस शब्द को सबसे पहले बरसाना ( राधा रानी का जन्म स्थान) में राधा रानी को पुकारने के लिए प्रयोग किया गया। इसी संदर्भ में स्मरण हो रहा है कि इस परिवार की बेटी प्रेरणा ने जब पहली बार “बाबू” शब्द का प्रयोग किया तो सहसा ही हमारी जिज्ञासा  उठी थी,बेटी के बताने पर पता चला कि बिहार आदि क्षेत्रों में बच्चों को यहाँ तक कि पति  को भी प्यार से बाबू कह कर पुकारा जाता है। इंटरनेट इस बात का साक्षी है। 

राधा रानी सारे बरसाना गाँव  की “लाली” थीं। भगवान् कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति को सभी प्यार से “लाली” कहकर बुलाते थे। हमारी माता जी  को भी यही संबोधन मिला था। जन्मदात्री माता रामप्यारी, पिता जसवंतराव जी,भाई दीनदयाल, भाई सुनहरीलाल एवं बड़ी बहन ओमवती सभी उन्हें “लाली” ही कहते थे। पड़ोसियों की जीभ पर भी यही संबोधन लिख गया था। लाली सभी की अपनी थी। सभी का प्यार उस पर बरबस बरसता था। बचपन में जैसे अन्य बच्चे शरारती, चंचल और नटखट होते हैं, वैसा उनमें कुछ भी नहीं था। भोलापन और मासूमियत लिए बड़ी ही गजब की शांत प्रवृत्ति थी। नन्हें कदमों से जब उन्होंने चलना सीखा और वाणी से बोल मुखरित हुए तो उन्होंने अपनी माता को अम्मा और पिता को दादा कहना सीख लिया। नन्हें  कदमों से धीमे-धीमे चलती हुई अपनी इस प्यारी “लाली” को जसवंतराव जी प्रेम विभोर हो गोद में उठा लेते थे। अपनी लाड़ली की हर इच्छा को वह अपना सौभाग्य मानकर पूरा करते। वह “लाली” को अपनी दिव्य अनुभूतियों का साकार रूप लगती।

काल के रथ पर सवार भगवती का बचपन अपने आल राउंड  वातावरण में जीवन के मधुर संगीत की सृष्टि करता हुआ आगे बढ़ रहा था। तभी इस मधुरता में अचानक उदासी और निराशा  का क्षण गूंज उठा। जन्मदात्री माता अपनी प्यारी “लाली” को केवल चार वर्ष की आयु  में ही छोड़कर परलोक जा बसीं। माँ की बीमारी इस क्रूरता का माध्यम बनी। भगवती के बाल नेत्रों में आंसू छलक उठे। नन्हें  से दिल में भावनाओं का ज्वार तड़प उठा। मातृ विछोह के पल उनके लिए बड़े ही दारुण थे। चार वर्ष की छोटी-सी बच्ची के लिए तो माँ ही सब कुछ होती है, माँ ही न रहे तो…….? लेकिन सच-तो-सच था। अपनी माता की याद में उन दिनों वह काफी रोई लेकिन  इस करुण दशा में भी उनकी आंतरिक चेतना जाग्रत,सक्रिय और सचेतन बनी रही। ऐसा देखकर बड़ी बहन एवं भाइयों को बड़ा आश्चर्य होता था कि छोटी-सी “लाली” कभी-कभी उन्हें ही, बड़ों को ही समझाने लगती। कभी-कभी वह गुमसुम-सी चुपचाप पालथी मारकर बैठ जाती। उन्हें इस भावमग्न दशा में बैठे देखकर घर के सदस्यों को अचरज होता। वे सब उनकी अंतर्दशा से अपरिचित थे। उनमें से कोई सोच नहीं पाता था कि यह छोटी-सी बच्ची आखिर इस तरह एकांत में शांत होकर क्यों बैठी है। एक दिन बड़े भाई दीनदयाल ने उन्हें इस तरह बैठे देखकर पूछ लिया, ‘‘लाली, तू इस तरह चुपचाप शांत क्यों बैठी है, बच्चों के साथ खेलती-कूदती क्यों नहीं? तुझे देखकर तो ऐसा लगता है कि तेरे सिर पर सारी दुनिया का भार है’’ 

प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बड़े ही शांत नेत्रों से बड़े भाई की ओर देखा, फिर बड़े ही गंभीर स्वरों में बोलीं, 

उनकी ये बातें दीनदयाल को कुछ भी समझ न आईं लेकिन “लाली” के  शब्दों में यह सत्य तो निहित ही था कि वह बचपन से ही अपने भावी दायित्वों के प्रति जागरूक थीं। 

इन्हीं वर्षों में भाई दीनदयाल की शादी हो चुकी थी। उनकी पत्नी यानि कि बालिका भगवती की बड़ी भाभी बड़े ही स्नेहशील स्वभाव वाली प्रेमपूर्ण हृदय की महिला थी। उन्होंने अपनी इस ननद की बड़े ही यत्न से सार-संभाल की। बार-बार उनका मन कहता था कि उनकी यह छोटी-सी ननद कोई देवी है। उसकी पारदर्शी आंखों में उन्हें पारलौकिक व अलौकिक प्रभा छलकती हुई लगती। उनकी यह ननद कभी  कुछ ऐसी बातें कह देती थी, जिससे उनका यह विश्वास और भी अधिक मज़बूत हो जाता। 


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