वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य, वर्ष 2026 की त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित लेख श्रृंखला का तीसरा ज्ञानप्रसाद लेख

अक्सर हम निवेदन करते रहते हैं कि ज्ञानप्रसाद लेखों के अध्ययन में ब्रेक (विशेषकर लेख श्रृंखला के बीच) लेना उचित नहीं है। ऐसा करने से लिंक टूट जाता है और पाठक जैसे-तैसे ज्ञानप्रसाद ग्रहण तो कर लेता है लेकिन वैसा अमृतपान नहीं हो पाता जैसा होना चाहिए। 

इसी सन्दर्भ में आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करने के लिए कल वाले लेख के अंतिम पैराग्राफ को पढ़ना उचित रहेगा। ऐसा करने से स्मरण हो आएगा कि परम पूज्य गुरुदेव कौन से सामान्य/असामान्य  क्षणों की बात कर रहे हैं। 

वर्ष 1926 में परम वंदनीय माता जी के अवतरण के क्षण सामान्य न होकर असामान्य थे। अवतरण के इन्हीं असामन्य क्षणों को चरितार्थ करने के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से यह पुरषार्थ किया जा रहा है, उसी माँ के अवतरण के 100 वर्ष मनाने के लिए, वर्ष 2026 को इतना महत्व दिया जा रहा है। 

वंदनीय माताजी के पिता पंडित जसवंतराव जी एवं माता रामप्यारी जी ने क्या अनुभव किया, आज का लेख उन्हीं दुर्लभ क्षणों का दर्शन करा रहा है। हमारे अनेकों परिजन वंदनीय माताजी को एक साधारण गृहणी समझते होंगें लेकिन आज के लेख का अवलोकन हमारी माँ की दिव्यता को बताने में सक्षम है, ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।  

“ब्रह्मवर्चस” टाइटल के अंतर्गत लेखक समूह का, इन सौभाग्यशाली क्षणों के दिव्य दर्शन कराने  के लिए ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। 

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सामान्य एवं असामान्य क्षण: 

इस संबंध में उन्होंने समय-समय पर कुछ विशेष बातें भी बताईं। उन्होंने कहा कि कालप्रवाह में सामान्य एवं असामान्य क्षण प्रवाहित होते रहते हैं। सामान्य क्षणों में मानव मातृतत्व  की इच्छा  करता है। माता की परम पूर्णता का बोध पाने के लिए “योगसाधना” में निरत रहता है। ध्यान व ज्ञान की साधना करके आदिमाता से अपने जीवन की पूर्णता का वरदान पाने की प्रार्थना करता है।

असामान्य क्षणों में अपनी कोख से जीवन और जगत् को प्रसव करने वाली माता स्वयं यत्नशील होती है। सृष्टि को सुसंस्कारित करने के लिए वह स्वयं “युगशक्ति” बनकर अवतरित होती है। वह अपनी भटकी हुई संतानों को राह दिखाने के लिए आती है। उसकी दैवी चेतना मानवीय देह से अभिव्यक्त होती है। महादेवी स्वयं मानवी बनकर अपनी असंख्य संतानों को लाड़-दुलार करती है। आदिशक्ति, युगशक्ति का रूप धारण कर सत्पथ का प्रवर्तन करती है। जगन्माता किसी संकेत, इंगित अथवा आदेश से नहीं, बल्कि स्वयं जीवन के सभी आयामों को जीकर तत्त्व और सत्य का बोध कराती है। अपने बच्चों को अंगुली पकड़कर जीवन जीने की कला सिखाती है।

सृष्टि के इतिहास में ये क्षण बड़े ही महिमामय होते हैं। अगणित आकुल क्षणों की पुकार का उत्तर देने के लिए, करुणामयी माता अवतार लेने के लिए संकल्पित होती है। बड़ा ही भाग्यवान होता है वह देश, धरा का वह आंचल जिसे आदिजननी अपनी लीलाभूमि के रूप में चुनती है। बड़े ही पुण्यशाली होते हैं वे लोग, जो किसी भी रूप में उनके स्वजन एवं परिजन बनते हैं, इस सब से भी कहीं अधिक धन्य वे होते हैं, जो भक्ति से उफनते अपने हृदयों को माता के चरणों में उड़ेलकर मातृतत्व  का अर्चन-वंदन करते हैं। वे भी कम पुण्यवान नहीं होते, जो दिव्य जननी की लीलाकथा का स्मरण-चिंतन एवं अवगाहन करते हुए उनकी ज्योतिर्मय चेतना से एकात्म होने की साधना करते हैं। 

साधना के भावपूर्ण स्वरों का उत्तर देने के लिए ही तो भावमयी “माता भगवती” अवतार लेती है, इसीलिए तो मातृतत्व  की विशुद्ध चेतना घनीभूत होकर स्थूल रूप में प्रकट होती है। मानव की जन्म-जन्माँतर की आध्यात्मिक लालसाओं  का उत्तर देने के लिए ही मातृतत्व  की दिव्य ज्योति जन्म लेती है। उसके प्रकाश से लोकों के बाहरी आवरण ही नहीं, जीवों के अंतःकरण भी प्रकाशित होते हैं। युगशक्ति के अवतरण से हवाओं में अलौकिक सुगंध फैलने लगती है। जाग्रत् आत्माएं अपने अंतःकरण में बड़े ही अद्भुत Vibrations  को अनुभव करती हैं। आदिशक्ति की दिव्य ज्योति के जन्म का महोत्सव मनाने के लिए ऋषि, देवता एवं सिद्धगण सक्रिय होने लगते हैं। सृष्टि की समस्त दिव्य शक्तियों में एक अनोखी चेतनता व्याप्त हो जाती है। 

वंदनीय माता जी के अवतरण के समय, दिव्य ज्योति के अवतरण की वेला में कुछ ऐसा ही भाषित हो रहा था।

दिव्य ज्योति के जन्म की शुभ घड़ी समीप आने लगी थी। मातृतत्व मानवीय रूप और साकार ले रहा था। आदिशक्ति के युगशक्ति के रूप में अवतरण का संकल्प सूक्ष्म जगत् में मुखरित हो चला था। सांवरिया बोहरे समुदाय (आगरा) के पं. जसवंतराव शर्मा के परिवार में इसके स्पंदन तीव्रगति से संघनित होने लगे थे। घर के वातावरण में दिव्यता की कुछ अलग-सी तरंगें हर क्षण तरंगित होती रहतीं। एक अलौकिक महक मकान के कोने, चौबारे व आंगन में रह-रहकर सघन हो उठती। परिवार के सभी सदस्यों के मन, अंतःकरण में उल्लास उमगता रहता। एक अनजानी खुशी हर एक को घेरे थी।

पिछले कुछ महीनों से होने वाले इन परिवर्तनों को सबसे पहले जसवंतराव ने महसूस किया। जसवंतराव बड़े ही सीधे-सरल स्वभाव वाले आध्यात्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। उनकी सहधर्मिणी रामप्यारी शर्मा पति के अनुरूप जीवनयापन करने वाली भक्तिमती महिला थीं। उनकी कोमलता व सेवापरायणता की घर-परिवार के लोग, स्वजन-संबंधी और कुटुंबी बड़ाई करते नहीं अघाते थे। आस-पड़ोस की बड़ी-बूढ़ी महिलाएं बात-बात में उनका उदाहरण दिया करती थीं। जब-तब वे आपस की चर्चाओं में कहा करतीं:

प्रशंसा के इन स्वरों में यथार्थ की सार्थकता थी। इस ब्राह्मण दंपत्ति के पुण्य चरित्र और तपपरायणता को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो ये प्राचीनकाल के “सुतपा और पृश्नि (वासुदेव और देवकी के पूर्व जन्म)” हैं। जसवंतराव नित्य-नियम से देवी सप्तशती का संपूर्ण पाठ किया करते थे। उनका घर-आंगन प्रतिदिन जगन्माता के महिमागान से मुखरित होता था। सप्तशती के संपूर्ण पाठ के साथ गायत्री मंत्र पर उनकी गहन आस्था थी। “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै” का जप करते हुए वह भावलीन हो जाते थे। देवी सप्तशती के पाठ के समय प्रायः रोज ही उनकी आंखों से भावबिंदु झरने लगते। यदा-कदा रामप्यारी अपने पति से उनके इन भावाश्रुओं के बारे में पूछ लेती। प्रश्न के उत्तर में वह गदगद हो कहते: 

पति की इन बातों को सुनकर रामप्यारी भावमग्न हो जाती। उन्हें इस तरह चुप बैठा हुआ देखकर जसवंतराव पूछ बैठते, ‘‘तुम चुप क्यों हो गईं?’’  एक-दो बार पूछने पर वह धीरे से कहतीं, ‘‘आजकल मुझे भी बड़े विचित्र सपने आने लगते हैं। 

अभी एक-दो दिन पहले ही मैंने सपना  देखा कि मैं हिमालय पर हूँ। श्वेत-शुभ्र हिम शिखर बड़े ही भव्य लग रहे थे। तभी उन हिम शिखरों पर एक देवी प्रकट हुई। सचमुच ही देवी थी वो। धीरे-धीरे वो छोटी-सी लड़की बनकर मेरा हाथ पकड़कर बोली, 

एक सपना तो मैंने आज ही देखा, सपने में छोटी-छोटी आठ लड़कियां एक बड़ी प्यारी-सी लड़की को अपने साथ लेकर मेरे पास आई हैं और मुझसे कह रही हैं, हम सब इसको तुम्हें देने आई हैं। आज से तुम ही इसकी माँ हो, साथ ही हमारी माँ भी हो, क्योंकि हम सब तो इसी की अंश हैं।’’

पत्नी की इन बातों को सुनकर जसवंतराव कुछ पलों के लिए अंतर्लीन हो गए। उन्हें पत्नी के गर्भवती होने की बात पता थी, परंतु ये स्वप्न उन्हें गर्भ की दिव्यता के सूचक लग रहे थे। घर के वातावरण में भी आध्यात्मिक बदलाव के चिह्नों को वे काफी दिनों से अनुभव कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि उनके जीवन में कोई दिव्य घटना घटित होने वाली है। उन्हें इस तरह सोच में डूबा हुआ देख रामप्यारी बोलीं, 

पत्नी के इन प्रश्नों से उनके चिंतन की कड़ियां झंकार के साथ बिखर गईं। वह अपने भावों से उबरते हुए रामप्यारी से बोले,

जसवंतराव की इन बातों को सुनकर रामप्यारी भाव-विह्वल हो गईं। उनकी आंखें छलक उठीं। उन्होंने मन-ही-मन आदिमाता जगदंबा को प्रणाम किया और उठ खड़ी हुईं। अभी उन्हें घर के काफी काम करने थे, लेकिन आज वह घर के काम को करते हुए महसूस कर रही थीं कि उनके भीतर एक अद्भुत आनंद-धारा मंदगति से बह रही है। इससे उनका रोम-रोम, अस्तित्व का अणु-अणु भीग रहा है। काम करते हुए बीच-बीच में उन्होंने अपने दोनों बेटों दीनदयाल एवं सुनहरी लाल और बेटी ओमवती को भरपूर प्यार किया। शायद वह अपने भीतर उमड़ती-उफनती आनंद-सरिता के प्रवाह को अपने बच्चों में भी उड़ेलना चाहती थीं।

रात को सोते समय दिव्य भावानुभूतियों ने उन्हें फिर घेर लिया। उन्हें लगा कि दिव्य लोकों के देवगण, देवियां, सूक्ष्मशरीरधारी ऋषि और सिद्धजन उनके गर्भ पर पुष्पवृष्टि कर रहे हैं। अब यह किसी एक दिन की बात नहीं, नित्य का क्रम हो गया था। गर्भ की अवधि ज्यों–ज्यों पूर्णता की ओर बढ़ रही थी, ये भावानुभूतियां भी उत्तरोत्तर सघन होती जा रही थीं। उनके प्राणों में पुलक बढ़ती जा रही थी। उनकी निर्मल अंतर्चेतना और अधिक उज्ज्वल दीप्ति से प्रकाशित होती जा रही थी।

कालचक्र की बढ़ती गति के साथ वह दिव्य मुहूर्त आ गया, जिसे देवों और ऋषियों ने निश्चित किया था, जिसकी प्रतीक्षा जसवंतराव एवं रामप्यारी को ही नहीं, संपूर्ण विश्व मानवता को थी। 

20 सितंबर 1926 की प्रातः 8 बजे के लगभग दिव्य ज्योति ने जन्म ले लिया। पं. जसवंतराव शर्मा उस समय देवी के नवार्ण मंत्र का जप कर रहे थे। उनके ध्यान में माता की छवि प्रत्यक्ष थी। उनके हृदय की गहराइयों में उपस्थित आदिमाता उन्हें आशीष दे रही थी। तभी उनके कानों में किसी वृद्ध महिला के ये शब्द सुनाई पड़े:

उन्होंने बड़ी ही स्पष्ट रीति से अपने हृदय में श्री देव्यथर्वशीर्षम् की यह मंत्र ध्वनि सुनी: 

इस स्पष्ट मंत्र ध्वनि को अपनी अंतर्चेतना में सुनकर जसवंतराव को यह साफ हो गया कि आदिमाता ने आगमन के साथ ही उन्हें अपना परिचय दे दिया है। वह आदिमाता को प्रणाम करके पूजा के आसन से उठे और कपड़े बदलकर लेड़ी लायल अस्पताल की ओर चल पड़े। उन्हें अपने ज्योतिष ज्ञान की भी सार्थकता सिद्ध करनी थी।

कल तक के लिए मध्यांतर  

धन्यवाद्,जय गुरुदेव 


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